अनुपम मिश्रा: जल संरक्षण के अनन्य साधक

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भारतीय पर्यावरण चिंतन और जल संरक्षण के क्षेत्र में अनुपम मिश्रा का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है। वे केवल एक पर्यावरणविद् ही नहीं, बल्कि परंपरागत जल प्रबंधन व्यवस्था के पुनर्जीवन के प्रेरणास्रोत थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन देश की प्राचीन जल संरक्षण परंपराओं को खोजने, उन्हें समाज के समक्ष लाने और तालाबों के महत्व को स्थापित करने में समर्पित कर दिया।
जीवन परिचय
अनुपम मिश्रा का जन्म सन् १९४८ में वर्धा, महाराष्ट्र में हुआ था। उनके पिता प्रसिद्ध साहित्यकार भवानी प्रसाद मिश्र थे, जिनसे उन्हें साहित्य और संवेदनशीलता की विरासत मिली। बचपन से ही उनका परिवेश गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित था। उन्होंने अपनी शिक्षा वाराणसी और दिल्ली में पूर्ण की। प्रारंभिक जीवन में वे साहित्य और पत्रकारिता की ओर आकर्षित हुए, किंतु धीरे-धीरे पर्यावरण और जल संरक्षण उनके जीवन का मुख्य ध्येय बन गया।
गांधी शांति प्रतिष्ठान से जुड़ाव ने उनके जीवन को नई दिशा प्रदान की। यहां उन्होंने पर्यावरण पत्रिका के संपादन का दायित्व संभाला और लगभग तीन दशकों तक इस पत्रिका के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश फैलाया। उनका विवाह हुआ और उनका परिवार भी उनके कार्यों में सहयोगी बना। १९ दिसंबर २०१६ को उनका निधन हो गया, किंतु उनके विचार और कार्य आज भी लाखों लोगों को प्रेरित करते हैं।
साहित्यिक योगदान
अनुपम मिश्रा केवल कार्यकर्ता ही नहीं, बल्कि उत्कृष्ट लेखक भी थे। उनकी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक “आज भी खरे हैं तालाब” भारतीय जल संरक्षण साहित्य में मील का पत्थर मानी जाती है। इस पुस्तक में उन्होंने सरल भाषा में भारत की परंपरागत जल संचयन प्रणालियों का विस्तृत वर्णन किया। पुस्तक में बताया गया है कि कैसे हमारे पूर्वजों ने बिना आधुनिक तकनीक के विशाल तालाब, बावड़ियां और कुएं बनाए।
उनकी दूसरी महत्वपूर्ण कृति “राजस्थान की रजत बूंदें” राजस्थान की पारंपरिक जल संरक्षण प्रणालियों पर केंद्रित है। इस पुस्तक में उन्होंने रेगिस्तानी क्षेत्रों में जल प्रबंधन की अद्भुत तकनीकों का दस्तावेजीकरण किया। उनकी लेखनी सरल, प्रवाहपूर्ण और जनसामान्य की समझ के अनुकूल थी। वे अपनी रचनाओं में तकनीकी जानकारी के साथ सांस्कृतिक और सामाजिक पहलुओं को भी समाहित करते थे।
समाज सेवा और पर्यावरण कार्य
अनुपम मिश्रा का समाज सेवा कार्य अत्यंत व्यापक और प्रेरणादायक था। उन्होंने देश भर में भ्रमण करके पारंपरिक जल प्रबंधन प्रणालियों का गहन अध्ययन किया। वे गांव-गांव जाकर स्थानीय लोगों से मिलते, उनकी जल व्यवस्थाओं को समझते और उन्हें दस्तावेजीकृत करते। उनका मानना था कि भारत की जल समस्या का समाधान आधुनिक तकनीक में नहीं, बल्कि हमारी प्राचीन परंपराओं में छिपा है।
उन्होंने अनेक सामाजिक संगठनों और स्वयंसेवी समूहों के साथ मिलकर तालाब पुनरुद्धार अभियान चलाए। उनके प्रयासों से अनेक सूखे तालाब पुनर्जीवित हुए। वे नीति निर्माताओं, प्रशासकों और आम जनता को समान रूप से जल संरक्षण के प्रति जागरूक करते रहे। उनके व्याख्यान सरल भाषा में होते थे, जिससे हर वर्ग का व्यक्ति उन्हें समझ सकता था।
अनुपम जी ने यह स्थापित किया कि जल प्रबंधन केवल सरकार का कार्य नहीं, बल्कि समुदाय की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने लोगों को बताया कि कैसे छोटे-छोटे प्रयासों से वर्षा जल का संचयन किया जा सकता है। उनका जीवन सादगी और समर्पण का प्रतीक था।
सम्मान और पुरस्कार
अनुपम मिश्रा के असाधारण योगदान को देश और समाज ने विभिन्न सम्मानों से नवाजा। उन्हें जमनालाल बजाज पुरस्कार, इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार सहित अनेक प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए। किंतु उनके लिए सबसे बड़ा पुरस्कार था समाज में जागरूकता और तालाबों का पुनर्जीवन।
उपसंहार
अनुपम मिश्रा का जीवन प्रेरणा का अक्षय स्रोत है। उन्होंने सिद्ध किया कि एक व्यक्ति अपने दृढ़ संकल्प और निरंतर प्रयासों से समाज में महत्वपूर्ण परिवर्तन ला सकता है। आज जब देश जल संकट से जूझ रहा है, उनके विचार और कार्य पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। उनकी स्मृति को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनके बताए मार्ग पर चलते हुए जल संरक्षण को अपने जीवन का अंग बनाएं।(सोनेट)

उप राष्ट्रपति कैथोलिक बिशप द्वारा आयोजित क्रिसमस समारोह में शामिल हुए

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उप राष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने गुरूवार को नई दिल्ली में कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (सीबीसीआई) द्वारा आयोजित क्रिसमस समारोह में भाग लिया और त्योहार से पहले ईसाई समुदाय को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई दीं।

प राष्ट्रपति ने कहा कि क्रिसमस शांति, करुणा, विनम्रता और मानवता की सेवा जैसे सार्वभौमिक मूल्यों का उत्सव है। उन्होंने कहा कि प्रभु यीशु मसीह द्वारा सिखाए गए प्रेम, सद्भाव और नैतिक साहस का संदेश शाश्वत प्रासंगिकता रखता है और भारत की आध्यात्मिक परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ है, जो सह अस्तित्व, करुणा और मानवीय गरिमा के सम्मान पर जोर देती हैं।

भारत में ईसाई धर्म की लंबी उपस्थिति को याद करते हुए, उप राष्ट्रपति ने भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक और विकास यात्रा में ईसाई समुदाय के महत्वपूर्ण योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, सामाजिक सुधार और मानव विकास में समुदाय के निरंतर कार्यों की सराहना की, जो देश के सुदूरतम क्षेत्रों तक भी पहुंचे हैं और इसे राष्ट्र निर्माण का अभिन्न अंग बताया।

श्री सी पी राधाकृष्णन ने अपने व्यक्तिगत अनुभव को साझा करते हुए कहा कि झारखंड, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों के राज्यपाल के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान उन्हें कई ईसाई संगठनों के साथ घनिष्ठ संपर्क का अवसर मिला। उन्होंने सांसद के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान कोयंबटूर के एक चर्च में हर साल क्रिसमस मनाने और वहां साझा की गई आपसी समझ की भावना को भी याद किया। उन्होंने तमिलनाडु से एक ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए कॉन्स्टेंटाइन जोसेफ बेस्ची (वीरममुनिवर) के योगदान को याद किया, जिन्होंने तमिल साहित्य और संस्कृति को समृद्ध किया और भारत में ईसाई परंपरा द्वारा पोषित गहन सांस्कृतिक एकीकरण को रेखांकित किया।

भारत की बहुलवादी भावना पर जोर देते हुए श्री सी पी राधाकृष्णन ने कहा कि भारत की एकता, एकरूपता में नहीं, बल्कि आपसी सम्मान और साझा मूल्यों में निहित है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी प्रकार के भय का माहौल बनाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि देश में शांति और सद्भाव व्याप्त है। क्रिसमस की भावना और प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी द्वारा व्यक्त किए गए ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ के राष्ट्रीय दृष्टिकोण के बीच समानता बताते हुए उन्होंने कहा कि जिस प्रकार क्रिसमस विभिन्न धर्मों के लोगों को खुशी में एक साथ लाता है, उसी प्रकार ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’ का विचार नागरिकों से भारत की विविधता का जश्न मनाते हुए एक राष्ट्र के रूप में एकजुट होने का आह्वान करता है।

उपराष्ट्रपति ने सभी हितधारकों से 2047 तक विकसित भारत के राष्ट्रीय लक्ष्य की दिशा में अपना रचनात्मक योगदान जारी रखने का आग्रह किया। उन्होंने सभी समुदायों से गरीबी उन्मूलन और साझा समृद्धि की ओर बढ़ने के लिए मिलकर काम करने का आह्वान किया और इस बात पर जोर दिया कि विकास के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं।

उन्होंने यह भी सराहना व्यक्त की कि कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया 1944 से अस्तित्व में है और इसने स्कूलों, कॉलेजों, अस्पतालों और धर्मार्थ संस्थानों का एक व्यापक नेटवर्क बनाया है, जिससे यह सामन्य नागरिकों के जीवन से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है।

इस अवसर पर पश्चिम बंगाल के राज्यपाल डॉ. सी.वी. आनंद बोस, भारत के कैथोलिक बिशप सम्मेलन (सीबीसीआई) के अध्यक्ष आर्कबिशप एंड्रयूज थाज़थ; भारत में धर्मप्रचारक, आर्कबिशप लियोपोल्ड गिरेली, और अन्य विशिष्ट अतिथि उपस्थित थे।

भारतीय मूर्तिकला में राम वी सुतार योगदान सदियों तक स्मरण किया जाएगा

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भारत की कला परंपरा में जिन मूर्तिकारों ने आधुनिक युग में भी शिल्प को जीवित रखा, उनमें राम वी सुतार का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। अक्सर उन्हें गलती से रामस्वरूप कहा जाता है, जबकि स्टैचू ऑफ यूनिटी के वास्तविक निर्माता विश्वविख्यात मूर्तिकार राम वी सुतार हैं। उन्होंने अपने लंबे जीवन में भारतीय इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रनिर्माताओं को पत्थर और धातु में ऐसा रूप दिया, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा।

राम वी सुतार का जन्म मध्य भारत के एक साधारण परिवार में 19 फरवरी 1925 को हुआ।18 दिसबर 2025 उनका निधन हुआा। बचपन से ही उनकी रुचि चित्रकला और मूर्तिकला में थी। ग्रामीण परिवेश में पले बढ़े सुतार ने मिट्टी और पत्थर से आकृतियां बनाकर अपनी कला यात्रा की शुरुआत की। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी, किंतु कला के प्रति उनकी लगन ने उन्हें आगे बढ़ने की शक्ति दी।

शिक्षा के क्षेत्र में राम वी सुतार ने औपचारिक कला प्रशिक्षण प्राप्त किया। उन्होंने देश के प्रतिष्ठित कला संस्थानों में अध्ययन कर शिल्प की बारीकियों को समझा। यहीं से उनकी कला में यथार्थवाद, संतुलन और भावाभिव्यक्ति का अद्भुत मेल देखने को मिलता है। वे केवल आकृति नहीं गढ़ते थे, बल्कि उसमें व्यक्तित्व और भाव भी उतार देते थे।

स्वतंत्रता के बाद भारत में राष्ट्रनिर्माण का दौर शुरू हुआ। इस समय देश को ऐसे कलाकारों की आवश्यकता थी, जो महापुरुषों के योगदान को मूर्त रूप दे सकें। राम वी सुतार इस आवश्यकता पर खरे उतरे। उन्होंने महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल सहित अनेक राष्ट्रीय नेताओं की मूर्तियां बनाईं, जो आज देश और विदेश में स्थापित हैं।

राम वी सुतार की कला की सबसे बड़ी विशेषता उनका यथार्थवादी दृष्टिकोण है। वे चेहरे की बनावट, शरीर की मुद्रा और भाव-भंगिमा पर विशेष ध्यान देते थे। उनकी बनाई मूर्तियों को देखकर ऐसा लगता है मानो व्यक्तित्व सजीव होकर सामने खड़ा हो। यही कारण है कि उनकी कृतियां केवल शिल्प नहीं, बल्कि इतिहास का जीवंत दस्तावेज बन जाती हैं।

सरदार वल्लभभाई पटेल की विश्वविख्यात विशाल प्रतिमा, जिसे स्टैचू ऑफ यूनिटी के नाम से जाना जाता है, राम वी सुतार की जीवन भर की साधना का शिखर मानी जाती है। यह प्रतिमा भारत की एकता, दृढ़ता और संकल्प का प्रतीक है। इस महाकाय मूर्ति की परिकल्पना से लेकर अंतिम रूप तक राम वी सुतार की कलात्मक दृष्टि स्पष्ट दिखाई देती है।

इस प्रतिमा के निर्माण में तकनीकी चुनौतियां अत्यंत कठिन थीं। इतने बड़े आकार में संतुलन, मजबूती और सौंदर्य बनाए रखना आसान नहीं था। राम वी सुतार ने अपने अनुभव और सूक्ष्म दृष्टि से इन सभी चुनौतियों का समाधान किया। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि भारतीय मूर्तिकला विश्व स्तर पर किसी से कम नहीं है।

राम वी सुतार को उनके योगदान के लिए अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। भारत सरकार ने उन्हें उच्च नागरिक सम्मान से अलंकृत किया। कला जगत में उन्हें मूर्तिकला का भीष्म पितामह कहा जाता है। उनके सम्मान केवल पुरस्कार नहीं, बल्कि उनकी साधना और तपस्या की स्वीकृति हैं।

उनकी कला केवल प्रतिमाओं तक सीमित नहीं रही। उन्होंने आने वाली पीढ़ियों के कलाकारों को मार्गदर्शन भी दिया। उनके पुत्र अनिल सुतार भी एक प्रसिद्ध मूर्तिकार हैं, जिन्होंने पिता की परंपरा को आगे बढ़ाया। इस प्रकार राम वी सुतार ने एक कलात्मक विरासत भी स्थापित की।

राम वी सुतार का जीवन संघर्ष, साधना और समर्पण की प्रेरक कहानी है। उन्होंने यह दिखाया कि साधारण पृष्ठभूमि से आने वाला व्यक्ति भी अपनी प्रतिभा और मेहनत से विश्व इतिहास में स्थान बना सकता है। उनकी बनाई मूर्तियां न केवल पत्थर और धातु की संरचनाएं हैं, बल्कि वे भारत की आत्मा, इतिहास और गौरव को अभिव्यक्त करती हैं। राम वी सुतार भारतीय मूर्तिकला के ऐसे स्तंभ हैं, जिनका योगदान सदियों तक स्मरण किया जाएगा। स्टैचू ऑफ यूनिटी सहित उनकी समस्त कृतियां भारत की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच पर स्थापित करती हैं।(चैट जेपीजी)

संस्कृति में होती है राष्ट्र की आत्मा: योगी आदित्यनाथ

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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष का उद्घाटन किया

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 18 दिसंबर को भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय, कैसरबाग, लखनऊ में भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष के उद्घाटन समारोह के अवसर पर डाक का विमोचन करते हुए।

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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गुरुवार को भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय के शताब्दी वर्ष समारोह के शुभारंभ कार्यक्रम में कहा कि यह अवसर हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, भारत की कला, स्वर व लय ने अपनी पहचान को विषम परिस्थितियों का सामना करते हुए जो निरंतरता दी उसी के बदौलत हमारी सनातन संस्कृति विश्व में खुद को स्थापित करने और आगे बढ़ाने में सफल हुई है। उन्होंने कहा कि कलाकार की कला एक ईश्वरीय गुण है जिसकी हमें अवमानना नहीं करनी चाहिए। कलाकार किसी भी विधा से जुड़ा हो, उसे प्रोत्साहित करना चाहिए।

शताब्दी वर्ष समारोह का उद्घाटन दीप प्रज्वलन और पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे की प्रतिमा पर पुष्प अर्पण के साथ किया गया। इस अवसर पर 100 वर्षों की विकास यात्रा पर आधारित कॉफी टेबल बुक ‘ए लिगेसी ऑफ एक्सिलेंस’ का विमोचन हुआ। डाक विभाग द्वारा तैयार विशेष आवरण और विरूपण का भी विमोचन किया गया।मुख्यमंत्री ने अपने सबोंधन ने इस बात पर बल दिया कि राष्ट्र की आत्मा उसकी संस्कृति में होती है। उन्होंने कहा कि जैसे किसी मनुष्य की आत्मा उसके शरीर से संबंध तोड़ देती है तो शरीर निस्तेज हो जाता है, उसी प्रकार राष्ट्र के जीवन में भी होता है। किसी भी राष्ट्र की संस्कृति को उससे अलग कर दिया जाए तो राष्ट्र निस्तेज हो जाता है। वह खंडहर में परिवर्तित हो जाता है और अपनी पहचान को खो देता है।
उन्होने कहा कि, यह अवसर हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, भारत की कला, स्वर व लय ने अपनी पहचान को विषम परिस्थितियों का सामना करते हुए जो निरंतरता दी उसी के बदौलत हमारी सनातन संस्कृति विश्व में खुद को स्थापित करने और आगे बढ़ाने में सफल हुई है। उन्होंने कहा कि कलाकार की कला एक ईश्वरीय गुण है जिसकी हमें अवमानना नहीं करनी चाहिए। कलाकार किसी भी विधा से जुड़ा हो,उसे प्रोत्साहित करना चाहिए।मुख्यमंत्री ने इस बात पर बल दिया कि, राष्ट्र की आत्मा उसकी संस्कृति में होती है। उन्होंने कहा किए जैसे किसी मनुष्य की आत्मा उसके शरीर से संबंध तोड़ देती है तो शरीर निस्तेज हो जाता है, उसी प्रकार राष्ट्र के जीवन में भी होता है। किसी भी राष्ट्र की संस्कृति को उससे अलग कर दिया जाए तो राष्ट्र निस्तेज हो जाता है। वह खंडहर में परिवर्तित हो जाता है और अपनी पहचान को खो देता है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय के शताब्दी महोत्सव के शुभारंभ पर शुभकामनाएं देते हुए कहा कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी भारत की सांस्कृतिक चेतना, स्वर, लय और संस्कार को इस संस्थान ने एक नई पहचान दी है। उन्होंने कहा कि भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय ने पिछले 100 वर्षों में भारतीय संगीत, नृत्य, नाट्य और ललित कलाओं को न केवल संरक्षित किया है, बल्कि उन्हें आधुनिक शैक्षणिक व्यवस्था से जोड़कर प्रतिष्ठित भी किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि एक संस्कृति कर्मी भी राष्ट्र निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस दिशा में भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय से जुड़े सभी महानुभावों के योगदान के लिए उन्होंने कृतज्ञता व्यक्त की। मुख्यमंत्री योगी ने इस अवसर पर पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे को श्रद्धांजलि भी अर्पित की।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि, वर्ष 1940 में गुरुदेव रबिंद्रनाथ टैगोर ने एक पत्र जारी कर इस संस्थान को विश्वविद्यालय के रूप में संबोधित किया था। उन्होंने कहा कि यह प्रसन्नता का विषय है कि पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे की भावनाओं के अनुरूप इस संस्थान को विश्वविद्यालय का स्वरूप प्रदान किया जा सका। उन्होंने कहा कि वर्ष 1947 में देश आज़ाद हुआ और वर्ष 1950 में संविधान लागू हुआ। इसके बाद वर्ष 2017 तक अनेक सरकारें आईं और गईं, लेकिन तत्कालीन राज्यपाल राम नाइक ने भातखण्डे संस्थान को विश्वविद्यालय का दर्जा दिलाने के विषय में उनसे संवाद किया। मुख्यमंत्री योगी ने बताया कि प्रस्ताव आने में देर हुई, विभाग से निरंतर संवाद हुआ और अंततः वर्ष 2022 में सरकार ने इसे विश्वविद्यालय के रूप में मान्यता दी। यह उत्तर प्रदेश का पहला संस्कृति विश्वविद्यालय है। उन्होंने कुलपति प्रो. माण्डवी सिंह की सराहना करते हुए कहा कि उनके द्वारा विश्वविद्यालय का कुलगीत और लोगो ‘नादाधीनं जगत्’ थीम पर आधारित किया गया, जिसका अर्थ है-पूरा जगत नाद के अधीन है। यह जीवन की सच्चाई को दर्शाता है।

मुख्यमंत्री योगी ने पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे के योगदान को स्मरण करते हुए कहा कि वर्ष 1926 में देश औपनिवेशिक शासन के अधीन था। उस समय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित थी और संगीत तथा कला के लिए मंच उपलब्ध नहीं थे। उन्होंने कहा कि उस दौर में पंडित भातखण्डे ने भारतीय संगीत को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। शास्त्रीय अनुशासन, सुव्यवस्थित पाठ्यक्रम, राग-ताल का वर्गीकरण, क्रमिक पद्धति और गुरु-शिष्य परंपरा को आधुनिक शिक्षा से जोड़ना उनका ऐतिहासिक योगदान था। यह कार्य केवल शैक्षणिक नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति को आत्मसम्मान, आत्मगौरव और स्थायित्व देने का प्रयास था।

मुख्यमंत्री योगी ने पद्म विभूषण और पूर्व राज्यसभा सांसद डॉ. सोनल मानसिंह के संबोधन की सराहना करते हुए कहा कि उन्होंने कला और अध्यात्म के गहरे संबंध को अत्यंत सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि नृत्य में भगवान शिव नटराज के रूप में, वीणा के स्वर में माता सरस्वती, नाटक के संवाद में प्रभु श्रीराम की मर्यादा और रस में डूबते समय श्रीकृष्ण की रसधारा का अनुभव होता है। यह सब कुछ उत्तर प्रदेश की धरती पर उपलब्ध है। मुख्यमंत्री योगी के अनुसार, सरकार कलाकारों को सुरक्षित, सम्मानित और सशक्त वातावरण देने के लिए प्रतिबद्ध है। एक सुव्यवस्थित नीति के अंतर्गत इन कार्यों को आगे बढ़ाया जा रहा है और भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय इसमें सरकार का महत्वपूर्ण साझेदार है।

मुख्यमंत्री योगी ने प्रसन्नता व्यक्त की कि कि भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय में गायन, वादन और नृत्य की तीनों विधाओं में प्रमाणपत्र से लेकर शोध तक की समन्वित शिक्षा दी जा रही है। नाट्यकला और चित्रकला में भी डिप्लोमा और स्नातक पाठ्यक्रम संचालित हैं। उन्होंने आजमगढ़ के हरिहरपुर में स्थापित संगीत महाविद्यालय का उल्लेख किया ।कहा कि विश्वविद्यालय से संबद्ध महाविद्यालयों में छात्रों को मंच प्रदान करने और सांस्कृतिक चेतना के विस्तार के लिए निरंतर प्रयास किए जाएंगे। उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय को लखनऊ में लगभग छह एकड़ भूमि प्रदान की गई है, जहां वैश्विक मानकों के अनुरूप नया परिसर विकसित किया जाएगा। इसमें आधुनिक ऑडिटोरियम, ओपन थिएटर, समृद्ध लाइब्रेरी और अन्य सुविधाएं होंगी। पुराने परिसर को संगीत और कला के संग्रहालय के रूप में विकसित किया जाएगा।शताब्दी वर्ष समारोह का उद्घाटन दीप प्रज्वलन और पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे की प्रतिमा पर पुष्प अर्पण के साथ किया गया। इस अवसर पर 100 वर्षों की विकास यात्रा पर आधारित कॉफी टेबल बुक ‘ए लिगेसी ऑफ एक्सिलेंस’ का विमोचन हुआ। डाक विभाग द्वारा तैयार विशेष आवरण और विरूपण का भी विमोचन किया गया। साथ ही ‘विकसित भारत @2047 के संदर्भ में भारतीय सांस्कृतिक परंपराएं एवं संगीत’ विषयक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन और शताब्दी यात्रा पर आधारित प्रदर्शनी का शुभारंभ हुआ।

कार्यक्रम में पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह, लखनऊ की महापौर सुषमा खर्कवाल, विधान परिषद सदस्य मुकेश शर्मा, इंजीनियर अवनीश कुमार सिंह, लालजी प्रसाद निर्मल, रामचंद्र प्रधान, पवन चौहान, विधायक नीरज बोरा, विधायक अम्बरीश कुमार, पद्म विभूषण डॉ. सोनल मानसिंह, कुलपति प्रो. माण्डवी सिंह, प्रमुख सचिव अमृत अभिजात सहित कला जगत के अनेक गणमान्य उपस्थित रहे। अतिथियों ने छात्र-छात्राओं द्वारा दी गई सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का भी आनंद लिया। कार्यक्रम में लघु फिल्म का भी प्रदर्शन किया गया। कुलपति प्रो. माण्डवी सिंह ने भातखण्डे संस्कृति विश्वविद्यालय द्वारा कला के क्षेत्र में दिए गए योगदान पर प्रकाश डाला। पद्म विभूषण व पूर्व राज्यसभा सांसद डॉ. सोनल मानसिंह ने कला व सनातन संस्कृति के अभिन्न जुड़ाव पर अपने भाव रखे। कला साधकों को उन्होंने “काक चेष्टा बको ध्यानं, श्वान निद्रा तथैव च। अल्पहारी, गृहत्यागी, विद्यार्थी पंच लक्षणं॥” के सूत्र को जीवन में आत्मसात करने के लिए प्रेरित किया। पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री जयवीर सिंह ने वर्ष 2022 में गुरू-शिष्य परम्परा पर आधारित इस संस्थान को भातखण्डे संस्कृति विश्नविद्यालय के रूप में दर्जा दिए जाने के महत्व के बारे में जानकारी देते हुए छात्र-छात्राओं को शुभकामनाएं दीं।

प्रधानमंत्री पारंपरिक चिकित्सा पर विश्व स्वास्थ्य संगठन के दूसरे वैश्विक शिखर सम्मेलन के समापन समारोह को संबोधित करेंगे

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 19 दिसंबर को शाम 4:30 बजे भारत मंडपम, नई दिल्ली में पारंपरिक चिकित्सा पर दूसरे डब्ल्यूएचओ वैश्विक शिखर सम्मेलन के समापन समारोह में भाग लेंगे। प्रधानमंत्री समापन समारोह के दौरान सभा को भी संबोधित करेंगे। यह कार्यक्रम वैश्विक, विज्ञान-आधारित और जन-केंद्रित पारंपरिक चिकित्सा एजेंडे को आकार देने में भारत के बढ़ते नेतृत्व और अग्रणी पहल को दर्शाता है।

प्रधानमंत्री ने अनुसंधान, मानकीकरण और वैश्विक सहयोग के माध्यम से पारंपरिक चिकित्सा और भारतीय ज्ञान प्रणाली को मुख्यधारा में लाने पर लगातार जोर दिया है। इस दृष्टिकोण के अनुरूप, कार्यक्रम के दौरान, प्रधानमंत्री आयुष क्षेत्र के लिए एक मास्टर डिजिटल पोर्टल, माई आयुष इंटीग्रेटेड सर्विसेज पोर्टल (एमएआईएसपी) सहित कई ऐतिहासिक आयुष पहलों का शुभारंभ करेंगे। वे आयुष मार्क का भी शुभारंभ करेंगे, जिसकी परिकल्पना आयुष उत्पादों और सेवाओं की गुणवत्ता के लिए एक वैश्विक बेंचमार्क के रूप में की गई है।

भारी हंगामें के बीच लोकसभा में वीबी−जी− रामजी विधेयक पारित

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भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास में १८ दिसंबर, २०२५ का दिन एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विवादास्पद अध्याय के रूप में दर्ज हो गया है। आज लोकसभा में भारी शोर-शराबे और विरोध प्रदर्शनों के बीच ‘विकसित भारत – गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ यानी ‘विबी-जी रामजी’ (VB-G RAM G) विधेयक २०२५ को पारित कर दिया गया। यह विधेयक दो दशक पुराने ‘महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम’ (मनरेगा) का स्थान लेगा। सदन के भीतर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच जो तीखी नोक-झोंक और वैचारिक संघर्ष देखने को मिला, उसने देश के संसदीय शिष्टाचार और नीतिगत बदलावों पर एक नई बहस छेड़ दी है।

​विधेयक के मुख्य प्रावधान और सरकार का तर्क

​केंद्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने सदन में इस विधेयक का बचाव करते हुए इसे ‘विकसित भारत २०४७’ के लक्ष्य की ओर एक क्रांतिकारी कदम बताया। सरकार के अनुसार, इस नए कानून का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में केवल गड्ढे खोदना नहीं, बल्कि स्थायी संपत्ति का निर्माण करना है।

​रोजगार के दिनों में वृद्धि: नए विधेयक के तहत ग्रामीण परिवारों को अब वर्ष में १०० दिनों के बजाय १२५ दिनों के रोजगार की कानूनी गारंटी दी गई है।

​परिसंपत्ति निर्माण: इसमें जल सुरक्षा, ग्रामीण सड़कें, बाजार अवसंरचना और जलवायु अनुकूल कार्यों को प्राथमिकता दी गई है।

​तकनीकी निगरानी: भ्रष्टाचार रोकने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित जांच, जीपीएस निगरानी और आधार आधारित भुगतान को अनिवार्य बनाया गया है।

​खेती के समय विराम: बुवाई और कटाई के व्यस्त समय के दौरान सार्वजनिक कार्यों पर ६० दिनों के विराम का प्रावधान है, ताकि किसानों को श्रमिकों की कमी का सामना न करना पड़े।

​विपक्ष का कड़ा प्रहार और ‘नाम’ पर संग्राम

​जैसे ही विधेयक पर चर्चा शुरू हुई, समूचा विपक्ष एकजुट होकर विरोध में उतर आया। विपक्ष का सबसे बड़ा विरोध इस योजना से ‘महात्मा गांधी’ का नाम हटाए जाने को लेकर था। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इसे राष्ट्रपिता का अपमान और ‘बदले की राजनीति’ करार दिया।
​विपक्षी सांसदों ने आरोप लगाया कि सरकार केवल नाम बदलने में विश्वास रखती है, जबकि इस नए विधेयक की बारीकियां ग्रामीण गरीबों के अधिकारों को छीनने वाली हैं। विपक्ष के अनुसार, पहले मनरेगा में अकुशल श्रम की मजदूरी का पूरा बोझ केंद्र सरकार उठाती थी, लेकिन नए ‘विबी-जी रामजी’ विधेयक में केंद्र और राज्यों के बीच व्यय का अनुपात ६०:४० कर दिया गया है। इससे राज्य सरकारों पर वित्तीय बोझ बढ़ेगा और योजना के प्रभावी कार्यान्वयन में बाधा आएगी।

​सदन में अभूतपूर्व हंगामा और गरमा-गरमी

​सदन की कार्यवाही के दौरान दृश्य काफी तनावपूर्ण थे। विपक्षी सांसद सदन के बीचों-बीच (वेल) में आ गए और सरकार विरोधी नारे लगाए। चर्चा के दौरान जब केंद्रीय मंत्री जवाब दे रहे थे, तब कुछ सदस्यों द्वारा विधेयक की प्रतियां फाड़ने और उन्हें अध्यक्ष की पीठ की ओर फेंकने की खबरें भी आईं। विपक्षी दलों ने इस विधेयक को ‘संसदीय स्थायी समिति’ के पास भेजने की मांग की थी, जिसे सरकार ने अस्वीकार कर दिया।
​सदन में ध्वनि मत से विधेयक पारित होने के बाद विपक्ष ने बहिर्गमन किया। प्रियंका गांधी वाड्रा और अन्य वरिष्ठ नेताओं ने संसद परिसर में महात्मा गांधी की प्रतिमा के समक्ष प्रदर्शन किया और इसे ‘बापू के सपनों की हत्या’ बताया।

​अन्य प्रमुख मामले: प्रदूषण और परमाणु ऊर्जा

​विधेयक के अतिरिक्त, आज संसद में दिल्ली और उत्तर भारत में बढ़ते वायु प्रदूषण पर भी चर्चा हुई। पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने सदन को आश्वासन दिया कि सरकार वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए युद्ध स्तर पर कार्य कर रही है। इसके अलावा, कल पारित हुए ‘शांति’ (SHANTI) विधेयक यानी परमाणु ऊर्जा संशोधन विधेयक पर भी चर्चा की गूंज सुनाई दी, जिसमें निजी क्षेत्र की भागीदारी को लेकर चिंताएं जताई गईं।

​निष्कर्ष और भविष्य की राह

​’विबी-जी रामजी’ विधेयक का पारित होना भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़े बदलाव का संकेत है। जहां सरकार इसे दक्षता और आधुनिकता का मेल बता रही है, वहीं राज्यों पर बढ़ता वित्तीय भार और गांधी जी का नाम हटाना आने वाले समय में एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना रहेगा। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकारें इस ६०:४० के अनुपात को कैसे स्वीकार करती हैं और क्या यह योजना वास्तव में ग्रामीण भारत की तस्वीर बदल पाएगी।
​क्या आप चाहेंगे कि मैं इस विधेयक के वित्तीय प्रावधानों या राज्यों पर पड़ने वाले प्रभाव का विस्तृत विवरण तैयार करूँ?
​विबी-जी रामजी विधेयक पर संसद की बहस
यह वीडियो लोकसभा में आज हुई बहस और इस विधेयक के पारित होने के दौरान रही गहमागहमी की सीधी झलक दिखाता है।

प्रधानमंत्री को ऑर्डर ऑफ ओमान से सम्मानित किया गया

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ओमान के सुल्तान हैथम बिन तारिक ने भारत-ओमान संबंधों में असाधारण योगदान और दूरदर्शी नेतृत्व के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी को ‘ऑर्डर ऑफ ओमान’ पुरस्कार से सम्मानित किया।प्रधानमंत्री ने इस सम्मान को दोनों देशों की सदियों पुरानी मित्रता को समर्पित किया । इसे भारत और ओमान के 1.4 बिलियन लोगों के बीच के स्नेह और प्रेम का प्रतीक बताया।प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज मस्कट में भारत-ओमान बिजनेस फोरम को संबोधित किया।उन्होंने व्यापार साझेदारी को भविष्य के लिए तैयार करने के लिए भारत-ओमान एग्री इनोवेशन हब और भारत-ओमान इनोवेशन ब्रिज के निर्माण का प्रस्ताव रखा। प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि ये केवल विचार नहीं हैं, बल्कि निवेश करने, नवाचार करने और एक साथ भविष्य का निर्माण करने के लिए निमंत्रण हैं।

प्रधानमंत्री की ओमान यात्रा के दौरान, दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों के 70 वर्ष पूरे होने के अवसर पर, इस सम्मान का प्रदान किया जाना इस अवसर और रणनीतिक साझेदारी को विशेष महत्व देता है। सुल्तान काबूस बिन सईद द्वारा 1970 में स्थापित, ऑर्डर ऑफ ओमान चुनिंदा वैश्विक नेताओं को सार्वजनिक जीवन और द्विपक्षीय संबंधों में उनके योगदान के लिए प्रदान किया जाता है।

प्धारनमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज मस्कट में भारत-ओमान बिजनेस फोरम को संबोधित किया। ओमान के वाणिज्य, उद्योग और निवेश संवर्धन मंत्री कैस अल यूसुफ, ओमान चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के अध्यक्ष शेख फैसल अल रवास, भारत के वाणिज्य और उद्योग मंत्री श्री पीयूष गोयल और सीआईआई के अध्यक्ष श्री राजीव मेमानी ने बैठक में भाग लिया। फोरम में ऊर्जा, कृषि, लॉजिस्टिक, इंफ्रास्ट्रक्चर, विनिर्माण, स्वास्थ्य, वित्तीय सेवाओं, हरित विकास, शिक्षा और कनेक्टिविटी के क्षेत्र में दोनों देशों के प्रमुख व्यापार प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

सभा को संबोधित करते हुए, प्रधानमंत्री ने मांडवी से मस्कट तक दोनों देशों के बीच सदियों पुराने समुद्री व्यापार संबंधों पर प्रकाश डाला, जो आज जीवंत वाणिज्यिक आदान-प्रदान का आधार हैं। उन्होंने कहा कि 70 वर्षों के राजनयिक संबंध सदियों से बने विश्वास और मित्रता का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रधानमंत्री ने उद्योगपतियों से भारत और ओमान के बीच व्यापक आर्थिक साझेदारी (सीईपीए) की पूरी क्षमता का उपयोग करने का आह्वान किया, जिसे उन्होंने भारत-ओमान साझा भविष्य का खाका बताया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सीईपीए द्विपक्षीय व्यापार और निवेश संबंधों में नई ऊर्जा का संचार करेगी और आपसी विकास, नवाचार और रोजगार के अवसर पैदा करेगी।

पिछले 11 वर्षों में भारत की आर्थिक सफलता पर प्रकाश डालते हुए, प्रधानमंत्री ने कहा कि देश अगली पीढ़ी के सुधारों, नीतिगत पूर्वानुमेयता, सुशासन और उच्च निवेशक विश्वास के बल पर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है। उन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक अनिश्चितता के माहौल में पिछली तिमाही में भारत की 8 प्रतिशत से अधिक उच्च वृद्धि दर  इसकी मजबूत प्रकृति और अंतर्निहित ताकत की अभिव्यक्ति है। उन्होंने कहा कि भारत “जीवन की सुगमता” और “कारोबारी सुगमता” को बढ़ावा देने के लिए विश्व स्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर, लॉजिस्टिक, कनेक्टिविटी, विश्वसनीय आपूर्ति श्रृंखला, विनिर्माण क्षमता और हरित विकास बनाने के लिए तीव्र और व्यापक तौर पर काम कर रहा है। उन्होंने ओमानी व्यवसायों को ऊर्जा, तेल और गैस, पेट्रोकेमिकल और उर्वरक के पारंपरिक क्षेत्रों से परे देखने और हरित ऊर्जा, सौर पार्क, ऊर्जा भंडारण, स्मार्ट ग्रिड, कृषि-तकनीक, फिनटेक, एआई और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में अवसरों का पता लगाने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने व्यापार साझेदारी को भविष्य के लिए तैयार करने के लिए भारत-ओमान एग्री इनोवेशन हब और भारत-ओमान इनोवेशन ब्रिज के निर्माण का प्रस्ताव रखा। प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि ये केवल विचार नहीं हैं, बल्कि निवेश करने, नवाचार करने और एक साथ भविष्य का निर्माण करने के लिए निमंत्रण हैं।

प्रधानमंत्री ने इस कार्यक्रम में व्यापार जगत के दिग्गजों की जोरदार उपस्थिति की सराहना करते हुए उनसे उद्यम को नीति के साथ जोड़ने और सीईपीए को उड़ान भरने का आह्वान किया। उन्होंने इस बात की पुष्टि करते हुए कहा कि भारत और ओमान न केवल करीबी पड़ोसी हैं, बल्कि रणनीतिक साझेदार हैं जो क्षेत्र और उससे आगे स्थिरता, विकास और साझा समृद्धि के लिए प्रतिबद्ध हैं।

उपराष्ट्रपति, पीएम और गृहमंत्री ने मूर्तिकार राम सुतार के निधन पर शोक प्रकट किया

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उपराष्ट्रपति, पीएम नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने मूर्तिकार राम सुतार के निधन पर शोक प्रकट किया।उन्होने इसे राष्ट्रीय क्षति बताया। कहा कि श्री सुतार ने विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’, महात्मा गांधी एवं छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे महान नेताओं की असंख्य कृतियों में योगदान के साथ देश की सांस्कृतिक विरासत पर अमिट छाप छोड़ी है।


उपराष्ट्रपतिसीपी राधाकृष्णन ने कहा कि श्री राम सुतार के रचनात्मकता, समर्पण और कलात्मक उत्कृष्टता से परिपूर्ण जीवन ने अपनी निपुणता एवं दूरदृष्टि से पीढ़ियों को प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि उनकी मूर्तियां सदैव भारत की आत्मा, संस्कृति और इतिहास के लिए शाश्वत सम्‍मान का प्रतीक रहेंगी।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने श्री राम सुतार जी के निधन पर शोक व्यक्त किया है।प्रधानमंत्री ने कहा कि श्री राम सुतार जी एक उत्‍कृष्‍ट मूर्तिकार थे, जिनकी कला ने भारत को केवडिया स्थित स्टैच्यू ऑफ यूनिटी सहित कुछ सबसे प्रसिद्ध स्मारक दिए। प्रधानमंत्री ने कहा कि सुतार के कार्यों को हमेशा भारत के इतिहास, संस्कृति और सामूहिक भावना की शक्तिशाली अभिव्यक्ति के रूप में सराहा जाएगा। उन्होंने कहा कि श्री सुतार की कृतियां जिन्‍होंने आने वाली पीढ़ियों के लिए राष्ट्रीय गौरव को अमर कर दिया है, कलाकारों और नागरिकों को प्रेरित करती रहेंगी।

प्रधानमंत्री ने एक्‍स पर लिखा;

श्री राम सुतार जी के निधन से अत्‍यंत दुख हुआ है। वे एक उत्‍कृष्‍ट मूर्तिकार थे जिनकी कला ने भारत को केवडिया स्थित स्टैच्यू ऑफ यूनिटी सहित कई प्रतिष्ठित स्मारक दिए। उनकी कृतियों को भारत के इतिहास, संस्कृति और सामूहिक भावना की सशक्त अभिव्यक्ति के रूप में हमेशा सराहा जाएगा। उन्होंने आने वाली पीढ़ियों के लिए राष्ट्रीय गौरव को अमर कर दिया है। उनकी कृतियां कलाकारों और नागरिकों को समान रूप से प्रेरित करती रहेंगी। उनके परिवार, प्रशंसकों और उनके अद्भुत जीवन और कार्यों से प्रभावित सभी लोगों के प्रति मेरी हार्दिक संवेदनाएं।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री श्री अमित शाह ने स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के आर्किटेक्ट, महान मूर्तिकार राम सुतार जी के निधन पर शोक व्यक्त किया।

X प्लेटफॉर्म पर एक पोस्ट में केन्द्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने कहा “स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के आर्किटेक्ट, महान मूर्तिकार राम सुतार जी का निधन अत्यंत दुःखद है। भारतीय संस्कृति व विरासत को युवा पीढ़ी के बीच चिरस्मरणीय बनाने हेतु ऐतिहासिक मूर्तियों का निर्माण करने वाले राम सुतार जी ने अजंता, एलोरा की मूर्तियों के जीर्णोद्धार में भी अहम भूमिका निभाई। उनका निधन भारतीय कला जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। ईश्वर पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और उनके परिजनों व प्रशंसकों को यह दुःख सहन करने की शक्ति प्रदान करें।

रक्षा मंत्री ने वायु सेना कमांडरों से ऑपरेशन सिंदूर के अनुभवों से सबक लेने और भविष्य की प्रत्येक चुनौती से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए तैयार रहने का आह्वान किया

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।रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान सशस्त्र बलों ने भारत की उच्च-प्रभावशाली और अल्प समय में निर्णायक कार्रवाई करने की क्षमता का सशक्त प्रदर्शन किया। उन्होंने भारतीय वायु सेना (आईएएफ) को तकनीकी रूप से उन्नत, परिचालन में चुस्त, रणनीतिक दृष्टि से आत्मविश्वासी और भविष्योन्मुखी सैन्य बल बताया। रक्षा मंत्री ने कहा कि यह निरंतर बदलते वैश्विक परिवेश में राष्ट्रीय हितों की प्रभावी रक्षा कर रही है। वे 18 दिसंबर, 2025 को नई दिल्ली में आयोजित वायु सेना कमांडरों के सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे।

रक्षा मंत्री ने ऑपरेशन के दौरान आतंकी शिविरों को नष्ट करने में भारतीय वायु सेना द्वारा प्रदर्शित साहस, गति एवं सटीकता की सराहना की और हमलों के उपरांत पाकिस्तान की ‘गैर-जिम्मेदाराना प्रतिक्रिया’ का प्रभावी ढंग से मुकाबला करने के लिए भी वायु सेना की प्रशंसा की। उन्होंने सशस्त्र बलों, विशेष रूप से वायु रक्षा क्षमताओं पर जनता के गहरे विश्वास को रेखांकित किया। श्री सिंह ने कहा, ‘आमतौर पर जब दुश्मन हमला करता है तो लोग सुरक्षित स्थानों की ओर रुख करते हैं, लेकिन जब पाकिस्तानी सेना ने भारतीय ठिकानों को निशाना बनाने का प्रयास किया, तब भारत के नागरिक शांत रहे और उन्होंने अपनी दैनिक गतिविधियां सामान्य रूप से जारी रखीं। यह हमारी परिचालन तैयारियों पर प्रत्येक भारतीय के अटूट भरोसे का प्रमाण है।’ रक्षा मंत्री ने निर्णायक बढ़त बनाए रखने के लिए शत्रु की आक्रामक एवं रक्षात्मक क्षमताओं की गहन समझ के महत्व पर बल देते हुए कमांडरों से ऑपरेशन सिंदूर से सबक लेने तथा भविष्य की प्रत्येक चुनौती से निपटने के लिए सतर्क और सदैव तैयार रहने का आग्रह किया

श्री राजनाथ सिंह ने युद्ध के बदलते स्वरूप पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि रूस–यूक्रेन संघर्ष, इजराइल–हमास युद्ध, बालाकोट हवाई हमले और ऑपरेशन सिंदूर इस तथ्य के सशक्त प्रमाण हैं कि समकालीन परिदृश्य में वायु सेना एक निर्णायक शक्ति के रूप में उभरी है। उन्होंने कहा कि वायु शक्ति केवल एक सामरिक संपत्ति नहीं, बल्कि एक प्रभावी रणनीतिक उपकरण है, जिसकी अंतर्निहित विशेषताएं गति, आश्चर्य और प्रहार की प्रभावशीलता हैं। रक्षा मंत्री कहा, ‘वायु सेना किसी भी नेतृत्व को शत्रु के समक्ष यह स्पष्ट रणनीतिक संदेश देने की क्षमता प्रदान करती है कि राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए हर आवश्यक कदम उठाया जाएगा। उन्होंने कहा कि गति, पहुंच और सटीकता के बल पर वायु शक्ति सैन्य साधनों के माध्यम से राष्ट्रीय उद्देश्यों की प्राप्ति का एक अत्यंत प्रभावी माध्यम बन गई है।

रक्षा मंत्री ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत की वायु रक्षा प्रणालियों तथा अन्य सैन्य उपकरणों के प्रभावी प्रदर्शन की सराहना की।श्री सिंह ने कहा कि 21वीं सदी का युद्ध केवल हथियारों तक सीमित नहीं है; यह विचारों, प्रौद्योगिकी और अनुकूलन क्षमता का रण है। साइबर युद्ध, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मानवरहित हवाई वाहन, उपग्रह-आधारित निगरानी और अंतरिक्ष-आधारित क्षमताएं युद्ध के स्वरूप को मूल रूप से बदल रही हैं। उन्होंने कहा कि सटीक व निर्देशित हथियार, वास्तविक समय की खुफिया जानकारी और डेटा-आधारित निर्णय-निर्माण अब वैकल्पिक नहीं रहे, बल्कि आधुनिक संघर्षों में सफलता के लिए अनिवार्य आवश्यकताएं बन चुके हैं। रक्षा मंत्री ने कहा कि जो देश प्रौद्योगिकी, रणनीतिक दूरदर्शिता और अनुकूलन क्षमता की इस त्रिमूर्ति में दक्षता हासिल करेंगे, वही वैश्विक नेतृत्व की दिशा में अग्रसर होंगे।

श्री राजनाथ सिंह ने विश्वास व्यक्त किया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर घोषित ‘सुदर्शन चक्र’ भविष्य में राष्ट्रीय परिसंपत्तियों की सुरक्षा में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। उन्होंने कहा कि स्वदेशी जेट इंजनों का विकास अब एक राष्ट्रीय मिशन का स्वरूप ले चुका है और सरकार इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पूर्णतः प्रतिबद्ध है।

रक्षा मंत्री ने बताया कि सरकार सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण को गति देने के लिए निजी क्षेत्र के साथ सक्रिय सहयोग कर रही है और आईडेक्स तथा अदिति जैसी कार्यकर्मों के माध्यम से युवाओं को रक्षा विनिर्माण क्षेत्र से जोड़ रही है। इस पहल में स्टार्टअप तथा लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) भी शामिल हैं। उन्होंने जानकारी दी है कि नवंबर 2025 तक आईडेक्स के अंतर्गत प्रस्तुत की गई 565 चुनौतियों में से कुल 672 विजेताओं का चयन किया गया है, जिनमें भारतीय वायु सेना से संबंधित 77 चुनौतियों के 96 विजेता शामिल हैं। श्री सिंह कहा कि यह उपलब्धि इस बात का स्पष्ट संकेत है कि युवाओं, विशेषकर निजी क्षेत्र के युवाओं की रक्षा क्षेत्र में रुचि निरंतर बढ़ रही है।          

श्री राजनाथ सिंह ने ऑपरेशन सिंदूर को तीनों सेनाओं के समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण बताते हुए आज के तेजी से बदलते परिदृश्य में संयुक्त संचालन के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा, ‘तीनों सेनाओं के बीच संयुक्तता अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि इससे हमारी सुरक्षा संरचना भी मजबूत होगी और हम अपने शत्रुओं का सामना पहले से अधिक प्रभावी ढंग से कर सकेंगे।           

रक्षा मंत्री ने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवीय सहायता एवं आपदा राहत प्रयासों में भी भारतीय वायु सेना के योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा, ‘चाहे देश के भीतर हो या विदेश में, भारतीय वायु सेना ने प्राकृतिक आपदाओं के दौरान निरंतर और प्रभावी सहायता प्रदान की है। श्री सिंह ने कहा कि कई मिशन अत्यंत चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में सफलता पूर्वक संपन्न किए गए, जिससे हमारे वायु योद्धाओं पर जनता का विश्वास और अधिक बढ़ा है।

इस सम्मेलन में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान और भारतीय वायु सेना के वरिष्ठ कमांडरों ने भाग लिया। रक्षा मंत्री के आगमन पर उनका स्वागत चीफ ऑफ एयर स्टाफ एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने किया और उन्हें भारतीय वायु सेना की परिचालन तैयारियों से अवगत कराया गया। यह सम्मेलन भारतीय वायु सेना के नेतृत्व को परिचालन प्राथमिकताओं पर विचार-विमर्श करने, उभरती चुनौतियों के समाधान खोजने और रक्षा क्षमताओं में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देने के लिए एक रणनीतिक मंच प्रदान करता है, जिससे वायु सेना उत्कृष्टता की ओर अग्रसर होती है।

रक्षा मंत्री ने नीदरलैंड्स के विदेश मंत्री से मुलाकात की

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रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 18 दिसंबर को नई दिल्ली में नीदरलैंड्स के विदेश मंत्री डेविड वान वील से मुलाकात की। इसमें दोनों देशों के बीच मजबूत और बढ़ती रक्षा साझेदारी की पुष्टि की गई। दोनों मंत्रियों ने रक्षा उपकरणों के सह-विकास और सह-उत्पादन के लिए प्राथमिकता वाले क्षेत्रों सहित कई द्विपक्षीय सुरक्षा और रक्षा मुद्दों पर चर्चा की। दोनों मंत्रियों ने  कार्यनीतिक साझेदारी के एक प्रमुख स्तंभ के रूप में रक्षा सहयोग को विकसित करने पर ध्यान केंद्रित करते हुए दोनों देशों की सेनाओं के बीच सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता की पुष्टि की।

इस मुलाकात में एक स्वतंत्र, खुले, समावेशी और नियम-आधारित हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए भारत और नीदरलैंड्स की साझा प्रतिबद्धता पर जोर दिया गया। दोनों मंत्रियों ने एक करीबी रक्षा साझेदारी और दोनों देशों के रक्षा उद्योगों, विशेष रूप से विशिष्ट प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में, को जोड़ने की जरूरत पर जोर दिया। रक्षा सचिव श्री राजेश कुमार सिंह और भारत में नीदरलैंड्स की राजदूत सुश्री मारिसा जेरार्ड्स ने दोनों मंत्रियों की उपस्थिति में दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग पर आशय पत्र का आदान-प्रदान किया।

दोनों देश प्रौद्योगिकी सहयोग, सह-उत्पादन और प्लेटफार्मों एवं उपकरणों के सह-विकास के लिए एक रक्षा औद्योगिक रोडमैप विकसित करके पारस्परिक लाभ के लिए चिन्हित क्षेत्रों में रक्षा सहयोग की संभावनाओं का पता लगाना चाहते हैं। श्री राजनाथ सिंह ने कहा कि दोनों देशों के लोगों के बीच संबंध बहुत मजबूत हैं, और नीदरलैंड्स में बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय एक जीवित सेतु के रूप में कार्य कर रहे हैं, जो दोस्ती के बंधनों को मजबूत कर रहे हैं।