उपराष्ट्रपति ने अपने निवास पर क्रिसमस लंच का आयोजन किया

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क्रिसमस प्रेम, आशा और दान का कालातीत संदेश देता है: उपराष्ट्रपति

भारत के उपराष्ट्रपति सी. पी. राधाकृष्णन ने आज क्रिसमस से पहले उपराष्ट्रपति निवास पर क्रिसमस लंच का आयोजन किया और सभी को मेरी क्रिसमस तथा नया साल मुबारक की हार्दिक शुभकामनाएं दीं। उपराष्ट्रपति ने कहा कि क्रिसमस प्रेम, आशा और दान का कालातीत संदेश देता है। उन्होंने आग्रह किया कि क्रिसमस की भावना को मौसम से आगे ले जाकर दैनिक जीवन में प्रतिबिंबित किया जाए।

उपराष्ट्रपति ने राष्ट्र-निर्माण में ईसाई समुदाय के अमूल्य योगदान की सराहना और प्रशंसा की, विशेष रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा तथा आदिवासी समुदायों और वंचित वर्गों के उत्थान के क्षेत्रों में।

उपराष्ट्रपति ने ईसाई समुदाय से राष्ट्र-निर्माण में उनके मूल्यवान योगदान को जारी रखने का आग्रह किया। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए समाज के सभी वर्गों का सामूहिक प्रयास आवश्यक होगा। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के महत्व को रेखांकित किया और जलवायु परिवर्तन से निपटने तथा सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मिशन लाइफ (लाइफस्टाइल फॉर एनवायरनमेंट) को अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया।

इस समारोह में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल डॉ. सी. वी. आनंद बोस; राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश; केंद्रीय राज्य मंत्री जॉर्ज कुरियन और सुरेेश गोपी; कार्डिनल्स, आर्कबिशप्स, बिशप्स, पुजारी, पास्टर, रेवरेंड फादर्स एवं सिस्टर्स तथा भारत भर के विभिन्न चर्च प्रशासनों के वरिष्ठ प्रतिनिधि सहित अन्य विशिष्ट अतिथि उपस्थित थे।

एनसीआर में एक सप्ताह के भीतर वायु गुणवत्ता की स्थिति में स्पष्ट सुधार सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं 

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केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने आज दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण की गंभीर स्थिति से निपटने के लिए दिल्ली, हरियाणा और उत्तर प्रदेश की राज्य सरकारों और संबंधित नगर निकायों की कार्य योजनाओं की विस्तृत समीक्षा के लिए उच्चस्तरीय बैठक की।श्री यादव ने दिल्ली-एनसीआर में खराब वायु गुणवत्ता की लगातार बनी हुई समस्या पर चिंता व्यक्त की।एक सप्ताह में इसमें सुधार के निर्देश दिए।

यह समीक्षा बैठकों की श्रृंखला में चौथी बैठक थी, जो 3 दिसंबर, 2025 को आयोजित पिछली बैठक में श्री यादव के दिए गए निर्देशों के अनुसार निर्धारित प्रारूप में और निर्धारित मापदंडों के आधार पर आयोजित की गई। इस बैठक में केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह भी उपस्थित थे।

श्री यादव ने कहा कि अभी तैयार की जा रही कार्य योजनाओं की समीक्षा जनवरी 2026 से हर महीने मंत्री स्तर पर की जाएगी। राज्य सरकारों से कहा गया कि वे सभी एनसीआर शहरों की भविष्य में प्रस्तुत की जाने वाली कार्य योजनाओं को अपने अधिकार क्षेत्र में एकीकृत करें। श्री यादव ने आश्वासन दिया कि कार्यान्वयन संबंधी बाधाओं को उच्च स्तरीय अंतर-राज्यीय समन्वय बैठकों के माध्यम से दूर किया जाएगा।

श्री यादव ने दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए राज्य सरकारों और नगर निकायों के किए गए उपायों पर अलग-अलग प्रस्तुतियों की समीक्षा की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि इन कार्रवाइयों की गति को तब तक बनाए रखना आवश्यक है जब तक कि पूरे एनसीआर में वायु गुणवत्ता में स्पष्ट सुधार न हो जाए। उन्होंने यह भी साफ किया कि नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए, लेकिन आम जनता को अनावश्यक असुविधा नहीं होनी चाहिए। चिन्हित मुद्दों को सुधारात्मक कार्रवाई के माध्यम से हल किया जाएगा, जिसकी समीक्षा 15 दिनों में की जाएगी।

दिल्ली-एनसीआर में भीड़भाड़ वाले चिन्हित 62 इलाकों में सुचारू यातायात प्रबंधन सुनिश्चित करने और कॉरपोरेट एवं औद्योगिक इकाइयों द्वारा कर्मचारियों के लिए इलेक्ट्रिक वाहन/सीएनजी बसों को बढ़ावा देने के निर्देश जारी किए गए। व्यस्त समय में भीड़ कम करने के लिए कार्यालयों, शॉपिंग मॉल और वाणिज्यिक परिसरों के लिए अलग-अलग समय निर्धारित करने पर भी जोर दिया गया। अधिक यातायात वाले मार्गों पर संपूर्ण सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध कराने के लिए विशेष उपाय किए गए, साथ ही क्षेत्र में संचालित अवैध और प्रदूषण फैलाने वाली औद्योगिक इकाइयों के खिलाफ कार्रवाई तेज करने के सख्त निर्देश दिए गए। गुरुग्राम, फरीदाबाद, गाजियाबाद और नोएडा को एकीकृत स्मार्ट यातायात प्रबंधन प्रणाली (आईटीएमएस) के कार्यान्वयन में तेजी लाने का निर्देश दिया गया, जबकि यातायात पुलिस को यह सुनिश्चित करने के लिए कहा गया कि प्रवर्तन जांच स्वयं ही भीड़भाड़ का कारण न बने।

केंद्रीय मंत्री ने एनसीआर शहरों में मेट्रो की अंतिम-मील कनेक्टिविटी में सुधार के लिए डीएमआरसी और राज्य अधिकारियों के साथ समन्वित योजना पर जोर दिया। यातायात जाम का कारण बनने वाले अतिक्रमणों को 10 दिनों के भीतर हटाने, गड्ढों से मुक्त सड़कों के लिए वार्षिक रखरखाव अनुबंध सुनिश्चित करने और मानसून से सड़कों को होने वाले नुकसान को रोकने के लिए उचित जल निकासी व्यवस्था करने के निर्देश जारी किए गए। प्रदूषण से संबंधित जन शिकायतों का समन्वित निवारण सीएक्यूएम की देखरेख में सुनिश्चित किया जाना था। इसके साथ ही हितधारकों की भागीदारी के लिए लक्षित सूचना, शिक्षा और संचार (आईईसी) गतिविधियों का आयोजन किया जाना था।

इस बैठक में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन सचिव, वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (सीएक्यूएम) के अध्यक्ष, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय, भारी उद्योग मंत्रालय और दिल्ली, हरियाणा तथा उत्तर प्रदेश की राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे। इसके अलावा, इस बैठक में डीएमआरसी के निदेशक और एमसीडी, एनडीएमसी, दिल्ली पुलिस, एनएचएआई और डीडीए के वरिष्ठ अधिकारियों सहित नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम और फरीदाबाद के नगर आयुक्त और जिलाधीक्षक मौजूद थे। इसमें केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी), संबंधित राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) और दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे।

केन्द्रीय गृह मंत्री ने देशभर में बंदरगाहों के लिए एक मजबूत सुरक्षा ढांचा स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया

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केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जहाजों और बंदरगाहों की सुरक्षा के लिए देशभर में बंदरगाहों के लिए एक मजबूत सुरक्षा ढांचा स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया।एक डेडिकेटेड Bureau of Port Security (BoPS) के गठन से सम्बंधित समीक्षा बैठक की। समीक्षा बैठक में केन्द्रीय पत्तन, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्री और केन्द्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री भी उपस्थित थे। श्री शाह ने निर्देश दिया कि सुरक्षा उपायों को व्यापार क्षमता, लोकेशन तथा अन्य संबंधित मापदंडों को ध्यान में रखते हुए क्रमबद्ध और जोखिम के आधार पर लागू किया जाए।

BoPS का गठन हाल ही में अधिनियमित Merchant Shipping Act, 2025 की धारा 13 के प्रावधानों के तहत एक वैधानिक निकाय के रूप में किया जाएगा। इस ब्यूरो का नेतृत्व एक महानिदेशक करेंगे और यह केन्द्रीय पत्तन, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्रालय (MoPSW) के अधीन काम करेगा और जहाजों और बंदरगाहों पर सुविधाओं की सुरक्षा से संबंधित नियामक एवं निरीक्षण कार्यों के लिए उत्तरदायी होगा। BoPS  का गठन Bureau of Civil Aviation Security (BCAS) की तर्ज पर किया जा रहा है। BoPS का नेतृत्व भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के एक वरिष्ठ अधिकारी (वेतन स्तर-15) करेंगे। एक वर्ष की ट्रांजिशन अवधि के दौरान, नौवहन महानिदेशक (DGS/DGMA), BoPS के महानिदेशक के रूप में कार्य करेंगे।

BoPS सुरक्षा संबंधी सूचनाओं का समयबद्ध विश्लेषण, संग्रहण और आदान-प्रदान सुनिश्चित करेगा, जिसमें साइबर सुरक्षा पर विशेष ध्यान होगा; इसमें बंदरगाहों की IT अवसंरचना को डिजिटल खतरों से सुरक्षित रखने के लिए डेडिकेटेड प्रभाग भी शामिल होगा। बंदरगाहों की सुरक्षा अवसंरचना को मजबूत करने के उद्देश्य से केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF) को बंदरगाह सुविधाओं के लिए Recognised Security Organisation (RSO) नामित किया गया है, जिसकी जिम्मेदारी बंदरगाहों का सुरक्षा मूल्यांकन और सुरक्षा योजनाएं तैयार करना है।

CISF को बंदरगाहों की सुरक्षा में लगी निजी सुरक्षा एजेंसियों (PSAs) को प्रशिक्षण देने और उनकी क्षमता निर्माण करने का भी काम दिया गया है। इन एजेंसियों को प्रमाणित किया जाएगा तथा इस क्षेत्र में केवल लाइसेंस प्राप्त निजी सुरक्षा एजेंसी ही कार्य करें, यह सुनिश्चित करने के लिए उचित नियामक उपाय लागू किए जाएंगे। बैठक में यह भी उल्लेख किया गया कि समुद्री सुरक्षा ढांचे से प्राप्त अनुभवों को विमानन सुरक्षा क्षेत्र में भी लागू किया जाएगा

उत्तर प्रदेश विधानसभा के शीतकालीन सत्र के प्रथम दिन की कार्यवाही गहमागहमी के बीच प्रारंभ

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​उत्तर प्रदेश की राजनीति के केंद्र, लखनऊ स्थित विधानभवन में आज से विधानसभा का महत्वपूर्ण सत्र आरंभ हो गया। लोकतांत्रिक परंपराओं और राजनीतिक गहमागहमी के बीच सदन की कार्यवाही शुरू हुई। इस लेख में हम दिनभर की प्रमुख घटनाओं, चर्चाओं और विधायी कार्यों का विश्लेषण करेंगे।

सदन की कार्यवाही नियत समय पर राष्ट्रगान के साथ शुरू हुई। सत्र के पहले दिन का वातावरण अत्यंत गंभीर और भावुक रहा। सदन के अध्यक्ष ने सबसे पहले उन दिवंगत सदस्यों को याद किया, जिनका पिछले सत्र और आज के बीच निधन हो गया। मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष समेत सभी दलों के नेताओं ने शोक संवेदनाएं व्यक्त कीं। संसदीय परंपरा के अनुसार, दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए दो मिनट का मौन रखा गया। यह क्षण दलगत राजनीति से ऊपर उठकर मानवीय संवेदनाओं को प्रदर्शित करने वाला था।

​विधायी कार्य और अध्यादेशों का प्रस्तुतीकरण

​श्रद्धांजलि सभा के पश्चात, विधायी कार्यों का क्रम शुरू हुआ। सरकार की ओर से संसदीय कार्य मंत्री ने सदन के पटल पर कई महत्वपूर्ण अध्यादेश रखे। इन अध्यादेशों में प्रदेश के विकास, कानून व्यवस्था और जनहित से जुड़े कई प्रमुख प्रावधान शामिल हैं। नियमानुसार, इन अध्यादेशों को अब विधेयक के रूप में सदन की स्वीकृति मिलनी अनिवार्य है। सत्ता पक्ष ने इन संशोधनों को प्रदेश की प्रगति के लिए आवश्यक बताया, जबकि विपक्ष ने इनकी बारीकियों पर चर्चा की मांग की।

​विपक्ष का रुख और जनहित के मुद्दे

​सत्र के पहले ही दिन विपक्ष के तेवर कड़े नजर आए। हालांकि पहले दिन विधायी कार्यों की प्रधानता रही, लेकिन विपक्ष ने विभिन्न माध्यमों से प्रदेश की वर्तमान स्थिति पर अपनी चिंता व्यक्त की। किसानों की समस्याएं, खाद की उपलब्धता, महंगाई और बेरोजगारी जैसे विषयों पर विपक्षी सदस्यों ने सरकार को घेरने की रणनीति तैयार की। सदन के बाहर और भीतर विपक्षी दलों ने एकजुट होकर यह संकेत दिया कि आने वाले दिनों में सत्र काफी हंगामेदार रहने वाला है।

​सत्ता पक्ष की रणनीति और जवाबदेही

​सरकार की ओर से मुख्यमंत्रीयोगी आदित्य नाथ ने स्पष्ट किया कि उनकी सरकार हर जनहित के मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है। सत्ता पक्ष ने अपनी उपलब्धियों का विवरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश निवेश और विकास के मार्ग पर तेजी से अग्रसर है। सरकार ने स्पष्ट किया कि सत्र का समय बहुमूल्य है और इसका उपयोग सकारात्मक चर्चा और प्रदेश के विकास के लिए कानून बनाने में किया जाना चाहिए। मंत्रियों ने अपने-अपने विभागों से संबंधित प्रश्नों के उत्तर देने की तैयारी भी पूरी कर ली है।

​विधानसभा के बाहर और भीतर सुरक्षा के अभूतपूर्व प्रबंध किए गए थे। सदन की गरिमा को बनाए रखने के लिए अध्यक्ष ने सभी सदस्यों से अनुशासन और शिष्टाचार का पालन करने का आग्रह किया। लोकतंत्र के इस मंदिर में होने वाली चर्चाएं प्रदेश के करोड़ों नागरिकों के भविष्य का निर्धारण करती हैं, इसलिए मर्यादा बनाए रखना अनिवार्य है।

​निष्कर्ष और आगामी दिनों का रोडमैप

​आज की कार्यवाही मुख्य रूप से औपचारिकताओं और शोक प्रस्तावों तक सीमित रही, लेकिन इसने आने वाले दिनों के लिए एक स्पष्ट रूपरेखा तय कर दी है। आने वाले दिनों में अनुपूरक बजट पेश किया जाना है, जो इस सत्र का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बिंदु होगा। इसके अतिरिक्त, कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा जैसे विषयों पर भी तीखी बहस होने की संभावना है।
​यह सत्र केवल सत्ता और विपक्ष के बीच का द्वंद्व नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश की जनता की अपेक्षाओं को स्वर देने का मंच है। देखना यह होगा कि जनहित के मुद्दों पर सदन में कितनी प्रभावी चर्चा होती है और सरकार विपक्ष के सवालों का कितना संतोषजनक समाधान प्रस्तुत कर पाती है।(जैमिनी)

संसद का शीतकालीन सत्र विधायी कार्यों और राजनीतिक बहस दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण रहा

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संसद का शीतकालीन सत्र आज 19 दिसंबर 2025 को समाप्त हो गया । 19 दिनों तक चले इस शीतकालीन सत्र में कुल 15 बैठकें हुईं। 18वीं लोकसभा का यह छठा सत्र विधायी कार्यों और राजनीतिक बहस दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण रहा।इस सत्र में सभा की उत्पादकता 111 प्रतिशत रही, जो सांसदों की सक्रिय भागीदारी को दर्शाती है । लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सदन को संबोधित करते हुए कहा कि सभी सदस्यों के सहयोग से यह उच्च उत्पादकता हासिल की गई। उन्होंने प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और सभी सांसदों का धन्यवाद किया। सत्र के दौरान कई महत्वपूर्ण विधायी और वित्तीय कार्य संपन्न हुए।
पारित प्रमुख विधेयक
इस सत्र के दौरान संसद ने कुल 5 प्रमुख विधेयकों को लोकसभा और राज्यसभा से पारित किया । इनमें सबसे महत्वपूर्ण और विवादास्पद विधेयक विकसित भारत-ग्रामीण रोजगार एवं आजीविका मिशन विधेयक (VB-G RAM G या जी राम जी विधेयक) 2025 था, जो 20 वर्ष पुरानी मनरेगा योजना की जगह लेगा।
बीमा संशोधन विधेयक, परमाणु ऊर्जा से संबंधित शांति (SHANTI) विधेयक, अनुदान विधेयक और निरसन एवं संशोधन विधेयक शामिल हैं । इन विधेयकों के माध्यम से सरकार ने ग्रामीण रोजगार, सामाजिक सुरक्षा, ऊर्जा क्षेत्र और कानूनी ढांचे को मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए।सत्र के पहले दिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने तीन विधेयक पेश किए – मणिपुर जीएसटी संशोधन बिल 2025, केंद्रीय उत्पाद शुल्क संशोधन विधेयक 2025, और स्वास्थ्य सुरक्षा तथा राष्ट्रीय सुरक्षा सेस विधेयक 2025, जो सभी पारित हुए।
प्रमुख चर्चाएं और बहसें
संसद के शीतकालीन सत्र के छठे दिन सरकार की ओर से वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने पर एक चर्चा आयोजित की गई । इस चर्चा की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में की, जिसमें सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव भी देखा गया।
सत्र के दौरान दिल्ली-एनसीआर के वायु प्रदूषण, बीमा कानून संशोधनों और अन्य महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर गहन चर्चा हुई। विभिन्न मंत्रालयों से संबंधित संसदीय स्थायी समितियों की रिपोर्टें भी प्रस्तुत की गईं।
जी राम जी विधेयक विवाद
संसद के इस सत्र में सबसे अधिक विवाद जी-राम-जी विधेयक 2025 को लेकर रहा। विपक्षी दलों ने इस विधेयक का जमकर विरोध किया, जिसे मनरेगा का विकल्प बताया गया। विपक्ष का आरोप था कि यह कानून ग्रामीण गरीबों के अधिकारों का हनन करता है और महात्मा गांधी के विजन का अपमान है।
विपक्षी सांसदों ने संसद परिसर में मनरेगा का नाम बदलने के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और हाथों में तख्तियां लेकर ‘मनरेगा को मत मारो’ के नारे लगाए । विधेयक पारित होने से पहले विपक्षी सांसदों ने सदन से वॉकआउट किया और संसद के मकर द्वार पर रातभर धरने पर बैठे रहे।
हंगामा और व्यवधान
सत्र के दौरान कई मौकों पर विपक्ष के विरोध और हंगामे के कारण लोकसभा की कार्यवाही बाधित हुई। अंतिम दिन शुक्रवार को कार्यवाही शुरू होते ही विपक्ष ने फिर हंगामा किया, जिसके बाद वंदे मातरम के बाद सदन को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया।
विपक्ष का तर्क था कि महत्वपूर्ण बिलों को बिना सिलेक्ट कमेटी के पास भेजे और राज्य सरकारों से परामर्श किए बिना जल्दबाजी में पास करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के विरुद्ध है। विपक्षी सांसदों ने रात 12:30 बजे तक चली कार्यवाही को भी अनुचित बताया।
सत्रावसान के बाद की घटनाएं
सत्र के अंत में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने सभी दलों के नेताओं से मुलाकात की । इस पारंपरिक चाय पार्टी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विपक्ष के नेताओं के बीच सौहार्दपूर्ण माहौल देखने को मिला। नवनिर्वाचित सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा भी इस बैठक में शामिल हुईं और प्रधानमंत्री के साथ वायनाड के विकास मुद्दों पर चर्चा की।
बैठक के दौरान सदस्यों ने नए संसद भवन में एक समर्पित हॉल की मांग प्रधानमंत्री के सामने रखी। सदस्यों ने यह भी कहा कि सत्र काफी उपयोगी रहा, हालांकि इसे और आगे बढ़ाया जा सकता था।
निष्कर्ष
111 प्रतिशत उत्पादकता के बावजूद, यह सत्र हंगामे और राजनीतिक टकराव का साक्षी बना। मनरेगा के प्रतिस्थापन जैसे विवादास्पद मुद्दों ने संसदीय बहस को तीखा बना दिया। लोकसभा अध्यक्ष ने सभी सदस्यों के सहयोग की सराहना करते हुए सत्र को सफल बताया। अब अगला बजट सत्र 2026 में शुरू होगा।
राज्यसभा शीतकालीन सत्र 2025 – विस्तृत रिपोर्ट
राज्यसभा का 269वां सत्र आज शुक्रवार को सभापति सीपी राधाकृष्णन द्वारा अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया । उच्च सदन ने इस सत्र में विधायी कार्यों के साथ-साथ महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर सार्थक चर्चा की।
उत्कृष्ट उत्पादकता
राज्यसभा में इस शीतकालीन सत्र में 92 घंटे काम हुआ, जिससे इस सदन ने 121 फीसदी प्रोडक्टिविटी हासिल की । यह आंकड़ा सदन के सदस्यों की सक्रिय भागीदारी और विधायी कार्यों के प्रति गंभीरता को दर्शाता है। राज्यसभा ने लोकसभा की तुलना में भी अधिक उत्पादकता हासिल की।
शून्यकाल में अभूतपूर्व भागीदारी
सीपी राधाकृष्णन ने सदन को बताया कि इस सत्र में प्रतिदिन औसतन 84 से अधिक शून्यकाल नोटिसों का अभूतपूर्व आंकड़ा शामिल है, जो पिछले दो सत्रों की तुलना में 30.1 प्रतिशत ज्यादा है । शून्यकाल के दौरान प्रतिदिन 15 से अधिक मामले उठाए गए, जो लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाते हैं।
इस सत्र में 58 तारांकित प्रश्न, 208 शून्यकाल नोटिस और 87 विशेष उल्लेख लिए गए। सदस्यों ने देश के विभिन्न क्षेत्रों और मुद्दों पर अपनी चिंताएं व्यक्त कीं।
पारित प्रमुख विधेयक
राज्यसभा ने लोकसभा के साथ मिलकर पांच महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित किया। इनमें सबसे चर्चित विधेयक विकसित भारत-ग्रामीण रोजगार एवं आजीविका गारंटी मिशन (जी राम जी) विधेयक 2025 था।
गुरुवार, 18 दिसंबर 2025 को परमाणु ऊर्जा से संबंधित शांति विधेयक 2025 राज्यसभा से पारित हो गया । यह विधेयक निजी क्षेत्र की भागीदारी के लिए परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को खोलने का मार्ग प्रशस्त करता है। राज्यसभा ने इसे ध्वनिमत से मंजूरी दी।
बीमा संशोधन विधेयक, निरसन एवं संशोधन विधेयक, और अनुदान विधेयक भी राज्यसभा से पारित हुए। विनियोग विधेयक 2025 पर चर्चा हुई, जो धन विधेयक होने के कारण केवल विचार-विमर्श के लिए राज्यसभा में आया।
जी राम जी विधेयक पर तीखी बहस
गुरुवार रात करीब 12:30 बजे जी-राम-जी विधेयक को राज्यसभा से मंजूरी मिली, जबकि विपक्ष ने इसका जमकर विरोधा किया । विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने चेतावनी दी कि सरकार को यह कानून भी तीन कृषि कानूनों की तरह वापस लेना पड़ेगा। विपक्ष का आरोप था कि इस विधेयक से राज्य सरकारों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा और ग्रामीण गरीबों के अधिकारों का हनन होगा। विधेयक पारित होने से पहले विपक्षी सांसदों ने सदन से वॉकआउट किया।
वंदे मातरम पर विशेष चर्चा
वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने पर विशेष चर्चा आयोजित की गई । राज्यसभा में इस चर्चा की शुरुआत गृह मंत्री अमित शाह ने की। इस ऐतिहासिक अवसर पर सत्ता पक्ष और विपक्ष के सदस्यों ने अपने विचार व्यक्त किए, हालांकि कुछ बिंदुओं पर मतभेद भी सामने आए।
अन्य महत्वपूर्ण चर्चाएं
राज्यसभा में दिल्ली-एनसीआर के वायु प्रदूषण, बीमा क्षेत्र में सुधार, परमाणु ऊर्जा नीति और विभिन्न संसदीय समितियों की रिपोर्टों पर विस्तृत चर्चा हुई। सदस्यों ने कृषि, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर सरकार से सवाल किए।
देर रात की कार्यवाही
सत्र के अंतिम दिनों में राज्यसभा में देर रात तक कार्यवाही चली। विधेयकों को पारित कराने के लिए सरकार ने रात 12:30 बजे तक सदन चलाया, जिस पर विपक्ष ने आपत्ति जताई। विपक्ष का कहना था कि इतने महत्वपूर्ण विधेयकों पर रात के समय चर्चा करना लोकतांत्रिक परंपराओं के विरुद्ध है।
सभापति का समापन संबोधन
सत्र की समाप्ति पर सभापति सीपी राधाकृष्णन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, सदन के नेता जेपी नड्डा, विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे और सभी सदस्यों को उनके सहयोग के लिए हार्दिक आभार व्यक्त किया। उन्होंने सत्र के दौरान हुए उल्लेखनीय कार्यों की सराहना की।
चुनौतियां और विवाद
हालांकि राज्यसभा में उच्च उत्पादकता रही, लेकिन कई मौकों पर विपक्ष के विरोध के कारण कार्यवाही बाधित हुई। विपक्ष का मुख्य आरोप था कि सरकार महत्वपूर्ण विधेयकों को स्थायी समितियों के पास भेजे बिना और पर्याप्त चर्चा के बिना पारित करा रही है।
विपक्षी सांसदों ने विशेष रूप से जी राम जी विधेयक और परमाणु ऊर्जा विधेयक पर गहन चर्चा की मांग की थी, लेकिन सरकार ने बहुमत के आधार पर इन्हें पारित करा दिया।
सत्र का समग्र मूल्यांकन
121 प्रतिशत उत्पादकता के साथ राज्यसभा का यह सत्र विधायी दृष्टि से अत्यंत सफल रहा। सदस्यों की सक्रिय भागीदारी, शून्यकाल में बढ़ोतरी और महत्वपूर्ण विधेयकों का पारित होना इस सत्र की उपलब्धियां हैं। हालांकि, विधेयकों को जल्दबाजी में पारित कराने और पर्याप्त परामर्श के अभाव को लेकर विपक्ष की चिंताएं भी दर्ज हुईं।
राज्यसभा ने अपनी संवैधानिक भूमिका का निर्वहन करते हुए विधेयकों पर विस्तृत चर्चा की और विभिन्न दृष्टिकोणों को सामने लाया। अब अगला सत्र 2026 में बजट सत्र के साथ शुरू होगा, जिसमें देश की आर्थिक नीतियों और बजट प्रस्तावों पर चर्चा होगी।

भारतीय तटरक्षक ने नई पीढ़ी के तेज गश्‍ती पोत अमूल्य को सेवा में शामिल किया

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भारतीय तटरक्षक का पोत अमूल्य को आज गोवा में सेवा में शामिल किया गया। नई पीढ़ी के अदम्य श्रेणी के आठ तीव्र गश्ती पोतों की श्रृंखला का तीसरा पोत है। इसे गोवा शिपयार्ड लिमिटेड द्वारा विकसित और निर्मित  51 मीटर लंबा यह पोत देश में पोत निर्माण में नया मानदंड स्थापित करता है। इसके 60 प्रतिशत से अधिक घटक देश में निर्मित हैं। अमूल्य अर्थात् अनमोल  भारत सरकार की आत्मनिर्भर भारत और मेक-इन-इंडिया पहल के तहत रक्षा क्षेत्र में भारत की निरंतर प्रगति को दर्शाता है। आधुनिक डिजाइन पद्धति पर आधारित यह पोत दक्षता, स्‍थायित्‍व और त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता से युक्‍त है।

तीन हजार किलोवाट के दो उन्नत डीजल इंजनों से संचालित यह पोत 27 समुद्री मील की अधिकतम गति से चल सकता है और इसकी परिचालन क्षमता 1,500 समुद्री मील की है। इससे भारत के समुद्री क्षेत्रों में लंबे अभियान को अंजाम देना संभव हो पाएगा। यह पोत स्वदेश निर्मित अत्याधुनिक हथियारों/प्रणालियों से सुसज्जित है और बेहतर गतिशीलता, परिचालन अनुकूलता और समुद्र में उन्नत प्रदर्शन करने में सक्षम है। यह निगरानी, ​​अवरोधन, खोज एवं बचाव, तस्करी विरोधी अभियान और प्रदूषण नियंत्रण सहित कई अभियानों को अंजाम देगा और पूर्वी तट की सुरक्षा में भारतीय तटरक्षक को सुदृढ़ बनाएगा।

भारतीय तटरक्षक पोत अमूल्य ओडिशा के पारादीप में तैनात रहेगा और तटरक्षक क्षेत्र (उत्तर पूर्व) कमान के प्रशासनिक और परिचालन नियंत्रण में काम करेगा। इस पोत की कमान कमांडेंट (जेजी) अनुपम सिंह को सौंपी गई है, जिसमें पांच अधिकारी और 34 कर्मी शामिल हैं।

अमूल्‍य को सेवा में शामिल किए जाने के समारोह की अध्यक्षता रक्षा विभाग के संयुक्त सचिव (स्वतंत्र प्रभार), समारोह एवं सीएओ अमिताभ प्रसाद ने की और इसमें भारतीय तटरक्षक बल, केंद्र और राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारियों तथा गोवा शिपयार्ड लिमिटेड के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। अमूल्‍य पोत को तटरक्षक सेवा में श‍ामिल करना उसके बेड़े को विस्‍तारित करने का एक उल्‍लेखनीय कदम है, जो तटीय सुरक्षा सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण योगदान देगा।

उत्तराखंड में 15वें वित्त आयोग के अंतर्गत 94 करोड़ से अधिक के अनुदान जारी किए गए

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केंद्र सरकार ने उत्तराखंड में ग्रामीण स्थानीय निकायों/पंचायती राज संस्थाओं के लिए वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान 15वें वित्त आयोग के अनुदान के रूप में 94.236 करोड़ रुपये जारी किए हैं। इस राशि में वित्त वर्ष 2024-25 के लिए अबद्ध अनुदान की दूसरी किस्त, अर्थात् 9,410.03 लाख रुपये की राशि राज्य की सभी पात्र 13 जिला पंचायतों, 95 ब्लॉक पंचायतों और 7,784 ग्राम पंचायतों को जारी की गई है। इसके अतिरिक्त, वित्त वर्ष 2024-25 के लिए अबद्ध अनुदान की पहली किस्त के रोके गए हिस्से के रूप में 13.60 लाख रुपये की राशि 15 अतिरिक्त पात्र ग्राम पंचायतों को जारी की गई है।

पंचायती राज मंत्रालय और जल शक्ति मंत्रालय (पेयजल एवं स्वच्छता विभाग) ग्रामीण स्थानीय निकायों/ग्रामीण संस्थाओं के लिए पंद्रहवीं वित्त अनुदान राशि जारी करने की सिफारिश करते हैं, जिसे वित्त मंत्रालय द्वारा एक वित्तीय वर्ष में दो किस्तों में जारी किया जाता है। अबद्ध अनुदानों का उपयोग वेतन और अन्य स्थापना व्ययों को छोड़कर ग्रामीण स्थानीय निकायों/ग्रामीण संस्थाओं द्वारा संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची में सूचीबद्ध 29 विषयों के अंतर्गत स्थान-विशिष्ट आवश्यकताओं के लिए किया जाता है। दूसरी ओर, बद्ध अनुदान बुनियादी सेवाओं के लिए निर्धारित हैं, जिनमें (क) स्वच्छता और खुले में शौच मुक्त स्थिति का रखरखाव, जिसमें घरेलू अपशिष्ट, मानव मल और मल अपशिष्‍ट का प्रबंधन तथा शोधन और (ख) पेयजल की आपूर्ति, वर्षा जल संचयन एवं जल पुनर्चक्रण शामिल है।

प्रधानमंत्री 20-21 दिसंबर को पश्चिम बंगाल−असम का दौरा करेंगे

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प्रधानमंत्री असम में लगभग 15,600 करोड़ रुपये की परियोजनाओं का उद्घाटन और आधारशिला रखेंगे

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी 20 दिसंबर को पश्चिम बंगाल की यात्रा पर जाएंगे। वे 20-21 दिसंबर को असम का दौरा करेंगे। सुबह लगभग 11 बजकर 15 मिनट पर प्रधानमंत्री पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के राणाघाट में राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं की आधारशिला रखेंगे और उनका उद्घाटन करेंगे। श्री मोदी इस अवसर पर उपस्थित लोगों को संबोधित भी करेंगे।प्रधानमंत्री लगभग 3,200 करोड़ रुपये की दो राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं का उद्घाटन करेंगे और उनकी आधारशिला रखेंगे।

प्रधानमंत्री पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग-34 के बाराजागुली-कृष्णनगर मार्ग पर 66.7 किलोमीटर लंबे 4-लेन का उद्घाटन करेंगे। श्री मोदी पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग-34 के बारासात-बराजागुली मार्ग पर 17.6 किलोमीटर लंबे 4-लेन की आधारशिला भी रखेंगे।

ये परियोजनाएं कोलकाता और सिलीगुड़ी के बीच महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग के रूप में काम करेंगी। इन परियोजनाओं से यात्रा के समय में लगभग 2 घंटे की बचत होगी, निर्बाध यातायात के लिए वाहनों की तेज और सुगम आवाजाही सुनिश्चित होगी, वाहन संचालन लागत में कमी आएगी, और कोलकाता तथा पश्चिम बंगाल के अन्य पड़ोसी जिलों के साथ-साथ पड़ोसी देशों के साथ कनेक्टिविटी में सुधार होगा। इन परियोजनाओं से क्षेत्र में आर्थिक विकास को भी बढ़ावा मिलेगा और पूरे क्षेत्र में पर्यटन के विकास को प्रोत्साहन मिलेगा।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 20-21 दिसंबर को असम की यात्रा पर रहेंगे। 20 दिसंबर को दोपहर लगभग 3 बजे प्रधानमंत्री गुवाहाटी पहुंचकर लोकप्रिय गोपीनाथ बारदोलोई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के नए टर्मिनल भवन का निरीक्षण और इसका उद्घाटन करेंगे। इस अवसर पर वे एक जनसभा को संबोधित करेंगे।

21 दिसंबर को सुबह लगभग 9:45 बजे, प्रधानमंत्री गुवाहाटी के बोरागांव स्थित शहीद स्मारक क्षेत्र में शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। इसके बाद, वे असम के डिब्रूगढ़ जिले के नामरूप जाएंगे, जहां वे असम वैली फर्टिलाइजर एंड केमिकल कंपनी लिमिटेड की अमोनिया-यूरिया परियोजना के लिए भूमि पूजन करेंगे। वे इस अवसर पर एक सभा को संबोधित भी करेंगे।

20 दिसंबर को प्रधानमंत्री गुवाहाटी में लोकप्रिय गोपीनाथ बारदोलोई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के नए टर्मिनल भवन का उद्घाटन करेंगे, यह असम की कनेक्टिविटी, आर्थिक विस्तार और वैश्विक जुड़ाव में एक परिवर्तनकारी उपलब्धि सिद्ध होगा।

लगभग 1.4 लाख वर्ग मीटर में विस्तारित नवनिर्मित एकीकृत नया टर्मिनल भवन, रनवे, एयरफील्ड सिस्टम, एप्रन और टैक्सीवे में किए गए बड़े उन्नयन के समर्थन से, प्रति वर्ष 1.3 करोड़ यात्रियों को संभालने की क्षमता के साथ तैयार किया गया है।

भारत का पहला प्रकृति-विषय से जुड़ा यह हवाई अड्डा टर्मिनल, असम की जैव विविधता और सांस्कृतिक विरासत से प्रेरित है, जिसका विषय “बांस के उद्यान” है। टर्मिनल में पूर्वोत्तर से प्राप्त लगभग 140 मीट्रिक टन बांस का अभूतपूर्व उपयोग किया गया है, जो काजीरंगा से प्रेरित हरे-भरे परिदृश्य, जापी आकृतियां, प्रतिष्ठित गैंडे का प्रतीक और कोपो फूल को प्रतिबिंबित करने वाले 57 बाग-विषय वाले स्तंभों से पूरित है। एक अनूठा “आकाश वन”, जिसमें लगभग एक लाख स्थानीय प्रजातियों के पौधे हैं और यह यहां आने वाले यात्रियों को वन जैसा अनुभव प्रदान करता है।

यह टर्मिनल यात्रियों की सुविधा और डिजिटल नवाचार के क्षेत्र में नए मानक स्थापित करता है। तेज़ और सहज सुरक्षा जांच के लिए फुल-बॉडी स्कैनर, डिजियात्रा-सक्षम संपर्क रहित यात्रा, स्वचालित सामान प्रबंधन, त्वरित आव्रजन और एआई-संचालित हवाई अड्डा संचालन जैसी सुविधाएं निर्बाध, सुरक्षित और कुशल यात्रा सुनिश्चित करती हैं।

21 दिसंबर की सुबह नामरूप जाने से पहले, प्रधानमंत्री शहीद स्मारक क्षेत्र का दौरा करेंगे और ऐतिहासिक असम आंदोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। यह छह वर्ष लंबा जन आंदोलन था जिसने विदेशियों से मुक्त असम और राज्य की पहचान की रक्षा के लिए सामूहिक संकल्प को मूर्त रूप दिया।

बाद में दिन में, प्रधानमंत्री असम के डिब्रूगढ़ जिले के नामरूप में ब्रह्मपुत्र घाटी उर्वरक निगम लिमिटेड (बीवीएफसीएल) के वर्तमान परिसर के भीतर स्थित नई ब्राउनफील्ड अमोनिया-यूरिया उर्वरक परियोजना का भूमिपूजन करेंगे।

प्रधानमंत्री के किसान कल्याण के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाते हुए, 10,600 करोड़ रुपये से अधिक के अनुमानित निवेश वाली यह परियोजना असम और पड़ोसी राज्यों की उर्वरक आवश्यकताओं को पूर्ण करेगी, आयात पर निर्भरता कम करने के साथ-साथ पर्याप्त रोजगार सृजित करेगी और क्षेत्रीय आर्थिक विकास को गति प्रदान करेगी। यह औद्योगिक पुनरुद्धार और किसान कल्याण की आधारशिला है।

राष्ट्रपति ने हैदराबाद में लोक सेवा आयोगों के अध्यक्षों के राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन किया

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राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने आज शु्क्रवार को हैदराबाद में तेलंगाना लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित लोक सेवा आयोगों के अध्यक्षों के राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन किया।इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि हमारे संविधान निर्माताओं ने संविधान का एक पूरा भाग सेवाओं और लोक सेवा आयोगों को समर्पित किया है। यह केंद्र और राज्यों के लिए लोक सेवा आयोगों की भूमिकाओं और कार्यों को दिए गए महत्व को दर्शाता है।

राष्ट्रपति ने कहा कि सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय तथा समान अवसर और प्रतिष्ठा के हमारे संवैधानिक आदर्श लोक सेवा आयोगों के कामकाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। संविधान की प्रस्तावना, सार्वजनिक रोजगार के मामलों में समान अवसर का मौलिक अधिकार और जन कल्याण को बढ़ावा देने के लिए सामाजिक व्यवस्था सुनिश्चित करने हेतु राज्य को निर्देशित करने वाले निर्देशक सिद्धांत, लोक सेवा आयोगों के लिए मार्ग प्रशस्त करते हैं। लोक सेवा आयोगों को न केवल समान अवसर के आदर्श से निर्देशित होना चाहिए, बल्कि परिणामों की समानता के लक्ष्य को भी हासिल करने का प्रयास करना चाहिए। ये आयोग परिवर्तन के ऐसे माध्यम हैं जो समानता और निष्पक्षता को बढ़ावा देते हैं।

राष्ट्रपति ने कहा कि शासन प्रक्रिया में निष्पक्षता, निरंतरता और स्थिरता लोक सेवा आयोगों द्वारा चयनित लोक सेवकों के ‘स्थायी कार्यपालिका’ निकाय द्वारा सुनिश्चित की जाती है। राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर जनहितैषी नीतियों को लागू करने के लिए स्थायी कार्यपालिका में शामिल सिविल सेवकों की सत्यनिष्ठा, संवेदनशीलता और योग्यता अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि लोक सेवा आयोगों को भर्ती किए जाने वाले उम्मीदवारों की ईमानदारी और सत्यनिष्ठा को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। ईमानदारी और सत्यनिष्ठा सर्वोपरि हैं और इनसे कोई समझौता नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि कौशल और योग्यता की कमी को प्रशिक्षण कार्यक्रमों और अन्य रणनीतियों के माध्यम से दूर किया जा सकता है लेकिन सत्यनिष्ठा की कमी गंभीर चुनौतियां पैदा कर सकती है, जिन पर नियंत्रण पाना असंभव हो सकता है।

राष्ट्रपति ने कहा कि सरकारी कर्मचारी के रूप में रोजगार चाहने वाले युवाओं में वंचित और कमजोर वर्गों के लिए कार्य करने की प्रवृत्ति होनी चाहिए। हमारे सरकारी कर्मचारियों को महिलाओं की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील होना चाहिए। लोक सेवा आयोगों द्वारा लैंगिक संवेदनशीलता को उच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

राष्ट्रपति ने कहा कि भारत के विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था और अपार विविधता से संपन्न राष्ट्र होने के नाते सभी स्तरों पर सबसे प्रभावी शासन प्रणालियों की आवश्यकता है। देश निकट भविष्य में विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। हम वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में भी अग्रसर हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि लोक सेवा आयोग अपनी जिम्मेदारियों को निभाते रहेंगे और उनके द्वारा चयनित और निर्देशित सिविल सेवकों की भविष्य के लिए तैयार टीम के निर्माण में योगदान देंगे।

अरावली चौराहे पर: जब परिभाषा तय करती है भविष्य

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– डॉ सत्यवान सौरभ

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अरावली पर्वतमाला, जो विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत शृंखलाओं में से एक है, पश्चिमी भारत में एक मौन पारिस्थितिक प्रहरी के रूप में सदियों से खड़ी रही है। गुजरात से राजस्थान होते हुए हरियाणा और दिल्ली तक फैली यह शृंखला भूजल पुनर्भरण, मरुस्थलीकरण पर नियंत्रण, जलवायु संतुलन तथा धूल और प्रदूषकों को रोकने जैसे महत्वपूर्ण कार्य करती है। हालिया विवाद, जिसमें अरावली की कानूनी परिभाषा को पुनर्परिभाषित किया गया है, ने इस प्राचीन पर्वतमाला को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है जहाँ शब्दावली ही उसके अस्तित्व का भविष्य तय कर सकती है।

विवाद के केंद्र में अरावली पहाड़ियों की एक नई, समान और तकनीकी परिभाषा है, जिसमें न्यूनतम ऊँचाई को मुख्य मानक बनाया गया है। प्रशासनिक दृष्टि से मानकीकरण भले ही सरल प्रतीत हो, पर प्रकृति सीधी रेखाओं में कार्य नहीं करती। छोटी पहाड़ियाँ, चट्टानी उभार, ढलान और असमतल भू-आकृतियाँ—जो इस ऊँचाई के मानक से नीचे आती हैं—मिलकर एक ऐसा पारिस्थितिक तंत्र बनाती हैं जो जलधारण और जैव विविधता के लिए अनिवार्य है। ऊँचाई को कार्यात्मक महत्व से ऊपर रखना भू-दृश्यों की भाषा को न समझने के समान है।

भारत में पर्यावरण संरक्षण का विकास अक्सर न्यायिक हस्तक्षेप के माध्यम से हुआ है, जिसने कई बार प्रशासनिक निष्क्रियता की भरपाई की है। अरावली क्षेत्र भी दशकों से न्यायालय द्वारा लगाए गए खनन प्रतिबंधों और संरक्षण आदेशों से लाभान्वित रहा है। किंतु कानूनी परिभाषा को संकुचित करने का वर्तमान प्रयास इन उपलब्धियों को बिना किसी औपचारिक वापसी के कमजोर कर सकता है। यदि केवल तकनीकी कसौटी के आधार पर बड़े पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो जाते हैं, तो यह पर्यावरणीय सुरक्षा का परोक्ष क्षरण होगा।

इसके दुष्परिणाम पहले से ही संवेदनशील क्षेत्रों में अधिक गंभीर हो सकते हैं। राजस्थान की नाजुक भूजल व्यवस्था अरावली के जलग्रहण क्षेत्रों पर अत्यधिक निर्भर है। हरियाणा और दिल्ली-एनसीआर के लिए यह पर्वतमाला पश्चिम से आने वाली धूल और प्रदूषण के विरुद्ध प्राकृतिक दीवार का काम करती है। इन पहाड़ियों का विखंडन—चाहे वह खनन, रियल एस्टेट या अवसंरचना परियोजनाओं के माध्यम से हो—भूजल स्तर में गिरावट, शहरी ताप द्वीप प्रभाव और वायु गुणवत्ता में और गिरावट ला सकता है। इसका मूल्य न्यायालयों में नहीं, बल्कि घरों, खेतों और अस्पतालों में चुकाना पड़ेगा।

नई परिभाषा के समर्थकों का तर्क है कि स्पष्टता आवश्यक है ताकि अस्पष्टता कम हो, दुरुपयोग रोका जा सके और विकास परियोजनाओं को गति मिले। उनका कहना है कि व्यापक संरक्षण का कभी-कभी मनमाने ढंग से उपयोग हुआ है, जिससे वैध परियोजनाएँ अटकती रही हैं। यह चिंता पूरी तरह निराधार नहीं है। पर्यावरणीय शासन पारदर्शी, साक्ष्य-आधारित और न्यायसंगत होना चाहिए। किंतु प्रशासनिक अस्पष्टता का समाधान पारिस्थितिक विस्मृति नहीं हो सकता। स्पष्टता का उद्देश्य संरक्षण को सशक्त करना होना चाहिए, न कि उसे खोखला करना।

यह बहस एक गहरी संरचनात्मक समस्या को भी उजागर करती है—भारत में पर्यावरण संरक्षण को अब भी अक्सर बाधा के रूप में देखा जाता है, निवेश के रूप में नहीं। अरावली बंजर भूमि नहीं है जिसे ‘उपयोगी’ बनाने के लिए बदला जाए; यह जीवित अवसंरचना है। जल सुरक्षा, जलवायु सहनशीलता और सार्वजनिक स्वास्थ्य के रूप में जो सेवाएँ यह प्रदान करती है, उनकी भरपाई कृत्रिम उपायों से आसान नहीं है। जब नीति निर्माण में पर्यावरणीय परिसंपत्तियों का मूल्य कम आँका जाता है, तो तात्कालिक आर्थिक लाभ दीर्घकालिक सामाजिक हानि में बदल जाते हैं।

राजनीतिक स्तर पर इस मुद्दे ने तीखी प्रतिक्रियाएँ पैदा की हैं, जो पर्यावरणीय संरक्षण में संभावित ढील को लेकर बढ़ती सार्वजनिक चिंता को दर्शाती हैं। किंतु विमर्श को दलगत राजनीति से ऊपर उठना होगा। आवश्यकता एक ऐसे विज्ञान-आधारित और सहभागी ढाँचे की है, जो भू-आकृतिक स्वरूप के साथ-साथ पारिस्थितिक कार्यों को भी महत्व दे। रिमोट सेंसिंग, जीआईएस मानचित्रण और जलवैज्ञानिक मॉडलिंग जैसे आधुनिक उपकरण ऊँचाई से परे उच्च पारिस्थितिक मूल्य वाले क्षेत्रों की पहचान में सहायक हो सकते हैं। संरक्षण को तब सटीक रूप से अनुकूलित किया जा सकता है, न कि कमजोर।

उतना ही महत्वपूर्ण है प्रभावी प्रवर्तन। सबसे सशक्त परिभाषाएँ भी तब निष्प्रभावी हो जाती हैं जब जमीनी स्तर पर निगरानी कमजोर हो। अरावली में प्रतिबंधों के बावजूद अवैध खनन का जारी रहना इस बात का संकेत है कि समस्या परिभाषा से अधिक संस्थागत कमजोरी की है। स्थानीय प्रशासन को मजबूत करना, वन और खनन विभागों को सशक्त बनाना तथा भूमि उपयोग परिवर्तन में पारदर्शिता सुनिश्चित करना किसी भी संरक्षण रणनीति की अनिवार्य शर्त है।

अंततः अरावली विवाद भारत के पर्यावरणीय भविष्य से जुड़ा एक बड़ा प्रश्न उठाता है—क्या नीतियाँ संकीर्ण तकनीकी मानकों से संचालित होंगी या पारिस्थितिक विवेक से? जलवायु अनिश्चितता, जल संकट और तीव्र शहरीकरण के इस दौर में गलती की गुंजाइश बेहद कम है। प्राचीन पहाड़ियाँ राजनीतिक कार्यकालों में पुनर्जीवित नहीं की जा सकतीं; एक बार समतल हो जाने पर वे सदा के लिए खो जाती हैं।

परिभाषा का उद्देश्य वास्तविकता को स्पष्ट करना होना चाहिए, न कि उसे मिटा देना। विकास के मार्ग पर आगे बढ़ते भारत के लिए आवश्यक है कि अरावली को केवल मानचित्र पर ऊँचाइयों के रूप में नहीं, बल्कि क्षेत्र के पर्यावरणीय और मानवीय इतिहास से जुड़ी जीवनरेखा के रूप में देखा जाए। नीति निर्माताओं के सामने विकल्प स्पष्ट है—पूरे तंत्र का संरक्षण करें या उसके क्रमिक लोप के साक्षी बनें। इतिहास तय करेगा कि कौन-सी परिभाषा वास्तव में राष्ट्रीय हित में थी।

डॉ सत्यवान सौरभ