एक उपेक्षित उपन्यासकार कुशवाह कांत

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के. विक्रम राव

पिछली सदी में एक साहित्यसेवी हुये थे। नाम था ”कान्त”। कुशवाहा कान्त। पाठक उनके असंख्य थे। सभी उम्र के। आज 9 दिसम्बर को उनकी 107वीं जयंती पड़ी है। विस्मृत रही। 29 फरवरी 2025 को उनकी जघन्य हत्या की 73वीं बरसी थी। भरी जवानी में वे चन्द प्रतिद्वंदियों की इर्ष्या के शिकार हुये थें, वाराणसी के कबीर चौरा में। इतने सालों बाद भी उनके तक हत्यारे दंडित नहीं हुये।

मगर कुशवाहा कान्त ने शोहरत और दौलत खूब अर्जित की। चौंतीस वर्षों तक लिखा। खूब धारधार, धाराप्रवाह, अद्भुत लायकियत से भरी। रसास्वाद करते पाठक की लार टपकती थी। शब्द चयन की स्टाइल ही ऐसी थी। उस काल में बीए क्लास से ही शब्दकोश का इस्तेमाल शुरु किया जाता था। कुशवाहा कान्त के आने के बाद इन्टरमीडिएट छात्र भी डिक्शनरी तलाशने लगे थे। मसलन रान, जंघा, स्तन आदि शब्द तो आम थे, बोलचाल के थे। मगर उरोज, नितम्ब को व्यापक बनाया कान्त ने ही। संस्कृतनिष्ट भाषा थीं। अत: छात्र स्वत: द्विभाषी हो गये। उस दौर की आचार संहिता उदार और विशाल—हृदय की नहीं होती थी। युवावर्ग संयम, मर्यादा और आचरण को मानता था।

कुशवाहा कान्त की किताब हाथ में ”कोई देख लेगा” के खौफ से छात्र अतंकित रहता था। कान्त का भाषा-भंडार, भावभरी उक्तियां पिरोने की शैली, खासकर गुदगुदाने वाले रसिया प्रसंग। मानो हाथों को उंगलियों के पोर पर कोई सुखद खुजली, मीठी चुभन सर्जा रहा हो। आयु का दौर से तादाम्य होता है। अत: कुशवाहा कान्त के युग की उस अनुभूति को तरल तारुण्य तक संदेशित करने में लेखक की अगाध अर्हता दिखती थी।
कान्त की समानान्तरता का जिक्र हो तो उपन्यासकार ओस्कर वाइल्ड से की जा सकती है, जो समलैंगिकता के जुर्म (उन्नीसवीं सदी के कठोर कानून के तहत) में कई बार लंदन जेल में रहे। कुशवाहा कान्त का अपराध ऐसा हेय नहीं रहा। कान्त की अपनी शब्दशक्ति रही। व्यंजना, अभिधा तथा लक्षणा वाली। रसमर्मज्ञ की। इन्द्रियासक्त भी। उनकी अभिव्यक्ति नाट्यसम्राट पृथ्वीराज के पुत्र शम्मी कपूर के अभिनय जैसा उभारने वाला, डुलानेवाला रहता था। पच्चीस (गधेपन के) के गबरू युवा उनकी रचना का लक्ष्य रहता था। याद आया। तब हम लोग हिचक कर डीडीके कहते थे। फिल्म का शीर्षक था। ”दिल देके देखो।” इतने सतर्क रहते थे।
गमनीय बिन्दु था कि उनका उपन्यास छपते ही ”आउट आफ स्टाक” हो जाता था। फिर छपता ही रहता था। रेलवे बुक स्टाल पर। फुटपाथ पर बिछी दुकानों में, कालेजों के पास खासकर।

कुशवाहा कान्त की हर नूतन रचना की प्रतीक्षा रहती थी। बेताबी से, आतुरता से, बेकरारी से, उत्कण्ठा और अधीरता से। ये सारे उच्चरित भाव उनके चाहने वालों द्वारा प्रयुक्त होते रहे।

एक विशिष्टता दिखती थी उनकी किताब के खरीददारों में। सभी लुके, छिपे, ढककर ले जाते थे। साझा करके पढ़ते थे। क्योंकि अनुशीलन की परिभाषा तब ऐसी ही थी। ”तेरा मुण्डा बिगड़ा जाये” वाला अभियोग लगने का भय था। कान्त के प्रकाशन संस्थान का नाम था ”चिनगारी”। मगर पाठक उसे ज्वाला मानते थे। उनकी कृतियों के शीर्षक भी अर्थपूर्ण होते थे। लाल रेखा, जलन, आहुति, परदेसी, पपीहरा, नागिन, मदभरे नैयना, अकेला, लवंग, निर्मोही वगैरह।

हिन्दी क्षेत्र में हिन्दी पढ़ने की ललक बढ़ी थी जिसका कारण भी काफी हद तक कुशवाहा कान्त ही रहें। उनकी चन्द अनुवादित रचनाओं के खालीपन से प्यासे रहकर, लोग मूल रचना पढ़ना चाह रहे थे। नागरी लिपि सीख ली। उद्दीपन और रोमांच की झूठन रुचिकर नहीं हो सकती। अनुवाद मतलब टेलिफोन पर बोसा! ईसाई किताबों में निषेध की ऐसी भावना सर्जी होगी जब आदम और हव्वा ने बाइबिल में वर्णित (ज्ञान का) फल चख लिया था। दोनों की अबोधता तब नष्ट हो गई। मगर रैक्व ऋषि की भांति हम सभी युवा अनभिज्ञ ही रहते थे। छकड़ा गाड़ी के तले।

उस कालावधि के छात्र भी अल्पज्ञानी होते थे। सैक्स इतना मुखरित नहीं था। वर्जनायें बहुत थी। मुझे स्मरण है कि लखनऊ विश्वविद्यालय के बीए प्रथम वर्ष का क्लासरुम। संस्कृत साहित्य विषय था। पण्डित (डाक्टर) आरसी शुक्ल महाकवि कालीदास की अभिज्ञान शाकुंतल पढ़ाते थे। कवि की कल्पना तो वल्लाह वाह थी। श्रृंगार में तो यूं भी कालीदास बेजोड़ हैं। एकदा क्लास में एक संदर्भ आया। कण्व के आश्रम में विश्वामित्रपुत्री शकुंतला अपनी सखा प्रियंवदा से शिकायत करती है कि उसकी कंचुकि संकुचित हो (स्रिंक) हो गयी है। तो सखा बताती है कि : ”तुम बड़ी हो रही हो। उरोज फूल रहे है।”

इन पंक्तियों पर डा. शुक्ल कहते थे कि ”घर पर पढ़ लेना”। छात्रायें अगली पंक्ति पर विराजे भावार्थ समझ लेती थीं। तो ऐसा युग था हमारा। लज्जा ही पुरुषों का गुण होता था। युवती के नखशिख का क्लास में वर्णन अश्लील समझा जाता था। इतना कठोर, कटु संयम होता था। सब छात्र ”भइया” (राखी के लायक) और छात्रायें ”बहने” (स्नेहिल) होतीं थीं।

उस दौर में कुशवाहा कान्त एक आगेदेखू (लोहिया के शब्दों में) क्रान्तिकारी, अग्रगामी, प्रगतिवादी, उपन्यासकार माने जाते थे। हमारे समय जेनयू नहीं बना था। मगर सुनने में आया है कि जेनयू में प्रगतिवादिता का पहला सोपान होता है कि छात्र सिखाते है छात्राओं को कि ”ब्रा” पहनना नारी दासता का प्रतीक है। यह बेड़ी है। तोड़ो इसे, हटाओं। आज भारत कितना विकास कर चुका है?

फिर भी कुशवाहा कान्त को हिन्दी साहित्य में उनका छीना गया स्थान मिलना चाहिये। हिन्दी विश्वभाषा है। दकियानूसीपन की जंजीरों में जकड़ी नहीं रह सकती। अब और अवरुद्ध नहीं की जा सकती है।

के विक्रम राव

देश− दुनिया के बड़े पत्रकार आदरणीय स्वर्गीय के विक्रम राव साहब ने कभी बहुत पहले ये लेख लिखा था।आज उनके जन्मदिन पर ये लेख याद आ गया।

राष्ट्रपति ने वर्ष 2023 और 2024 के लिए राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार प्रदान किए

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राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने नई दिल्ली में वर्ष 2023 और 2024 के लिए राष्ट्रीय हस्तशिल्प पुरस्कार प्रदान किए।राष्ट्रपति ने इस अवसर पर कहा कि कला हमारे अतीत की स्मृतियों, वर्तमान के अनुभवों और भविष्य की आकांक्षाओं को प्रतिबिम्बित करती है। प्राचीन काल से ही मनुष्य चित्रकला या मूर्तिकला के माध्यम से अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करता रहा है। कला लोगों को संस्कृति से जोड़ती है। कला लोगों को एक-दूसरे से भी जोड़ती है।

राष्ट्रपति ने कहा कि हमारी सदियों पुरानी हस्तशिल्प परंपरा के जीवंत और संरक्षित रहने का श्रेय, पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे कारीगरों की प्रतिबद्धता को जाता है। हमारे कारीगरों ने अपनी कला और परंपरा को समय के साथ ढाला है और साथ ही मूल भावना को भी जीवित रखा है। उन्होंने अपनी प्रत्येक कलात्मक रचना में देश की मिट्टी की खुशबू को संजोकर रखा है।

राष्ट्रपति ने कहा कि हस्तशिल्प न केवल हमारी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं, बल्कि आजीविका का एक महत्वपूर्ण स्रोत भी हैं। यह क्षेत्र देश में 32 लाख से ज़्यादा लोगों को रोज़गार देता है। उल्लेखनीय है कि हस्तशिल्प से रोज़गार और आय प्राप्त करने वाले ज़्यादातर लोग ग्रामीण या दूरदराज के इलाकों में रहते हैं। यह क्षेत्र रोज़गार और आय का विकेंद्रीकरण करके समावेशी विकास को बढ़ावा देता है।

राष्ट्रपति ने कहा कि सामाजिक सशक्तिकरण के लिए हस्तशिल्प को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण है। यह क्षेत्र पारंपरिक रूप से कमज़ोर वर्गों के लोगों को सहायता प्रदान करता रहा है। हस्तशिल्प न केवल कारीगरों को आजीविका का साधन प्रदान करता है, बल्कि उनकी कला उन्हें समाज में पहचान और सम्मान भी दिलाती है। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र में कार्यरत कार्यबल में 68 प्रतिशत महिलाओं की हिस्‍सेदारी है और इस क्षेत्र के विकास से महिला सशक्तिकरण को भी बल मिलेगा।

राष्ट्रपति ने कहा कि हस्तशिल्प उद्योग की सबसे बड़ी ताकत प्राकृतिक और स्थानीय संसाधनों पर इसकी निर्भरता है। यह उद्योग पर्यावरण के अनुकूल है और इसमें कार्बन उत्सर्जन कम होता है। आज, दुनिया भर में पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ जीवनशैली की आवश्यकता पर बल दिया जा रहा है। ऐसे में, यह क्षेत्र स्थायित्व में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

राष्ट्रपति ने जीआई टैग द्वारा दुनिया भर में भारतीय हस्तशिल्प उत्पादों की पहचान को मज़बूत करने की उपलब्धियों पर खुशी व्‍यक्‍त की। उन्होंने सभी हितधारकों से अपने अनूठे उत्पादों के लिए जीआई टैग प्राप्त करने की दिशा में काम करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि जीआई टैग उनके उत्पादों को एक विशिष्ट पहचान प्रदान करेगा और राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उनकी विश्वसनीयता को बढ़ाएगा। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि एक ज़िला एक उत्पाद (ओडीओपी) पहल हमारे क्षेत्रीय हस्तशिल्प उत्पादों की अंतर्राष्ट्रीय पहचान को भी मज़बूत कर रही है।

राष्ट्रपति ने कहा कि हमारे कारीगरों के पीढ़ी दर पीढ़ी संचित ज्ञान, समर्पण और कड़ी मेहनत के बल पर, भारतीय हस्तशिल्प उत्पादों की दुनिया भर में अपनी अलग पहचान बनी है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भारतीय हस्तशिल्प की मांग में वृद्धि की अपार संभावनाएं हैं। उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र युवा उद्यमियों और डिज़ाइनरों को उद्यम स्थापित करने के बेहतरीन अवसर प्रदान करता है।

इंडिगो पर सरकार का हंटर, विंटर शेड्यूल में हुई दस प्रतिशत फ्लाइट्स की कटौती

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नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) द्वारा जारी आदेश के बाद कारण बताओ नोटिस का जवाब देने के बाद सरकार ने इंडिगो की पांच प्रतिशत उड़ानें कम कर दी हैं। नोटिस में कहा गया है यह देखा गया कि डीजीसीए द्वारा जारी शीतकालीन अनुसूची (डब्ल्यूएस) 2025 के अनुसार, मेसर्स इंडिगो के लिए प्रति सप्ताह 15,014 प्रस्थान स्वीकृत किए गए थे, जो नवंबर 2025 के महीने के लिए अनुमोदित 64,346 उड़ानों के बराबर है। जबकि, इंडिगो द्वारा प्रस्तुत परिचालन आंकड़ों के अनुसार, यह देखा गया है कि नवंबर 2025 के दौरान वास्तव में 59,438 उड़ानें संचालित की गईं, और महीने के दौरान 951 उड़ान रद्द दर्ज की गईं। नोटिस में इंडिगो के ग्रीष्मकालीन कार्यक्रम में वृद्धि पर भी प्रकाश डाला गया।

नोटिस में कहा गया कि ग्रीष्मकालीन अनुसूची (SS25) की तुलना में, इंडिगो को SS25 में 351 विमानों की तुलना में 403 विमानों के साथ अनुसूची में 6% की वृद्धि की अनुमति दी गई थी। यह देखा गया है कि एयरलाइन अक्टूबर 2025 में केवल 339 विमान और नवंबर 2025 में 344 विमान ही संचालित कर सकती है। उपरोक्त से, यह अनुमान लगाया जाता है कि इंडिगो ने शीतकालीन अनुसूची 24 (WS 24) की तुलना में अपने प्रस्थान में 9.66% और ग्रीष्मकालीन अनुसूची 25 (SS 25) के संबंध में 6.05% की वृद्धि की है। नोटिस में कहा गया है कि एयरलाइन इन शेड्यूल को कुशलतापूर्वक संचालित नहीं कर पा रही है और उनसे बुधवार शाम तक संशोधित शेड्यूल जमा करने की अपेक्षा की गई है।

भारतीय डाक ने कोट्टायम के सीएमएस कॉलेज में केरल के प्रथम आधुनिक जेन-जेड डाकघर विस्तार काउंटर का अनावरण किया

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भारतीय डाक और सीएमएस कॉलेज के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा जेन जेड डाकघर विस्‍तार काउंटर का उद्घाटन

भारतीय डाक ने केरल के कोट्टायम स्थित सीएमएस कॉलेज में अपनी तरह के पहले जेन-जेड डाकघर विस्‍तार काउंटर का उद्घाटन किया। ‘छात्रों का, छात्रों द्वारा, छात्रों के लिए’ के ​​मूल दर्शन के साथ परिकल्पित इस पूरे स्थान की कल्पना, योजना और सह-निर्माण सीएमएस कॉलेज के छात्रों द्वारा भारतीय डाक अधिकारियों के सहयोग से किया गया, जो रचनात्मकता, स्थिरता और सेवा का एक आदर्श मिश्रण प्रस्तुत करता है।

यह डाक विस्तार काउंटर एक जीवंत, युवा, प्रकृति से ओतप्रोत स्थान है जो आंतरिक और बाहरी क्षेत्रों का सहज मिश्रण है। इसका परिणाम एक आधुनिक डाक विस्तार काउंटर है जो एक कार्य कैफ़े, एक हरित कोना और एक सामुदायिक केंद्र के रूप में कार्य करता है—और साथ ही प्रकृति के साथ सामंजस्य के कॉलेज के सिद्धांतों के प्रति भी समर्पित है।

न जेड डाकघर विस्‍तार काउंटर की मुख्य विशेषताएं

  • पिकनिक-टेबल शैली की व्यवस्था और एक ऊर्ध्वाधर उद्यान के साथ प्रकृति-थीम वाला बैठने का क्षेत्र, एक ताज़ा और शांत वातावरण प्रदान करता है। नवीनीकृत टायरों से बनी अतिरिक्त बैठने की व्यवस्था, स्थिरता और पर्यावरण-अनुकूल प्रथाओं के प्रति छात्रों कीप्रतिबद्धता को दर्शाती है।
  • लैपटॉप और मोबाइल उपकरणों के लिए चार्जिंग पॉइंट से सुसज्जित कार्यअनुकूल काउंटर हैं।
  • मनोरंजन और विश्राम का कोना, जिसमें पुस्तकों और बोर्ड गेम्स से युक्त एक बुकशेल्फ़ है, तथा शांत चिंतन के लिए एक इनडोर रीडिंग नुक्कड़ भी है।
  • पैकेजिंग सामग्री और माईस्टाम्प प्रिंटर के साथ पूर्णतः सुसज्जित एमपीसीएम बुकिंग काउंटर, सेवा की सुगमता को बढ़ाता है।
  • कला से सुसज्जित आंतरिक भाग, जिसमें छात्रों और कर्मचारियों द्वारा निर्मित कलाकृतियाँ प्रदर्शित की गई हैं, जो भारतीय डाक, कोट्टायम की सांस्कृतिक विरासत – साहित्य की भूमि, केरल की विरासत, सीएमएस कॉलेज के लोकाचार और प्रकृति से प्रेरित रूपांकनों को दर्शाती है।

यह जेन जेड शैली का विस्‍तार काउंटर सिर्फ एक कार्यात्मक सेवा केंद्र नहीं है – यह एक कार्यस्थल, बैठक स्थल, रचनात्मक केंद्र, विश्राम क्षेत्र और सामुदायिक कोना है, जो भारतीय डाक की विरासत को भविष्य में गर्व से आगे ले जा रहा है।

काशी तमिल संगमम् के अंतर्गत 50 स्कूलों में तमिल शिक्षकों द्वारा सिखाई जा रही है तमिल

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काशी-तमिल संगमम् 4.0 की पहल ‘तमिल करकलाम’ यानी आइए तमिल सीखें के अंतर्गत जिले के 50 स्कूलों में तमिल भाषा की कक्षाएँ संचालित की जा रही हैं। तमिलनाडु से आए 50 शिक्षकों ने अलग-अलग स्कूलों में छात्रों को तमिल भाषा की बुनियादी जानकारी दी। इनमें माध्यमिक और बेसिक स्कूलों के साथ-साथ जिले के निजी और कॉन्वेंट स्कूल भी शामिल हैं।

दो विभिन्न पालियों में तमिल शिक्षकों ने छात्र-छात्राओं को तमिल पढ़ाया। इसके अंतर्गत तमिल बोलने के साथ अक्षर ज्ञान भी कराया जा रहा है। छात्रों को स्कूल में तमिल वर्णमाला, स्वर और व्यंजन की जानकारी दी जा रही है। इसके अलावा रोजमर्रा में उपयोग होने वाले वाक्यों जैसे आपका नाम क्या है?आप किस स्कूल में पढ़ते हैं?मेरा नाम… है, आदि का तमिल में उच्चारण भी सिखाया जा रहा है।

शिक्षकों के एक दल ने बंगाली टोला इंटर कॉलेज में स्पेशल क्लास आयोजित की। लगभग दो घंटे चली इस कक्षा में छात्रों को तमिल लिखना और बोलना सिखाया गया। छात्रों ने बताया कि उनके घर के आसपास तमिलनाडु से बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं, ऐसे में यदि वे तमिल भाषा सीख जाएँगे तो उन पर्यटकों से बातचीत कर सकेंगे और उनकी बातों को बेहतर ढंग से समझ पाएँगे। छात्रों ने कहा कि शिक्षा मंत्रालय की यह पहल अत्यंत उपयोगी है।

एकांत का सौंदर्य और भीतर की यात्रा: बदलते समय में आत्मिक अनुशासन की आवश्यकता

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बाहरी दुनिया की चकाचौंध के बीच भीतरी संसार को सँभालना ही जीवन का सबसे बड़ा संतुलन

— डॉ. प्रियंका सौरभ

आज का मनुष्य निरंतर दौड़ में है—लक्ष्य पाने की दौड़, दिखावे की दौड़, और दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा करने की दौड़। इस भागदौड़ के बीच जो सबसे अधिक छूट गया है, वह है मनुष्य का अपना आंतरिक जगत। आधुनिक जीवनशैली ने हमें बाहरी दुनिया से इतना जोड़ दिया है कि हम स्वयं से मिलने का समय ही खो बैठे हैं। ऐसे समय में ‘एकांत’ कोई विलासिता नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य आवश्यकता बन गया है। यही वह क्षण है जब जीवन हमें धीरे से कहता है—आंतरिक रूप से एकांत में रहिए, लक्ष्यहीन जीवन मत बिताइए, ध्यान कीजिए और अच्छी पुस्तकें पढ़िए।

जीवन की दिशा तभी स्पष्ट होती है जब मन के भीतर शांति हो। लक्ष्यहीन भटकाव केवल थकाता है, प्रेरित नहीं करता। आत्मिक यात्रा के लिए एकांत वह दीपक है जो मन की गहराइयों को रोशन करता है। ध्यान और अध्ययन उस गहराई को दिशा देने वाले दो मजबूत स्तंभ हैं। ध्यान व्यक्ति को स्थिरता देता है और अध्ययन उसे विस्तार प्रदान करता है। दोनों मिलकर जीवन में लक्ष्य, अनुशासन और सृजनात्मकता का संचार करते हैं।

यह आवश्यक नहीं कि मनुष्य समाज से कट जाए। मनुष्य सामाजिक प्राणी है—लोगों में थोड़ा घुलना–मिलना जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। किन्तु वास्तविक समस्या तब उत्पन्न होती है जब हम लोगों में इतने खो जाते हैं कि स्वयं से मिलने का अवसर ही न बचे। इसलिए प्रतिदिन एक–दो घंटे अपने लिए निकालना केवल मानसिक स्वास्थ्य नहीं, बल्कि जीवन प्रबंधन का सबसे बड़ा मंत्र है। यही समय हमें सजग बनाता है, थकान को धोता है, और भीतर की ऊर्जा को पुनः भरता है। अलग रहिए, पर अपने अंतर में स्थित रहिए—यही आदर्श संतुलन है।

एकांत का आनंद उठाना किसी पलायन का नाम नहीं है। यह स्वयं को पुनः निर्मित करने की प्रक्रिया है। यह वह शांति है जो किसी कोने में बैठकर मन को उसकी मौलिक लय में वापस ले आती है। यह वह स्पेस है जहाँ जीवन के अनुत्तरित प्रश्न स्वयं उत्तर बनने लगते हैं। विचार निर्मल होते हैं, भावनाएँ संयमित होती हैं, और लक्ष्य स्पष्ट होने लगते हैं। इतने सारे लाभों के बावजूद लोग एकांत से डरते हैं, क्योंकि उन्होंने स्वयं के साथ बैठने का अभ्यास ही नहीं किया। लेकिन सच यही है—जो व्यक्ति स्वयं के साथ सुखी है, वही दूसरों को भी सुख दे सकता है।

किन्तु एकांत का आनंद लेने का अर्थ यह नहीं कि समाज से विमुख हो जाएँ। मनुष्य का व्यक्तित्व पूर्ण तब होता है जब वह एकांत और मेल–मिलाप के बीच संतुलन बनाए रखे। जब आप दूसरों से मिलें तो पूरे प्रेम और मित्रता के साथ मिलें। आपकी उपस्थिति लोगों के मन में सकारात्मकता भर दे, यह एक साधना है; और इस साधना का आधार भी एकांत ही है। जो व्यक्ति भीतर से स्थिर होता है, वही दूसरों के लिए प्रेरणा बनता है। ऐसे व्यक्ति को देखकर लोग भूलते नहीं; वे याद रखते हैं कि वे एक ऐसी आत्मा से मिले थे जिसने उनके भीतर प्रसन्नता और प्रेम के बीज बोए।

आज के समय में सबसे बड़ी चुनौती यही है कि लोगों के बीच रहते हुए भी लोग भीतर से अकेले हो गए हैं, और अकेले रहते हुए भी स्वयं से कटे हुए हैं। सोशल मीडिया की चमक, निरंतर सूचना के प्रवाह और बाहरी अपेक्षाओं का बोझ मन को ऐसा व्यस्त बनाए रहता है कि शांति का क्षण मिलना दुर्लभ हो जाता है। ऐसे माहौल में एकांत हमें उसी तरह बचाता है जैसे समुद्र में तैरते हुए किसी नाविक को तट बचाता है। जीवन की तेज़ हवाओं में यह हमारा एंकर बन जाता है।

एकांत जीवन को संतुलन देता है। ध्यान उसे गहराई देता है। अध्ययन उसे दिशा देता है। और प्रेम—वह जीवन को सार्थक बनाता है। जब यह चारों तत्व एक साथ मिलते हैं, तब जीवन केवल बाहरी उपलब्धियों का खेल नहीं रहता; वह अर्थपूर्ण यात्रा बन जाता है।

समाज को ऐसे ही व्यक्तियों की आवश्यकता है—जो भीतर से शांत हों और बाहर से करुणामय; जो अपनी अकेली सुबहों में आत्मा को मजबूत करते हों और अपनी भीड़ भरी दोपहरों में दुनिया को मुस्कान देते हों; जिनकी उपस्थिति लोगों को छोटा न करे बल्कि ऊँचा उठाए; जिनकी वाणी में विनम्रता हो, मन में करुणा हो और जीवन में दृढ़ता।

संदेश स्पष्ट है—अपने भीतर लौटिए। जीवन को दिशा दीजिए। कुछ देर अकेले बैठिए, पर जब दुनिया से मिलिए तो प्रेम और मित्रता के साथ मिलिए। ताकि लोग आपको इसलिए याद रखें कि आपने उनके हृदय में खुशी और आशा का एक छोटा सा दीप जला दिया था। यही एकांत का उद्देश्य है—पहले स्वयं को प्रकाशित करना और फिर उस प्रकाश से दुनिया को gently छू लेना।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

देश भर में लघु उद्यमों के प्रौद्योगिकी उन्नयन और डिजिटलीकरण के लिए कई योजनाएं कार्यान्वित

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lसूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय देश भर में छोटे उद्यमों के प्रौद्योगिकी उन्नयन और डिजिटलीकरण को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाओं और पहलों को लागू कर रहा है। इनमें अन्य बातों के साथ-साथ सूक्ष्म और लघु उद्यम -क्लस्टर विकास कार्यक्रम (सामान्य सुविधा केंद्र), टूल रूम/प्रौद्योगिकी केंद्र, सूक्ष्म और लघु उद्यम – परिवर्तन के लिए हरित निवेश वित्तपोषण योजना, और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम चैंपियंस योजना शामिल हैं। ये पहल आधुनिकीकरण, कौशल और गुणवत्ता वृद्धि, उन्नत प्रौद्योगिकी पहुंच, हरित प्रौद्योगिकी अपनाने और सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम की बेहतर प्रतिस्पर्धात्मकता में सहायता करती हैं। सरकार उद्यम पोर्टल, एमएसएमई चैंपियंस पोर्टल, सरकारी ई-मार्केटप्लेस (जीईएम), ट्रेड रिसीवेबल्‍स डिकाउंटिंग सिस्‍टम (टीआरडीएस), एमएसएमई मार्ट, एमएसएमई संबंध और ऑनलाइन विवाद  समाधान पोर्टल जैसी पहलों के माध्यम से डिजिटलीकरण को आगे बढ़ा रही है

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय (एमएसएमई) देश भर में 20 नए प्रौद्योगिकी केंद्रों (टीसी) और 100 विस्तार केंद्रों (ईसी) की स्थापना के लिए ‘नए प्रौद्योगिकी केंद्रों/विस्तार केंद्रों की स्थापना’ नामक एक स्‍कीम लागू कर रहा है। इसका उद्देश्य प्रौद्योगिकी, कुशल मानव संसाधन और सलाहकार सेवाओं के लिए एमएसएमई की स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार समाधान प्रदान करने हेतु प्रौद्योगिकी केंद्रों के नेटवर्क की भौगोलिक पहुंच को बढ़ाना है। इससे जमीनी स्तर पर एमएसएमई की प्रतिस्पर्धात्मकता और लाभप्रदता बढ़ेगी। इस स्‍कीम के तहत, नए प्रौद्योगिकी केंद्रों की स्थापना के लिए 20 स्थानों को मंजूरी दी गई है, जिनमें गया (बिहार) और बोकारो (झारखंड) जैसे आकांक्षी जिलों में दो स्थान शामिल हैं।

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय ने अपने क्षेत्रीय संगठनों में 65 निर्यात सुविधा केंद्र (ईएफसी) स्थापित किए हैं, जिनमें एमएसएमई-विकास और सुविधा कार्यालय, एमएसएमई प्रौद्योगिकी केंद्र और एमएसएमई परीक्षण केंद्र शामिल हैं। इनका उद्देश्य एमएसएमई को उनकी निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए अपेक्षित मार्गदर्शन और सहायता प्रदान करना है।

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम राज्य मंत्री सुश्री शोभा करंदलाजे ने लोकसभा में एक लिखित उत्तर में यह जानकारी दी।

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भय, भूख और भ्रष्टाचार के साये में मानवाधिकार

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                                                   बाल मुकुन्द ओझा

मानव अधिकारों को पहचान देने और उसके हक की लड़ाई को ताकत देने के लिए हर साल 10 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस मनाया जाता है। कहते है जब तक देश और दुनिया में  भय, भूख, भ्रष्टाचार, असमानता रहेगी तब तक मानवाधिकारों का हनन होता रहेगा। अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार, दुनिया में 5 करोड़ लोग, आधुनिक दासता के शिकार हैं, जिसमें जबरन मज़दूरी, जबरन विवाह और यौन शोषण जैसी स्थितियाँ शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि जबरन श्रम से हर साल क़रीब 236 अरब डॉलर का मुनाफ़ा कमाया जाता है, जो मूल रूप से श्रमिकों का छीन लिया गया पारिश्रमिक है। इस वर्ष इस दिवस की थीम असमानताओं को कम करना और मानव अधिकारों को आगे बढ़ाना रखी गई है। यह थीम मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा के महत्व पर प्रकाश डालती है और सभी देशों और लोगों को इन अधिकारों के संरक्षण के लिए अपने हिस्से का योगदान करने के लिए प्रोत्साहित करती है। मानवाधिकार, वे अधिकार हैं जो हर व्यक्ति को उसकी जाति, लिंग, धर्म, राष्ट्रीयता या सामाजिक स्थिति के दायरे की परवाह किए बिना, समान गरिमा और सुरक्षा के साथ जीवन जीने का अवसर देते हैं। 

मानव अधिकारों से हमारा अभिप्राय मौलिक अधिकार एवं स्वतंत्रता से है जिसके सभी  हकदार है। अधिकारों एवं स्वतंत्रताओं के उदाहरण के रूप में जिनकी गणना की जाती है, उनमें नागरिक और राजनैतिक अधिकार सम्मिलित हैं जैसे कि जीवन और आजाद रहने का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कानून के सामने समानता एवं आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के साथ ही साथ सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने का अधिकार, भोजन का अधिकार काम करने का अधिकार एवं शिक्षा का अधिकार। सवा अरब से भी ज्यादा संख्या वाली एक विविधतापूर्ण आबादी के लिए मानवाधिकार सुनिश्चित करने की चुनौती होती है, जिनके विभिन्न गुटों और समुदायों के बीच अपने ही हित कई बार एक-दूसरे से टकराते हुए प्रतीत होते हैं। मानवाधिकारों के मामले में हमारी स्थिति उस विद्यार्थी जैसी है, जिसकी उपलब्धियां कम नहीं हैं, लेकिन अभी उसे लंबी यात्रा तय करनी है।

स्वतंत्रता और समानता से जीवन यापन करने के अधिकारों की रक्षा करना मानव के मूलभूत अधिकारों में निहित है। लोकतंत्र हमें मानव के सभी अधिकारों की रक्षा का वचन देता है मगर स्वतंत्रता  की आड़ में आतंकवादी और विध्वंशक गतिविधिया बर्दाश्त नहीं की जाती। यह निर्णय तो देशवासियों को करना है की हमारे अधिकार क्या है और उनकी रक्षा कैसे की  जाये। बहरहाल स्वतंत्रता के साथ शिक्षा और रोटी, कपडा और मकान का बुनियादी  अधिकार सभी के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है जिस पर चिंतन और मंथन की जरुरत है।

मानव अधिकार वे अधिकार है जो किसी भी व्यक्ति के लिए सामान्य रूप से जीवन बिताने एवं उसके अस्तित्व के लिए आवश्यक है। मानवाधिकार का उद्देश्य है विश्व में किसी भी व्यक्ति, समाज या वर्ग को परेशान न किया जाये। सभी को जीवन जीने की आजादी एवं समान अधिकार मिले। मानवाधिकारों को सबसे ज्यादा चुनौती गरीबी से मिल रही है। विश्वभर में हर 8 में से 1 व्यक्ति भूख के साथ जी रहा है। दुनियां में 24 हजार व्यक्ति  रोजाना  भुखमरी के शिकार होकर अकाल मौत मर जाते है। ऐसे दौर में हम मानवाधिकारों की बात करते नहीं थकते यह सम्पूर्ण विश्व के लिए शर्मनाक है। मानवाधिकारों की बात करने वालों लिए यह किसी चुनौती से कम नहीं है। मानवाधिकार हर प्राणी के लिए मायने रखता है वह चाहे अमीर हो या गरीब। दुनियां के हर संपन्न व्यक्ति और देश को भूख से पीड़ित लोगों को पेटभर खाना खिला कर उनके मानवाधिकारों की रक्षा के लिए आगे आना होगा तभी हमारा सही अर्थों में मानवाधिकार दिवस मानना सार्थक होगा। भूख और गरीबी से  लोगों के जीने का अधिकार खतरे में पड़ जाता है तो अन्य मानवाधिकारों, जैसे- समानता, विचार अभिव्यक्ति, धार्मिक स्वतंत्रता आदि के बारे में बातें करना बेमानी है। बाल मजदूरी, महिलाओं का यौन शोषण, धार्मिक अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न, जातिगत भेद-भाव, लूट-पाट, बलात्कार आदि सभी बातें मानवाधिकारों के खिलाफ जाती हैं ।

भारत में मानव अधिकार आयोग होने और उनके संरक्षण के लिए कारगर कानून होने के बावजूद बच्चों और महिलाओं पर अत्याचार, तस्करी, ऑनर किलिंग, अस्पृश्यता, गरीबी, महिलाओं के साथ घर या सार्वजनिक तौर पर होने वाली हिंसा आजादी के 7 दशक बीत जाने के बाद भी जारी है। इसलिए हमें सब कुछ सरकार पर न छोड़कर अपने स्तर पर भी अपने आसपास होने वाले इन अपराधों को रोकने के लिए मिलकर कदम उठाने होंगे। हमें अपने अधिकारों का सही इस्तेमाल करना है तो यह तभी संभव होगा जब एक सभ्य समाज के नागरिक होने के नाते हम एक-दूसरे के दुःख  दर्द को समझें और एक-दूसरे के अधिकारों को बना रहने दें। इसकी सार्थकता तभी होगी जब हम एक दूसरे के प्रति सद्भाव बनाये रखते हुए मानवाधिकारों की रक्षा के लिए समर्पित होंगे।

 बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी 32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

केंद्र की त्रिपुरा के 30 विशेष रूप से निर्बल जनजातीय समूह बस्तियों में संपर्क बढ़ाने के लिए 25 सड़क परियोजनाओं को मंजूरी

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ग्रामीण विकास मंत्रालय ने पीएम-जनमन के सड़क संपर्क घटक के अंतर्गत त्रिपुरा के लिए 68.67 करोड़ रुपये के अनुमानित निवेश के साथ 65.38 किलोमीटर लंबाई की 25 सड़क परियोजनाओं को मंजूरी दी है।

यह ऐतिहासिक पहल:

  • राज्य में 30 पीवीटीजी बस्तियों को बारहमासी सड़क संपर्क प्रदान करेगी।
  • राज्य में रहने वाले विशेष रूप से निर्बल जनजातीय समूहों (पीवीटीजी) की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार करेगी।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में कनेक्टिविटी बढ़ाएगी, सुदूरवर्ती गांवों और शहरी केंद्रों के बीच की खाई को पाटेगी।
  • क्षेत्र में आर्थिक विकास, व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा देगी।
  • स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और बाजार जैसी आवश्यक सेवाओं तक पहुंच में सुधार करेगी।
  • रोजगार के अवसर सृजित करेगी और स्थानीय अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करेगी।
  • समृद्ध पूर्वोत्तर और विकसित भारत के सरकार के विजन के साथ संयोजित करेगी।

पीएम-जनमन के अंतर्गत परियोजनाओं का क्षेत्र पर परिवर्तनकारी प्रभाव पड़ेगा, जिससे पूर्वोत्तर क्षेत्र में जनजातीय समूहों के विकास और समृद्धि में योगदान मिलेगा तथा समावेशी विकास के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता सुदृढ़ होगी।

एनएमडीसी स्टील का नवंबर 2025 में रिकॉर्ड तोड़ परिचालन प्रदर्शन

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एनएमडीसी स्टील लिमिटेड (एनएसएल), भारत के सबसे युवा एकीकृत इस्पात संयंत्र ने अपनी मूल्य-श्रृंखला में परिचालन माइलस्टोन के एक असाधारण सेट के साथ नवंबर 2025 का समापन किया। प्रक्रिया-स्थिरता में मजबूती, परिचालन उत्कृष्टता और बढ़ती क्षमता उपयोग का प्रदर्शन करते हुए एनएसएल ने कई प्रमुख उत्पादन क्षेत्रों में अपना अब तक का सर्वश्रेष्ठ मासिक प्रदर्शन किया है।

नवंबर माह में कच्चे माल की हैंडलिंग प्रणाली (आरएमएचएस) ने 21 नवंबर, 2025 को दिन में सबसे अधिक यानी 616 वैगन की टिपलिंग के साथ रिकॉर्ड उपलब्धियां हासिल कीं। संयंत्र ने 5,18,886 टन का अब तक का सबसे अधिक मासिक बेस मिक्स उत्पादन भी हासिल किया।

सिंटर संयंत्र में एनएसएल ने दिन और मासिक सिंटर उत्पादन रिकॉर्ड के साथ अपनी विकास यात्रा जारी रखी, जो रेटेड क्षमता उपयोग के 105 प्रतिशत से अधिक पर परिचालन करते हुए 30 नवंबर, 2025 को एक दिन में 15,590 टन और माह में 4,14,271 टन तक पहुंच गया।

ब्लास्ट फर्नेस ने 28 नवंबर, 2025 को 11,315 टन के रिकॉर्ड हॉट मेटल उत्पादन के साथ उल्लेखनीय दक्षता दर्ज की, जो रेटेड क्षमता उपयोग का 119 प्रतिशत है, और क्षमता उपयोग के 101 प्रतिशत को पार करते हुए 2,80,049 टन का मासिक उत्पादन किया। विशेष रूप से एनएसएल ने बर्डन में केवल सिंटर और अयस्क का उपयोग करके हॉट मेटल के 519 किलोग्राम प्रति टन की अपनी सबसे कम मासिक औसत ईंधन दर हासिल की, जो देश में सर्वोत्तम औसत में से है, और हॉट मेटल की 164 किलोग्राम प्रति टन की उच्चतम मासिक औसत पीसीआई दर हासिल की।

स्टील मेल्टिंग शॉप और थिन स्लैब कैस्टर-हॉट स्ट्रिप मिल ने भी अब तक का अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन      किया। एनएसएल ने 2,03,356 टन का अपना सर्वाधिक मासिक एचआर कॉइल उत्पादन, 2,09,445 टन क्रूड इस्पात उत्पादन और 2,15,010 टन तरल इस्पात उत्पादन रिकार्ड किया, जिसमें क्षमता का उपयोग क्रमशः 84 प्रतिशत, 85 प्रतिशत और 86 प्रतिशत को पार कर गया। संयंत्र ने 4,799 हीट की अब तक की सबसे अच्छी कनवर्टर लाइनिंग लाइफ के साथ एक नया बेंचमार्क भी बनाया। दो नए ग्रेड – IS 2062 E450BR और IS 2062 E350C को सफलतापूर्वक वाणिज्यिक उत्पादन में परिवर्तित किया गया, जिससे निर्माण, आधारभूत सुविधाओं और भारी  ढांचे और भारी इंजीनियरिंग क्षेत्र के लिए कंपनी के उत्पाद पोर्टफोलियो में वृद्धि हुई।

एनएसएल ने ऑक्सीजन प्लांट में अनुकूलतंम प्रचालनों से अपनी लागत दक्षता को भी बेहतर बनाया और सिंगल प्लांट टर्नडाउन मोड में काम करके बिजली की लागत में लगभग 1.9 करोड़ रुपये की बचत की है। दूसरी महत्वपूर्ण उपलब्धियों में ब्लास्ट फर्नेस (पैकेज 05) और टर्बो ब्लोअर (पैकेज 10A) के पीजी टेस्ट का सफलतापूर्वक पूरा होना, साथ ही IS 2041:2024 और IS 2062 E450BR के लिए बीआईएस लाइसेंस हासिल करना शामिल है।

सभी इकाइयों में इस शानदार निष्पादन पर टिप्पणी करते हुए श्री अमिताभ मुखर्जी, अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक ने कहा, ”सभी इकाइयों में लगातार रिकॉर्ड तोड़ उपलब्धियां हमारी टीम के समर्पण, अनुशासन और पक्के इरादे को दर्शाती हैं। भारत एक ग्लोबल स्टील पावरहाउस बनने की अपनी यात्रा में तेजी से आगे बढ़ रहा है और एनएसएल प्रौद्योगिकी से संचालित दक्षता, बढ़ते प्रोडक्ट पोर्टफोलियो और राष्ट्र निर्माण की प्रतिबद्धता के साथ भारत की इस्पात यात्रा की प्रगति में अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार है।”