ऑफिस टाइम के बाद नो कॉल–नो ईमेल: बॉस का फोन न उठाने का हक

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कर्मचारियों को आखिर कब मिलेगा असली ‘डिसकनेक्ट’ का अधिकार?

राइट टू डिसकनेक्ट बिल 2025: कामकाजी भारत की थकान, तनाव और ‘हमेशा उपलब्ध रहने’ की संस्कृति पर एक जरूरी बहस। 

 – डॉ प्रियंका सौरभ

भारत का कार्य-संस्कृति परिदृश्य पिछले दो दशकों में जिस तेज़ी से बदला है, शायद ही दुनिया का कोई अन्य देश इस प्रकार की डिजिटल छलांग से गुज़रा हो। इंटरनेट, मोबाइल फोन, वर्क-फ्रॉम-होम, रियल-टाइम मॉनिटरिंग और 24×7 कनेक्टिविटी ने काम को आसान भी बनाया है और जटिल भी। इसका सबसे बड़ा प्रभाव पड़ा है—कर्मचारियों के निजी जीवन और मानसिक स्वास्थ्य पर। आज कार्यालय का समय भले ही 8 घंटे का माना जाता है, पर काम की ‘ड्यूटी’ 12–14 घंटे तक फैली मिलती है। एक मेल रात 10 बजे, एक कॉल सुबह 7 बजे, एक मैसेज रविवार को… और इसी अनंत चक्र में कर्मचारी अपने जीवन से, अपने परिवार से, और स्वयं से कटते चले जा रहे हैं।

इसी पृष्ठभूमि में सांसद सुप्रिया सुले द्वारा लोकसभा में पेश किया गया ‘राइट टू डिसकनेक्ट बिल 2025’ देश के करोड़ों कर्मचारियों के लिए आशा की किरण लेकर आया है। यह बिल कहता है कि ऑफिस समय के बाद कोई भी कर्मचारी अपने बॉस, मैनेजर या संस्थान के कॉल, ईमेल, मैसेज या किसी डिजिटल निर्देश का जवाब देने के लिए बाध्य नहीं होगा। यदि यह कानून बनता है, तो भारत की कार्य-संस्कृति में एक ऐतिहासिक परिवर्तन संभव है। लेकिन इसका विरोध, इसकी चुनौतियाँ, इसका व्यावहारिक पक्ष और इसका सामाजिक प्रभाव—ये सभी उतने ही महत्त्वपूर्ण सवाल हैं, जिनका विश्लेषण करना ज़रूरी है।

आज यह एक प्रशासनिक या तकनीकी मुद्दा मात्र नहीं, बल्कि एक सामूहिक सामाजिक-मानसिक स्वास्थ्य संकट से जुड़ा विषय है। एक ऐसा संकट जिसे हम अक्सर सामान्य मानकर जीते जा रहे हैं।

भारत में कार्य-संस्कृति का चरित्र लंबे समय से ‘हमेशा उपलब्ध रहने’ की अघोषित संस्कृति पर टिका रहा है। यह धारणा कि अच्छा कर्मचारी वही है जो छुट्टी के दिन भी फोन उठाए, आधी रात को भी मेल का जवाब दे, और घर बैठकर भी कंपनी के लिए उपलब्ध रहे—आज कई कर्मचारियों की थकान, निराशा और बर्नआउट की जड़ में यही सोच है। महामारी के बाद वर्क–फ्रॉम–होम संस्कृति ने इसे और गहरा कर दिया। घर ऑफिस बन गया और ऑफिस घर में घुस आया। समय की सीमाएँ मिट गईं। काम और जीवन की रेखा धुंधली पड़ गई।

हर साल लाखों युवा नौकरी में आते हैं, पर कुछ ही सालों में तनाव, उच्च रक्तचाप, नींद की समस्याएँ, एकाग्रता में कमी और अवसाद जैसी समस्याओं से जूझने लगते हैं। और अधिकांश मामलों में कारण है—अनियंत्रित कार्य-घंटे और निजी समय में लगातार हस्तक्षेप।

यही कारण है कि यूरोप के कई देशों—फ्रांस, इटली, पुर्तगाल, बेल्जियम—ने ‘राइट टू डिसकनेक्ट’ को कानूनी अधिकार बनाया। भारत इस दिशा में अब तक पीछे था, पर यह बिल एक बड़ी शुरुआत साबित हो सकता है।

लेकिन प्रश्न यह भी है कि क्या सिर्फ कानून बनने से हालात बदल जाएंगे? क्या कंपनियाँ इसे मानेंगी? क्या कर्मचारी इसे लागू करा पाएंगे? क्या तकनीकी दुनिया में डिसकनेक्ट होना संभव है?

राइट टू डिसकनेक्ट बिल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह कर्मचारी को ‘अधिकार’ देता है—एक ऐसा अधिकार जिसे वह कानूनी रूप से प्रयोग कर सकता है। लेकिन भारत में कार्य-परिस्थितियाँ कई बार कानूनों से भी अधिक शक्तिशाली सामंती कार्य-संस्कृति, पदानुक्रम और असुरक्षा द्वारा निर्देशित होती हैं। बड़ी बहस यह है कि एक कर्मचारी को यदि ऑफ-ऑवर में कॉल न उठाने का अधिकार है, तो क्या उसे इससे उसके मूल्यांकन में नुकसान नहीं होगा? क्या इसे ‘अनकोऑपरेटिव’ व्यवहार नहीं समझा जाएगा? क्या निजी कंपनियाँ इसे सहजता से स्वीकार करेंगी?

इन सवालों का जवाब कठिन है, पर कानून कम से कम एक आधार देता है—एक सुरक्षा कवच। अक्सर कर्मचारियों की समस्या यह नहीं होती कि वे कॉल उठाना नहीं चाहते; समस्या यह होती है कि यदि वे कॉल नहीं उठाएँ तो अगला दिन उनके लिए भारी पड़ता है। काम का दबाव, बॉस की नाराजगी, ‘टीम प्लेयर’ न समझे जाने का भय—यह सब उन्हें विवश कर देता है।

बिल की सबसे महत्त्वपूर्ण शक्ति यही है कि यह कहता है:

“ऑफिस टाइम के बाद आपसे संपर्क किया जाए तो जवाब देना ‘मजबूरी’ नहीं, ‘विकल्प’ होगा।”

यह भावना ही कार्य-संस्कृति में परिवर्तन की दिशा में पहला कदम है।

इस बिल का बड़ा सामाजिक और मानसिक प्रभाव हो सकता है। यह न सिर्फ कर्मचारियों के परिवारिक जीवन को बेहतर बनाएगा, बल्कि समाज में ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ की नई समझ विकसित करेगा।

भारत में अक्सर काम को ‘त्याग’ और काम से असंतुलन को ‘समर्पण’ का चिह्न माना जाता है। यह बिल इस सोच को चुनौती देता है। यह बताता है कि बेहतर कर्मचारी वही है जो बेहतर इंसान भी बना रह सके।

कर्मचारी के जीवन में जो खाली समय है—परिवार के साथ बिताना, बच्चों के साथ खेलना, माता-पिता का हाल पूछना, किताबें पढ़ना, नींद पूरी करना, खुद को नया सीखना—यही असल में उत्पादकता की नींव है। थका हुआ दिमाग, तनावग्रस्त मन और 24×7 उपलब्ध रहने की मजबूरी किसी भी राष्ट्र की उत्पादकता को बढ़ा नहीं सकती।

इसके अतिरिक्त, यह बिल महिलाओं के लिए विशेष रूप से राहतकारी साबित हो सकता है।

भारतीय समाज में महिलाएँ पहले ही दोहरी जिम्मेदारियों—ऑफिस और घर—के बीच संघर्ष करती हैं। अगर रात के भोजन के बाद भी मेल का जवाब देना पड़े, बच्चों को सुलाते समय फोन उठाना पड़े, तो उनका दबाव कई गुना बढ़ जाता है। ‘राइट टू डिसकनेक्ट’ उनकी मानसिक और पारिवारिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

इसके बावजूद इस बिल के सामने कुछ व्यावहारिक चुनौतियाँ हैं। भारत की अर्थव्यवस्था में सर्विस सेक्टर का दायरा बड़ा है, और आईटी, बीपीओ, ऑनलाइन सेवाएँ, ई–कॉमर्स जैसी उद्योगों में 24×7 काम चलता है। अंतरराष्ट्रीय क्लाइंट्स, अलग-अलग टाइम ज़ोन, आपातकालीन तकनीकी समस्याएँ—इन सबमें ‘नो कॉल–नो ईमेल’ व्यवस्था लागू करना जटिल है।

इसका समाधान कानून के भीतर ही मौजूद है:

ड्यूटी टाइम और नॉन-ड्यूटी टाइम का स्पष्ट निर्धारण।

कंपनियाँ कार्यकर्ता के साथ अनुबंध में यह स्पष्ट करेंगी कि कौन कर्मचारी किस श्रेणी में आता है, कौन ऑन-रोल है, कौन ऑफ-रोल, कौन ‘क्रिटिकल सर्विस’ पर है, और किसका काम सामान्य है।

इसके अलावा एक और चिंता यह है कि कई कंपनियाँ कर्मचारियों से अप्रत्यक्ष दबाव के माध्यम से ‘मौन सहमति’ ले सकती हैं—यानी कागज़ पर तो नियम होंगे, पर व्यवहार में ‘उपलब्धता’ की अपेक्षा जारी रहेगी।

इसलिए निगरानी और अनुपालन की मजबूत व्यवस्था जरूरी है। शिकायत निवारण तंत्र, हेल्पलाइन, और जुर्माने जैसे प्रावधान तभी प्रभावी होंगे जब कर्मचारी बिना डर शिकायत कर सकें।

इस बिल के समर्थक कहते हैं कि आधुनिक अर्थव्यवस्था में ‘डिजिटल स्लेवरी’ से मुक्ति आवश्यक है। आलोचक कहते हैं कि यह बिल निजी कंपनियों के कार्य-तंत्र में हस्तक्षेप कर सकता है। लेकिन सच्चाई यह है कि यह बिल कंपनियों के खिलाफ नहीं, बल्कि कर्मचारियों के पक्ष में है—एक संतुलित दृष्टिकोण के साथ।

अच्छा वर्क-लाइफ बैलेंस केवल कर्मचारी का अधिकार नहीं, कंपनी का भी फायदा है।

शोध बताते हैं कि मानसिक रूप से आराम पाए कर्मचारी अधिक उत्पादक, क्रिएटिव और वफादार होते हैं।

इस बिल के जरिए सरकार केवल यह संदेश देना चाहती है कि कर्मचारी भी इंसान हैं, मशीन नहीं।

कंपनियों का औचित्य हो सकता है कि ‘कभी-कभी’ आपात स्थिति में उपलब्धता जरूरी होती है। लेकिन समस्या ‘कभी-कभी’ की नहीं है—समस्या ‘हर समय’ की संस्कृति है।

यह बिल उस असंतुलन को तोड़ने की कोशिश है।

राइट टू डिसकनेक्ट केवल एक अधिकार नहीं, बल्कि आधुनिक भारत की कार्य-संस्कृति को बदलने का अवसर है। यह कर्मचारियों को राहत देने का वादा है, कंपनियों को नई कार्य-संरचना देने का मौका है, और समाज को स्वास्थ्यपूर्ण मानसिक वातावरण देने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

अगर यह बिल कानून बन जाता है, तो इसके सही क्रियान्वयन की चुनौती सामने होगी। कानून जितना सख्त होगा, उतनी ही जिम्मेदारी सरकार, कंपनियों और कर्मचारियों पर होगी कि इसे संवेदनशील और संतुलित तरीके से लागू करें। यह बिल हमें याद दिलाता है कि विकास केवल आर्थिक नहीं होता—विकास वह है जिसमें इंसान अपनी थकान, तनाव और निजी जीवन खोए बिना आगे बढ़ सके।

भारत की अर्थव्यवस्था जितनी तेज़ी से आगे बढ़ रही है, उतना ही जरूरी है कि उसके पीछे खड़े मानव संसाधन को सुरक्षित, संतुलित और सम्मानजनक जीवन मिले।

राइट टू डिसकनेक्ट सिर्फ एक कानून नहीं, बल्कि आधुनिक भारत की नई कार्य-दृष्टि का आधार बन सकता है—यदि इसे सही नीयत, संवेदना और ईमानदारी के साथ अपनाया जाए।

यह समय है कि भारत यह स्वीकार करे—

कर्मचारी 24×7 उपलब्ध रहने के लिए पैदा नहीं हुए।

उनका निजी जीवन, उनका परिवार और उनका मानसिक स्वास्थ्य भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना उनका कार्य।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

आंध्र प्रदेश में ‘उद्भव 2025’ का समापन: तेलंगाना पदक तालिका में शीर्ष पर, आदिवासी प्रतिभाओं ने देशभर में चमक बिखेरी

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जनजातीय कार्य मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले राष्ट्रीय आदिवासी छात्र शिक्षा सोसाइटी (एनईएसटीएस) के छठे राष्ट्रीय ईएमआरएस सांस्कृतिक, साहित्यिक और कला उत्सव-उद्भव 2025 का समापन 5 दिसंबर 2025 को आंध्र प्रदेश के गुंटूर जिले के वड्डेश्वरम स्थित केएल विश्वविद्यालय में हुआ। इस उत्सव का आयोजन एनईएसटीएस द्वारा किया गया था और केएल विश्वविद्यालय की मदद से आंध्र प्रदेश जनजातीय कल्याण आवासीय शैक्षणिक संस्थान सोसाइटी (एपीटीडब्ल्यूआरईआईएस-गुरुकुलम) द्वारा 3 से 5 दिसंबर 2025 तक इसकी मेजबानी की गई थी।

समापन समारोह में आंध्र प्रदेश सरकार की जनजातीय कल्याण और महिला एवं बाल कल्याण मंत्री श्रीमती जी. संध्या रानी, आंध्र प्रदेश सरकार के समाज कल्याण, विकलांग एवं वरिष्ठ नागरिक कल्याण, सचिवालय एवं ग्राम स्वयंसेवक मंत्री डॉ. डी.एस. स्वामी, आंध्र प्रदेश सरकार के पर्यटन व संस्कृति मंत्री और गुंटूर के प्रभारी मंत्री श्री कंडुला दुर्गेश उपस्थित थे। आंध्र प्रदेश सरकार के समाज कल्याण एवं जनजातीय कल्याण विभाग के सचिव श्री एम.एम. नायक भी कार्यक्रम में उपस्थित थे। उनकी उपस्थिति ने कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई और प्रतिभागियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी।

गणमान्य व्यक्तियों ने अपने संबोधन में आदिवासी छात्रों के उत्कृष्ट प्रदर्शन की सराहना की और आदिवासी शिक्षा, सांस्कृतिक संरक्षण और सशक्तिकरण को मजबूत करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की प्रतिबद्धता का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ‘उद्भव’ जैसे मंच न केवल भारत की समृद्ध आदिवासी विरासत को प्रदर्शित करते हैं, बल्कि आदिवासी युवाओं में आत्मविश्वास, नेतृत्व और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने के लिए उत्प्रेरक का काम भी करते हैं।

यह उत्सव श्री अजीत कुमार श्रीवास्तव (आईआरएएस), आयुक्त, एनईएसटीएस और श्री एम.एम. नायक (आईएएस), सचिव, समाज कल्याण एवं आदिवासी कल्याण विभाग, आंध्र प्रदेश सरकार के मार्गदर्शन में आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम आयोजन सचिव श्रीमती एम. गौतमी (आईएएस), सचिव, एपीटीडब्ल्यूआरईआईएस (गुरुकुलम) के नेतृत्व में संपन्न हुआ जिसमें उनकी टीमों और एनईएसटीएस तथा एपीटीडब्ल्यूआरईआईएस दोनों के अधिकारियों का सहयोग रहा। उनके समन्वित प्रयासों से सभी गतिविधियां सुचारू रूप से संचालित हुईं।

इस कार्यक्रम में 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के कुल 1,558 छात्रों ने भाग लिया। इनमें 524 छात्र और 1,024 छात्राएं शामिल थीं। उनकी भागीदारी को 45 टीम लीडर, 178 एस्कॉर्ट्स, 22 दल प्रबंधक, 22 संपर्क अधिकारी, 10 अधिकारी, 19 एनईएसटीएस अधिकारी और पदाधिकारी, 137 उप-समिति सदस्य, 48 जूरी सदस्य और 60 राज्य अधिकारी और एपीटीडब्ल्यूआरईआईएस अधिकारीगण ने समर्थन दिया। तीन दिनों में, छात्रों ने 49 सांस्कृतिक, साहित्यिक, रचनात्मक और प्रदर्शन कला कार्यक्रमों में भाग लिया जिसमें देश के आदिवासी समुदायों की जीवंतता और विविधता को दर्शाया गया। कार्यक्रम में पहले दिन 18, दूसरे दिन 22 और तीसरे दिन 9 कार्यक्रम शामिल थे जिनमें असाधारण प्रतिभा, सांस्कृतिक गहराई और कलात्मक अभिव्यक्ति का प्रदर्शन हुआ।  

समापन समारोह में विभिन्न श्रेणियों के परिणामों की घोषणा की गई। तेलंगाना ने समग्र पदक तालिका में शीर्ष स्थान हासिल किया। उसके बाद झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश का स्थान रहा। कुल 105 प्रथम पुरस्कार, 105 द्वितीय पुरस्कार और 105 तृतीय पुरस्कार प्रदान किए गए और एक समग्र राज्य चैम्पियनशिप भी प्रदान की गई। सभी प्रतिभागी छात्रों को उनके समर्पण और भागीदारी के सम्मान में भागीदारी प्रमाण पत्र प्रदान किए जाएंगे।

12 चयनित श्रेणियों के उद्भव 2025 के विजेता अब पुणे के यशदा में आयोजित होने वाले राष्ट्रीय कला उत्सव में ईएमआरएस का प्रतिनिधित्व करेंगे, जहां पूरे देश से टीमें भाग लेंगी। आदिवासी हस्तशिल्प, दृश्य कला, पारंपरिक प्रदर्शन और स्वदेशी रचनात्मक अभिव्यक्तियों ने इस उत्सव में महत्वपूर्ण योगदान दिया जिससे आदिवासी समाजों में संरक्षित सांस्कृतिक संपदा और कलात्मक परंपराओं पर प्रकाश डाला गया।

उद्भव 2025 ने आदिवासी छात्रों को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने, आत्मविश्वास बढ़ाने और अपनी सांस्कृतिक पहचान का जश्न मनाने का अवसर प्रदान करके प्रधानमंत्री के सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास के विजन को और मजबूत किया। इस उत्सव ने विकासात्मक अंतरालों को पाटने, शैक्षणिक और सांस्कृतिक क्षमताओं को सुदृढ़ करने और आदिवासी युवाओं में नेतृत्व क्षमता बढ़ाने में ईएमआरएस की परिवर्तनकारी भूमिका पर भी प्रकाश डाला।

छठे संस्करण के सफल समापन के साथ, एनईएसटीएस देश भर के आदिवासी छात्रों के लिए समग्र शिक्षा, सांस्कृतिक सशक्तिकरण और रचनात्मक अवसरों को बढ़ावा देने के लिए अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि करता है। यह संगठन ऐसे मंचों का विस्तार करने के लिए समर्पित है जो स्वदेशी प्रतिभाओं को पहचान दिलाते हैं और सांस्कृतिक एवं साहित्यिक क्षेत्रों में उत्कृष्टता को प्रोत्साहित करते हैं।

प्रधानमंत्री ने दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले ‘सुप्रभातम्’ कार्यक्रम की सराहना की

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प्रधानमंत्री ने दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले ‘सुप्रभातम्’ कार्यक्रम की सराहना करते हुए कहा कि यह सुबह की ताजगी भरी शुरुआत करता है। उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम में योग से लेकर भारतीय जीवन शैली के विभिन्न पहलुओं तक विविध विषयों को शामिल किया जाता है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारतीय परंपराओं और मूल्यों पर आधारित यह कार्यक्रम ज्ञान, प्रेरणा और सकारात्मकता का एक अनूठा संगम है।

प्रधानमंत्री ने ‘सुप्रभातम्’ कार्यक्रम के एक विशेष खंड-संस्कृत सुभाषितम् की ओर भी ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि यह भारत की संस्कृति और विरासत के बारे में नए सिरे से जागरूकता फैलाने में मदद करता है।

प्रधानमंत्री ने आज के ‘सुभाषितम’ को दर्शकों के साथ साझा किया।

प्रधानमंत्री ने ‘एक्स’ पर एक अलग पोस्ट में कहा:

“दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाला सुप्रभातम् कार्यक्रम सुबह-सुबह ताजगी भरा एहसास देता है। इसमें योग से लेकर भारतीय जीवन शैली तक अलग-अलग पहलुओं पर चर्चा होती है। भारतीय परंपराओं और मूल्यों पर आधारित यह कार्यक्रम ज्ञान, प्रेरणा और सकारात्मकता का अद्भुत संगम है।

भ्रष्टाचार के मकड़जाल में फंसी है दुनिया

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 बाल मुकुन्द ओझा

दुनिया के लगभग हर देश में भ्रष्टाचार का बोलबाला है। लाख प्रयासों के बाद भी  भ्रष्टाचार की इस महामारी से विश्व मुक्त नहीं हो पाया है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा लोगों में जन जागरण और चेतना जगाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक दिवसों का आयोजन किया जाता है, इनमें एक दिवस भ्रष्टाचार के खिलाफ भी है। भ्रष्टाचार के खिलाफ दुनिया को एकजुट करने के लिए 9 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरोधी दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र का कहना है, भ्रष्टाचार का मुक़ाबला करने की ख़ातिर वैश्विक प्रतिबद्धता सुनिश्चित करने के लिए दुनिया भर के देशों को मिलकर काम करने की ज़रूरत है। एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में रिश्वत की वार्षिक मात्रा एक ट्रिलियन डॉलर आँकी गई है। भ्रष्टाचार के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को 2.6 ट्रिलियन डॉलर का नुक़सान होता है, जो वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के पाँच प्रतिशत से अधिक है।

यह जगजाहिर और अकाट्य सत्य है कि दुनियाभर में भ्रष्टाचार की वजह से न केवल आर्थिक विकास पर असर पड़ता है बल्कि लोकतंत्र के प्रति विश्वास को भी ठेस पहुँचती है। विश्व का कोई भी देश भ्रष्टाचार से सुरक्षित नहीं है। भ्रष्टाचार ने पूरी  दुनिया को अपनी गिरफ्त में ले रखा है। भ्रष्टाचार आर्थिक विकास में बाधक है, लोकतंत्र के प्रति विश्वास को नुकसान पहुँचाता है और रिश्वत की संस्कृति को बढ़ावा देता है। भ्रष्टाचार से सामाजिक असामानता फैलती है। हर साल ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल जैसी वैश्विक संस्था अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर रैंकिंग भी जारी करता है जिसमें भ्रष्टतम देश शामिल किये जाते है। मगर लाख प्रयासों के बाद भी भ्रष्टाचार पर कोई प्रभावी अंकुश नहीं लगाया जा सका। यह हमारे सिस्टम का फेलियोर है या सत्ताधीशों का, इस पर गहन चिंतन और मनन की जरुरत है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक भ्रष्टाचार एक गंभीर अपराध है जो सभी समाजों में सामाजिक और आर्थिक विकास को कमजोर करता है। वर्तमान में भ्रष्टाचार से कोई देश, क्षेत्र या समुदाय बचा नहीं है। यह आग की तरह दुनिया के सभी हिस्सों में फैल गया है। इससे लोकतान्त्रिक मूल्यों का क्षरण हो रहा है। भ्रष्टाचार का शाब्दिक अर्थ है भ्रष्ट आचरण यानि जिसका आचार बिगड़ गया हो।  स्वार्थ में लिप्त होकर किया गया गलत कार्य भ्रष्टाचार होता है। भ्रष्टाचार के कई रूप हैं- रिश्वत, कमीशन लेना, काला बाजारी, मुनाफाखोरी, मिलावट, कर्तव्य से भागना, चोर-अपराधियों आतंकियों को सहयोग करना आदि आदि। इसका सीधा मतलब है जब कोई व्यक्ति समाज द्वारा स्थापित नैतिकता के आचरण का उल्लंघन करता है तो वह भ्रष्टाचारी कहलाता है। यहां भ्रष्टाचार से हमारा तात्पर्य अनैतिक और गलत तरीके से अर्जित आय से है।

भारत में भ्रष्टाचार ने लगता है संस्थागत रूप धारण कर लिया है। भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने खुलेआम यह कहा है की वे न तो खाएंगे और न खाने देंगे। मोदी अपनी बात पर कायम रहे मगर भ्रष्टाचार पर काबू नहीं पाया जा सका है। दुनिया के भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाली संस्था ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल इंडिया के द इंडिया करप्शन सर्वे 2024  के भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक में भारत 180 देशों में 96 वें स्थान पर रहा। इससे पहले साल 2023 में 93 और  2022 में भारत की रैंकिंग 85 थी, जो इस साल बढ़कर 96 हो गई है। दुनिया में सबसे भ्रष्‍ट देश सोमालिया है जबकि सबसे कम भ्रष्‍ट डेनमार्क है, जो लगातार छठे साल भी ग्लोबल करप्शन इंडेक्स में टॉप पर है।

140 करोड़ की आबादी का आधा भारत आज रिश्वतखोरी के मकड़जाल में फंसा हुआ है।  स्थिति यह हो गई है की बिना रिश्वत दिए आप एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। हमारे देश में भ्रष्टाचार इस हद तक फैल चुका है कि इसने समाज की बुनियाद को हिला कर रख दिया है। जब तक मुट्ठी गर्म न की जाए तब तक कोई काम ही नहीं होता। NCRB और लोकल सर्कल इंडिया करप्‍शन सर्वे रिपोर्ट में यह भी उल्‍लेख किया गया है कि लोगों को सबसे ज्‍यादा घूस जमीन से जुड़े मामलों में देनी पड़ रही है। इसके बाद दूसरे सबसे भ्रष्‍ट महकमों में पुलिस शामिल है। भ्रष्टाचार एक संचारी  बीमारी  की भांति इतनी तेजी से फैल रहा है कि लोगों को अपना भविष्य अंधकार से भरा नजर आने लगा है और कहीं कोई भ्रष्टाचार मुक्त समाज की उम्मीद नजर नहीं आरही है। मंत्री से लेकर संतरी और नेताओं तक पर भ्रस्टाचार के दलदल में फंसे है। भ्रष्टाचार हमारे सामाजिक, आर्थिक और नैतिक जीवन मूल्यों पर सबसे बड़ा प्रहार है। भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कठोर कानून और  दंड-व्यवस्था की जानी चाहिए। जब तक समाज एकजुट होकर भ्रष्टाचार पर हमला नहीं करेगा तब तक इस बीमारी को जड़मूल से समाप्त नहीं किया जा सकता।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

चेन्नई में पर्यावरण पर क्षेत्रीय सम्मेलन बेहतर और हरित भविष्य के लिए एक सशक्त आह्वान के साथ संपन्न

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चेन्नई के दक्षिणी क्षेत्र पीठ में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के दक्षिणी राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और समितियों के सहयोग से आयोजित पर्यावरण पर क्षेत्रीय सम्मेलन – 2025 का दूसरा दिन आज कलैवनार आरंगम, चेन्नई में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। यह सम्मेलन एनजीटी के अध्यक्ष, न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव के नेतृत्व में एनजीटी, दक्षिणी क्षेत्र पीठ, चेन्नई के न्यायिक सदस्य न्यायमूर्ति पुष्पा सत्यनारायण के मार्गदर्शन में आयोजित किया गया था।

6 दिसंबर, 2025 को पहले दिन के सफल समापन के बाद, दूसरे दिन की शुरुआत तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा में चुनौतियों पर तीसरे सत्र के साथ हुई। इसकी अध्यक्षता कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज ने की। उनके मार्गदर्शन में समुद्री जीवन और तटीय क्षेत्रों पर प्लास्टिक प्रदूषण और शहरी विकास जैसी मानवीय गतिविधियों के गंभीर पर्यावरणीय प्रभाव पर प्रकाश डाला गया।

डॉ. मुरली कृष्ण चिमाता, अतिरिक्त निदेशक/वैज्ञानिक-ई, क्षेत्रीय कार्यालय, विजयवाड़ा, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, ने कहा कि भारत की 11,098.81 किलोमीटर लंबी तटरेखा प्रदूषण के कारण गंभीर खतरों का सामना कर रही है, जहाँ वार्षिक आधार पर 11-12 मिलियन टन प्लास्टिक उत्सर्जित होती है और आवास क्षति के कारण 405 वैश्विक मृत क्षेत्र बन रहे हैं। उन्होंने आर्थिक प्रभाव पर प्रकाश डाला, जहाँ 3 अरब लोग महासागरों पर निर्भर हैं और वैश्विक प्रोटीन का 20 प्रतिशत मछलियों से प्राप्त होता है। उन्होंने जैव विविधता और आजीविका के लिए प्रवाल भित्तियों और मैंग्रोव के महत्व पर बल दिया। सम्मेलनों और राष्ट्रीय नियामक ढाँचों के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों पर भी चर्चा की गई।

डॉ. कलैयारासन, पर्यावरण अभियंता और अतिरिक्त परियोजना निदेशक, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन निदेशालय, केरल सरकार, ने तटीय क्षेत्रों, विशेष रूप से केरल, की सुरक्षा में चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित किया, जो कटाव, अपशिष्ट प्रबंधन के मुद्दों और प्रवर्तन चुनौतियों से ग्रस्त रहा है, जहाँ 2020 तक 2,700 से अधिक उल्लंघनों की सूचना मिली थी। उन्होंने एनसीएससीएम द्वारा शुरू की गई तलछट कोशिकाओं की अवधारणा को समझाया, जो तलछट की गति के आधार पर तटीय क्षेत्रों को वर्गीकृत करती है। 1992 से 2022 तक तटरेखा में हुए परिवर्तनों के अनुसार देश भर में 34 प्रतिशत क्षरण और 26.9 प्रतिशत वृद्धि हुई है, तथा जलवायु परिवर्तन अनुमानों के अनुसार 2030 तक तापमान में 1.1 डिग्री सेल्सियस से 2 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होगी तथा 2080 तक 3.3 डिग्री सेल्सियस से 4.8 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि होगी।

पर्यावरणविद् और केरल सरकार के पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन निदेशालय, निज़ल के न्यासी डॉ. टी.डी. बाबू ने पर्यावरणीय संकटों को जड़ से समाप्त करने पर ज़ोर दिया। उन्होंने बंगाल की खाड़ी और तमिल तटीय भू-दृश्यों, विशेष रूप से समुद्री घास (उच्च कार्बन भंडारण) और मैंग्रोव (जैव-शील्ड और मत्स्य पालन) के पारिस्थितिक मूल्य पर प्रकाश डाला और इस बात पर ज़ोर दिया कि मानवीय गतिविधियाँ मडफ़्लैट्स, लैगून और मत्स्य पालन को नुकसान पहुँचा रही हैं। उन्होंने तटीय इकोसिस्टम के ज़िम्मेदार प्रबंधन का आग्रह किया।

सम्मेलन का समापन भारत के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर. महादेवन की उपस्थिति में एक समापन सत्र के साथ हुआ।

एनजीटी के अध्यक्ष, न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव ने न्यायमूर्ति आर. महादेवन के ऐतिहासिक फैसले से शुरुआत की, जिसमें इस बात पर ज़ोर दिया गया था कि उद्योग पारिस्थितिक बहाली के लिए पूरी तरह ज़िम्मेदार हैं और एक मज़बूत मिसाल कायम की। श्री ए.आर.एल. सुंदरेशन और श्रीमती सुप्रिया साहू सहित कानूनी और प्रशासनिक नेताओं के योगदान ने पर्यावरण विनियमन को मज़बूत किया है।

समापन से पहले, माननीय न्यायाधीश ने इस संस्कृत श्लोक का उल्लेख किया:

“न्यायेन पृथिवीं रक्षेम, नियमेन जीवसंपदाम्।

सर्वे मिलित्वा सत्कर्मणि, हरितं पर्यावरणं धारयेत्॥”

“न्याय के माध्यम से, आइए हम पृथ्वी की रक्षा करें; नियमन के माध्यम से, आइए हम जीवन के खजाने की रक्षा करें। नेक कार्यों में एक साथ, हम एक हरित पर्यावरण को बनाए रखें।”

तमिलनाडु सरकार के पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और वन विभाग की अपर मुख्य सचिव, श्रीमती सुप्रिया साहू ने तमिलनाडु के पर्यावरण शासन के बारे में बात की, जिसमें नीति को कार्यरूप में परिणत करने, जलवायु परिवर्तन से निपटने और जैव विविधता के संरक्षण पर ध्यान केंद्रित किया गया।

मद्रास उच्च न्यायालय में भारत के अपर सॉलिसिटर जनरल, श्री ए.आर.एल. सुंदरेशन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अब से, दो प्राथमिकताओं: आज पर्यावरण की रक्षा और भविष्य के लिए जैव विविधता का संरक्षण पर ध्यान होना चाहिए।

इसके बाद एक पुरस्कार वितरण समारोह का आयोजन किया गया, जिसमें विभिन्न पर्यावरण प्रतियोगिताओं में विजेता विद्यार्थियों को सम्मानित किया गया।

केवल वित्तपोषण ही नहीं, बल्कि मार्गदर्शन भी स्टार्टअप्स की अगली पीढ़ी को आकार देगा: डॉ. जितेंद्र सिंह

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केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) डॉ. जितेंद्र सिंह ने स्टार्टअप्स को भारत के भविष्य के विकास का एक प्रमुख चालक बताते हुए कहा कि केवल वित्तपोषण ही नहीं, बल्कि मार्गदर्शन भी स्टार्टअप्स की अगली पीढ़ी को आकार देगा।

मंत्री ने आज यहां भारत अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान महोत्सव (आईआईएसएफ) में उद्यमियों और छात्रों के साथ बातचीत करते हुए मजबूत मार्गदर्शन, अनुसंधान में जोखिम उठाने और युवा नवप्रवर्तकों को सहायता प्रदान करने की आवश्यकता पर बल दिया।

महोत्सव के दूसरे दिन “स्टार्टअप जर्नी” पर एक पैनल चर्चा के दौरान, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत विज्ञान शिक्षा तक सीमित पहुंच जैसी स्थिति से एक ऐसे चरण में पहुंच गया है जहां अवसरों का लोकतांत्रिकीकरण हो रहा है तथआ छोटे शहरों एवं सामान्य पृष्ठभूमि की प्रतिभाओं को उद्यमिता का अवसर प्राप्त हो रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार का ध्यान नीतिगत मुद्दों से हटकर विचारों को बाज़ार से जोड़ने वाले सहायक तंत्रों के निर्माण पर केंद्रित हो गया है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के निरंतर प्रयासों से बार्क, राष्ट्रीय मिशन और क्षेत्र-विशिष्ट कार्यक्रमों जैसे योजना बनाने में मदद मिली है, जो स्टार्टअप्स को वित्त पोषण, उद्योग भागीदारों एवं मार्गदर्शकों से जोड़ते हैं। इस बात पर बल देते हुए कि नवाचार में अनिवार्य रूप से विफलता शामिल होती है, उन्होंने कहा कि अगर स्टार्टअप्स को वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ना है और प्रतिस्पर्धा करनी है, तो भारत को अनुसंधान एवं विकास में जोखिम की पहचान एवं स्वीकार करना सीखना होगा।

मंत्री ने इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे विज्ञान की प्रगति से भारत में रोज़मर्रा की ज़िंदगी बदल गई है। उन्होंने स्वास्थ्य सेवा प्रौद्योगिकियों एवं जैव प्रौद्योगिकी में हुई प्रगति का हवाला दिया जो एक समय में केवल विदेशों में ही सुलभ थी। व्यापक समानता का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि आज देश न केवल वैश्विक प्रौद्योगिकियों को अपना रहा है बल्कि जीवन विज्ञान से लेकर डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म तक, सभी क्षेत्रों में मौलिक समाधानों में तेजी से योगदान भी दे रहा है।

युवा उद्यमियों, जिनमें से कई छात्र थे, के सवालों का जवाब देते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने स्टार्टअप शुरू करने से पहले उद्देश्य एवं योग्यता के महत्व पर बल दिया। उन्होंने कहा कि युवा नवप्रवर्तकों को अपनी ताकत समझने, विचारों को निखारने और आम गलतियों से बचने में मदद करने के लिए शुरुआती स्तर पर मार्गदर्शन बहुत आवश्यक है। सरकारी पहलों का उल्लेख करते हुए, उन्होंने कहा कि छात्रों, विशेषकर लड़कियों के लिए बनाए गए कार्यक्रमों का विस्तार किया जा रहा है ताकि प्रतिभा की जल्द पहचान हो सके और उन्हें व्यवस्थित मार्गदर्शन प्राप्त हो सके।

प्रतिभागियों द्वारा उठाई गई नियामक चिंताओं पर, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सरकार धीरे-धीरे उद्यमियों पर बोझ कम करने के लिए विनियमन में ढील, लाइसेंस खत्म करने एवं अपराधमुक्त करने की दिशा में बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि इन सुधारों का उद्देश्य स्टार्टअप्स को अनुपालन के बजाय नवाचार पर ध्यान केंद्रित करने देना साथ ही जवाबदेही सुनिश्चित करना है।

कार्यक्रम में स्टार्टअप संस्थापकों एवं वरिष्ठ प्रशासकों ने अपना अनुभव भी साझा किया, जिनमें स्वास्थ्य सेवा और जैव प्रौद्योगिकी में प्रौद्योगिकी-आधारित समाधानों का उदाहरण शामिल था जो वंचित आबादी तक पहुंच रहे हैं। डॉ. जितेंद्र सिंह ने इन अनुभवों का स्वागत किया और कहा कि सार्वजनिक-निजी भागीदारी भारत की नवाचार रणनीति का केंद्रबिंदु बनी हुई है।

अपनी वक्तव्य को समाप्त करते हुए, केंद्रीय मंत्री ने कहा कि आईआईएसएफ जैसे मंच नीति निर्माताओं, वैज्ञानिकों एवं महत्वाकांक्षी उद्यमियों को एक साथ लाने के लिए हैं। उन्होंने कहा कि बच्चों में जिज्ञासा जगाना एवं उन्हें प्रश्न पूछने का आत्मविश्वास देना, वित्त पोषण या अवसंरचना जितना ही महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत अपने नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को 2047 के लिए निर्धारित लक्ष्यों के लिए तैयार कर रहा है।

अमित शाह ने अहमदाबाद में आनंदीबेन पटेल के जीवन पर आधारित पुस्तक के गुजराती संस्करण का विमोचन किया

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केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने आज अहमदाबाद, गुजरात में उत्तर प्रदेश की राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल के जीवन पर आधारित पुस्तक “चुनौतियाँ मुझे पसंद हैं” के गुजराती संस्करण का विमोचन किया। इस अवसर पर गुजरात के मुख्यमंत्री श्री भूपेन्द्र पटेल और उत्तर प्रदेश की राज्यपाल श्रीमती आनंदीबेन पटेल सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा कि इस पुस्तक में आनंदीबेन के समूचे जीवन और उनके कार्यों का सुंदर आलेखन किया गया है। उन्होंने कहा कि पुस्तक में एक निम्न मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मी बेटी की यात्रा है। उस दौर में जब बेटियों को पढ़ाने-लिखाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता था, उस समय से लेकर गुजरात जैसे प्रगतिशील राज्य की पहली महिला मुख्यमंत्री बनने तक, देश की सांसद और तीन राज्यों की राज्यपाल रहने तक, और आज उत्तर प्रदेश – जो भारत का सबसे बड़ा राज्य है – वहाँ राज्यपाल के रूप में दायित्व निभाने तक की पूरी यात्रा को बहुत ही जीवंत तरीके से दर्शाया गया है। श्री शाह ने कहा कि आनंदीबेन के सारे संघर्षऔर संघर्ष के बीच मिली प्रेरणाइस पुस्तक में खूबसूरती से समाहित किए गए हैं। अगर एक वाक्य में इस पूरी यात्रा का सार कहना हो तो यही कहेंगे –“नेतृत्व पद के लिए, पोजिशन के लिए नहीं होता; नेतृत्व उद्देश्य के लिए, पर्पस के लिए होता है।”

श्री अमित शाह ने कहा कि किसी व्यक्ति का जन्म से मृत्यु तक एक ही सूत्र में बँधे रहना, एक ही ध्येय के पीछे निरंतर चलते रहना अपने आप में बहुत कठिन होता है। जब लक्ष्य स्वयं के लिए हो तब भी कठिन है, लेकिन जब वह लक्ष्य समाज के लिए हो तो और भी अधिक कठिन हो जाता है। उन्होंने कहा कि आनंदीबेन की जीवनयात्रा देखकर निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि उन्होंने अपना पूरा जीवन समाज के लिए निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने में समर्पित कर दिया है। 

केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि उस समय पूरे मेहसाणा जिले में विज्ञान के महज तीन कॉलेज थे और इनमें MScकी पढ़ाई सिर्फ एक कॉलेज में होती थी।उस दौर में हॉस्टल में रहकर कोई बेटी विज्ञान में एमएससी करे, यह साहस बेटी में तो होता था, पर माता-पिता में बहुत कम होता था। उन्होंने कहा कि उस कॉलेज के हॉस्टल में एकमात्र छात्रा आनंदीबेन ही थीं, बाकी सब छात्र थे।श्री शाह ने कहा कि उस दौर की कल्पना कीजिए जब समाज की मुख्य धारा के विपरीत जाकर आनंदीबेन ने अपनी पढ़ाई पूरी की।

श्री अमित शाह ने कहा कि आनंदीबेन के साथ उन्होंने काफी काम किया है। 2014 में जब पार्टी विस्तार का लक्ष्य तय हुआ, तब हमने 1 लाख 86 हजार बूथों में कहाँ कमी है, यह पता लगाया, सदस्यता बढ़ाई और आज कश्मीर से कन्याकुमारी, द्वारका से कामाख्या तक हमारी पार्टी की पहुँच है। इसका मूल आधार बूथ का काम ही था। जो काम असंभव-सा लगता था, वह एक छोटी-सी शुरुआत से संभव हुआ। इसका मूल विचार मोदी जी ने उस समय के संगठन पर्व में रखा था। उस संगठन पर्व में आनंदीबेन इंचार्ज थीं। हमने मिलकर उस काम को आगे बढ़ाया। उन्होंने कहा कि कभी-कभी रात को अकेले बैठकर अक्सर सोचता हूँ कि उस समय से आज तक बूथ संरचना में कितना परिवर्तन हुआ और पार्टी कहाँ से कहाँ पहुँच गई। “बूथ का डॉक्यूमेंटेशन होना चाहिए, कौन-सा बूथ कमजोर है उसकी नोटिंग होनी चाहिए” – यही विचार पार्टी के विकास का सबसे बड़ा प्रेरणास्रोत बना। बाद में “विचारधारा युक्त बूथ, विचारधारा युक्त कार्यकर्ता” का संकल्प लेकर 2014 से पार्टी ने अपना सफर और तेज किया। 

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि आनंदीबेन के जीवन में छात्र के रूप में तो संघर्ष था ही, शिक्षिका बनने के बाद, समाजसेविका के रूप में और राजनीति में आने के बाद भी हर कदम पर संघर्ष आए। उन्होंने कहा कि आनंदीबेन विधायक बनीं, गुजरात में शिक्षा मंत्री, राजस्व मंत्री, मुख्यमंत्री और फिर तीन राज्यों की राज्यपाल बनीं।

श्री अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने राज्यपालों को बहुत सारे रचनात्मक कार्य सौंपे हैं। संवैधानिक रूप से राज्यपालों को निर्देश नहीं दिए जा सकते, केवल सूचित किया जा सकता है, लेकिन राज्यपालों ने उस रचनात्मक सूचना को स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि मोदी जी ने राज्यपाल संस्था को जीवंत बनाया – टीबी उन्मूलन, ड्रॉपआउट रेशियो कम करना, स्कूलों में 100% एनरोलमेंट, स्वच्छता, प्राकृतिक खेती जैसे अनेक कामों से जोड़ा। उन सभी विचारों को लागू करने की टीम भी मैंने ही तैयार की थी।लेकिन आनंदीबेन जहाँ-जहाँ राज्यपाल रहीं, उन्होंनेएक शिक्षिका की तरह परफेक्शन और अनुशासन के साथ उन सारे कामों को उत्कृष्ट रूप से किया। इसके कारण उन राज्यों के सामाजिक जीवन में गुणात्मक परिवर्तन आया। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में शिक्षा का स्तर उठाना, सभी यूनिवर्सिटी को NAAC रजिस्ट्रेशन करवाना, और सबसे ज्यादा NAAC A+ ग्रेड वाली यूनिवर्सिटी उत्तर प्रदेश में होना, यह बहुत बड़ी उपलब्धि है।

केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कहा कि नर्मदा परियोजना को पूरा करने का काम मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने और आनंदीबेन के मुख्यमंत्री रहते हुए हुआ। जब आनंदीबेन राजस्व मंत्री थीं, तब भूमि अधिग्रहण का काम इतनी कुशलता से हुआ कि पूरे भारत में किसी भी बड़े प्रोजेक्ट के लिए सबसे कम खर्च में सबसे बड़ी मात्रा में भूमि अधिग्रहण का रिकॉर्ड आज भी नर्मदा प्रोजेक्ट के नाम पर है। अनेक विघ्नों को पार करते हुए, अनुकूल समय में बांधकी ऊँचाई पूरी हुई, दरवाजे लगे और पानी न केवल कच्छ,बल्कि राजस्थान तक पहुँचा – इसका मूल श्रेय उस समय की राजस्व मंत्री आनंदीबेन को जाता है।

श्री अमित शाह ने कहा इस पुस्तक में अनेक प्रकार के मार्मिक प्रसंग वर्णित किए गएहैं। हर प्रसंग में आनंदीबेन की क्षमता, दृढ़ता और अपार स्नेह का परिचय मिलता है।उन्होंने कहा कि आनंदीबेन आज 85 वर्ष की आयु में भी जिस गति और ऊर्जा से उत्तर प्रदेश में काम कर रही हैं, वह हर किसी के लिए बड़ी प्रेरणा है। मुझे विश्वास है कि यह पुस्तक जब लाखों-करोड़ों लोगों तक पहुँचेगी, तो निश्चित रूप से उनके लिए भी प्रेरणा का स्रोत बनेगी।

 अमित शाह ने अहमदाबाद नगर निगम के विकास कार्यों का उद्घाटन एवं शिलान्यास किया

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केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने आज गुजरात में अहमदाबाद नगर निगम (AMC) के 1500 करोड़ रुपए की लागत के विभिन्न विकास कार्यों का उद्घाटन एवं शिलान्यास किया। इस अवसर पर गुजरात के मुख्यमंत्री श्री भूपेन्द्र पटेल सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे।

अपने सम्बोधन में केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में देश की सुदृढ़ सुरक्षा, मजबूत अर्थतंत्र, गरीबी उन्मूलन, गरीबों की सुविधाएँ बढ़ाना, गाँवों व शहरों में इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास, विश्व में भारत को उत्पादन का केंद्र बनाना, युवाओं के लिए रोजगार-व्यवसाय की अनेक योजनाएँ, सिंचाई क्षेत्र में लगभग दोगुना विस्तार, अनाज उत्पादन में दोगुनी वृद्धि, एमएसपी पर खरीद में तीन गुना बढ़ोतरी और विश्व स्तर पर भारत का डंका बजना जैसी महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हासिल हुई हैं। इसी का परिणाम है कि हमारी सभ्यता, संस्कृति और सनातन धर्म आज समूचे विश्व में सम्मान के साथ पहचाना जा रहा है, उन्होंने कहा कि इसका श्रेय भी मोदी जी के नेतृत्व को जाता है।

अहमदाबाद में कॉमनवेल्थ गेम्स 2030 के आयोजन को सफल बनाने के संकल्प का आह्वान करते हुए केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि श्री नरेन्द्र मोदी जी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, उस समय गुजरात ने ही देश में सबसे “खेलो गुजरात” की शुरुआत की। उन्होंने कहा कि “खेलो गुजरात” का उद्देश्य था कि युवा व्यसन, आलस्य और कु-संगत छोड़ें, खेल-कूद में भागीदारी बढ़ाएं और जीवन में प्रगति के पथ पर अग्रसर हों। उन्होंने कहा कि “खेलो गुजरात” से शुरू हुई यह यात्रा “खेलो इंडिया” तक पहुँची और आज देश के सभी राज्यों में खेल-कूद को बहुत बढ़ावा दिया जा रहा है।

श्री अमित शाह ने कहा कि अहमदाबाद शहर में अनेक आधुनिक खेल-संकुल बन चुके हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर के सभी खेलों और कोचिंग की बेहतरीन व्यवस्था हो चुकी है। अहमदाबाद में अब अगर किसी को खेलना हो तो घर से पाँच किलोमीटर के दायरे में ही सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि उनके संसदीय क्षेत्र में ब्रिज और ओवरब्रिज के नीचे जहाँ पहले सिर्फ़ गंदगी और अंधेरा था, वहाँ अब छोटे-छोटे सुंदर खेल-संकुल, लाइब्रेरी, योगासन की व्यवस्था और ओपन जिम बना दिए गए हैं। उन्होंने कहा कि जगह का सदुपयोग कैसे किया जाता है, यह सीखने के लिए देश के लोगों को अहमदाबाद आना चाहिए। श्री शाह ने कहा कि दुनिया का सबसे बड़ा क्रिकेट स्टेडियम – नरेन्द्र मोदी स्टेडियम – मोटेरा में है और उसके ठीक बगल में उससे भी भव्य सरदार वल्लभभाई पटेल स्पोर्ट्स एन्क्लेव बनाने का काम शुरू हो चुका है। गृह मंत्री ने कहा कि 70 से ज्यादा देशों की खेल सुविधाओं, इंफ्रास्ट्रक्चर, युवाओं में खेल के प्रति लगाव और रहने-खाने की सुविधाओं की तुलना करने के बाद कॉमनवेल्थ गेम्स-2030 की मेजबानी भारत को मिली है।

श्री अमित शाह ने कहा कि हम गाँधीनगर लोकसभा क्षेत्र को पूरे भारत में सबसे विकसित क्षेत्र बनाने के संकल्प के साथ काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि गांधीनगर लोकसभा क्षेत्र की जनता को एक संकल्प लेना है कि बरसात में हर सोसाइटी में कम-से-कम 5 और अधिक-से-अधिक 50 पेड़ जरूर लगाएं ताकि “ग्रीन गांधीनगर लोकसभा क्षेत्र” की शुरुआत हो सके। श्री शाह ने कहा कि वृक्षारोपण हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहद जरूरी है। साफ हवा, सहनीय गर्मी, पक्षियों का कलरव और तनाव-मुक्त माहौल बनाने का एकमात्र उपाय वृक्षारोपण है। श्री शाह ने कहा कि पिछले पाँच साल में गांधीनगर लोकसभा क्षेत्र में ग्रीन एरिया में 13.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन हमें इससे संतुष्ट नहीं होना चाहिए। हम हर सोसाइटी में 5 से 50 पेड़ लगवाएँगे और वहाँ के युवाओं को पानी देने की जिम्मेदारी सौंपेंगे।

रक्षा मंत्री ने सशस्त्र सेना झंडा दिवस कोष में उदारतापूर्वक योगदान की अपील की

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रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने बाहरी और आंतरिक, दोनों ही चुनौतियों से राष्ट्र की रक्षा करने वाले वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित की और एएफएफडी कोष में उदारतापूर्वक योगदान के माध्यम से पूर्व सैनिकों, विकलांग कर्मियों और उनके परिवारों के कल्याणकारी कार्यक्रमों का समर्थन करने वाले नागरिकों और संगठनों के प्रति गहरा आभार व्यक्त किया। उन्होंने लोगों से इस कोष में दान देना जारी रखने और भूतपूर्व सैनिकों, वीर नारियों और शहीद नायकों के आश्रितों के सम्मानजनक पुनर्वास और कल्याण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराने का आह्वान किया।

रक्षा मंत्री ने इस अवसर पर अपने संदेश में कहा, ‘‘सशस्त्र सेना झंडा दिवस पर, मैं हमारे सशस्त्र बलों के पराक्रम और बलिदान को नमन करता हूं। उनका साहस हमारे राष्ट्र की रक्षा करता है और उनकी निस्वार्थ सेवा हमें उस ऋण की याद दिलाती है जिसे हम कभी चुका नहीं सकते। मैं सभी से सशस्त्र सेना झंडा दिवस कोष में उदारतापूर्वक योगदान देने का आग्रह करता हूं। आपका समर्थन उनके समर्पण का सम्मान करता है और हमारी रक्षा करने वालों को मजबूती प्रदान करता है।’’(क्षा राज्य मंत्री श्री संजय सेठ ने भारत की संप्रभुता की रक्षा में सशस्त्र बलों की महत्वपूर्ण भूमिका और रक्षा तथा मानवीय कार्यों में उनकी असाधारण प्रतिबद्धता का उल्‍लेख किया। उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों को उनकी कुशलता और साहस का प्रमाण बताया।

सचिव (सैन्य मामलों के विभाग) और चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने भारत की रक्षा तैयारियों और राष्ट्रीय सुरक्षा में सेवारत कर्मियों, पूर्व सैनिकों और वीर नारियों की दृढ़ सेवा, अदम्य साहस और निरंतर योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा, ‘‘हम अपने सैनिकों, नौसैनिकों और वायु योद्धाओं की अटूट प्रतिबद्धता, असाधारण वीरता और सर्वोच्च बलिदान का सम्मान करते हैं जिन्होंने सभी सीमाओं और क्षेत्रों में राष्ट्र की संप्रभुता की दृढ़ता से रक्षा की है।’’

क्षा सचिव श्री राजेश कुमार सिंह ने कहा कि राष्ट्र सशस्त्र बलों के साहस, वीरता और कर्तव्य के प्रति अटूट समर्पण के लिए उनका ऋणी है। उन्होंने आगे कहा, ‘‘सशस्त्र बल न केवल हमारी सीमाओं की रक्षा करते हैं, बल्कि आतंकवाद और उग्रवाद का भी मुकाबला करते हैं। इस कर्तव्य का पालन करते हुए, अनेक सैनिक मातृभूमि की सेवा में अपना सर्वोच्च बलिदान देते हैं।’’

रक्षा अनुसंधान एवं विकास विभाग के सचिव तथा डीआरडीओ के अध्यक्ष डॉ. समीर वी. कामत और सचिव (रक्षा उत्पादन) श्री संजीव कुमार ने भी सशस्त्र बलों के कर्मियों और उनके परिवारों को शुभकामनाएं दीं तथा राष्ट्रीय हितों की रक्षा में उनके साहस और देशभक्ति को नमन किया।

सचिव (पूर्व सैनिक कल्याण विभाग) श्रीमती सुकृति लिखी ने विभिन्न खतरों से राष्ट्र की रक्षा करने तथा प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सहायता प्रदान करने के लिए बहादुर सशस्त्र बलों के प्रति आभार व्यक्त किया।

भूतपूर्व सैनिक कल्याण विभाग, वीर नारियों, शहीद सैनिकों के आश्रितों और पूर्व सैनिकों, जिनमें विकलांग भी शामिल हैं उनके कल्याण और पुनर्वास के लिए उनकी पहचान की गई व्यक्तिगत आवश्यकताओं के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए कार्यरत है। एएफएफडी कोष के माध्यम से एकत्रित धनराशि का उपयोग विवाह, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि के लिए सहायता और वित्तीय सहायता प्रदान करने के लिए किया जाता है। 1 नवंबर, 2025 से निर्धनता अनुदान 4,000 रुपये से दोगुना होकर 8,000 रुपये प्रति माह, पुत्री विवाह अनुदान 50,000 रुपये से बढ़कर 1,00,000 रुपये और शिक्षा अनुदान 1,000 रुपये से बढ़कर 2,000 रुपये प्रति माह प्रति बच्चा हो गया है।

वर्ष 2024-25 के दौरान, 1.78 लाख से अधिक लाभार्थियों को कल्याणकारी सहायता के रूप में लगभग 370 करोड़ रुपये वितरित किए गए। इसके अलावा, देश भर में 36 युद्ध स्मारक छात्रावासों, किरकी और मोहाली स्थित पैराप्लेजिक पुनर्वास केंद्रों और देहरादून, लखनऊ तथा दिल्ली स्थित चेशायर होम्स को संस्थागत अनुदान प्रदान किए गए।

एएफएफडी कोष में योगदान आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 80जी(5)(vi) के तहत आयकर से मुक्त है। योगदान निम्नलिखित बैंक खातों में चेक/डीडी/एनईएफटी/आरटीजीएस के माध्यम से किया जा सकता है:

लोकतंत्र में : “बन्दों को गिना करते हैं ‘तौला’ नहीं करते ”                                                               

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तनवीर जाफ़री

नवनिर्वाचित बिहार विधानसभा के पहले सत्र में शपथ ग्रहण के दौरान गत दिसंबर को भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था की वास्तविकता का एक अजीब दृश्य देखने को मिला जबकि राज्य की नवादा विधानसभा क्षेत्र से निर्वाचित जनता दल (यूनाइटेड) विधायक विभा देवी को हिंदी में भी शपथ पत्र पढ़ने में कठिनाई का सामना करना पड़ा। अनपढ़ होने के कारण ही वह ठीक से शपथ नहीं पढ़ पा रही थीं। इस संबंध में वायरल हुई वीडिओ में देखा गया कि शपथ लेने के दौरान वे बार-बार रुक गईं और उन्होंने पास में बैठी एक अन्य जे डी यू विधायक मनोरमा देवी से शपथ पूरी करने में मदद मांगीं जिन्होंने उन्हें शब्दों का उच्चारण बताया। स्वयं स्पीकर महोदय ने बार बार शपथ लेने में मनोरमा देवी की सहायता की जिसके बाद ही विभा देवी किसी तरह शपथ लेने की ‘औपचारिकता ‘ निभा सकीं। विभा देवी का परिचय व उनकी योग्यता केवल यह है कि वे पूर्व विधायक और विवादित ‘बाहुबली’ राजबल्लभ यादव की पत्नी हैं। वे आर जे डी के प्रत्याशी कौशल यादव को 27,594 वोटों से हराकर विजयी घोषित हुई हैं। गोया अब बिहार का भाग्य लिखने वालों में एक नाम विधायक विभा देवी का भी शामिल होगा। राज्य के नेतृत्व में ऐसे और भी कई उदाहरण हैं। 

                     इसी बिहार विधानसभा चुनाव में पहली बार देश के प्रसिद्ध चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर शायद यह सोचकर जन सुराज नामक अपनी पार्टी बनाकर मैदान में उतरे होंगे कि जब वे दूसरे दलों व उनके नेताओं को चुनावी जीत दिला सकते हैं तो स्वयं अपने गृह राज्य में अपनी पार्टी बनाकर विजयी क्यों नहीं हो सकते ? सुख और विलासता के जीवन को त्याग कर गत तीन वर्षों तक पूरे बिहार की ख़ाक छानने के बाद अपनी ही कमाई के करोड़ों रूपये पानी में बहाकर जो मुद्दे वे जनता के सामने रख रहे थे निश्चित रूप से वही मुद्दे आज की राजनीति विशेषकर बिहार की ज़रूरत हैं। जैसे शिक्षा,पलायन,बेरोज़गारी व भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को ही उन्होंने अपने चुनाव के सर्वप्रमुख मुद्दे के रूप में उठाया। इतना ही नहीं बल्कि जितने शिक्षित,अनुभवी,सज्जन,योग्य व दूरदर्शी लोगों को प्रशांत किशोर ने जन सुराज पार्टी का प्रत्याशी बनाया शायद राज्य के किसी अन्य दल ने नहीं बनाया। परन्तु भारतीय राजनीति व देश की लोकतान्त्रिक व्यवस्था का आज का सच यही है कि नवादा की जिस नवनिर्वाचित विधायक विभा देवी के अनपढ़ होने के कारण उनका मज़ाक़ उड़ाया गया उनके मुक़ाबले में जन सुराज पार्टी ने जिस अनुज सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया था वे संसाधन भूगोल (Resource Geography) में पीएचडी धारक थे परन्तु उन्हें कुल 19349 वोट हासिल हुए और वे तीसरे नंबर पर रहे, जबकि अनपढ़ विभा देवी ने कुल 87423 वोट पाकर ज़बरदस्त जीत दर्ज की। 

                 अब एक नज़र डालते हैं पूर्व केंद्रीय ऊर्जा मंत्री आर के सिंह प्रकरण पर। भाजपा के वरिष्ठ नेता राज कुमार सिंह ने बिहार विधान सभा चुनाव के दौरान ही बिहार की नीतीश सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुये सरकार की नीतियों, भ्रष्टाचार और पार्टी नेताओं पर कुछ गंभीर सवाल उठाए थे। उन्होंने बिहार सरकार व अदानी पावर लिमिटेड के मध्य  ₹62,000 करोड़ के घोटाले का आरोप लगाते हुये यह दावा किया था कि यह अडानी को फ़ायदा पहुंचाने की साज़िश है। उन्होंने इस विषय पर सीबीआई जांच की मांग की थी। इसके अलावा उन्होंने भाजपा नेताओं जैसे भाजपा के उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर 1995 हत्या मामले आरोपी होने, अपनी आयु व  शिक्षा छिपाने जैसे प्रशांत किशोर के गंभीर आरोपों का समर्थन किया था । आर के सिंह ने अनंत सिंह जैसे एनडीए उम्मीदवारों को अपराधी बताते हुए लोगों से उन्हें वोट न देने की अपील भी की थी । परन्तु ‘बलिहारी ‘ हो इस ‘लोकतंत्र’ की, कि सम्राट चौधरी भी चुनाव जीतकर पुनः राज्य के उप मुख्यमंत्री बन गये और आपराधिक पृष्ठभूमि वाले अनंत सिंह भी विजयी हो गये। जबकि दूसरी ओर इनको आइना दिखाने वाले आर के सिंह जैसे ईमानदार व शिक्षित नेता के आरोपों को भाजपा ने ‘अनुशासनहीनता’ व “पार्टी-विरोधी गतिविधियां” मानते हुये उल्टे उन्हें ही पार्टी से निलंबित कर दिया। उधर अपने निलंबन के कुछ ही घंटों बाद सिंह ने भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा को पत्र लिखकर पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया। उन्होंने अपने इस्तीफ़े में भी साफ़ कहा कि यह कार्रवाई “भ्रष्ट लोगों के साथ साठगांठ” को साबित करती है। उन्होंने भाजपा आलाकमान से यह भी पूछा कि भ्रष्टाचार व अपराधियों के विरुद्ध आवाज़ उठाना क्या भाजपा की नज़रों में अनुशासनहीनता है ? परन्तु लोकतंत्र में तथ्य व आरोप से भी बड़ा है जनमत या ‘बहुमत’। यानी जो जीता वही सिकंदर। 

              अब एक नज़र राहुल गाँधी की बिहार में की गयी पदयात्रा पर भी डालिये। राहुल गाँधी ने बिहार में कभी पलायन रोकने के विषय को मुद्दा बनाकर तो कभी वोट अधिकार यात्रा के नाम पर बिहार के लोगों को जागरूक करने की पूरी कोशिश की। राजनीति व राज्य के विकास के बुनियादी मुद्दों पर उन्होंने जनता को जागृत करने का प्रयास किया। परन्तु चुनाव नतीजों ने उन सभी बुनियादी मुद्दों पर भी पानी फेर दिया। गोया मतदाताओं को न तो शिक्षित व चरित्रवान राजनीतिज्ञ समझ आये न ही भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम। न ही राहुल गाँधी,आर के सिंह व प्रशांत किशोर जैसे स्पष्ट बोलने व राजनैतिक दूरदृष्टि रखने वाले संघर्षशील नेता। बल्कि राज्य की जनता जनार्दन ने मुफ़्त राशन,बैंक खातों में मुफ़्त पैसा, धर्म-जाति,परिवारवाद,अनपढ़,अपराधी जैसे मुद्दों व प्रत्याशियों के पक्ष में अपनी राय ज़ाहिर की। 

            दरअसल आज के चतुर व शातिर राजनेता यह समझ चुके हैं बहुमत हासिल करने के लिये क्या क्या हथकंडे अपनाये जाने चाहिए। और किस तरह मतदान में ‘बहुमत ‘ को अपने पक्ष में करना चाहिये। शायद लोकतंत्र की इसी ‘त्रासदी’ से प्रभावित होकर ही अल्लामा इक़बाल ने लिखा था कि -‘जम्हूरियत वह तर्ज़-ए-सियासत है कि जिसमें। ‘  ‘बन्दों को गिना करते हैं,’तौला’ नहीं करते।’   

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 तनवीर जाफ़री वरिष्ठ पत्रकार