मुख्यमंंत्री ने जनपद गाेरखपुर में रैन बसेरों का निरीक्षण किया,उपलब्ध सुविधाओं के बारे में जानकारी प्राप्त की

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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बीती रात जनपद गोरखपुर में रेलवे
स्टेशन तथा झूलेलाल मन्दिर के पास बने रैन बसेरों का निरीक्षण किया। उन्होंने
बसेरों में ठहरे लाेगाें से बातचीत कर उपलब्ध सुविधाओं के बारे में जानकारी प्राप्त की।
मुख्यमंत्री जी ने रैन बसेरों में जरूरतमन्दों को कम्बल व भोजन का वितरण भी किया।
उन्होंने रेलवे स्टेशन के पास रैन बसेरे के बाहर भी जरूरतमन्द लोगों को कम्बल व
भोजन का वितरण कर आश्वस्त किया कि सरकार उनकी सेवा के लिए प्रतिबद्ध है।
मुख्यमंत्री जी ने निरीक्षण के दौरान अधिकारियों को निर्देशित किया कि रैन बसेरों
में अच्छी सुविधाएँ दी जाएँ। प्रशासन इसे प्राथमिकता पर लेते हुए यह सुनिश्चित करे कि
सभी रैन बसेरों में पर्याप्त संख्या में बिस्तर व कम्बल का इंतजाम हो। इनमें साफ-सफाई
का भी पूरा ध्यान रखा जाए। साथ ही, यदि किसी के पास भोजन की व्यवस्था नहीं है,
तो उसे भोजन भी उपलब्ध कराया जाए।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि प्रदेश सरकार हर जरूरतमन्द को शीतलहर से बचाने
और सम्मानजनक आश्रय देने के लिए प्रतिबद्ध है। इसके लिए रैन बसेरों काे पूरी क्षमता
के साथ संचालित किया जा रहा है। जरूरतमन्दों में ऊनी वस्त्र एवं कम्बल वितरण और
अलाव की व्यवस्था के लिए तहसीलों और नगर निकायों को पर्याप्त धनराशि उपलब्ध
करायी गई है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि भीषण शीतलहर से आम जनमानस के बचाव के लिए
शासन और प्रशासन संवेदनशील है। हर व्यक्ति का जीवन अमूल्य है। अधिकारियों को
निर्देश दिए गए हैं कि कोई भी व्यक्ति फुटपाथ, प्लेटफॉर्म या सड़क पर खुले में न लेटे।
यदि कोई व्यक्ति ऐसा मिले, ताे उसे रैन बसेरों में पहुँचाया जाए और इसकी निरन्तर
निगरानी भी की जाए।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि सभी निकायों और पंचायतों को यह निर्देश दिए गए हैं
कि वह भीषण शीतलहर में जहाँ भी आवश्यकता हो, अलाव की पर्याप्त व्यवस्था भी
सुनिश्चित करें। यह सभी व्यवस्थाएँ प्रभावी तरीके से आगे बढ़ायी जा रही हैं। महानगर
गोरखपुर में नगर निगम द्वारा 14 रैन बसेरों का संचालन किया जा रहा है, जहाँ 700 से
1,000 तक जरूरतमन्द आश्रय ले सकते हैं।
मुख्यमंत्री जी ने रैन बसेरों में ठहरे लाेगों से कुशलक्षेम जानने के साथ उनसे
आत्मीय संवाद भी किया। रैन बसेरों में देवरिया, कुशीनगर, बलिया, गगहा, चौरी-चौरा
समेत पूर्वांचल के अलग अलग क्षेत्रों क े नागरिकों के अलावा, बिहार से आए लोग भी
ठहरे थे। कोई परीक्षा के सिलसिले में आया था, कोई डॉक्टर को दिखाने के लिए तो
कोई काम की तलाश या फिर किसी अन्य कार्य से गाेरखपुर आया था। सभी ने व्यवस्था
को लेकर संतोष व्यक्त किया।
निरीक्षण के दौरान महापौर डॉ0 मंगलेश श्रीवास्तव, विधान परिषद सदस्य डॉ0
धर्मेन्द्र सिंह, विधायक श्री विपिन सिंह सहित अन्य जनप्रतिनिधिगण तथा शासन-प्रशासन
के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

काशी तमिल संगमम् 4.0 के 10वें दिन बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में पाँचवें शैक्षणिक सत्र का सफल आयोजन

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काशी तमिल संगमम् 4.0 के अंतर्गत गुरुवार को बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में कुशल पेशेवरों एवं शिल्पकारों के लिए आयोजित पाँचवाँ शैक्षणिक सत्र सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। तमिलनाडु से आए उद्योग जगत के प्रतिनिधियों, उद्यमियों और पारंपरिक शिल्पकारों ने इस विशेष सत्र में उत्साहपूर्वक भाग लिया।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जयंत चौधरी, माननीय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), कौशल विकास एवं उद्यमशीलता मंत्रालय तथा राज्य मंत्री, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, ने अपने प्रेरक उद्बोधन में काशी तमिल संगमम् की सराहना करते हुए कहा कि यह आयोजन देश की दो प्राचीन और समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं को अद्भुत रूप से जोड़ने वाला महत्त्वपूर्ण मंच है। उन्होंने कहा कि भले ही हमारी भाषाएँ और विचार भिन्न हों, किंतु हमारा साझा मूल्य-तंत्र और संविधान हमें एक सूत्र में बाँधता है। भाषा कोई बाधा नहीं, बल्कि वह सेतु है जो तमिलनाडु और काशी को एक परिवार की तरह जोड़ता है।

 जयंत चौधरी ने बनारस की आध्यात्मिकता और आकर्षण का उल्लेख करते हुए कहा कि “कौन बनारस आना नहीं चाहता? यह शहर स्वयं लोगों को अपनी ओर खींच लेता है।” उन्होंने बीएचयू को मात्र एक शिक्षण स्थल न बताते हुए उसे एक सशक्त सामाजिक संस्थान के रूप में वर्णित किया। मार्क ट्वेन के प्रसिद्ध उद्धरण का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि बनारस इतिहास, परंपराओं और किंवदंतियों से भी अधिक प्राचीन है। बदलते वैश्विक परिवेश का संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि आज परिवर्तन की गति वर्षों में नहीं, बल्कि क्षणों में मापी जाती है। ऐसे समय में बीएचयू से यूनिकॉर्न स्टार्टअप्स, नवीन शोध और पेटेंट जैसी उपलब्धियों की अपेक्षा स्वाभाविक है। उन्होंने यह भी कहा कि आज की युवा पीढ़ी बहुभाषी, संवेदनशील और वैश्विक दृष्टिकोण रखने वाली है, और विद्यार्थियों को अंतरराष्ट्रीय भाषाएँ सीखने के लिए प्रेरित किया।

बीएचयू के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने अपने स्वागत संबोधन में तमिलनाडु से आए अतिथियों का हृदय से स्वागत किया। उन्होंने कहा कि काशी और तमिलनाडु के बीच आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और ज्ञानपरंपरा पर आधारित संबंध सदियों से स्थापित हैं। शैव-वैष्णव परंपराएँ, मठ-पीठ, संत-विद्वान और तीर्थयात्राएँ इन दोनों प्रदेशों को एक अदृश्य सेतु से जोड़ती हैं। उन्होंने कहा कि काशी तमिल संगमम् कोई नया संबंध नहीं रचता, बल्कि एक प्राचीन बंधन को नई पीढ़ियों के लिए पुनर्जीवित करता है। उन्होंने बताया कि वाराणसी के विभिन्न विद्यालयों में लगभग 50 तमिल भाषा-शिक्षक कार्यरत हैं, जो इस सांस्कृतिक आदान–प्रदान की जीवंत मिसाल हैं। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि तेनकासी से प्रारंभ हुआ अगस्त्य कार अभियान काशी पहुँच चुका है, जो इन ऐतिहासिक संबंधों का प्रतीक है।

प्रबंध शास्त्र संस्थान के निदेशक प्रो. आशीष बाजपेयी ने अपने स्वागत वक्तव्य में कहा कि काशी की प्रत्येक गली, घाट और शिखर में सदियों का ज्ञान, प्रेम और भक्ति गुंजित है, और आज यह पावन नगरी तमिलनाडु के प्रतिनिधियों का हृदय से स्वागत कर रही है। उन्होंने कहा कि काशी तमिल संगमम् “एक भारत श्रेष्ठ भारत” की राष्ट्रीय दृष्टि का महत्वपूर्ण अंग है, जिसका उद्देश्य भारत के विभिन्न क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक समन्वय और एकता को सुदृढ़ करना है।

1911 में 12 दिसंबर को कोलकत्ता से दिल्ली आई राजधानी

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भारत के औपनिवेशिक इतिहास में सन 1911 एक अत्यंत महत्वपूर्ण वर्ष माना जाता है। इसी वर्ष कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) से दिल्ली को भारत की नई राजधानी घोषित किया गया। यह निर्णय ब्रिटिश शासन की राजनीतिक, सैन्य, प्रशासनिक और भू-रणनीतिक सोच से प्रेरित था। राजधानी परिवर्तन केवल स्थान का बदलाव नहीं था, बल्कि भारत की व्यवस्था, शासन और सरकारी ढाँचे पर दूरगामी प्रभाव डालने वाला ऐतिहासिक मोड़ था।

कोलकाता कब से कब तक भारत की राजधानी रहा
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1757 के प्लासी युद्ध और 1764 के बक्सर युद्ध के बाद बंगाल पर अपना नियंत्रण मजबूत कर लिया था। प्रशासनिक कार्यों के विस्तार के साथ ही सन 1772 में वारेन हेस्टिंग्स ने कोलकाता को ब्रिटिश भारत की वास्तविक राजधानी बना दिया। उसके बाद लगभग 139 वर्ष तक, 1772 से लेकर 1911 तक कोलकाता ही भारत की राजधानी रहा। हालाँकि दिल्ली दरबार और अन्य समारोह कभी-कभी दिल्ली में होते थे, लेकिन प्रशासन, न्याय व्यवस्था, व्यापारिक गतिविधियाँ और सत्ता का केंद्र कोलकाता ही था।


कोलकाता को राजधानी बनाने के प्रमुख कारण थे—
ब्रिटिश व्यापार का केंद्र – शुरुआती दौर में कंपनी का मुख्य उद्देश्य व्यापार था और कोलकाता बंगाल की समृद्धि व समुद्री रास्तों के कारण सबसे अनुकूल स्थान था।
राजस्व व्यवस्था का मजबूत आधार – बंगाल से मिलने वाला राजस्व साम्राज्य के लिए सबसे बड़ा स्रोत था।
भौगोलिक सुविधाएँ – समुद्र के निकट होने से यूरोप से संपर्क आसान था।
सत्ता का आरंभिक केंद्र – कंपनी सरकार ने अपने शीर्ष अधिकारियों का निवास और प्रशासनिक कार्यालय यहीं स्थापित किए थे।

राजधानी दिल्ली स्थानांतरित करने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई
समय के साथ कोलकाता की सीमाओं, राजनीतिक परिस्थिति और भूगोल ने ब्रितानियों के सामने कई चुनौतियाँ उत्पन्न कर दीं। कुछ मुख्य कारण निम्नलिखित थे—

१. कोलकाता का भौगोलिक असुरक्षित होना
पूर्वी भारत का यह क्षेत्र समुद्र के निकट था, जिससे युद्धकाल में यह बाहरी शक्तियों के आक्रमण का आसान लक्ष्य बन सकता था।
ब्रिटिश सत्ता अब संपूर्ण भारत पर फैली थी और ऐसे में एक अधिक सुरक्षित, देश के मध्य में स्थित राजधानी की आवश्यकता महसूस हुई।

२. बंगाल में राष्ट्रीय आंदोलन का बढ़ता प्रभाव
उन्नीसवीं सदी के अंत तक बंगाल राष्ट्रीय आंदोलन का प्रमुख केंद्र बन चुका था।
अनुशीलन समिति, क्रांतिकारी गतिविधियाँ और औपनिवेशिक शासन के खिलाफ बड़े आंदोलन लगातार हो रहे थे।
ब्रिटिश सरकार राजधानी को असंतोष के केंद्र से हटाकर एक शांत व राजनीतिक रूप से रणनीतिक स्थान पर ले जाना चाहती थी।

३. कोलकाता की भीड़, अव्यवस्था और प्रशासनिक कठिनाई
कोलकाता उस समय दुनिया की सबसे भीड़भाड़ वाली औपनिवेशिक शहरों में से था। सड़कों, पुलों, जल निकासी, आवागमन आदि पर भारी दबाव था।
सरकार को लगा कि इतनी बड़ी और अव्यवस्थित नगरी से पूरे भारत का शासन चलाना कठिन होता जा रहा है।

४. दिल्ली का ऐतिहासिक महत्व और सामरिक स्थिति
दिल्ली सदियों से भारत की राजनीति का केंद्र रही थी—चाहे वह मुगल हों, तोमर हों, खिलजी हो या तुगलक।
ब्रिटिश चाहते थे कि भारत के प्रशासनिक ढाँचे को दिल्ली से जोड़कर वे स्वयं को इस ऐतिहासिक साम्राज्य के उत्तराधिकारी के रूप में प्रस्तुत करें।
दिल्ली उत्तर, पश्चिम और मध्य भारत के केंद्र में स्थित थी, जो सामरिक दृष्टि से अधिक उपयुक्त था।

५. पूरे भारत में बेहतर संचार सुविधा
दिल्ली को रेलवे, राजमार्ग और आंतरिक संपर्क के लिए सर्वाधिक अनुकूल माना गया।
उत्तर भारत, पंजाब, राजस्थान, यूपी, मध्य भारत और आगे अफगानिस्तान मार्ग तक ब्रिटिश सेना का नियंत्रण दिल्ली से अधिक सशक्त हो सकता था।

६. बंगाल विभाजन की असफलता और राजनीतिक दबाव
1905 में लॉर्ड कर्जन द्वारा किया गया बंगाल विभाजन भारी विरोध के कारण असफल हो गया था।
ब्रिटेन चाहता था कि साम्राज्य का प्रशासन बंगाल की राजनीतिक उथल-पुथल से अलग होकर देश के केंद्र से संचालित हो।

दिल्ली को राजधानी बनाने की घोषणा कब और कैसे हुई
राजधानी परिवर्तन की आधिकारिक घोषणा 12 दिसम्बर 1911 को हुई।
यह घोषणा ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम ने दिल्ली में आयोजित ऐतिहासिक दिल्ली दरबार में की।
इस घोषणा के बाद पूरा प्रशासनिक ढाँचा धीरे-धीरे दिल्ली में स्थानांतरित किया गया।
घोषणा की मुख्य बातें—
भारत की राजधानी कोलकाता से दिल्ली लाई जाएगी।
नई राजधानी के निर्माण के लिए विशेष क्षेत्र चिन्हित होगा।
वायसराय हाउस (वर्तमान राष्ट्रपति भवन), सचिवालय, संसद भवन आदि नई योजना के तहत बनेंगे।
कोलकाता अब भी बंगाल प्रांत की राजधानी रहेगा, पर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली होगी।
इस घोषणा के बाद एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर ने नई दिल्ली की रूपरेखा तैयार की।
1931 में औपचारिक रूप से नई दिल्ली का उद्घाटन हुआ और यह भारत की स्थायी राजधानी बन गई।

दिल्ली को राजधानी बनाने के बाद के प्रभाव
भारत के प्रशासनिक ढांचे में व्यापक परिवर्तन हुआ।
उत्तरी भारत में राजनीतिक गतिविधियाँ बढ़ीं, जो कालांतर में राष्ट्रीय आंदोलन का नया केंद्र बना।
दिल्ली का औद्योगिक, जनसंख्या और सांस्कृतिक विस्तार पहले से तेज हुआ।
ब्रिटिश साम्राज्य ने मुगल साम्राज्य की परंपरा का प्रतीकात्मक “उत्तराधिकार” अपने पक्ष में स्थापित किया।
उपमहाद्वीप के केंद्र में प्रशासन होने से संचार, सेना, रेल और शासन सभी अधिक सुचारु रूप से चलने लगे।

उपसंहार
कोलकाता से दिल्ली राजधानी स्थानांतरण केवल एक भौगोलिक बदलाव नहीं था। यह ब्रिटिश सत्ता की राजनीतिक रणनीति, सुरक्षा चिंताओं और राष्ट्रीय आंदोलन की पृष्ठभूमि से जुड़ा बड़ा निर्णय था।
कोलकाता 1772 से 1911 तक लगभग डेढ़ सदी से अधिक समय तक राजधानी रहा।
परंतु बदलते समय, राजनीतिक परिस्थितियों और भारत की विविधता को देखते हुए ब्रिटेन ने दिल्ली को अधिक उपयुक्त पाया और 12 दिसम्बर 1911 की घोषणा के बाद भारत प्रशासन का केंद्र दिल्ली बन गया।
यह निर्णय आगे चलकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, सांस्कृतिक गतिविधियों और आधुनिक भारत की राजनीतिक संरचना को आकार देने में अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुआ।

    ​आधुनिक राजधानी का निर्माण: कलकत्ता औपनिवेशिक काल के शुरुआती चरण में विकसित हुआ था और इसकी वास्तुकला पुरानी पड़ रही थी। ब्रिटिश सरकार एक नई, आधुनिक और सुनियोजित राजधानी बनाना चाहती थी जो उनके साम्राज्य की शक्ति और भव्यता को प्रदर्शित कर सके। दिल्ली ने नई राजधानी (नई दिल्ली) के निर्माण के लिए पर्याप्त और अविकसित भूमि प्रदान की, जिसकी योजना एडविन लुटियंस और हर्बर्ट बेकर जैसे वास्तुकारों ने बनाई।

    ​विधान परिषदों का महत्व: 1909 के मॉर्ले-मिंटो सुधारों के बाद, निर्वाचित विधान परिषदों का महत्व बढ़ रहा था। वायसराय लॉर्ड हार्डिंग ने तर्क दिया था कि इन उभरते हुए विधायी निकायों के लिए एक अधिक केंद्रीय स्थान पर राजधानी होना आवश्यक है ताकि वे देश के विभिन्न हिस्सों के प्रतिनिधियों के लिए सुलभ हो सकें।

    ​कलकत्ता से दिल्ली राजधानी का स्थानांतरण केवल एक भौगोलिक बदलाव नहीं था, बल्कि ब्रिटिश सरकार की एक बहु-आयामी रणनीतिक चाल थी। यह चाल बंगाल में बढ़ते राष्ट्रवाद को शांत करने, एक विशाल और विविध साम्राज्य पर अधिक केंद्रीय स्थान से प्रभावी ढंग से शासन करने और भारतीय इतिहास के प्रतीकवाद का लाभ उठाकर अपनी सत्ता को मजबूत करने के उद्देश्य से की गई थी। इस कदम ने कलकत्ता के राजनीतिक और आर्थिक प्रभुत्व को कम कर दिया और दिल्ली को भारत की आधुनिक प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था का स्थायी केंद्र बना दिया।( चैटजेपीटी− जैमिनी)

    मध्यप्रदेश में अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा के लिये करें सभी प्रयास : मुख्यमंत्री डॉ. यादव

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    मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि राज्य सरकार मध्यप्रदेश को वैश्विक शिक्षा मानचित्र पर नई पहचान दिलाने की दिशा में अब निर्णायक कदम बढ़ा रही है। राज्य सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों के अध्ययन केन्द्रों की स्थापना के लिए विशेष टास्क फोर्स गठित करने का निर्णय लिया है। इस संबंध में आदेश शीघ्र ही जारी किए जाएंगे। प्रदेश के विद्यार्थियों को विश्वस्तरीय शिक्षा मध्यप्रदेश में ही उपलब्ध कराई जाए, जिससे उच्च शिक्षा के इच्छुक विद्यार्थियों को विदेश जाकर अध्ययन करने की आवश्यकता कम पड़े और स्थानीय स्तर पर ही अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा गुणवत्ता का अकादमिक वातावरण मिल सके। मुख्यमंत्री डॉ. यादव गत बुधवार को ‘सुशासन भवन’ में आयोजित एक उच्चस्तरीय बैठक को संबोधित कर रहे थे।

    अटल बिहारी वाजपेयी सुशासन एवं नीति विश्लेषण संस्थान के अधिकारियों ने बताया कि इस सिलसिले में तेजी से प्रगति हो रही है। संयुक्त राज्य अमेरिका के दो विश्व विख्यात विश्वविद्यालयों Arizona State University (ASU) और Purdue University के साथ ताईवान की प्रतिष्ठित Asia University से मध्यप्रदेश में अपने अध्ययन केन्द्र स्थापित करने के लिए सक्रियता से संवाद चल रहा है। इन वर्ल्ड क्लास संस्थानों को उच्च स्तरीय शिक्षा, शोध एवं नवाचार के क्षेत्र में वैश्विक पहचान प्राप्त है। शासन स्तर पर इन विश्वविद्यालयों के शीर्ष प्रबंधन से लगातार बातचीत हो रही है, जिससे संभावनाओं को बेहतर तरीके से मूर्त रूप देने में और तेजी लाई जा सके।

    राज्य सरकार की मंशा है कि प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के अध्ययन केन्द्र खुलने से प्रदेश में उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और बेहतर होगी। इंजीनियरिंग, एआई, डेटा साइंस, हेल्थ केयर साईंस, मैनेजमेंट और नये-नये उभरते तकनीकी क्षेत्रों में विद्यार्थियों को अंतर्राष्ट्रीय पाठ्यक्रम उपलब्ध होंगे। साथ ही स्थानीय उद्योगों, स्टार्टअप्स और इनोवेशन इकोसिस्टम को भी उच्च स्तरीय विशेषज्ञता और संयुक्त शोध कार्यक्रमों (ज्वाइंट रिसर्च प्रोग्राम्स) का भी लाभ मिलेगा।

    राज्य सरकार द्वारा इस संबंध में गठित की जा रही टास्क फोर्स में प्रो. संतोष विश्वकर्मा को अध्यक्ष नामांकित किया जा रहा है। यह टास्क फोर्स अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों के अध्ययन केन्द्रों की स्थापना से जुड़े सभी तकनीकी, शैक्षणिक और कानूनी पहलुओं का अध्ययन करेगी। साथ ही इन विश्वविद्यालयों के साथ होने वाले करार (समझौते) की प्रक्रिया को गति देगी। अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों से वार्ताएं सफल रहने पर भविष्य में मध्यप्रदेश उच्च शिक्षा के क्षेत्र में देश का सबसे आकर्षक एवं आइडियल डेस्टिनेशन बनेगा, जहां वैश्विक विश्वविद्यालयों का व्यापक शैक्षिक-तंत्र प्रदेश की प्रतिभाओं को नव विकसित परिदृश्य में नए अवसर और नई दिशाएं देगा।

    बैठक में अटल बिहारी वाजपेयी सुशासन एवं नीति विश्लेषण संस्थान के उपाध्यक्ष डॉ. राजीव दीक्षित, प्रमुख सचिव एवं संस्थान के चीफ एक्जीक्यूटिव ऑफिसर श्री गुलशन बामरा एवं डायरेक्टर श्री ऋषि गर्ग सहित अन्य पदाधिकारी भी उपस्थित थे।

    काशी तमिल संगमम्-4.0 के 10वें दिन किसान प्रतिनिधियों के दल ने अयोध्या में रामलला के दर्शन किए

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    काशी तमिल संगमम् 4.0 के अंतर्गत आए किसानों के प्रतिनिधिमंडल के लिए गुरुवार का दिन भावनात्मक और ऐतिहासिक क्षण बन गया। प्रतिनिधिमंडल ने अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि मंदिर, हनुमानगढ़ी, और पवित्र सरयू नदी का दर्शन किया और इस अनुभव ने हर किसान के दिल को गहराई से स्पर्श किया।

    जैसे ही किसान राम मंदिर के दर्शन स्थल पर पहुंचे, उनके कदम थम गए और आंखें नम हो उठीं। कई किसान भावुक होकर बोले कि यह केवल दर्शन नहीं, बल्कि 500 वर्षों की आस्था, संघर्ष और प्रतीक्षा की पूर्णता है। प्रभु श्रीराम की भव्य प्रतिमा को देखते ही उनके भीतर संचित भावनाएं उमड़ पड़ीं। कुछ किसान तो हाथ जोड़कर खड़े ही रह गए, मानो उनके पास शब्द ही न बचे हों। उन्होंने कहा कि आज उन्हें महसूस हुआ कि “सदियों की प्रतीक्षा का फल मिल गया।” 

    सके बाद किसानों ने हनुमानगढ़ी पहुंचकर बजरंगबली के चरणों में प्रणाम किया। जयकारों की गूंज और भक्तिभाव से भरे वातावरण ने उन्हें भीतर तक ऊर्जा से भर दिया। कई किसानों ने कहा कि हनुमानजी के दरबार में खड़े होकर उन्हें जीवन के संघर्षों से लड़ने की प्रेरणा मिली।

    दोपहर में जब वे सरयू नदी के तट पहुंचे, तो नदी की ठंडी हवा और शांत प्रवाह ने उन्हें गहरी आध्यात्मिक शांति प्रदान की। किसान सरयू जी के किनारे बैठकर देर तक उस शांति को महसूस करते रहे। कई ने कहा कि सरयू के सामने मन पूरी तरह से स्थिर हो गया जैसे सारी थकान बहती लहरों में समा गई हो।

    तिनिधिमंडल ने अत्यंत भावुक होकर कहा कि काशी तमिल संगमम् ने उन्हें केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं दी, बल्कि आस्था, इतिहास और आध्यात्मिकता को करीब से अनुभव करने का अवसर दिया। यह यात्रा, विशेषकर राम मंदिर का दर्शन, उनके लिए सदैव स्मरणीय रहेगा।

    काशी तमिल संगमम् 4.0 उत्तर और दक्षिण भारत की सांस्कृतिक एकता का सेतु बनकर, ऐसे भावपूर्ण क्षणों को जन्म दे रहा है और किसानों का यह अनुभव उसी एकता की सबसे सुंदर मिसाल है।

    सुपरस्टार रजनीकांत: एक जीवन परिचय और भारतीय सिनेमा में योगदान

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    ​रजनीकांत, जिनका असली नाम शिवाजी राव गायकवाड़ है, भारतीय फिल्म जगत के एक ऐसे प्रतिष्ठित अभिनेता हैं जिनकी लोकप्रियता किसी परिचय की मोहताज नहीं है। उनका जन्म 12 दिसंबर, 1950 को कर्नाटक के बैंगलोर में एक मराठी परिवार में हुआ था। उनके पिता, रामोजीराव गायकवाड़, एक पुलिस कांस्टेबल थे, और उनकी माता जीजाबाई थीं। रजनीकांत ने बचपन में ही अपनी माँ को खो दिया था।

    ​🌟 प्रारंभिक जीवन और संघर्ष

    ​रजनीकांत का प्रारंभिक जीवन संघर्षों से भरा रहा। फिल्म उद्योग में प्रवेश करने से पहले, उन्होंने जीवनयापन के लिए कई छोटे-मोटे काम किए। वह एक कारपेंटर थे, कुली का काम भी किया और फिर बेंगलुरु परिवहन सेवा (BTS) में बस कंडक्टर के रूप में सेवा दी। बस कंडक्टर के रूप में काम करते हुए भी, उन्होंने विभिन्न मंचों पर अभिनय और स्टंट किए, जहाँ उनकी अभिनय प्रतिभा को लोगों ने पहचाना। उनकी सिगरेट पीने और चश्मा पहनने की खास स्टाइल उस समय भी लोगों के बीच लोकप्रिय थी।

    ​🎬 फिल्म इंडस्ट्री में प्रवेश और करियर

    ​रजनीकांत ने 1975 में तमिल फिल्म ‘अपूर्व रागंगल’ से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। इस फिल्म का निर्देशन के. बालाचंदर ने किया था, जिन्हें रजनीकांत अपना गुरु मानते हैं। शुरुआत में, उन्होंने अक्सर नकारात्मक या सहायक भूमिकाएँ निभाईं। हालांकि, उनकी अद्वितीय अभिनय शैली, शानदार संवाद अदायगी और बेमिसाल ऑन-स्क्रीन उपस्थिति ने उन्हें जल्द ही एक बड़ा स्टार बना दिया।
    ​प्रमुख फिल्में और सफलता
    ​रजनीकांत ने मुख्य रूप से तमिल सिनेमा में काम किया, लेकिन उन्होंने हिंदी, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम फिल्मों में भी अभिनय किया है। उनकी कुछ सबसे बड़ी और यादगार फिल्मों में शामिल हैं:

    ​तमिल: बाशा, अन्नामलाई, मुथु, पडयप्पा, शिवाजी: द बॉस, एंथिरन (रोबोट), कबाली, और 2.0।

    ​हिंदी: अंधा कानून, चालबाज, गिरफ्तार, और हम।

    ​60 वर्ष की आयु के बाद भी, रजनीकांत ने मुख्य अभिनेता के रूप में काम करना जारी रखा, जो भारतीय सिनेमा में एक दुर्लभ उपलब्धि है।

    ​🏆 भारतीय सिनेमा में योगदान

    ​रजनीकांत का भारतीय सिनेमा में योगदान अमूल्य है, जिसके कई पहलू हैं:

    ​अद्वितीय स्टाइल और करिश्मा: रजनीकांत की सबसे बड़ी पहचान उनकी अनूठी स्टाइल और करिश्मा है। उनका सिगरेट फ़्लिप करना, चश्मा पहनना, और चलने का विशिष्ट अंदाज़ दर्शकों के बीच एक पंथ बन गया है। यह स्टाइल ही उनकी फिल्मों को बॉक्स ऑफिस पर अत्यधिक सफल बनाने में प्रमुख कारण बनी।

    ​मास अपील और लोकप्रियता: दक्षिण भारत, खासकर तमिलनाडु में, उन्हें ‘थलाइवा’ (नेता) और एक भगवान की तरह पूजा जाता है। उनकी व्यापक लोकप्रियता उन्हें भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली सितारों में से एक बनाती है।

    ​बॉक्स ऑफिस रिकॉर्ड: उनकी फिल्में लगातार बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड तोड़ती रही हैं, जिससे वह एशिया के सबसे अधिक फीस लेने वाले अभिनेताओं में से एक बन गए हैं।

    ​विनम्रता और सादगी: इतनी बड़ी सफलता के बावजूद, रजनीकांत अपनी सादगी और विनम्रता के लिए जाने जाते हैं। वह अक्सर बिना मेकअप के और अपने वास्तविक रूप (कम बालों के साथ) में सार्वजनिक रूप से दिखाई देते हैं, जो उनकी सहजता को दर्शाता है।

    ​परोपकार और सामाजिक कार्य: रजनीकांत ने हमेशा समाज सेवा को महत्व दिया है और कई सामाजिक कार्यों में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। वे ज़रूरतमंदों की मदद के लिए विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का समर्थन करते रहे हैं।

    ​🎖️ सम्मान और पुरस्कार

    ​भारतीय सिनेमा में उनके शानदार योगदान के लिए, रजनीकांत को भारत सरकार द्वारा कई सर्वोच्च सम्मानों से नवाजा गया है:

    ​पद्म भूषण (कला के क्षेत्र में, 2000)

    ​पद्म विभूषण (कला के क्षेत्र में, 2016)

    ​दादा साहेब फाल्के पुरस्कार (भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान, 2019 में घोषित)

    ​इसके अलावा, उन्हें उनकी फिल्मों के लिए कई फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड्स और अन्य क्षेत्रीय पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं।

    ​💡 निष्कर्ष

    ​बस कंडक्टर से लेकर ‘थलाइवा’ और ‘सुपरस्टार’ बनने तक का रजनीकांत का सफ़र गरीबी, संघर्ष और अथक मेहनत की एक प्रेरणादायक कहानी है। उनकी असाधारण प्रतिभा, अनूठी शैली, और विनम्र व्यक्तित्व ने उन्हें सिर्फ एक अभिनेता ही नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक प्रतीक बना दिया है। भारतीय सिनेमा में उनका योगदान पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा।(जैमिनी)

    रामानंद सागर : भारतीय सिनेमा और धर्मप्रधान धारावाहिक कला के अग्रदूत

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    भारतीय जनमानस पर अमिट छाप छोड़ने वाले महान फिल्म निर्देशक, लेखक और दूरदर्शन पर प्रसारित धर्मप्रधान धारावाहिक रामायण के निर्माता रामानंद सागर का स्थान भारतीय कला जगत में अत्यंत ऊँचा है। उनका जन्म 29 दिसम्बर 1917 को लाहौर के निकट असाल गुरके नामक गाँव में हुआ था। जीवन के अत्यंत कठिन शुरुआती दौर, विभाजन की त्रासदी, साहित्यिक संघर्ष और फिल्म उद्योग की लंबी यात्रा के बाद वे एक ऐसे सर्जक बने जिनके कार्यों ने करोड़ों भारतीयों के जीवन और संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया। उनका निधन 12 दिसम्बर 2005 को हुआ। नीचे उनके जीवन, संघर्ष, साहित्य, फिल्म यात्रा और ‘रामायण’ के ऐतिहासिक प्रभाव का विस्तृत लेख प्रस्तुत है।


    प्रारम्भिक जीवन, संघर्ष और शिक्षा

    रामानंद सागर का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ। बचपन में ही माता का साथ छूट गया और पिता ने दूसरी शादी कर ली। आर्थिक कठिनाइयाँ लगातार बनी रहीं, परंतु प्रतिभाशाली बालक रामानंद पढ़ाई में हमेशा उत्कृष्ट रहे। उन्होंने लाहौर विश्वविद्यालय से स्नातक और बाद में साहित्य में परास्नातक उपाधि प्राप्त की। इसी दौरान उनकी कहानी-लेखन की रुचि उभरकर सामने आई। विद्यार्थी जीवन में वे न केवल कविता, कथा और नाटक लिखते थे, बल्कि कई स्थानीय पत्रों में संपादन कार्य भी करते थे। उनकी रचनात्मक क्षमता ने उन्हें युवा आयु में ही साहित्यिक जगत में पहचान दिलानी शुरू कर दी।


    विभाजन की त्रासदी और फिल्म जगत में प्रवेश

    सन 1947 में हुए भारत-विभाजन ने रामानंद सागर के जीवन को गहराई से प्रभावित किया। वे अपने परिवार के साथ शरणार्थी बनकर भारत आए। इस कठिन परिस्थिति ने उनके भीतर अपार संवेदनाएँ भरीं, जो बाद में उनकी फिल्मों और धारावाहिकों में स्पष्ट दिखाई देती हैं। विभाजन के बाद वे मुंबई पहुँचे और फिल्म उद्योग से जुड़ गए। प्रारम्भ में उन्होंने पटकथा लेखन, संवाद, कहानी और सहायक निर्देशन का कार्य किया। धीरे-धीरे उनकी प्रतिभा प्रकाश में आई और वे फिल्म जगत में स्थिर होने लगे।


    फिल्म निर्देशन और साहित्यिक योगदान

    रामानंद सागर की फिल्में भावनाओं, संवेदनाओं और भारतीय जीवन के यथार्थ को सुंदर ढंग से प्रस्तुत करती थीं। उन्होंने कई सफल फिल्मों का निर्देशन और निर्माण किया। उनकी प्रमुख फिल्मों में आरजू, गीत, ललकार, आंखें, चरस, ज़िंदगी आदि शामिल हैं। उनकी फिल्मों की सबसे बड़ी विशेषता कथा-विन्यास, संवाद और भावनात्मक प्रस्तुति थी।

    फिल्मों के साथ-साथ वे साहित्य जगत में भी सक्रिय रहे। उन्होंने कई कहानियाँ, नाटक और उपन्यास लिखे। साहित्य में उन्हें प्रतिष्ठित पुरस्कार भी मिले। उनकी लेखन शैली सरल, भावनात्मक और भारतीय संस्कृति से ओत-प्रोत थी।


    दूरदर्शन पर ‘रामायण’ का अवतरण और ऐतिहासिक प्रभाव

    ८० के दशक में दूरदर्शन पर कार्यक्रमों की संख्या सीमित थी और मनोरंजन के साधन कम थे। ऐसे समय में रामानंद सागर ने धर्म और संस्कृति को दृश्य माध्यम के जरिए जन-जन तक पहुँचाने का संकल्प लिया। उन्होंने वर्षों के अध्ययन और शोध के बाद ‘रामायण’ धारावाहिक का निर्माण आरम्भ किया।

    सन 1987 में इसका प्रसारण शुरू हुआ और यह इतिहास का सबसे लोकप्रिय धारावाहिक बन गया। रविवार की सुबह जैसे पूरा देश ठहर जाता था। गाँव-शहरों में लोग स्क्रीन के आगे बैठ जाते, मंदिरों की तरह वातावरण बनाया जाता और पूरा परिवार एक साथ यह कार्यक्रम देखता। इसकी लोकप्रियता का अंदाज़ इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसके पात्र भी लोगों की श्रद्धा का केंद्र बन गए।

    ‘रामायण’ ने भारतीय संस्कृति, मर्यादा, आदर्श, धर्म, नीति, त्याग और सेवा की परम्परा को एक-एक घर तक पहुँचा दिया। बालकों से लेकर वृद्धों तक, सभी आयु वर्ग के लोगों ने इससे शिक्षा ली। इस धारावाहिक ने दूरदर्शन पर दर्शक संख्या का रिकॉर्ड बनाया और भारत सहित कई देशों में भी इसे अपार लोकप्रियता प्राप्त हुई।


    सागर आर्ट्स और अन्य धार्मिक धारावाहिक

    ‘रामायण’ की सफलता के बाद रामानंद सागर और उनके परिवार ने सागर आर्ट्स के नाम से कई और धारावाहिक बनाए, जिनमें विक्रम-बेताल, अलिफ लैला, श्रीकृष्ण और अन्य पौराणिक प्रस्तुतियाँ शामिल थीं। इन सभी में भारतीय परम्परा, संस्कृति और नैतिकता को केंद्र में रखा गया। विशेष रूप से श्रीकृष्ण धारावाहिक ने भी व्यापक प्रभाव डाला और युवा दर्शकों को भारतीय आध्यात्मिक परंपरा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


    व्यक्तित्व, विचार और कार्यशैली

    रामानंद सागर अत्यंत शांत, संवेदनशील और आध्यात्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। उनकी कार्यशैली में अनुशासन, गहन अध्ययन और सूक्ष्मता प्रमुख थी। वे हर दृश्य को भावनात्मक और सांस्कृतिक गहराई के साथ प्रस्तुत करने में विश्वास रखते थे। कलाकारों से वे सौहार्दपूर्ण व्यवहार करते और उनकी प्रतिभा को आगे बढ़ाने में मदद करते।

    उनकी सोच में भारतीय जीवन मूल्यों के प्रति सम्मान और मानवता का गहरा भाव था। वे मानते थे कि मनोरंजन के साथ-साथ समाज को नैतिक और सांस्कृतिक मार्गदर्शन भी दिया जाना चाहिए। इसी कारण उनके द्वारा निर्मित कृतियों में सदैव आदर्शवाद, मानव-मूल्य और कर्तव्य-बोध की शिक्षा देखने को मिलती है।


    सम्मान और विरासत

    रामानंद सागर को भारतीय फिल्म उद्योग और दूरदर्शन दोनों क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सम्मान मिले। उन्हें साहित्यिक कार्यों के लिए भी प्रतिष्ठित पुरस्कार प्राप्त हुए। परंतु उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि भारतीय संस्कृति को एक बार फिर जन-जन तक पहुँचाने का महान कार्य था। रामायण और श्रीकृष्ण जैसे धारावाहिकों ने नई पीढ़ियों को धर्म-संस्कृति से परिचित कराया।

    आज भी रामानंद सागर की कृतियाँ पुनः प्रसारित होती हैं और उतनी ही श्रद्धा के साथ देखी जाती हैं। वे भारतीय दृश्य-माध्यम इतिहास के ऐसे कलाकार थे जिनके बिना भारतीय टेलीविजन का इतिहास अधूरा रहेगा।


    उपसंहार

    रामानंद सागर का जीवन संघर्ष, सृजन और भारतीय संस्कृति के प्रति समर्पण का प्रेरक उदाहरण है। एक शरणार्थी से लेकर महान फिल्मकार और भारतीय संस्कृति के प्रतिनिधि बनने तक की यात्रा असाधारण थी। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सच्ची प्रतिभा कठिनाइयों के बीच भी अपना मार्ग बना लेती है। उनकी जन्मतिथि 29 दिसम्बर 1917 और पुण्यतिथि 12 दिसम्बर 2005 भारतीय संस्कृति, साहित्य और सिनेमा के स्वर्णिम इतिहास की स्मृति बनकर आज भी जीवित हैं।

    रामानंद सागर की विरासत भारतीय समाज की आध्यात्मिक चेतना, सांस्कृतिक गौरव और दूरदर्शन पर धार्मिक धारावाहिकों की परंपरा में सदैव अमर रहेगी। (चैटजेपीजी)

    हरियाणा के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री से मुलाकात की

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    हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री नायब सिंह सैनी ने आज नई दिल्ली में प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी से मुलाकात की।

    प्रधानमंत्री कार्यालय के ट्विटर हैंडल पर पोस्ट किया गया:

    “हरियाणा के मुख्यमंत्री श्री @NayabSainiBJP ने प्रधानमंत्री @narendramodi से मुलाकात की।

    उन्होने राज्य के बारे में प्रधानमंत्री को बताया। उनका मार्गदर्शन प्राप्त किया।

    राष्ट्रपति −प्रधानमंत्री ने प्रणब मुखर्जी को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित की

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    राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने आज (11 दिसंबर, 2025) राष्ट्रपति भवन में भारत के पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणब मुखर्जी की जयंती पर उन्हें पुष्पांजलि अर्पित की।

    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने श्री प्रणब मुखर्जी को आज उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित की। प्रधानमंत्री ने श्री मुखर्जी को एक महान राजनेता और असाधारण विद्वत्तापूर्ण व्यक्तित्व बताते हुए कहा कि उन्होंने दशकों के सार्वजनिक जीवन में अटूट समर्पण के साथ देश की सेवा की।

    श्री मोदी ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा:

    “श्री प्रणब मुखर्जी को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि। वह एक महान राजनेता और असाधारण विद्वत्तापूर्ण व्यक्तित्व के धनी थे और उन्होंने दशकों के सार्वजनिक जीवन में अटूट समर्पण के साथ भारत की सेवा की। प्रणब बाबू की बुद्धिमत्ता और स्पष्ट विचार ने हर कदम पर हमारे लोकतंत्र को समृद्ध किया। यह मेरा सौभाग्य है कि इतने वर्षों तक उनके साथ संवाद करने के दौरान मुझे उनसे बहुत कुछ सीखने का अवसर मिला।”

    केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जी की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि दी।

    X प्लेटफॉर्म पर एक पोस्ट में श्री अमित शाह ने कहा भारत के पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी जी की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि। उन्होंने कहा कि जनसेवा के प्रति समर्पित नेता, मुखर्जी जी की संविधान की गहरी समझ ने सार्वजनिक पदों पर उनके कार्यकाल को परिभाषित किया। श्री शाह ने कहा कि उनका जीवन और कार्य हमारी लोकतांत्रिक यात्रा को प्रेरित करते रहेंगे।

    मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न प्रणब मुखर्जी जी की जयंती पर सादर नमन किया। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि देश के विकास और आर्थिक सुधारों के लिए श्रद्धेय प्रणब मुखर्जी जी का योगदान सदैव याद किया जाएगा।

    कवि और फिल्म गीतकार पंडित प्रदीप: एक कालजयी व्यक्तित्व

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    आज जिनकी पुण्यतिथि है

    कवि प्रदीप अपने परिवार के साथ

    ​पंडित प्रदीप, जिनका मूल नाम रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी था, भारतीय सिनेमा के एक ऐसे कालजयी कवि और गीतकार थे, जिन्होंने अपने गीतों के माध्यम से देशभक्ति और मानवीय मूल्यों को जन-जन तक पहुँचाया। उनके गीत न केवल मनोरंजन का साधन बने, बल्कि उन्होंने राष्ट्रीय चेतना जगाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ जैसा उनका गीत आज भी हर भारतीय की आँखों में आँसू ले आता है। पाँच दशकों से अधिक के अपने करियर में, उन्होंने लगभग 71 फिल्मों के लिए 1700 से अधिक गीतों की रचना की।

    ​📝 जीवन परिचय (Birth and Early Life)

    ​कवि प्रदीप का जन्म 6 फ़रवरी, 1915 को मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले के बड़नगर नामक कस्बे में हुआ था। वह उदीच्य ब्राह्मण परिवार से थे और उनके पिता का नाम नारायण भट्ट था। बचपन से ही उन्हें साहित्यिक और राष्ट्रीय संस्कारों का वातावरण मिला, जिससे उनकी काव्य-प्रतिभा को बल मिला।
    ​शिक्षा और साहित्यिक यात्रा

    ​प्राथमिक शिक्षा उन्होंने मध्य प्रदेश में ही प्राप्त की।

    ​स्नातक की डिग्री उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राप्त की।

    ​लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक करने के बाद, उन्होंने अध्यापक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में भी प्रवेश लिया।

    ​विद्यार्थी जीवन से ही वे काव्य-रचना और वाचन में गहरी रुचि रखते थे। वे कवि सम्मेलनों में अपनी कविताएँ सुनाते थे और श्रोताओं की खूब प्रशंसा पाते थे।

    ​इलाहाबाद में (1933-1935) का काल उनके लिए साहित्यिक दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।

    ​लखनऊ में उनकी भेंट उस समय के प्रखर कवि गिरिजा शंकर दीक्षित से हुई, जो उनके शिक्षक भी थे, और यहीं से उनके गीत-लेखन की यात्रा शुरू हुई।

    ​सिनेमा जगत में प्रवेश
    ​शिक्षक बनने की तैयारी के दौरान, उन्होंने एक गीत लिखा था – “चल चल रे नौजवान”। उनके शिक्षक दीक्षित जी ने यह गीत मुंबई भेज दिया, और संयोग से यह गीत 1940 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘बंधन’ में शामिल हो गया। फिल्म और यह गीत दोनों ही बहुत लोकप्रिय हुए, और इस एक गीत ने पंडित प्रदीप को रातों-रात देश भर में पहचान दिला दी। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और हिंदी सिनेमा को कई अमर गीत दिए।

    ​🇮🇳 देशभक्ति के गीत और राष्ट्रीय चेतना

    ​पंडित प्रदीप को मुख्य रूप से उनके देशभक्ति गीतों के लिए जाना जाता है, जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और उसके बाद राष्ट्र-निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
    ​स्वतंत्रता संग्राम के दौरान

    ​’दूर हटो ऐ दुनिया वालों, हिंदुस्तान हमारा है’ (फिल्म: किस्मत, 1943) उनका एक ऐसा ओजस्वी गीत था, जो ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के दौरान एक राष्ट्रीय नारा बन गया। इस गीत के अर्थ से तत्कालीन ब्रिटिश सरकार इतनी क्रोधित हुई कि उन्होंने प्रदीप जी की गिरफ्तारी के आदेश दे दिए, जिसके कारण उन्हें कुछ समय के लिए भूमिगत होना पड़ा।

    ​फिल्म ‘बंधन’ (1940) का गीत “चल चल रे नौजवान” भी युवा पीढ़ी में जोश भरने वाला एक प्रमुख गीत था।

    ​युद्ध और राष्ट्रीय समर्पण

    ​उनका सबसे प्रसिद्ध और भावुक गीत “ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी” है। उन्होंने यह गीत 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान शहीद हुए सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए लिखा था।

    ​इस गीत को लता मंगेशकर ने 26 जनवरी 1963 को दिल्ली के रामलीला मैदान में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की उपस्थिति में गाया था। कहा जाता है कि गीत सुनकर नेहरू जी की आँखें भर आई थीं।

    ​पंडित प्रदीप ने इस गीत का सम्पूर्ण राजस्व युद्ध विधवा कोष में जमा करने की अपील की थी।

    ​🎶 लोकप्रिय और अमर गीतों के मुखड़े

    ​पंडित प्रदीप ने केवल देशभक्ति गीत ही नहीं लिखे, बल्कि उन्होंने सामाजिक, भक्ति और भावनात्मक विषयों पर भी कई यादगार रचनाएँ दीं।
    ​देशभक्ति और राष्ट्रीय गौरव के गीत:

    ​”चल चल रे नौजवान” (फिल्म: बंधन, 1940)

    ​”दूर हटो ऐ दुनिया वालों, हिंदुस्तान हमारा है” (फिल्म: किस्मत, 1943)

    ​”आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिंदुस्तान की” (फिल्म: जागृति, 1954)

    ​”दे दी हमें आज़ादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल” (फिल्म: जागृति, 1954)

    ​”ऐ मेरे वतन के लोगों, ज़रा आँख में भर लो पानी” (गैर-फिल्मी गीत)

    ​सामाजिक और दार्शनिक गीत:

    ​”कितना बदल गया इंसान, कितना बदल गया इंसान” (फिल्म: नास्तिक, 1954)

    ​”देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, कितना बदल गया इंसान” (फिल्म: नास्तिक, 1954)

    ​”पिंजरे के पंछी रे, तेरा दर्द न जाने कोई” (फिल्म: नागमणि, 1957)

    ​”आज मौसम सलोना सलोना रे” (फिल्म: झूला)

    ​भक्ति और भावनात्मक गीत:

    ​”यहाँ वहाँ जहाँ तहाँ मत पूछो कहाँ कहाँ है संतोषी माँ” (फिल्म: जय संतोषी माँ, 1975) – यह गीत उन्होंने फिल्म के लिए स्वयं गाया भी था।

    ​”भर दे रे झोली, भगत भर दे रे झोली” (फिल्म: नास्तिक, 1954)

    ​”सूनी पड़ी रे सितार” (फिल्म: कंगन)

    ​🏆 सम्मान और विरासत

    ​पंडित प्रदीप को उनके अतुलनीय योगदान के लिए भारत सरकार द्वारा सन 1997-98 में सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
    ​कवि प्रदीप ने जीवन मूल्यों को धन-दौलत से हमेशा ऊपर रखा। उनकी सादगी और जन्मजात कवित्व शक्ति ने उन्हें ‘राष्ट्र कवि’ का दर्जा दिलाया। उन्होंने सिनेमा को एक माध्यम बनाकर आम लोगों के लिए लिखा। उन्होंने कहा था कि वे पहले रोमांटिक कविताएँ लिखते थे, लेकिन समय के साथ उनकी रचनाओं में देश के प्रति संजीदगी बढ़ती गई।
    ​पंडित प्रदीप का निधन 11 दिसंबर, 1998 को हुआ, लेकिन उनके गीत आज भी भारत की आत्मा में गूंजते हैं और आने वाली पीढ़ियों को देशभक्ति और मानवीय मूल्यों की प्रेरणा देते रहेंगे।
    ​आप कवि प्रदीप के देशभक्ति गीत ‘दूर हटो ऐ दुनियावालों, हिंदुस्तान हमारा है’ पर एक वीडियो यहां देख सकते हैं: दूर हटो ऐ दुनिया वालों हिंदुस्तान हमारा है। (जैमिनी)