भारत करेगा यूनेस्को के 20वें आईसीएच सत्र की मेज़बानी

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भारत सरकार 8 से 13 दिसंबर 2025 तक नई दिल्ली में अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा के लिए यूनेस्को अंतर-सरकारी समिति के 20वें सत्र की मेज़बानी करेगी। ऐतिहासिक लाल किला परिसर, जो यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, को इस आयोजन स्थल के रूप में चुना गया है, जो भारत की मूर्त और अमूर्त विरासत के एक ही छत के नीचे समागम का प्रतीक है।

यह पहली बार होगा, जब भारत आईसीएच समिति के सत्र की मेज़बानी करेगा और इस बैठक की अध्यक्षता यूनेस्को में भारत के स्थायी प्रतिनिधि महामहिम विशाल वी. शर्मा करेंगे। यह आयोजन 2005 में अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा के लिए 2003 कन्वेंशन के भारत द्वारा अनुसमर्थन की बीसवीं वर्षगांठ के मौके पर हो रहा है, जो जीवंत सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण के लिए भारत की निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

यूनेस्को की परिभाषा के अनुसार, अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में वे प्रथाएँ, ज्ञान, अभिव्यक्तियाँ, वस्तुएँ और स्थान शामिल हैं, जिन्हें समुदाय अपनी सांस्कृतिक पहचान के हिस्से के रूप में देखते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही यह विरासत वक्त के साथ विकसित होती है, सांस्कृतिक पहचान को मज़बूत करती है और विविधता की सराहना करती है।

अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा के लिए, यूनेस्को ने 17 अक्टूबर 2003 को पेरिस में अपने 32वें आम सम्मेलन के दौरान 2003 कन्वेंशन को अपनाया था। इस कन्वेंशन ने वैश्वीकरण, सामाजिक परिवर्तन और सीमित संसाधनों के कारण तेज़ी से ख़तरे में आ रही मौजूदा सांस्कृतिक परंपराएँ, मौखिक प्रथाएँ, प्रदर्शन कलाएँ, सामाजिक रीति-रिवाज, अनुष्ठान, ज्ञान प्रणालियाँ और शिल्प कौशल जैसी वैश्विक चिंताओं पर चर्चा की।

इस सम्मेलन में समुदायों, खास तौर पर स्वदेशी समुदायों, समूहों और व्यक्तिगत अनुयायियों को, सांस्कृतिक विरासत के निर्माण, रखरखाव और हस्तांतरण में उनकी अहम भूमिका को देखते हुए, सुरक्षा प्रयासों के केंद्र में रखा गया। इसमें मूर्त और अमूर्त विरासत के बीच परस्पर निर्भरता, वैश्विक सहयोग की ज़रुरत और युवा पीढ़ी के बीच जागरूकता बढ़ाने के महत्व पर ज़ोर दिया गया। मानवता की जीवंत विरासत की रक्षा के लिए एक साझा वैश्विक प्रतिबद्धता के साथ, इस सम्मेलन ने औपचारिक रूप से अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, समर्थन और मान्यता के लिए तंत्र स्थापित किए, जिसने यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूचियों और उसके बाद अंतर-सरकारी समिति के कार्यों की भी नींव रखी।

उपराष्ट्रपति ने ब्रह्म कुमारी के गुरुग्राम के रजत जयंती वर्ष का शुभारंभ किया

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भारत के उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने आज गुरुग्राम में ब्रह्म कुमारी के ओम शांति रिट्रीट सेंटर (ओएसआरसी) के रजत जयंती वर्ष समारोह का शुभारंभ किया।उपस्थित जनसमूह को संबोधित करते हुए, उपराष्ट्रपति ने इस केंद्र के समारोह में शामिल होने पर प्रसन्नता व्यक्त की। इसकी स्थापना 24 वर्ष पहले ब्रह्म कुमारी के आध्यात्मिक दृष्टिकोण से हुई थी और अब यह अपनी सेवा के 25वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। उन्होंने केंद्र के शांति और ध्यान के संदेश की ओर आकर्षित होने वाले वैज्ञानिकों, डॉक्टरों, प्रशासकों, राजनेताओं जैसे पेशेवरों की विविधता की सराहना की। उन्होंने ब्रह्म कुमारी को दुनिया के सबसे बड़े महिला-नेतृत्व वाले आध्यात्मिक संगठन के रूप में उभरने के लिए बधाई दी।

उपराष्ट्रपति ने आध्यात्‍म, ध्यान और अंत: जागरण में निहित भारत की समृद्ध सभ्यतागत विरासत पर जोर दिया। उन्होंने संतों, ऋषियों और मुनियों के गहन योगदान को याद किया जिनकी तपस्या और ध्यान साधना ने भारत के शाश्वत ज्ञान को आकार दिया है। उन्होंने कहा कि राजयोग और विपश्यना जैसी परंपराएं इस बात के महत्‍व को इंगित करती है कि सच्ची शक्ति और स्पष्टता भीतर से ही उभरती है।

श्री सी.पी. राधाकृष्णन ने इस आध्यात्मिक विरासत को आगे बढ़ाने और भारत तथा विदेशों में लाखों लोगों को मन की शांति और पवित्रता की ओर मार्गदर्शन करने के लिए ब्रह्म कुमारी की सराहना की। उन्होंने कहा कि अमृत काल में, प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने एक विकसित भारत @2047 की कल्पना की है, जहां आर्थिक विकास, आंतरिक स्थिरता, प्रसन्‍नता और शांति पूरक हो। उन्होंने कहा कि आज के तीव्र संसार में ध्यान को एक आवश्यक जीवन कौशल के रूप में अपनाया जाना चाहिए।

उपराष्ट्रपति ने पर्यावरणीय स्थिरता के प्रति ओम शांति रिट्रीट सेंटर की दृढ़ प्रतिबद्धता और प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की पहल मिशन लाइफ के साथ तालमेल की भी सराहना की। यह मिशन लोगों को सचेतन जीवनशैली अपनाने के लिए प्रोत्साहित करता है। उन्होंने केंद्र की हरित पहलों की भी सराहना की जिनमें 1 मेगावाट का हाइब्रिड सौर ऊर्जा संयंत्र, वर्षा जल संचयन प्रणालियां, बायोगैस और सीवेज शोधन संयंत्र, हरित रसोई, निःशुल्क पौध नर्सरी और कल्प तरु परियोजना के तहत बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण शामिल हैं।

उपराष्ट्रपति ने ‘नशा मुक्त भारत अभियान’ और वरिष्ठ नागरिकों के सम्मान तथा सभी क्षेत्रों में कर्मयोग को बढ़ावा देने वाली अन्य सामाजिक पहलों में ब्रह्म कुमारी के योगदान की सराहना की।

हाल ही में लखनऊ में राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु द्वारा ब्रह्म कुमारी के वार्षिक अभियान ‘‘विश्व एकता और विश्वास के लिए राजयोग ध्यान’’ के उद्घाटन का उल्लेख करते हुए, श्री सी.पी. राधाकृष्णन ने विश्वास व्यक्त किया कि रजत जयंती वर्ष सेवा के नए मार्ग खोलेगा, सामाजिक साझेदारी को और गहरा करेगा और आध्यात्मिक पहुंच को बढ़ाएगा।

इस अवसर पर हरियाणा सरकार के पर्यावरण एवं वन तथा उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री श्री राव नरबीर सिंह तथा ब्रह्म कुमारी के वरिष्ठ गणमान्य व्यक्ति भी उपस्थित थे।

प्रधानमंत्री ने गोवा में अग्नि दुर्घटना में हुई जन हानि पर शोक व्यक्त किया

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प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने गोवा के अरपोरा में अग्नि दुर्घटना में हुई जन हानि पर शोक व्यक्त किया है। श्री मोदी ने दुर्घटना में घायल हुए लोगों के शीघ्र स्वस्थ होने की भी कामना की है।रोमियो लेन स्थित एक नाइट क्लब ‘बिर्च’ में मध्यरात्रि के बाद लगी आग में कम से कम 25 लोगों की मौत हो गई।

प्रधानमंत्री ने बताया कि उन्होंने इस स्थिति के बारे में गोवा के मुख्यमंत्री डॉ. प्रमोद सावंत से बात की है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार इस त्रासदी से प्रभावित लोगों को हर संभव सहायता प्रदान कर रही है।

प्रधानमंत्री ने एक्स पर पोस्ट किया;

‘‘गोवा के अरपोरा में हुई अग्नि दुर्घटना बेहद दुखद है। मेरी संवेदनाएं उन सभी लोगों के साथ हैं जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया है। घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की कामना करता हूं। गोवा के मुख्यमंत्री डॉ. प्रमोद सावंत जी से इस स्थिति के बारे में बात की। राज्य सरकार प्रभावित लोगों को हर संभव सहायता प्रदान कर रही है।प्रधानमंत्री ने प्रत्येक मृतक के निकटतम परिजन को पीएमएनआरएफ से 2 लाख रुपये तथा घायलों को 50,000 रुपये की अनुग्रह राशि देने की भी घोषणा की।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने रविवार को कहा कि गोवा के एक नाइट क्लब में आग लगने की घटना में लोगों की मौत ‘बेहद दुखद’ है। गृह मंत्री ने कहा कि स्थानीय प्रशासन बचाव एवं राहत अभियान संचालित कर रहा है और प्रभावितों को आवश्यक देखभाल प्रदान कर रहा है।

शाह ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘गोवा के अरपोरा में आग लगने की घटना में लोगों की मृत्यु बेहद दुखद है। स्थानीय प्रशासन बचाव एवं राहत अभियान संचालित कर रहा है और प्रभावितों को आवश्यक देखभाल प्रदान कर रहा है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘मेरी गहरी संवेदनाएं उन परिवारों के प्रति हैं, जिनके प्रियजनों ने इस हादसे में जान गंवाई है। मैं घायलों के शीघ्र स्वस्थ होने की प्रार्थना करता हूं।’’ रोमियो लेन स्थित एक नाइट क्लब ‘बिर्च’ में मध्यरात्रि के बाद लगी आग में कम से कम 25 लोगों की मौत हो गई।

राज्य की राजधानी पणजी से लगभग 25 किलोमीटर दूर उत्तरी गोवा के अरपोरा गांव में स्थित यह पार्टी स्थल पिछले साल ही खुला था। घटनास्थल पर पहुंचे मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने बताया कि मृतकों में ज्यादातर लोग क्लब की रसोई में काम करने वाले कर्मचारी थे, जिनमें तीन महिलाएं भी शामिल हैं। उन्होंने बताया कि मरने वालों में तीन से चार पर्यटक भी शामिल हैं।

गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने जानकारी दी है कि रविवार को एक नाइटक्लब में लगी भीषण आग के सिलसिले में उस क्लब के जनरल मैनेजर को गिरफ्तार कर लिया गया है। मुख्यमंत्री ने बताया कि क्लब, जिसका नाम ‘द बर्च बाय रोमियो लेन’ है, उसके मालिक के खिलाफ भी गिरफ्तारी वारंट जारी किया गया है।

25 लोगों की मौत, दम घुटने से गई जान

मुख्यमंत्री सावंत ने पुष्टि की कि यह दर्दनाक घटना देर रात करीब 12 बजे हुई। उन्होंने बताया, ‘आग लगने की वजह से कई लोग (नाइटक्लब से) बाहर नहीं निकल पाए और दम घुटने से उनकी मौत हो गई।’ इस हादसे में 25 लोगों के मारे जाने और छह अन्य के घायल होने की पुष्टि हुई है। उन्होंने बताया कि घायल लोग फिलहाल खतरे से बाहर हैं और उनका इलाज गोवा मेडिकल कॉलेज में चल रहा है।

घटना की मजिस्ट्रेट जांच के आदेश

सावंत ने बताया कि स्थिति का जायजा लेने के लिए उन्होंने रात करीब 2 बजे घटना वाली जगह का दौरा किया। उन्होंने इस मामले में मजिस्ट्रेट जांच के आदेश दिए हैं। उन्होंने इस घटना को गोवा के इतिहास में पहली बार हुई ऐसी घटना बताया।सुरक्षा नियमों की अनदेखी की होगी जांच

जब मुख्यमंत्री से पूछा गया कि क्या नाइटक्लब में लगी आग ‘लापरवाही’ का नतीजा थी, तो उन्होंने कहा कि इसकी जांच के आदेश दिए गए हैं। जांच में यह पता लगाया जाएगा कि नाइटक्लब ने आग से सुरक्षा के नियमों का ठीक से पालन किया था या नहीं।

प्रधानमंत्री ने सशस्त्र सेना झंडा दिवस पर सशस्त्र बलों के प्रति आभार व्यक्त किया

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प्रधानमंत्री ने आज सशस्त्र सेना झंडा दिवस के अवसर पर सशस्त्र बलों के बहादुर पुरुषों और महिलाओं के प्रति अपनी गहरी कृतज्ञता व्यक्त की।

उन्होंने कहा कि सशस्त्र बलों के जवानों का अनुशासन, दृढ़ संकल्प और अदम्य साहस राष्ट्र की रक्षा करता है और देशवासियों को सशक्त बनाता है। उन्होंने कहा कि उनकी प्रतिबद्धता, राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, अनुशासन और समर्पण का उदाहरण है।

प्रधानमंत्री ने सभी से सशस्त्र बलों की वीरता और सेवा के सम्मान में सशस्त्र सेना झंडा दिवस कोष में योगदान देने का भी आग्रह किया।

प्रधानमंत्री ने एक्स पर लिखा;

सशस्त्र सेना झंडा दिवस पर, हम उन बहादुर पुरुषों और महिलाओं के प्रति अपनी गहरी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं जो अटूट साहस के साथ हमारे राष्ट्र की रक्षा करते हैं। उनका अनुशासन, दृढ़ संकल्प और भावना हमारे लोगों की रक्षा करते हैं और हमारे राष्ट्र को सशक्‍त बनाते हैं। उनकी प्रतिबद्धता हमारे राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, अनुशासन और समर्पण का एक सशक्त उदाहरण है। आइए, हम भी सशस्त्र सेना झंडा दिवस कोष में योगदान दें।

थार के हस्तशिल्प और वैश्विक बाजार में उनकी पहचान

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बाल मुकुन्द ओझा

घरेलू तथा वैश्विक बाजार में कारीगरों द्वारा तैयार हस्तशिल्प तथा हथकरघा उत्पादों की बहुत मांग है। इसी को दृष्टिगत रखते हुए अखिल भारतीय हस्तशिल्प सप्ताह 8 दिसंबर से लेकर 14 दिसंबर तक देशभर में मनाया जा रहा है । हस्तशिल्प सप्ताह लोगों के बीच हस्तशिल्प की वर्षों पुरानी परंपरा और संस्कृति के महत्व को रेखांकित करता है। हस्तशिल्प देशभर के ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी महत्ता के लिए जानी जाती है। हस्तशिल्प को प्रोत्साहन देने, हस्तशिल्प सामग्रियों को जन जन तक पहुंचाने और उनका प्रचार-प्रसार करने के उद्देश्य से हर साल 8 से 14 दिसंबर के बीच अखिल भारतीय हस्तशिल्प सप्ताह मनाया जाता है। यह एक ऐसा आयोजन है जो हस्तशिल्प कलाओं से जुड़ी परंपराओं और संस्कृतियों को जीवित रखता है। हस्तशिल्प का मतलब होता है ऐसे कलात्मक कार्य जिसे बनाने के लिए हाथ और सरल औजार की सहायता ली जाती है और इसके माध्यम से आप अपने घर को भी सजा सकते हैं I इसके अलावा हस्तशिल्प कला का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व बहुत ज्यादा है। हस्तशिल्प परंपरा में चीजें मशीन के द्वारा नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर हाथों के द्वारा बनाई जाती हैं यही वजह है कि इसे हम लोग हस्तकला के नाम से जानते हैं I विशेषरूप से लोक चित्रकला, फाड़ चित्रकला, चिकनकारी, दरी बुनाई, कनी शॉल बुनाई, हाथ से ब्लॉक प्रिंटिंग, बंधेज टाई डाई, लाख की चूड़ियां, कांथादर्पण कार्य, क्रूल कढ़ाई, पिपली और क्रोशिया की बुनाई, फुलकारी और कलमकारी चित्रकारी, जरदोजी आदि ऐसे हस्तशिल्प कार्य हैं, जिनके जरिये स्थानीयता का राष्ट्रीय पहचान मिलती है।

हम देश के उस क्षेत्र की विरासत से आपको रूबरू कराना चाहते है जो सीमावर्ती तो है ही साथ ही अकाल और सूखे की मार से पीड़ित होने के बावजूद अपनी हस्तशिल्प की कला और संस्कृति को विपरीत स्थितियों में भी सहेजे हुए है। रेतीले धोरों से आच्छादित राजस्थान के सीमावर्ती बाड़मेर जिले के निवासियों के पास हुनर तो है मगर हुनर के विकास की सुविधा नहीं थी। बाड़मेर के लाखों परिवार हस्तशिल्प से जुड़े हैं। कतवारिनें और कशीदा करने वाली महिलाएं उत्पाद तैयार करती है और इनको बेचने का कार्य व्यापारी कर रहे हैं। हस्तशिल्प में अजरख प्रिंट और कांथा वर्क फैमस है। बाड़मेर अपनी पारंपरिक हस्तशिल्प कला के लिए जाना जाता है। यहां के शिल्पकर्मी अपनी कड़ी मेहनत, कला और परंपराओं के माध्यम से इन हस्तशिल्पों को जीवित रखते हैं। बाड़मेर को हस्तशिल्प का खजाना कहा जाता रहा है। यहां हुनरबाजों, कलाकारों की कोई कमी नहीं है लेकिन हस्तशिल्प से बने उत्पादों की सही मार्केटिंग नहीं होने के चलते यहां के हुनरबाजों का हुनर अपने तक ही सीमित रह रहा। बाड़मेर के हस्तनिर्मित बेडशीट, कुशन कवर, अजरख दुनियाभर में भी पसंद की जाती रही है। लकड़ी के हैंडीक्राफ्टस की भी विदेशों में बहुत मांग है। मालाणी के गौरव पदमश्री मगराज जैन ने गरीबी झेल रहे दलित, गरीब ,वंचित और महिलाओं के सशक्तिकरण का बीड़ा उठाया तो लता कच्छवाहा के रूप में उन्हें एक सहकर्मी का साथ मिला। मगराज जैन एक ऐसी शख्सियत है जिन्होंने थार के हस्तशिल्प लोककला और मेलों को पुनर्जीवित कर विश्वस्तरीय ख्याति दिलाने में अहम भूमिका निभाई। इसी तरह करीब पांच हजार से अधिक युवक-युवतियों को हस्तशिल्प यथा कांच कशीदा एप्लीक, चर्म कार्य, रेडियो मरम्मत सहित चालीस से अधिक विभिन्न व्यवसायों में प्रशिक्षण की सुविधा उपलब्ध कराई और उन्हें आत्मनिर्भर बना दिया। युवाओं की रोजी-रोटी का जरिया बन गया।

बाड़मेर सीमा क्षेत्र में 1965 व 1971 के भारत पाक युद्ध के बाद सैंकड़ों पाक विस्थापित परिवार आकर बसे। रोजी रोटी से जूझ रहे मेगवाल जाति के परिवारों की महिलाओं के पास पारम्परिक हुनर था। महिलाएं अपनी बेटियों के दहेज हेतु कांचली, अंगरखी, तकिया, रूमाल या दामाद की बुकानी, बटुआ आदि सुंदर वस्त्र, चादर, रालियां, घर सजाने के लिए तोरण, उंटों एवं घोड़ों को सजाने के लिए तन आदि बनाती थी। उनका यह हुनर मन को मोह लेने वाला था। आकर्षक रंगों के धागों व कांच का उपयोग कर बनाये जानेवाला यह हुनर उम्दा कारीगरी का बेहतरीन नमूना था। मगर महिलाओं को उनके हुनर का उचित मूल्य नहीं मिल पता। बिचौलिये उचित मूल्य के मार्ग में बाधा खड़ी कर रहे थे। 1990 में मगराज जैन द्वारा स्थापित सोसायटी टू अपलिफ्ट रूरल इकोनामी ने बाड़मेर जिले की हजारों महिलाओं को लाभान्वित करने के लिए सन् 1994 में दस्तकारों के प्रषिक्षण, डिजाइनिंग व मार्केटिंग के लिए बाड़मेर से 75 किलामीटर दूर बीजराड़ गांव जहां आसपास के गावों में दस्तकारों की अधिकता थी उनके बीच में क्राफ्ट डवलपमेंट सेंटर की स्थापना की जो आज तक उसी रफ्तार से कार्य कर रहा है। इसके साथ ही  हस्तशिल्प को बढ़ावा देने हेतु सिंगापुर, थाईलैंड, बांगला देश, श्रीलंका आदि देशों में महिलाओं के हुनर को वैश्विक पहचान मिली और उनके उत्पादों का सही मूल्य भी मिलने लगा।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

कुमार साहनी: भारतीय सिनेमा के एक विद्रोही कवि

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​कुमार साहनी (1940-2024) भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक ऐसे महत्वपूर्ण फिल्म निर्माता के रूप में दर्ज हैं, जिन्होंने अपनी कलात्मक और बौद्धिक दृष्टि से फिल्मों को केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि चिंतन और अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। वे समानांतर सिनेमा (Parallel Cinema) या कला सिनेमा (Art Cinema) आंदोलन की प्रमुख हस्तियों में से एक थे, जिन्होंने मुख्यधारा की व्यावसायिक फिल्मों से हटकर, गहन, काव्यात्मक, और अक्सर गूढ़ विषयों पर फिल्में बनाईं। साहनी को भारतीय सिनेमा का “विद्रोही कवि” या “दार्शनिक” कहा जाता है, जिनकी फिल्मों ने दशकों तक दर्शकों और आलोचकों दोनों को चुनौती दी और प्रेरित किया।

​प्रारंभिक जीवन और वैचारिक आधार

​कुमार साहनी का जन्म 1940 में अविभाजित भारत के सिंध प्रांत (अब पाकिस्तान) में हुआ था। उन्होंने फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII), पुणे से फिल्म निर्देशन में शिक्षा प्राप्त की। FTII में, वह प्रख्यात फिल्म निर्माता ऋत्विक घटक के छात्र रहे, जिनकी गहरी वैचारिक समझ और कलात्मक स्वतंत्रता का प्रभाव साहनी के शुरुआती काम पर स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। साहनी ने केवल निर्देशन नहीं सीखा, बल्कि मार्क्सवादी विचारधारा, भारतीय शास्त्रीय संगीत, कला इतिहास और साहित्य का गहन अध्ययन किया, जिसने उनके सिनेमाई दर्शन की नींव रखी।
​स्नातक होने के बाद, साहनी को 1960 के दशक के अंत में फ्रांस जाने का अवसर मिला, जहाँ उन्होंने महान फ्रांसीसी निर्देशक रॉबर्ट ब्रेसों के साथ काम किया। ब्रेसों की Minimalism (अतिसूक्ष्मवाद) और अभिनेताओं के उपयोग की विशिष्ट शैली ने साहनी के सिनेमा को और अधिक परिष्कृत किया। साहनी की कलात्मक दृष्टि ऋत्विक घटक के सामाजिक-राजनीतिक यथार्थवाद और रॉबर्ट ब्रेसों के औपचारिक अनुशासन का एक अनूठा संगम थी।

​सिनेमाई शैली: कविता, प्रतीक और दर्शन

​कुमार साहनी की फिल्में उनकी अत्यंत व्यक्तिगत और काव्यात्मक शैली के लिए जानी जाती हैं। उनकी फिल्में कथावाचन के पारंपरिक रैखिक तरीके का पालन नहीं करतीं; इसके बजाय, वे प्रतीकों, इमेजरी, और एक विशिष्ट लय पर निर्भर करती हैं। उनकी फिल्मों में अक्सर धीमी गति, लंबा टेक (long takes), और एक ध्यानपूर्ण चुप्पी होती है जो दर्शकों को फिल्म के भीतर के दर्शन को समझने के लिए मजबूर करती है।
​साहनी ने भारतीय संस्कृति, इतिहास, मिथकों और लोककथाओं से प्रेरणा ली, लेकिन उन्हें एक आधुनिक और आलोचनात्मक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया। उनकी फिल्में सत्ता संरचनाओं, सामाजिक-आर्थिक विषमताओं, और व्यक्ति की आंतरिक दुविधाओं पर सवाल उठाती हैं। उनकी शैली को अक्सर “विचारों का सिनेमा” कहा जाता है, जहाँ चरित्र और कथानक से अधिक महत्वपूर्ण वह विचार या अवधारणा होती है जिसे वह व्यक्त करना चाहते हैं।

​प्रमुख फिल्में और योगदान

​साहनी के करियर में फिल्मों की संख्या भले ही कम हो, लेकिन उनका महत्व बहुत अधिक है।

​’माया दर्पण’ (1972): यह साहनी की पहली फीचर फिल्म थी और इसे भारतीय सिनेमा की सबसे महत्वपूर्ण शुरुआती कला फिल्मों में से एक माना जाता है। यह एक सामंती पृष्ठभूमि की महिला की निराशा और स्वतंत्रता की लालसा को एक स्तंभित, प्रतीकवादी शैली में दर्शाती है। इस फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ हिंदी फीचर फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीता।

​’तरंग’ (1984): यह फिल्म साहनी के मार्क्सवादी दृष्टिकोण को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करती है। यह पूंजीवाद और श्रमिक वर्ग के शोषण पर केंद्रित है, जिसे एक जटिल और परतदार तरीके से फिल्माया गया है।

​’ख्याल गाथा’ (1989): साहनी की यह कृति भारतीय शास्त्रीय संगीत (विशेषकर ख्याल गायकी) और उसके इतिहास पर एक अर्ध-वृत्तचित्र, अर्ध-काल्पनिक फिल्म है। यह भारतीय संस्कृति के सौंदर्यशास्त्र और उसकी निरंतरता पर गहन चिंतन प्रस्तुत करती है।

​’कस्बा’ (1991): यह फिल्म चेखव की कहानी पर आधारित है और एक छोटे शहर की नैतिकता के पतन को दिखाती है, जिसमें साहनी की विशेषता वाली सूक्ष्मता और सामाजिक आलोचना निहित है।

​’बवंडर’ (1996): यह उनकी अंतिम फीचर फिल्म थी, जो राजस्थान की एक महिला की सच्ची कहानी पर आधारित थी, जिसने सामंती व्यवस्था और यौन हिंसा के खिलाफ लड़ाई लड़ी।

​विरासत और प्रभाव

​कुमार साहनी का काम भारतीय सिनेमा के छात्रों, गंभीर फिल्म प्रेमियों और निर्देशकों की पीढ़ियों के लिए एक पाठ्यपुस्तक जैसा है। वे उन निर्देशकों में से थे जिन्होंने सौंदर्यशास्त्र और राजनीति को एक साथ लाने की हिम्मत की। उनकी फिल्मों को समझना हमेशा आसान नहीं रहा, लेकिन उनकी कलात्मक ईमानदारी और समझौता न करने वाले दृष्टिकोण ने उन्हें एक पंथ का दर्जा दिया।
​साहनी ने केवल फिल्में नहीं बनाईं, बल्कि उन्होंने भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्र पर महत्वपूर्ण लेख भी लिखे। उन्होंने हमेशा फिल्मों को एक व्यापक सांस्कृतिक संदर्भ में देखा, जहाँ सिनेमा अन्य कला रूपों—संगीत, नृत्य, चित्रकला और साहित्य—से संवाद करता है।
​कुमार साहनी का निधन 2024 में हुआ, लेकिन उनका काम भारतीय सिनेमा को लगातार याद दिलाता रहेगा कि सिनेमा केवल एक उद्योग नहीं, बल्कि एक कला, एक दर्शन, और समाज को बदलने की शक्ति रखने वाला माध्यम भी है। वे सही मायने में भारतीय कला सिनेमा के एक स्तंभ थे।

हरियाणा में टोल की मार: सबसे ऊँची वसूली, सबसे कम दूरी — व्यवस्था पर ठोस सवाल

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जब गुजरात जैसा बड़े आकार वाला प्रदेश पीछे रह जाए और छोटा हरियाणा टोल वसूली में सबसे आगे हो—तो यह महज संयोग नहीं, नीतिगत असंतुलन का संकेत है

— डॉ सत्यवान सौरभ

लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में वह सच सामने आया जिसे हरियाणा के लोग वर्षों से महसूस कर रहे थे—टोल की बढ़ती बोझिल मार, अनियमित ढांचा, और हर कुछ किलोमीटर पर खड़े बैरियर। संसद में दिया गया यह सरकारी डेटा सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम के कामकाज, प्राथमिकताओं और नीति-निर्माण की मानसिकता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि देश में प्रति व्यक्ति सबसे अधिक टोल वसूली हरियाणा में होती है—₹917.1 प्रति नागरिक, जो पूरे भारत में नंबर एक है।

यह तथ्य चौंकाता इसलिए भी है क्योंकि हरियाणा का भौगोलिक आकार, जनसंख्या, मार्ग-लंबाई और औद्योगिक स्थिति गुजरात से कई स्तरों पर छोटी है। गुजरात हरियाणा से तीन गुना बड़ा राज्य है, लेकिन वहाँ टोल वसूली हरियाणा से कम है। यह अंतर सिर्फ क्षेत्रफल का नहीं, बल्कि प्रशासनिक दूरदृष्टि, नीति-व्यवस्थापन और सार्वजनिक हित के मूल्यांकन का अंतर दिखाता है।

जब यह सामने आता है कि गुजरात में कुल 62 टोल प्लाज़ा हैं, वहीं हरियाणा में 75, तो सबसे पहले सवाल यह उठता है कि आखिर छोटे प्रदेश पर इतनी अधिक वसूली का बोझ क्यों? कौन-सी बाध्यताएँ या प्राथमिकताएँ हैं जिनके चलते हरियाणा में टोल प्लाज़ा की घनत्व अन्य राज्यों से कहीं अधिक है? टोल की संख्या अपने आप में समस्या नहीं है; समस्या वहाँ बनती है जहाँ नियमों का पालन न हो, दूरी का मानक तोड़ा जाए, और जनता की जेब से अधिकतम वसूली की कोशिश व्यवस्था के लक्ष्य के रूप में स्थापित हो जाए।

राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) के नियमों के अनुसार, दो टोल प्लाज़ा के बीच न्यूनतम दूरी 60 किलोमीटर होनी चाहिए। यह नियम इसलिए बनाया गया था कि जनता पर अनावश्यक भार न पड़े और सड़क-सुविधाओं का उपयोग न्यायपूर्ण तरीके से हो। लेकिन हरियाणा का मामला बिल्कुल उलट है—यह देश का अकेला प्रदेश है जहाँ 2 टोल के बीच औसत दूरी 45 किलोमीटर है, यानी स्थापित मानक से 25% कम।

यह अंतर कोई छोटा सांख्यिकीय खेल नहीं, बल्कि एक गहरी संरचनात्मक गड़बड़ी की ओर संकेत करता है। हरियाणा में सड़कों का जाल जरूर है, लेकिन हर सड़क पर टोल की रणनीति क्या जनसुविधा के अनुरूप है? या फिर यह योजना आर्थिक वसूली का एक ऐसा मॉडल बन गई है जो जनता की जेब पर निरंतर बोझ डालने का काम कर रही है?

टोल प्लाज़ा किसी भी राज्य के लिए दोहरी भूमिका निभाते हैं—आर्थिक संसाधन जुटाना और सड़क निर्माण/रखरखाव में योगदान देना। लेकिन जब टोल से आय इतनी अधिक हो जाए कि लोगों को यात्रा करने से पहले हर 40–50 किलोमीटर पर जेब ढीली करनी पड़े, तब यह व्यवस्था संदेहास्पद लगने लगती है। इस संदर्भ में हरियाणा की तुलना गुजरात से करना नीतिगत विसंगति को और भी उजागर करता है। गुजरात का क्षेत्रफल विशाल है, औद्योगिक गतिविधियाँ अधिक हैं, राजमार्ग कहीं अधिक लंबाई में फैले हैं, फिर भी टोल की संख्या कम है। यह दर्शाता है कि वहाँ योजना संतुलित है, दूरी का औसत मानक के करीब है, और जनता पर अपेक्षाकृत कम दबाव है।

हरियाणा के लोग दोहरी मार झेल रहे हैं—एक तरफ यात्रा की लागत बढ़ रही है, दूसरी तरफ टोल की आवृत्ति। यही कारण है कि प्रदेश में व्यापारियों, किसानों, निजी वाहन चालकों और दैनिक यात्रियों में असंतोष लगातार बढ़ रहा है। दिल्ली–एनसीआर से जुड़े हर जिले—सोनीपत, झज्जर, गुरुग्राम, फरीदाबाद, पलवल, रोहतक—लगभग हर दिशा में टोल प्लाज़ा की भरमार है। यह स्थिति ऐसी है कि कोई भी व्यक्ति 150–200 किमी की यात्रा में तीन से पाँच टोल पार कर लेता है। यह सिर्फ असुविधा नहीं, एक गहरी वित्तीय क्षति है, जो दीर्घकाल में राज्य की गतिशीलता और आर्थिक दक्षता पर प्रभाव डालती है।

प्रश्न यह भी उठता है कि अंततः इस अधिकतम वसूली का उपयोग कहाँ हो रहा है? क्या हरियाणा की सड़कें, फ्लाईओवर, सुरक्षा और मार्ग-गुणवत्ता उतनी ही बेहतर हैं जितनी वसूली अधिक है? क्या जनता को उसके पैसे का समुचित प्रतिफल मिल रहा है? अक्सर देखने में आता है कि कई रास्ते निर्माणाधीन रहते हैं, कई जगहों पर काम धीमा पड़ जाता है, और अनेक स्थानों पर सुविधा अपेक्षित स्तर से कम होती है। यदि वसूली इतनी अधिक है, तो सुविधाएँ भी उसी स्तर की होनी चाहिए। लेकिन जमीन की वास्तविकता इस दावे की पुष्टि नहीं करती।

टोल वसूली को लेकर एक और गंभीर विमर्श यह है कि हर कुछ किलोमीटर पर टोल होने से लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ती है। जब मालवाहक ट्रकों, कृषि उत्पादों और औद्योगिक सामग्री पर टोल का अतिरिक्त भार पड़ता है, तो उसकी कीमत अंततः आम उपभोक्ता तक पहुँचकर महँगाई को बढ़ाती है। इस प्रकार टोल का बोझ सिर्फ यात्रियों पर ही नहीं, पूरे आर्थिक ढाँचे पर पड़ता है। हरियाणा की पहचान कृषि और उद्योग दोनों में अग्रणी प्रदेश की है। ऐसे में टोल की अधिकतम घनत्व व्यापारिक गतिविधियों की गति को धीमा करता है और प्रदेश की प्रतिस्पर्धी क्षमता को कमजोर करता है।

यदि देश के बड़े राज्य नीति के अनुसार टोल दूरी का संतुलन बनाए रख सकते हैं, तो हरियाणा क्यों नहीं? यह सवाल सिर्फ संख्या का नहीं, नियत का है। क्या वाकई नियमों के मुताबिक प्लेसमेंट हुआ? क्या पुनरीक्षण हुआ? क्या राज्य सरकार ने इस पर केंद्र से संवाद किया? क्या स्थानीय जन-प्रतिनिधियों ने इस मुद्दे को नियमित रूप से उठाया? जनता के प्रश्नों का उत्तर तभी मिलेगा जब नीति-निर्माता इस मुद्दे को गंभीरता से लें।

आज जरूरत है कि राज्य और केंद्र मिलकर हरियाणा के टोल ढाँचे का विस्तृत पुनर्मूल्यांकन करें। जिस प्रदेश में औसत दूरी 45 किमी है, वहाँ नियमों के अनुरूप पुनर्व्यवस्था अनिवार्य है। साथ ही, प्रति व्यक्ति इतनी अधिक वसूली का सीधा अर्थ है कि सिस्टम की प्राथमिकताओं में सुधार की आवश्यकता है। जनता कोई मशीन नहीं जिसे टोल का सिक्का डालकर आगे बढ़ा दिया जाए; वह करदाता है, सुविधा चाहता है, और पारदर्शिता का अधिकार रखता है।

अंततः, व्यवस्था को जनता के हित में काम करना चाहिए, न कि जनता को व्यवस्था के हित में मजबूर करना चाहिए। हरियाणा में टोल का यह असंतुलन सिर्फ आर्थिक मसला नहीं; यह शासन की प्राथमिकताओं का प्रतिबिंब है। अब समय है कि इस असंतुलन को दुरुस्त किया जाए—ताकि सड़कें विकास का माध्यम बनें, बोझ न बन जाएं।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,

अंतरराष्ट्रीय मंच पर शिष्टाचार और भारतीय प्रतिनिधित्व का सवाल

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स्वतंत्र पत्रकारिता का अधिकार महत्वपूर्ण, पर राष्ट्र की गरिमा और सांस्कृतिक सौम्यता की अनदेखी नहीं

विश्व के सामने बैठने का ढंग, बोलने की शैली और प्रस्तुति—ये केवल व्यक्तिगत विकल्प नहीं, बल्कि देश की सामूहिक पहचान का प्रतीक होते हैं।

– डॉ. प्रियंका सौरभ

भारत में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के इंटरव्यू को लेकर उठी बहस किसी छोटे विवाद का परिणाम नहीं है, बल्कि यह उस बड़े प्रश्न से जुड़ा है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से किस प्रकार की छवि प्रस्तुत कर रहा है। जब इंडिया टुडे/आज तक की पत्रकार अंजना ओम कश्यप और उनकी सहयोगी गीता मोहन ने पुतिन का इंटरव्यू लिया, तब उस बातचीत से अधिक चर्चा में उनका बैठने का ढंग, शारीरिक मुद्रा और व्यवहार आ गया। कई दर्शकों ने इसे भारतीय शिष्टाचार के विरुद्ध माना, और यह मुद्दा सोशल मीडिया, समाचार मंचों और सार्वजनिक विमर्श में तेजी से उभरा।

यह चर्चा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सिर्फ दो पत्रकारों के व्यक्तिगत व्यवहार का मामला नहीं रह गया है; यह भारत के सांस्कृतिक चरित्र, अंतरराष्ट्रीय शिष्टाचार, राजनयिक संवेदनशीलता और भारतीय मीडिया की पेशेवर पहचान का व्यापक प्रश्न बन चुका है। वैश्विक राजनीति के इस दौर में, जहाँ हर शब्द, हर चित्र और हर संकेत तुरंत विश्वभर में प्रसारित हो जाता है, किसी भी प्रतिनिधि का व्यवहार देश की सामूहिक पहचान का हिस्सा बनकर देखा जाता है।

भारतीय सभ्यता का मूल भाव हमेशा विनम्रता, सम्मान और मर्यादा पर आधारित रहा है। “अतिथि देवो भव” सिर्फ एक नारा नहीं है, बल्कि भारतीय समाज की जड़ों में गहराई से बसा जीवन–मूल्य है। हम मानते आए हैं कि अतिथि का स्वागत सम्मानपूर्वक किया जाए, चाहे वह किसी भी शक्ति, समाज या देश से आता हो। ऐसे में जब रूस जैसी महाशक्ति के राष्ट्रपति, जो वैश्विक राजनीति में एक निर्णायक भूमिका निभाते हैं, भारत के पत्रकारों को इंटरव्यू देने बैठते हैं, तो लोगों की अपेक्षा स्वाभाविक रूप से अधिक हो जाती है।

इन अपेक्षाओं का केंद्र यह है कि पत्रकारों का व्यवहार पेशेवर हो—शब्दों में दृढ़ता हो, प्रश्नों में साहस हो, पर मुद्रा और प्रस्तुति में गरिमा भी हो। भारतीय नागरिकों का यह मानना गलत नहीं है कि उनके मीडिया प्रतिनिधि विश्व मंच पर भारत की सांस्कृतिक मर्यादा को भी साथ लेकर चलें।

पत्रकारिता का स्वरूप स्वभावतः निर्भीक होता है। सत्ता से सवाल पूछना इसका धर्म है। अंतरराष्ट्रीय नेता भी इस बात से भलीभांति परिचित होते हैं कि मीडिया की भूमिका केवल प्रशंसा करने की नहीं होती, बल्कि आलोचना और कठोर प्रश्न भी उसी लोकतांत्रिक ढांचे का हिस्सा होते हैं जिसमें शक्तिशाली नेतृत्व स्वयं को जवाबदेह बनाता है। लेकिन साहसी प्रश्न पूछने और असभ्यता की सीमा लाँघने में अंतर होता है, और यही अंतर इस बहस को तर्कसंगत बनाता है।

बहुत–से दर्शकों का कहना था कि बैठने का ढंग अत्यधिक अनौपचारिक और एक राष्ट्राध्यक्ष की उपस्थिति के अनुपयुक्त था। आप चाहे दुनिया के किसी भी देश की मीडिया प्रथाओं को देखें, वहां एक न्यूनतम स्तर का औपचारिक शिष्टाचार इंटरव्यू के संदर्भ में अपनाया जाता है, विशेषकर तब जब साक्षात्कारकर्ता कोई राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री या उच्च–पदस्थ वैश्विक नेता हो। रूस के राष्ट्रपति पुतिन जैसे नेता के साथ ऐसा इंटरव्यू सामान्य मीडिया बातचीत नहीं माना जाता; यह भारत–रूस संबंधों के अप्रत्यक्ष प्रतीकात्मक आयाम का हिस्सा होता है।

दर्शकों के मन में यह भी स्वाभाविक प्रश्न उठा कि जहाँ पुतिन अत्यंत संतुलित, सीधी मुद्रा में, कूटनीतिक गरिमा के साथ बैठे थे, वहीं भारतीय पत्रकारों का अत्यधिक सहज, लगभग घरेलू अंदाज़ में बैठना क्या अंतरराष्ट्रीय अपेक्षाओं के अनुरूप था? लोग यह नहीं कह रहे कि पत्रकार सिर झुकाकर, भयभीत होकर या अधीनस्थ मुद्रा में बैठें। लेकिन सभ्यता और शिष्टाचार के अनुकूल एक बुनियादी औपचारिक शैली हर पेशेवर को अपनानी चाहिए। यही वह सांस्कृतिक सूक्ष्मता है जो भारत की पहचान को अलग करती है।

सवाल यह भी है कि क्या यह विवाद अति–संवेदनशीलता का परिणाम है? क्या जनता ने पत्रकारों के काम से अधिक उनके बैठने को मायने दे दिया? यह प्रश्न भी अनदेखा नहीं किया जा सकता। मीडिया की एक भूमिका यह भी है कि वह सहज माहौल बनाए ताकि नेता खुलकर बोल सकें। लेकिन क्या सहजता का अर्थ शिष्टाचार त्याग देना है? यह संतुलन ही इस बहस का केंद्र है।

एक और महत्वपूर्ण आयाम यह है कि विवाद के बीच कुछ सोशल मीडिया संदेशों में यह दावा किया गया कि पश्चिमी देश भारतीयों को अपमानजनक नामों से बुलाते हैं। यह कथन न केवल तथ्यहीन है बल्कि इससे भारतीय समाज में अनावश्यक हीनभावना भी पैदा होती है। किसी एक पत्रकार के व्यवहार को आधार बनाकर पूरे देश पर ऐसे अपमानजनक लेबल लगाना न केवल गलत है बल्कि भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा के भी खिलाफ है। भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, वैश्विक कूटनीति का केंद्र है, और दुनिया भारतीय प्रतिभा को सम्मान और अवसर दे रही है। ऐसे में गलत, अपमानजनक और प्रमाण–विहीन बातों का प्रचार केवल समाज को विभाजित करता है।

भारतीय पत्रकारिता के सामने आज एक बड़ा चुनौतीपूर्ण मोड़ है। एक तरफ यह सरकारों और शक्तिशाली संस्थाओं से कठोर सवाल पूछने की जिम्मेदारी निभाती है, दूसरी तरफ इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेशेवर व्यवहार के मानकों का भी पालन करना होता है। यह कहना गलत नहीं होगा कि यदि भारत दुनिया में सशक्त आवाज बनना चाहता है, तो उसके मीडिया को भी उसी स्तर की गरिमा और गंभीरता दिखानी होगी।

इस विवाद ने एक और पहलू उजागर किया—भारत में सोशल मीडिया की तुरंत और तेज़ प्रतिक्रिया। आज हर दृश्य, हर शब्द, हर गतिविधि पलभर में करोड़ों लोगों तक पहुँच जाती है। यह लाभदायक है क्योंकि इससे जवाबदेही बढ़ती है, पर यह चुनौतीपूर्ण भी है क्योंकि भावनाएँ तर्क से अधिक प्रभावी हो जाती हैं। इसी कारण कभी–कभी घटनाएँ वास्तविकता से अधिक बढ़ा–चढ़ाकर प्रस्तुत हो जाती हैं। लेकिन इस मामले में लोगों की भावनाओं में एक वास्तविक चिंता झलकती है—भारतीय पहचान को विश्व मंच पर किस प्रकार प्रदर्शित किया जा रहा है?

यह आलोचना पत्रकारों को अपमानित करने के लिए नहीं है। यह एक गंभीर और आवश्यक विमर्श है कि भारत, जो विश्व राजनीति में लगातार ऊँचा उठ रहा है, उसे अपने व्यवहार, भाषण, प्रस्तुति और संवाद–शैली में भी वैसा ही परिपक्व और संतुलित दिखना चाहिए। भारत की सांस्कृतिक परंपरा केवल वेशभूषा या भाषा तक सीमित नहीं है; यह हमारे आचरण, विनम्रता, आदर और संतुलन में भी प्रकट होती है।

अंतरराष्ट्रीय नेता भारत की ओर सिर्फ उसकी आर्थिक और रणनीतिक क्षमता के कारण नहीं देखते, बल्कि उसकी सांस्कृतिक शक्ति, उसकी नैतिक परंपरा और उसकी गहरी सभ्यता के कारण भी। हिंदुस्तान की यही पहचान रही है कि हमने विश्व को शिष्टाचार, संवाद और संतुलन की विरासत दी है। इसलिए यह अपेक्षा भी स्वाभाविक है कि हमारे पत्रकार, हमारे कूटनीतिज्ञ, हमारे प्रोफेशनल्स—जब वे विश्व के सामने भारत का चेहरा बनते हैं—तो वे उस गरिमा और सौम्यता को भी प्रतिबिंबित करें जो हमें विशिष्ट बनाती है।

इस घटना ने एक सीख दी है—संचार का दायरा जितना बढ़ेगा, जिम्मेदारियाँ भी उतनी ही बड़ी होंगी। और जब जिम्मेदारी देश की प्रतिष्ठा से जुड़ी हो, तो छोटी–छोटी बातें भी महत्वपूर्ण हो जाती हैं। बैठने का ढंग, पेशेवर मुद्रा, भाषा—सभी उस बड़े फ्रेम का हिस्सा हैं जिसे दुनिया ‘भारत’ के रूप में देखती है।

अंततः इस बहस का सार यही है कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता और साहस का सम्मान किया जाए, पर साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि भारत की सांस्कृतिक गरिमा और अंतरराष्ट्रीय शिष्टाचार का सम्मान हर मंच पर बना रहे। स्वतंत्रता और मर्यादा विरोधी नहीं हैं—दोनों मिलकर भारत की उस संतुलित, परिपक्व और विश्वसनीय छवि को गढ़ते हैं जिसकी आज दुनिया को आवश्यकता है।

भारत की पहचान उसकी सभ्यता में है, और इस सभ्यता का सार यही कहता है—

साहस भी हो, संवेदनशीलता भी।

प्रश्नों में दृढ़ता हो, व्यवहार में गरिमा भी।

– डॉ. प्रियंका सौरभ

भारत वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच आत्मविश्वास से भरा हुआ हैः मोदी

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नई दिल्ली, ६ दिसंबर , प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को हिंदुस्तान टाइम्स लीडरशिप सम्मिट के २३वें संस्करण को संबोधित करते हुए कहा कि भारत वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच आत्मविश्वास से भरा हुआ है और विश्व अर्थव्यवस्था का प्रमुख विकास चालक बनता जा रहा है। नई दिल्ली में आयोजित इस कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने भारत की आर्थिक उपलब्धियों, शासन में सुधार और औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति की आवश्यकता पर जोर दिया।
प्रधानमंत्री ने सम्मिट की शुरुआत में बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर को उनके महापरिनिर्वाण दिवस पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि आज का दिन संविधान के शिल्पकार को याद करने का दिन है। उन्होंने कहा कि इक्कीसवीं सदी की एक चौथाई अवधि बीत चुकी है और इन २५ वर्षों में विश्व ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। वैश्विक महामारी, आर्थिक संकट, तकनीकी बदलाव और युद्ध जैसी परिस्थितियों ने दुनिया को चुनौती दी है। लेकिन इन अनिश्चितताओं के बीच भारत एक अलग श्रेणी में उभर रहा है।
आर्थिक उपलब्धियों पर जोर
प्रधानमंत्री ने भारत की दूसरी तिमाही में ८.२ प्रतिशत की वृद्धि दर का उल्लेख करते हुए कहा कि जब वैश्विक विकास दर लगभग ३ प्रतिशत है और जी७ देशों की औसत वृद्धि दर १.५ प्रतिशत के आसपास है, तब भारत उच्च विकास और कम मुद्रास्फीति का एक आदर्श मॉडल बन गया है। उन्होंने कहा कि यह केवल आंकड़े नहीं हैं बल्कि मजबूत व्यापक आर्थिक संकेत हैं जो यह संदेश देते हैं कि भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था का विकास चालक बन रहा है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि एक समय था जब देश में विशेषकर अर्थशास्त्री उच्च मुद्रास्फीति को लेकर चिंता व्यक्त करते थे, लेकिन आज वही लोग कम मुद्रास्फीति की बात करते हैं। यह परिवर्तन केवल सांख्यिकीय नहीं है बल्कि यह एक ऐसे राष्ट्र के लचीलेपन को दर्शाता है जो अपनी चुनौतियों का समाधान स्वयं खोज रहा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत की उपलब्धियां साधारण नहीं हैं, यह केवल संख्याओं के बारे में नहीं है बल्कि पिछले दशक में लाए गए मौलिक परिवर्तन के बारे में है।
विश्वास आधारित शासन की पहल
प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि अब कई आधिकारिक प्रक्रियाओं के लिए स्व-सत्यापन पर्याप्त होगा, जो नागरिकों को सशक्त बनाने और लालफीताशाही को कम करने के लिए बनाया गया है। उन्होंने कहा कि पुरानी सरकारों का अपने नागरिकों में विश्वास नहीं था और दस्तावेजों के लिए आधिकारिक प्रमाणीकरण की जटिल आवश्यकता थी। मोदी ने कहा कि हमारी सरकार ने उस काम करने के तरीके को तोड़ दिया और अब नागरिक का स्व-सत्यापित दस्तावेज उसकी प्रामाणिकता साबित करने के लिए पर्याप्त है।
प्रधानमंत्री ने जन विश्वास विधेयक प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें छोटे अनुपालनों को अपराध की श्रेणी से बाहर करना भी शामिल है ताकि आम लोगों पर बोझ कम किया जा सके। उन्होंने गारंटी मुक्त ऋण के परिवर्तनकारी प्रभाव पर जोर देते हुए कहा कि छोटे विक्रेताओं, फेरीवालों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को पहले ही ३७ लाख करोड़ रुपये वितरित किए जा चुके हैं। उन्होंने कहा कि यहां तक कि जो लोग केवल १,००० रुपये की मांग करते हैं, वे भी बिना गारंटी के ऋण प्राप्त कर रहे हैं।
दावा न किए गए धन की समस्या
प्रधानमंत्री ने दावा न किए गए धन के चौंकाने वाले आंकड़े प्रकट किए – बैंकों में ७८,००० करोड़ रुपये, बीमा कंपनियों के पास १४,००० करोड़ रुपये, म्यूचुअल फंड में ३,००० करोड़ रुपये और लाभांश में ९,००० करोड़ रुपये निष्क्रिय पड़े हुए हैं। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सरकार इन रकमों को उनके सही मालिकों तक पहुंचाने के लिए प्रयासरत है। यह पहल नागरिकों के प्रति सरकार के विश्वास और उनके अधिकारों की रक्षा के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
औपनिवेशिक मानसिकता की आलोचना
प्रधानमंत्री ने १९७० के दशक में गढ़े गए वाक्यांश ‘हिंदू वृद्धि दर’ पर तीखी आलोचना करते हुए कहा कि यह भारत की धीमी आर्थिक प्रगति के लिए भारतीय संस्कृति को दोषी ठहराने का प्रयास था। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या उस समय सांप्रदायिकता दिखाई नहीं देती थी। मोदी ने कहा कि इस तरह के लेबल भारत की परंपराओं के खिलाफ गहरे पूर्वाग्रह को दर्शाते हैं।
उन्होंने राष्ट्र से औपनिवेशिक शासन से विरासत में मिली गुलामी की मानसिकता को छोड़ने का आह्वान किया। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि भारत को पुरानी धारणाओं में सीमित रहने के बजाय अपना स्वयं का मार्ग तय करना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत की आर्थिक यात्रा को औपनिवेशिक ढांचे से मुक्त होकर अपनी शर्तों पर समझा जाना चाहिए।
परिवर्तन की व्यापक कहानी
प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत में हो रहा परिवर्तन केवल संभावनाओं के बारे में नहीं है बल्कि यह जीवन बदलने, सोच बदलने और एक नए दिशा में आगे बढ़ते राष्ट्र की वास्तविक कहानी है। उन्होंने कहा कि पिछले दशक में भारत की सफलता ने हमें बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने के लिए प्रेरित किया है। इसने आशा जगाई है कि यह सदी भारत की सदी होगी।
उन्होंने इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए कई प्रयासों की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि सरकार हर क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ करने के लिए तेजी से काम कर रही है। उन्होंने कहा कि हमारी प्रक्रियाओं को ऐसा बनाने की जरूरत है कि भारत का मानक विश्व स्तरीय माना जाए, चाहे वह उत्पादों का निर्माण हो या निर्माण, शिक्षा हो या मनोरंजन।
वैश्विक नेतृत्व की भूमिका
प्रधानमंत्री ने रेखांकित किया कि जब दुनिया मंदी की बात करती है तो भारत विकास की कहानी लिख रहा है। जब दुनिया विश्वास के संकट का सामना कर रही है तो भारत विश्वास के एक स्तंभ के रूप में उभर रहा है। जब दुनिया विखंडन की ओर बढ़ रही है तो भारत सेतु निर्माता बन रहा है। उन्होंने कहा कि आज जब हम कल के परिवर्तन पर चर्चा कर रहे हैं, तो यह स्पष्ट है कि जिस बदलाव की हम आकांक्षा करते हैं, वह वर्तमान के काम के माध्यम से बनाई जा रही मजबूत नींव में दृढ़ता से निहित है।
प्रधानमंत्री ने कहा कि आज हम जो सुधार करते हैं और आज हम जो प्रदर्शन देते हैं, वे हमारे कल के परिवर्तन के लिए मार्ग को आकार दे रहे हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भारत विकास की इस गति को बनाए रखेगा और जल्द ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा।
शासन में सरलीकरण और सशक्तिकरण
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में नीति सुधारों को सांस्कृतिक दृढ़ता के साथ जोड़ते हुए प्रशासनिक विश्वास, आर्थिक आत्मविश्वास और सभ्यतागत गौरव के विषयों को एक साथ बुना। प्रमाणीकरण से स्व-प्रमाणीकरण में बदलाव को रेखांकित करते हुए उन्होंने यह प्रदर्शित करने की कोशिश की कि शासन नागरिकों पर बोझ डालने के बजाय उन्हें कैसे सशक्त बना सकता है।
उन्होंने कहा कि उनका संबोधन एक आत्मविश्वासी भारत के निर्माण की व्यापक कथा को दर्शाता है, जहां शासन सरल है, नागरिकों पर भरोसा किया जाता है और सांस्कृतिक पहचान को ठहराव के कारण के बजाय ताकत के स्रोत के रूप में मनाया जाता है। उन्होंने पुरानी नीतियों की आलोचना करते हुए कहा कि विशेषज्ञों द्वारा बढ़ावा दिए गए वाक्यांश ‘अच्छी अर्थशास्त्र खराब राजनीति है’ पूर्व सरकारों के लिए खराब शासन और अक्षमता को छिपाने का साधन बन गया था।
प्रधानमंत्री ने १९९० के दशक को याद करते हुए कहा कि उस समय १० वर्षों में भारत ने ५ चुनाव देखे थे जो देश में अस्थिरता के स्पष्ट संकेत थे। जबकि समाचार पत्रों में लिखने वाले विशेषज्ञों ने भविष्यवाणी की थी कि चीजें उसी तरह जारी रहेंगी, लेकिन भारत के नागरिकों ने एक बार फिर उन्हें गलत साबित कर दिया। आज जब दुनिया भर में अनिश्चितता और अस्थिरता की बात हो रही है और कई देशों में नए प्रशासन सत्ता में आ रहे हैं, तब भारत में लोगों ने तीसरी बार उसी सरकार को चुना है।

हिंदुस्तान टाइम्स लीडरशिप सम्मिट में प्रधानमंत्री मोदी का संबोधन भारत की बढ़ती आर्थिक ताकत, शासन में सुधार और आत्मविश्वास से भरे राष्ट्र की तस्वीर पेश करता है। उनके शब्दों में भारत की विकास यात्रा, औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति का संकल्प और वैश्विक मंच पर नेतृत्व की भूमिका निभाने की तैयारी स्पष्ट रूप से झलकती है। यह संबोधन न केवल भारत के आर्थिक प्रदर्शन का जश्न है बल्कि एक नए, आत्मविश्वासी और सशक्त भारत के निर्माण का आह्वान भी है

डॉ. जितेंद्र सिंह ने पंचकुला में विज्ञान महोत्सव का उद्घाटन किया

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केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज हरियाणा के पंचकूला में भारतीय अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव (आईआईएस) का उद्घाटन किया। उन्होंने इसे तीन “सी”,  उत्सव, संचार और करियर, के इर्द-गिर्द परिभाषित किया। उन्होंने इस कहा कि भारत की वैज्ञानिक प्रगति प्रयोगशालाओं से आगे बढ़ना चाहिए और नागरिकों, छात्रों एवं युवा पेशेवरों को सार्थक रूप से इसमें शामिल होना चाहिए। इस महोत्सव का 11वां संस्करण 06 से 09 दिसंबर तक आयोजित किया जा रहा है।

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारतीय अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव को एक सामान्य अकादमिक सभा के रूप में नहीं, बल्कि एक खुले, जन-केंद्रित मंच के रूप में स्वीकार किया गया है जो विज्ञान को लोगों के समीप लाता है। उन्होंने कहा कि यह महोत्सव वैज्ञानिकों एवं वैज्ञानिक अनुसंधान के लक्षित लाभार्थियों के बीच वार्तालाप को प्रोत्साहित करता है, जो विज्ञान मंत्रालयों एवं विभागों के बीच अधिक समन्वय एवं एकता पर सरकार के दृष्टिकोण को दर्शाता है।

मंत्री ने तीन ‘सी’ पर विस्तार से जानकारी देते हुए कहा कि आईआईएसएफ भारत की वैज्ञानिक यात्रा एवं विभिन्न क्षेत्रों में उपलब्धियों का उत्सव है, शिक्षण एवं अनुसंधान संस्थानों के बाहर वैज्ञानिक ज्ञान को फैलाता है और युवा प्रतिभागियों के लिए एक करियर खोज मंच के रूप में कार्य करता है। उन्होंने कहा कि छात्र, शोधकर्ता और पहली बार सीखने वाले छात्रों को महोत्सव के दौरान आयोजित सत्रों के साथ-साथ अनौपचारिक नेटवर्किंग के माध्यम से अनुसंधान, स्टार्टअप और उद्योग में उभरते अवसरों की जानकारी प्राप्त करने का अवसर मिलता है।

द्घाटन कार्यक्रम के दौरान, मंत्री ने विज्ञान-प्रौद्योगिकी-रक्षा-अंतरिक्ष प्रदर्शनी और “विज्ञान पर एक क्षेत्र” प्रदर्शनी का उद्घाटन किया, जो इंटरैक्टिव डिस्प्ले के माध्यम से वैज्ञानिक क्षमताओं और चल रहे अनुसंधान को प्रदर्शित करती है। उन्होंने अंटार्कटिका में भारत के अनुसंधान केंद्र, भारती के शोधकर्ताओं के साथ लाइव इंटरफ़ेस के माध्यम से बातचीत भी की और चरम ध्रुवीय परिस्थितियों में किए जा रहे वैज्ञानिक कार्यों की समीक्षा की, जिसमें भारत के बढ़ते ध्रुवीय अनुसंधान प्रयासों और स्वदेशी क्षमताओं पर प्रकाश डाला गया।

अगले चार दिनों में आयोजित होने वाले प्रदर्शनियों, व्याख्यानों और संवादात्मतक सत्रों के साथ, भारत अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव का उद्देश्य विज्ञान के साथ जनता की सहभागिता को गहरा करना है, साथ ही अनुसंधान, नवाचार एवं मानव संसाधन विकास में दीर्घकालिक राष्ट्रीय उद्देश्यों में योगदान देना है।