उपराष्ट्रपति ने वैश्विक चुनौतियों के बावजूद परिधान निर्यातकों के लचीलेपन की सराहना की

0

भारत के उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने आज नई दिल्ली में आयोजित परिधान निर्यात संवर्धन परिषद (एईपीसी) के वार्षिक पुरस्कार समारोह में भाग लिया और भारत के परिधान निर्यात क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले पुरस्कार विजेताओं को बधाई दी।

सभा को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि परिधान एवं वस्त्र क्षेत्र भारत की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बना हुआ है, जो 4.5 करोड़ से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार प्रदान करता है और 1 करोड़ से अधिक लोगों की आजीविका को अप्रत्यक्ष रूप से सहारा देता है। उन्होंने बताया कि यह क्षेत्र सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगभग दो प्रतिशत का योगदान देता है और विनिर्माण क्षेत्र के सकल मूल्य वर्धित (जीवीए) में लगभग 11 प्रतिशत का योगदान देता है।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने पीएम मित्र पार्क और समर्थ कौशल विकास कार्यक्रम जैसी प्रगतिशील नीतियों और योजनाओं के माध्यम से वस्त्र और परिधान उद्योग को मजबूत और बहुआयामी समर्थन प्रदान किया है। उन्होंने आगे कहा कि प्रधानमंत्री ने इस क्षेत्र को वैश्विक शक्ति के रूप में विकसित करने के उद्देश्य से एक वृहद विजन 2030 प्रस्तुत किया है।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सरकारी पहलें तभी अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त करती हैं जब उद्योग जगत के भागीदार नवाचार और दृढ़ संकल्प के साथ प्रतिक्रिया देते हैं।

वैश्विक चुनौतियों से भरे इस युग में भारत के परिधान निर्यातकों द्वारा उल्लेखनीय लचीलापन और प्रगति प्रदर्शित करने पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि सरकार इस क्षेत्र द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियों को हल करने के लिए सक्रिय रूप से चर्चाओं और पहलों में लगी हुई है, जिसमें चल रही मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) वार्ताएं भी शामिल हैं।

उपराष्ट्रपति ने परिधान उद्योग से एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे नए बाजारों का सक्रिय रूप से पता लगाने का आग्रह किया। उन्होंने उद्योग से मूल्यवर्धन पर ध्यान केंद्रित करने, निर्यात उत्पादों में विविधता लाने, आयात पर निर्भरता कम करने, नवाचार और अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहित करने और टिकाऊ निर्यात को बढ़ावा देने का भी आह्वान किया।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि वस्त्र उद्योग श्रम प्रधान है और कृषि के बाद देश में रोजगार का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत है। उन्होंने उद्योग जगत में श्रमिकों के कल्याण को सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र के निर्यात में दोगुनी वृद्धि होने की उम्मीद है, जिससे रोजगार के महत्वपूर्ण अतिरिक्त अवसर सृजित होंगे। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि परिधान क्षेत्र विकसित और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने में अग्रणी भूमिका निभाएगा।

वस्त्र उद्योग से अपने घनिष्ठ संबंध को रेखांकित करते हुए, उपराष्ट्रपति ने बताया कि वे भारत के होजरी और निटवेअर के प्रमुख केंद्र तिरुप्पुर से आते हैं और उन्होंने इस क्षेत्र के विकास को करीब से देखा है। उन्होंने संसद सदस्य और वाणिज्य संबंधी संसदीय स्थायी समिति के अंतर्गत वस्त्र उपसमिति के सह-अध्यक्ष के रूप में अपने अनुभव को याद किया, जिसने उन्हें इस क्षेत्र की चुनौतियों का अध्ययन करने और नीतिगत अनुशंसाओं में योगदान देने में सक्षम बनाया।

उन्होंने सरकार और उद्योग के बीच एक सेतु के रूप में एईपीसी की भूमिका की भी प्रशंसा की और “थ्रेड्स ऑफ टाइम: स्टोरी ऑफ इंडियाज टेक्सटाइल्स” नामक इसकी कॉफी टेबल बुक का विमोचन किया।

दिल्ली सरकार के उद्योग मंत्री श्री मनजिंदर सिंह सिरसा, एईपीसी के अध्यक्ष श्री सुधीर सेखरी, एईपीसी के उपाध्यक्ष डॉ. ए. शक्तिवेल और वस्त्र एवं परिधान उद्योग के अन्य विशिष्ट अतिथि इस अवसर पर उपस्थित हुए।

सीएम धामी के औचक निरीक्षण में थानेदार अनुपस्थित, लाइन हाजिर

0

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने देहरादून स्थित डालनवाला पुलिस स्टेशन के औचक निरीक्षण के दौरान थानेदार के ड्यूटी से अनुपस्थित पाए जाने पर तत्काल प्रभाव से उन्हें लाइन हाजिर करने के निर्देश दिए। मुख्यमंत्री ने कड़े शब्दों में कहा कि कानून व्यवस्था और जनसेवा जैसे संवेदनशील दायित्वों में किसी भी स्तर की लापरवाही अक्षम्य अपराध है और ऐसे मामलों में तत्काल एवं कठोर कार्रवाई की जाएगी।निरीक्षण के दौरान मुख्यमंत्री ने थाने में स्थित कारागार में गंदगी और अव्यवस्था पर गहरी नाराज़गी व्यक्त की और तत्काल समुचित साफ-सफाई एवं मानकों के अनुरूप व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि पुलिस थाने की स्थिति ही शासन-प्रशासन की कार्यसंस्कृति को दर्शाती है।

विभिन्न बैठकों के उपरांत मुख्यमंत्री धामी अचानक पुलिस स्टेशन पहुंचे और वहां की संपूर्ण कार्यप्रणाली का गहन निरीक्षण किया। मुख्यमंत्री के औचक निरीक्षण से पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया और मौके पर व्यवस्थाओं की वास्तविक स्थिति सामने आई।

निरीक्षण के दौरान मुख्यमंत्री ने पुलिस स्टेशन में आए कई शिकायतकर्ताओं से सीधे बातचीत की और उनकी समस्याओं को गंभीरता से सुना। उन्होंने पुलिसकर्मियों को निर्देश दिए कि शिकायतों को औपचारिकता नहीं बल्कि उत्तरदायित्व समझकर दर्ज किया जाए तथा उनका तत्काल, निष्पक्ष और प्रभावी समाधान सुनिश्चित किया जाए।

मुख्यमंत्री महिला हेल्प डेस्क पर भी पहुंचे और वहां मौजूद महिला फरियादियों से बातचीत कर उनकी शिकायतों की जानकारी ली। उन्होंने महिला सुरक्षा से जुड़े मामलों में संवेदनशीलता, गोपनीयता और त्वरित कार्रवाई को अनिवार्य बताते हुए किसी भी प्रकार की ढिलाई पर सख़्त कार्रवाई की चेतावनी दी।

मुख्यमंत्री ने एफआईआर रजिस्टर का विस्तृत निरीक्षण करते हुए दर्ज मामलों पर की गई कार्रवाई, फॉलोअप की स्थिति तथा लंबित प्रकरणों की जानकारी ली। इसके साथ ही उन्होंने ड्यूटी रजिस्टर और उपस्थिति रजिस्टर का भी निरीक्षण कर कर्मियों की जिम्मेदारी और जवाबदेही तय करने के निर्देश दिए।

मुख्यमंत्री ने वाहन जांच अभियान, वेरिफिकेशन ड्राइव तथा अपराध नियंत्रण को लेकर चल रही कार्रवाई की समीक्षा करते हुए स्पष्ट निर्देश दिए कि इन अभियानों में किसी भी प्रकार की शिथिलता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। साथ ही क्षेत्र की ट्रैफिक व्यवस्था पर गंभीर असंतोष व्यक्त करते हुए उन्होंने विस्तृत जांच कर जिम्मेदारी तय करने के आदेश दिए।

मुख्यमंत्री के निर्देश पर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) देहरादून तत्काल पुलिस स्टेशन पहुंचे और मौके पर स्थिति का जायजा लेकर आवश्यक अनुशासनात्मक कार्रवाई प्रारंभ की।

मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी का सख्त शब्दों में कहा कि “ कानून व्यवस्था से जुड़ा प्रत्येक अधिकारी और कर्मचारी जनता के प्रति जवाबदेह है। जनसेवा में लापरवाही, अनुशासनहीनता या संवेदनहीनता किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं की जाएगी। पुलिस व्यवस्था में सुधार, पारदर्शिता और जवाबदेही हमारी सर्वाेच्च प्राथमिकता है। जनहित में सख्त से सख़्त कार्रवाई करने से सरकार पीछे नहीं हटेगी।”

मुख्यमंत्री धामी ने हरिद्वार में ‘मशरूम ग्राम’ का शुभारंभ किया

0

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हरिद्वार जनपद के बुग्गावाला में एमबी फूड्स द्वारा विकसित ‘मशरूम ग्राम’ का शुभारंभ किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि यह पहल किसानों की आय बढ़ाने, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त करने और कृषि क्षेत्र में नवाचार को प्रोत्साहित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। मुख्यमंत्री ने एमबी फूड्स की टीम के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि मशरूम उत्पादन कम भूमि, कम जल और कम समय में अधिक लाभ देने वाला प्रभावी उद्यम है, जिससे किसान अतिरिक्त आय अर्जित कर सकते हैं।

श्री धामी ने कहा कि इस परियोजना के माध्यम से स्थानीय युवाओं और महिलाओं को स्वरोज़गार के नए अवसर प्राप्त होंगे तथा स्वयं सहायता समूहों को भी आर्थिक मजबूती मिलेगी। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि ‘मशरूम ग्राम’ मॉडल राज्य के अन्य क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणास्रोत बनेगा और कृषि आधारित उद्यमिता को नई दिशा प्रदान करेगा।

मुख्यमंत्री ने बताया कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत देशभर के 11 करोड़ किसानों को आर्थिक सहायता दी जा रही है, जिसमें उत्तराखण्ड के लगभग 9 लाख किसान भी लाभान्वित हो रहे हैं। साथ ही न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना और मृदा स्वास्थ्य कार्ड जैसी योजनाओं से किसानों को व्यापक लाभ मिल रहा है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि किसान मानधन योजना, मिलेट मिशन, बागवानी विकास मिशन, कृषि यंत्र सब्सिडी, बूंद-बूंद सिंचाई योजना और डिजिटल कृषि मिशन जैसी योजनाएं किसानों को सशक्त बना रही हैं। उन्होंने कहा कि इस वर्ष के बजट में किसान क्रेडिट कार्ड की सीमा को तीन लाख रुपये से बढ़ाकर पाँच लाख रुपये करना किसानों के पक्ष में एक ऐतिहासिक निर्णय है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार भी किसानों के उत्थान के लिए पूरी प्रतिबद्धता के साथ कार्य कर रही है। फार्म मशीनरी बैंक योजना के अंतर्गत कृषि उपकरणों पर 80 प्रतिशत तक सब्सिडी, तीन लाख रुपये तक ब्याजमुक्त ऋण तथा नहरों से मुफ्त सिंचाई की सुविधा दी जा रही है। उन्होंने बताया कि किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से पॉलीहाउस निर्माण हेतु 200 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है, जिसके तहत अब तक लगभग 350 पॉलीहाउस स्थापित किए जा चुके हैं।

उन्होंने कहा कि गेहूं खरीद पर प्रति क्विंटल 20 रुपये का बोनस, गन्ने के दामों में 30 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि, नई सेब नीति, कीवी नीति, स्टेट मिलेट मिशन और ड्रैगन फ्रूट नीति जैसी योजनाएं राज्य में कृषि और बागवानी को नई ऊंचाइयों तक ले जा रही हैं। इसके साथ ही ‘महक क्रांति’ के माध्यम से सुगंध फसलों की खेती को बढ़ावा देकर हजारों किसानों को प्रत्यक्ष लाभ पहुंचाया जा रहा है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि ‘हाउस ऑफ हिमालयाज’ ब्रांड के माध्यम से राज्य के स्थानीय कृषि उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का कार्य किया जा रहा है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इन सभी प्रयासों से उत्तराखण्ड कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनेगा और किसानों की समृद्धि सुनिश्चित होगी।

कार्यक्रम के अंत में मुख्यमंत्री ने बुग्गावाला और हरिद्वार क्षेत्र के नागरिकों से सरकार के प्रयासों में सहयोग की अपील करते हुए कहा कि जनसहभागिता के माध्यम से ही देवभूमि उत्तराखण्ड को कृषि सहित सभी क्षेत्रों में अग्रणी राज्य बनाया जा सकता है।

कार्यक्रम में कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी, विधायक प्रदीप बत्रा, जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक सहित सभी जनपद स्तरीय अधिकारी तथा बड़ी संख्या में स्थानीय नागरिक उपस्थित थे।

गोरखपुर में रेलमार्ग पर निर्मित एक नए रेल उपरिगामी सेतु का लोकार्पण

0

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जनपद गोरखपुर में रेल ओवर ब्रिज के लोकार्पण अवसर पर

−−−−−

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आज जनपद गोरखपुर में गोरखपुर-लखनऊ
रेलमार्ग पर 138 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित एक नए रेल
उपरिगामी सेतु का लोकार्पण किया।
इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए कहा कि आज
गोरखपुर में आवागमन के लिए गाेरखनाथ ब्रिज के समानांतर एक और रेल उपरिगामी
उपलब्ध हो गया है। इससे गाेरखपुर महानगरवासियों को जनपद महाराजगंज,
सिद्धार्थनगर, बलरामपुर और नेपाल जाने के लिए एक नया मार्ग उपलब्ध हो गया है।
600 मीटर से अधिक लम्बा यह उपरिगामी सेतु अत्याधुनिक तकनीक पर आधारित है।
इसका निर्माण सेतु निगम ने एक वर्ष में किया है। इस सेतु पर पर्याप्त प्रकाश की
उपलब्धता के साथ साउण्ड बैरियर भी लगाए गए हैं। इसके दोनों तरफ नागरिकों के
लिए फुटपाथ का निर्माण किया गया है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि विकास तब होता है, जब हमारी साेच सकारात्मक होती
है। जब विरासत और विकास की सोच वाली डबल इंजन सरकार आती है, तो विकास
भी तीव्र गति से आगे बढ़ता है। विकास ही परिवर्तन का कारक बनता है और आम
जनमानस की धारणा को बदलता है।

मुख्यमंत्री जी ने कहा कि आज उत्तर प्रदेश के सामने पहचान का संकट नहीं है।

उत्तर प्रदेश, एक नई आभा के साथ विकास के क्षेत्र में देश मे अपनी एक नई पहचान
बना रहा है। उत्तर प्रदेश विकास और विरासत का एक नया केंद्र बना है। आज
गोरखपुर जल जमाव, माफिया, मच्छर एवं बीमारी से मुक्त है। आठ वर्ष पूर्व गाेरखपुर में
बुनियादी सुविधाओं का अभाव था। उत्तर प्रदेश के नागरिकों को प्रदेश के बाहर हेय
दृष्टि से देखा जाता था, लाेगाें के सामने पहचान का संकट था। आज डबल इंजन
सरकार ने अभूतपूर्व परिवर्तन करके दिखाया है। यह कार्य तभी होता है जब जनता का
सहयोग प्राप्त हाेता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि गोरखपुर में पहले जहां जाम लगता था, आज वहां
फोर लेन सड़काें के कारण यातायात आसान हो गया है। बरगदवां से लेकर स्पोट्र्स
कॉलेज होते हुए माेहद्दीपुर तक की सड़क 4-लेन में परिवर्तित हो चुकी है। गाेरखपुर
से लखनऊ जाने के लिए लिंक एक्सप्रेस-वे के रूप में एक नया मार्ग प्राप्त हो चुका है।
आज बेहतरीन कनेक्टिविटी के कारण गाेरखपुर से वाराणसी जाने में केवल ढाई से तीन
घण्टे तथा लखनऊ जाने में तीन से साढे़ तीन घण्टे का समय लगता है। अब गोरखपुर में
हर्बर्ट बांध पर भी मार्ग का निर्माण हो रहा है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि आज गाेरखपुर में एम्स भी है एवं फर्टिलाइजर कारखाना
भी पुनः संचालित हो गया है। गाेरखपुर में एम्स, बीआरडी मेडिकल कॉलेज
अत्याधुनिक स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ उपचार के केंद्र के रूप में स्थापित हुए हैं।
रामगढ़ताल गोरखपुर में पर्य टन का एक नया बेहतरीन गन्तव्य बना है। गाेरखपुर में हर
प्रकार की अवस्थापना सुविधाओं का निर्माण किया जा रहा है। बिजली, पानी,
कनेक्टिविटी, सफाई आदि की बेहतरीन सुविधा गोरखपुर में सुनिश्चित की जा चुकी है।
इन्सेफेलाइटिस जैसी बीमारी का उन्मूलन किया जा चुका है। यह नए भारत के नए
उत्तर प्रदेश का नया गोरखपुर है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि प्रदेश के अन्य जनपदों मे भी विकास के सभी प्रकार के
कार्यों को लगातार आगे बढ़ाया जा रहा है, क्योंकि सरकार की नीयत साफ है। आज
विकास के कारण अयोध्या अपनी भव्यता से त्रेतायुग जैसी अयोध्या का एहसास कराती
है। वाराणसी आज भारत की आध्यात्मिक नगरी के रूप में दुनिया को अपनी ओर
आकर्षित कर रही है। आज बनारस प्रधानमंत्री के सपनों का बनारस है। प्रयागराज
का त्रिवेणी संगम भी अत्याधुनिक सुविधाओं के साथ सबको अपनी ओर आकर्षित कर
रहा है। महाकुम्भ में चीन और भारत की जनसंख्या के बाद सबसे ज्यादा आबादी
प्रयागराज में आई थी। महाकुम्भ में जो भी आया उसने उत्तर प्रदेश का गुणगान किया।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि यह सभी कार्य एक सकारात्मक प्रयास क े कारण ही
सम्भव हुए हैं। डबल इंजन सरकार ने प्रदेश को एक नई पहचान व सम्मान दिलाने का
कार्य किया है। आज से 08 वर्ष पूर्व प्रदेश में माफियाराज हावी था। आज ‘एक जनपद
एक उत्पाद’ एवं ‘एक जनपद एक मेडिकल कॉलेज’ प्रदेश की पहचान हैं। आज प्रत्येक
जनपद में एक मेडिकल कॉलेज की उपलब्धता सुनिश्चित की गयी है। कुशीनगर,

देवरिया, महाराजगंज, सिद्धार्थनगर, बस्ती, बलरामपुर, बहराइच, गा ेण्डा, अयोध्या,
अम्बेडकरनगर, सुल्तानपुर, अमेठी, आजमगढ,़ गाजीपुर, चंदौली, सोनभद्र, मीरजापुर आदि
अन्य सभी जनपदों में एक मेडिकल कॉलेज के निर्माण का कार्य सुनिश्चित किया गया
है। बलिया में भी मेडिकल कॉलेज का निर्माण हो रहा है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि प्रदेश का पैसा प्रदेश के विकास में लगाया जा रहा है।
आज सड़क, पुल, मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज के निर्माण एवं अन्य विकास
कार्य के रूप में यह पैसा दिखाई दे रहा है। प्रदेश में वृद्धा को वृद्धावस्था पेंशन एवं
निराश्रित महिलाओं को पेंशन दी जा रही है। दीपावली और होली में निःशुल्क गैस
सिलेण्डर रिफिल दिए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना के माध्यम से गरीब
परिवार की बेटी के जन्म से लेकर शिक्षा तक की व्यवस्था प्रदेश सरकार कर रही है।

मुख्यमंत्री जी ने कहा कि प्रदेश सरकार द्वारा ठण्ड से बचाव के लिए सार्वजनिक
स्थानों पर अलाव की व्यवस्था की गई है। जरूरतमंदों को कम्बल वितरित किए जा रहे
हैं। फुटपाथ पर कोई भी न सोए, रैन बसेरों की व्यवस्था की गई है। इस दिशा में हर
जनपद तत्परता से कार्य कर रहा है। उन्होंने नागरिकों से अनुरोध किया कि अधि
ठण्ड में अनावश्यक यात्रा न करें और स्वास्थ्य सम्बन्धी किसी भी तरह की परेशानी होने
पर चिकित्सीय परामर्श अवश्य लें।
कार्यक्रम को सांसद श्री रवि किशन शुक्ल तथा गोरखपुर के महापौर डॉ. मंगलेश
श्रीवास्तव न भी सम्बोधित किया।
इस अवसर पर जनप्रतिनिधिगण तथा शासन-प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

जल का विस्मरण : आधुनिकता, अहंकार और सूखती हुई धरती

0

– डॉ सत्यवान सौरभ

भारत के समकालीन संकटों में जल सबसे अधिक चर्चित है, पर सबसे कम समझा गया भी। सूखा, बाढ़, गिरता भूजल, प्रदूषित नदियाँ—इन सबको हम अलग-अलग घटनाओं की तरह देखते हैं, जबकि ये एक ही कहानी के अलग अध्याय हैं। यह कहानी प्राकृतिक आपदा की नहीं, बल्कि मानवीय विस्मृति की है। हमने जल को केवल संसाधन समझ लिया और उसके साथ जुड़ी स्मृति, संस्कार और संवेदना को त्याग दिया।

बाँध बनाकर पानी को ज़मीन के ऊपर रोकने का विचार आधुनिक विकास की सबसे बड़ी भ्रांतियों में से एक है। यह व्यवस्था प्रकृति के स्वभाव के विरुद्ध खड़ी की गई है। जल का स्वभाव ठहरना नहीं, उतरना है—धरती की कोख में समाना, वहाँ से जीवन को पोषित करना। तालाब, जोहड़, कुएँ और बावड़ियाँ इसी स्वभाव की अभिव्यक्ति थे। वे पानी को रोकते नहीं थे, सहेजते थे। यही कारण है कि वे समय-सिद्ध और स्वयं-सिद्ध व्यवस्थाएँ थीं, जिन्होंने लाखों वर्षों तक मानव सभ्यता का साथ दिया।

आज हम बाँधों को विकास का प्रतीक मानते हैं, जबकि तालाबों को पिछड़ेपन की निशानी समझते हैं। यह दृष्टि का पतन है। एक समय पंजाब में सत्रह हज़ार से अधिक तालाबों का उल्लेख मिलता है। वे केवल जलस्रोत नहीं थे, बल्कि सामुदायिक जीवन के केंद्र थे—पशुओं, खेतों, पक्षियों और मनुष्यों को जोड़ने वाले जीवित स्थल। आज स्थिति यह है कि तालाब तो दूर, पंजाब में शामलात ज़मीनों तक का समुचित रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं। जब स्मृति मिटा दी जाती है, तो संकट अपरिहार्य हो जाता है।

हमारे पुरखे जानते थे कि बाढ़ विनाश नहीं, अवसर है। वे जानते थे कि यदि बाढ़ का पानी फैलकर तालाबों, जोहड़ों और मैदानों में उतरे, तो वही पानी धरती को पुनर्जीवित करेगा। इसलिए तालाबों से मिट्टी निकालने की परंपराएँ थीं—कोई इसे श्रमदान कहता था, कोई सामाजिक कर्तव्य। तालाब गहरे होते थे, उनकी कोख विस्तृत होती थी और वे वर्षा के अधिकतम जल को आत्मसात कर लेते थे। यह एक ऐसी व्यवस्था थी जिसमें तकनीक नहीं, समझ काम करती थी।

विडंबना यह है कि जिन हाथों ने तालाबों को पाटा, जोहड़ों को भर दिया और कुओं को कचरे से बंद कर दिया, वही हाथ आज पानी के लिए आसमान की ओर देख रहे हैं। तालाबों को मारने वाले जब स्वयं मरने लगते हैं, तो दोष प्रकृति पर, जलवायु परिवर्तन पर या पूर्वजों पर मढ़ दिया जाता है। आत्मालोचना का साहस अब दुर्लभ होता जा रहा है।

यह संकट केवल जल का नहीं, शिक्षा का भी है। मैं अक्सर सोचता हूँ कि ठीक से शिक्षित होने का अर्थ क्या है। क्या यह केवल डिग्रियाँ, आंकड़े और तकनीकी शब्दावली है? नहीं। ठीक से शिक्षित होने का अर्थ है सामवेदी होना—भगवत्ता द्वारा प्रदत्त पूरे इकोसिस्टम से एकात्म होना। जब मनुष्य स्वयं को प्रकृति से अलग मानने लगता है, तब उसका ज्ञान चतुराई बन जाता है और चतुराई अंततः विनाश की ओर ले जाती है। शेष सब तो बकलोली के ही परिष्कृत रूप हैं।

देश में जल-प्रबंधन की स्थिति का अंदाज़ा इसी एक तथ्य से लगाया जा सकता है कि आज तक ऐसा कोई विस्तृत, विश्वसनीय और समग्र सर्वेक्षण नहीं हो सका है, जिससे यह पता चले कि भारत में वास्तव में कुल जल कितना है। हम योजनाएँ बनाते हैं, बजट स्वीकृत करते हैं और घोषणाएँ करते हैं—बिना यह जाने कि आधार क्या है। यह नीति नहीं, अनुमान है; और अनुमान पर खड़ा विकास देर-सवेर ढहता ही है।

भूजल-दोहन की तस्वीर तो और भी भयावह है। पंजाब में लगभग साढ़े सत्रह लाख और हरियाणा में लगभग नौ लाख सबमर्सिबल धरती के गर्भ से पानी उलीच रहे हैं। धरती मानो सबमर्सिबलों की शर-शय्या पर लेट चुकी है। बिना किसी इच्छा-मृत्यु के वरदान के, हम उसे प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा मार रहे हैं। यह हरियाली की कीमत पर रची गई एक मौन त्रासदी है, जो आने वाले समय में विकराल रूप धारण करेगी।

पर्यावरण की कीमत पर होने वाला विकास उसी डाल पर बैठने जैसा है, जिसे हम स्वयं काट रहे हैं। यह स्थिति कालिदास की कथा की याद दिलाती है—जहाँ मूर्खता को विद्वत्ता का आवरण ओढ़ा दिया जाता है। चौड़ी सड़कें, ऊँची इमारतें और चमकदार परियोजनाएँ हमें प्रगति का भ्रम देती हैं, जबकि भीतर से ज़मीन सूख रही होती है। यह विकास नहीं, सजाया हुआ विनाश है।

शहर इस विफलता के सबसे स्पष्ट उदाहरण हैं। आधुनिक विद्या-केन्द्रों और नीति-निर्माताओं के पास आज भी कोई समग्र दृष्टि नहीं है, जिसके अनुसार भारतीय शहरों में जल-निकासी, जल-संरक्षण, गंदगी के उत्पादन में कमी और उत्पन्न गंदगी के उपयोग का कोई राष्ट्रीय ढाँचा हो। बारिश में शहर डूबते हैं और गर्मियों में वही शहर प्यास से कराहते हैं। यह विरोधाभास व्यवस्था की नहीं, दृष्टि की असफलता का प्रमाण है।

नदियों की हालत इस कहानी का सबसे मार्मिक अध्याय है। प्रदूषित नदियों की सूची इतनी लंबी हो चुकी है कि उसे पढ़ते हुए ऐसा लगता है मानो हम किसी मृतकों की नामावली देख रहे हों। जिन नदियों ने सभ्यताओं को जन्म दिया, आज वे हमारी लापरवाही की शिकार हैं। हम उन्हें माँ कहते हैं, पर व्यवहार ऐसा करते हैं मानो वे अनंत सहनशील हों। यह सांस्कृतिक पाखंड अब अपनी सीमा पर पहुँच चुका है।

अभी कुछ ही दशक पहले तक भारत के शहर, गाँव, चरागाहें, खेत, जंगल, तालाब, कुएँ और बावड़ियाँ जीवन से भरे हुए थे। यह कोई आदर्शीकृत अतीत नहीं, बल्कि सामाजिक स्मृति का तथ्य है। उस समय संसाधन सीमित थे, पर समझ व्यापक थी। समुदाय था, सहभागिता थी और प्रकृति के साथ सहजीवन का भाव था। सरकारी विकास कार्यक्रमों ने इस सामाजिक चरित्र को छिन्न-भिन्न कर दिया। योजनाएँ बढ़ीं, पर समाज सिकुड़ गया।

आज आवश्यकता इस बात की है कि जल-प्रबंधन को केवल इंजीनियरों और योजनाकारों के हवाले न छोड़ा जाए। यह प्रश्न तकनीकी से अधिक नैतिक और सांस्कृतिक है। तालाबों का पुनर्जीवन, जोहड़ों की वापसी, वर्षा-जल संचयन और सामुदायिक भूमि की रक्षा—ये सब भविष्य की खोज नहीं, अतीत की स्मृति हैं। हमें पीछे लौटना नहीं, बल्कि याद करना है।

जल कोई वस्तु नहीं, एक संबंध है—मनुष्य और प्रकृति के बीच। जब यह संबंध टूटता है, तो आपदाएँ जन्म लेती हैं। समय अभी भी है, पर चेतावनी स्पष्ट है। यदि हमने जल के साथ अपना रिश्ता नहीं सुधारा, तो इतिहास हमें उस पीढ़ी के रूप में याद रखेगा, जिसने अपनी ही धरती को प्यास से मार दिया।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,

पर्यावरण संकट : नीतियों से नहीं, नागरिक चेतना से बचेगी प्रकृति

0

सरकारों की विफलता के साथ-साथ हमारी जीवन-शैली भी पर्यावरण विनाश की सबसे बड़ी ज़िम्मेदार है। 

पेड़ लगाने की बात आए तो उत्साह केवल सरकारी अभियानों और फोटो अवसरों तक सीमित रह जाता है। वृक्षारोपण दिवस पर पौधे लगाए जाते हैं और अगले दिन भुला दिए जाते हैं। संरक्षण की जिम्मेदारी कोई नहीं लेता। यही कारण है कि आँकड़ों में लाखों पौधे लगते हैं, पर धरातल पर जंगल घटते जाते हैं। एक पुरानी कहावत है—मनुष्य जीवन भर नौ मन लकड़ी लेकर जाता है, तो कम से कम अपने पीछे नौ मन पेड़ छोड़ जाना चाहिए। यह कहावत आज के समय में कहीं अधिक प्रासंगिक है। हम अपने जीवन में जितने संसाधन उपभोग करते हैं, क्या उनके बराबर कुछ लौटाने का प्रयास करते हैं?

— डॉ. प्रियंका सौरभ

पर्यावरण संरक्षण की बहस अक्सर एक सुविधाजनक दिशा में मोड़ दी जाती है—सरकारें नीतियाँ नहीं बनातीं, मंत्रालय निष्क्रिय हैं, क़ानून काग़ज़ों तक सीमित हैं। यह आलोचना पूरी तरह ग़लत नहीं है। केंद्रीय और राज्य स्तर पर पर्यावरण मंत्रालयों का रिकॉर्ड देखें तो विकास परियोजनाओं के सामने प्रकृति अक्सर सबसे पहले बलि चढ़ती दिखती है। जंगलों की कटाई, नदियों का प्रदूषण, ज़हरीली हवा और भूजल का संकट—इन सबके लिए नीतिगत विफलता ज़िम्मेदार है। पर यह अधूरा सच है। पूरा सच यह है कि पर्यावरण संकट की जड़ें हमारी अपनी जीवन-शैली में गहरी धँसी हुई हैं।

हमने पर्यावरण को सरकार का विषय मान लिया है, जैसे वह नागरिक जीवन से अलग कोई विभागीय फाइल हो। यह मानसिकता ही सबसे बड़ा संकट है। हवा, पानी, मिट्टी और जंगल किसी मंत्रालय की संपत्ति नहीं, बल्कि सामूहिक उत्तरदायित्व हैं। जब नागरिक स्वयं को इस उत्तरदायित्व से अलग कर लेता है, तब कोई भी नीति प्रभावी नहीं रह जाती।

आज प्रदूषण का बड़ा हिस्सा किसी कारख़ाने से नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के घरेलू व्यवहार से पैदा हो रहा है—अत्यधिक निजी वाहन, बेहिसाब प्लास्टिक, अनियंत्रित कचरा, पानी और बिजली की फिजूलखर्ची। हम सुविधाओं को अधिकार मानते हैं और उनके दुष्परिणामों को व्यवस्था की समस्या। यही सोच पर्यावरण को धीरे-धीरे बर्बादी की ओर धकेल रही है।

भारत जैसे विकासशील देश में पर्यावरण संरक्षण को अक्सर विकास विरोधी बताकर खारिज कर दिया जाता है। यह एक कृत्रिम और भ्रामक बहस है। सच्चाई यह है कि प्रकृति का विनाश स्वयं विकास के ख़िलाफ़ है। बाढ़, सूखा, गर्मी की चरम लहरें, जल संकट और बीमारियाँ—ये सब उसी “विकास” की देन हैं, जो प्रकृति के संतुलन को नज़रअंदाज़ करता है।

लेकिन इस बहस में भी नागरिक की भूमिका गौण बना दी जाती है। हम यह नहीं पूछते कि हमारे विकास के मॉडल में हमारी व्यक्तिगत आदतें कितनी ज़िम्मेदार हैं। क्या हर छोटी दूरी के लिए कार निकालना ज़रूरी है? क्या हर शादी, समारोह और त्योहार में अनावश्यक दिखावा आवश्यक है? क्या एकल-उपयोग प्लास्टिक के बिना जीवन असंभव है? इन सवालों से हम बचते हैं, क्योंकि इनके जवाब हमें असहज करते हैं।

पर्यावरण संरक्षण केवल क़ानूनों और नियमों से संभव नहीं। यह नागरिक चरित्र और सामाजिक संस्कार का प्रश्न है। जिन देशों में पर्यावरणीय अनुशासन दिखाई देता है, वहाँ केवल सख़्त क़ानून नहीं, बल्कि नागरिकों की आदतें भी अनुशासित हैं। भारत में समस्या यह है कि हम अधिकारों को लेकर अत्यंत सजग हैं, पर कर्तव्यों को लेकर लगभग उदासीन।

हम अपने घर के बाहर गंदगी फैलाने में संकोच नहीं करते, पर स्वच्छता की अपेक्षा सरकार से करते हैं। हम नदियों को पूजा के नाम पर प्रदूषित करते हैं, फिर उनकी सफ़ाई के लिए आंदोलन करते हैं। यह विरोधाभास हमारी सामाजिक मानसिकता को उजागर करता है।

पेड़ लगाने की बात आए तो उत्साह केवल सरकारी अभियानों और फोटो अवसरों तक सीमित रह जाता है। वृक्षारोपण दिवस पर पौधे लगाए जाते हैं और अगले दिन भुला दिए जाते हैं। संरक्षण की जिम्मेदारी कोई नहीं लेता। यही कारण है कि आँकड़ों में लाखों पौधे लगते हैं, पर धरातल पर जंगल घटते जाते हैं।

एक पुरानी कहावत है—मनुष्य जीवन भर नौ मन लकड़ी लेकर जाता है, तो कम से कम अपने पीछे नौ मन पेड़ छोड़ जाना चाहिए। यह कहावत आज के समय में कहीं अधिक प्रासंगिक है। हम अपने जीवन में जितने संसाधन उपभोग करते हैं, क्या उनके बराबर कुछ लौटाने का प्रयास करते हैं?

आज पेड़ लगाना कोई महान कार्य नहीं रहा, बल्कि एक न्यूनतम नैतिक दायित्व बन चुका है। इसके बावजूद हम इसे टालते हैं। जगह, समय, पानी और देखभाल—हर चीज़ का बहाना हमारे पास है। सच्चाई यह है कि हमने सुविधा को प्राथमिकता और ज़िम्मेदारी को बोझ मान लिया है।

पेड़ न लगाना केवल पर्यावरणीय लापरवाही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के जीवन के साथ अन्याय है। यह एक ऐसा अपराध है, जिसकी सज़ा हमारे बच्चे चुकाएँगे—गंदी हवा, जहरीला पानी और असुरक्षित भविष्य के रूप में।

यह कहना भी सही नहीं होगा कि सरकारों की कोई भूमिका नहीं है। पर्यावरणीय क़ानूनों का सख़्ती से पालन, परियोजनाओं का ईमानदार पर्यावरणीय आकलन, प्रदूषकों पर कठोर दंड और स्थानीय निकायों को सशक्त करना—ये सब अनिवार्य हैं। पर इतिहास गवाह है कि जब समाज निष्क्रिय हो, तब सबसे अच्छे क़ानून भी निष्प्रभावी हो जाते हैं।

स्वच्छ भारत अभियान इसका उदाहरण है। जहाँ नागरिकों ने भागीदारी दिखाई, वहाँ परिणाम दिखे। जहाँ इसे केवल सरकारी योजना समझा गया, वहाँ स्थिति जस की तस रही। पर्यावरण संरक्षण भी इसी सिद्धांत पर काम करेगा।

पर्यावरण संकट का समाधान किसी एक बड़े निर्णय में नहीं, बल्कि लाखों छोटे नागरिक निर्णयों में छिपा है। घर-घर कचरा पृथक्करण, वर्षा जल संचयन, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग, ऊर्जा-सक्षम उपकरण, स्थानीय स्तर पर वृक्षारोपण—ये सभी कदम साधारण हैं, पर प्रभावशाली हैं।

स्कूलों और विश्वविद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रखकर व्यवहार में उतारना होगा। बच्चों को प्रकृति से जोड़ना होगा, ताकि वे केवल जानकारी नहीं, संवेदना भी विकसित करें। मीडिया और सामाजिक संगठनों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है। पर्यावरण को केवल आपदा या दिवस के रूप में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की चिंता के रूप में प्रस्तुत करना होगा।

अंततः पर्यावरण संकट का सबसे ईमानदार उत्तर हमें स्वयं से पूछना होगा—हम प्रकृति को क्या दे रहे हैं? जब तक यह प्रश्न हर नागरिक के मन में नहीं उठेगा, तब तक नीतियाँ आती-जाती रहेंगी और प्रकृति चुपचाप नष्ट होती रहेगी।

प्रकृति किसी मंत्रालय की जिम्मेदारी नहीं, यह हमारे सामूहिक चरित्र की परीक्षा है। और इस परीक्षा में अब तक हम असफल ही रहे हैं। अब भी समय है—यदि हम सच में विकास चाहते हैं, तो उसे प्रकृति के साथ सामंजस्य में गढ़ना होगा, वरना आने वाली पीढ़ियाँ हमें कभी माफ़ नहीं करेंगी।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

सर्दी का सितम और कोहरे का कोहराम

0

                             बाल मुकुन्द ओझा

सर्दियों का मौसम आते ही उत्तर भारत समेत देश के कई हिस्सों में घना कोहरा लोगों की दिनचर्या को प्रभावित करने लगता है। इस समय उत्तर भारत के अधिकांश हिस्से कोहरे की चादर में लिपटे हुए हैं। यहां इतना घना कोहरा छाया हुआ है कि सामने का रास्ता तक दिखाई नहीं दे रहा है। घने कोहरे के कारण जनजीवन को पूरी तरह से थम गया है। शून्य दृश्यता होने के कारण यातायात प्रभावित हो रहे हैं। दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश समेत कई हिस्सों में कोहरा इतना गहरा है कि सड़क से लेकर हवाई यातायात प्रभावित हो रहा है। मौसम विभाग ने दिल्ली में रेड अलर्ट तो यूपी, बिहार, पंजाब समेत कई राज्यों के विभिन्न जिलों में ऑरेंज अलर्ट जारी किया है। लोगों को सलाह दी गई है कि सड़कों पर यात्रा करते हुए वाहनों की गति धीमी रखें और लाइट जलाकर रखें, ताकि कोहरे के कारण होने वाले हादसों से बचा जा सकें।

कोहरा और सर्दी का चोली दामन का साथ है। बोलचाल की भाषा में धरातल पर बादल निर्माण की क्रिया को कोहरा कह सकते है। इस समय देश के कई प्रदेशों में कड़ाके की ठण्ड और सर्दी बढ़ गई है तो वहीं कोहरा भी लोगों को परेशान करने लगा है। सर्दियों के मौसम में कोहरा आम बात है। इसकी वजह से थम जाती है रोजमर्रा की रफ्तार। सर्दी  के मौसम के साथ ही देश में कोहरे की समस्या से भी दो दो हाथ करने पड़ते है।

मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार कोहरा वास्तव में हवा में तैरती पानी या फिर बर्फ की बहुत ही महीन बूंदें हैं। नम ठंडी हवा का संपर्क जब ऊष्णता से होता है तो कोहरा बन जाता है। कोहरा धरती के बिलकुल करीब आ चुके बादल हैं। जब आर्द्र हवा ऊपर उठकर ठंडी होती है तब जलवाष्प संघनित होकर जल की सूक्ष्म बूंदें बनाती है। कभी-कभी अनुकूल परिस्थितियों में हवा के बिना ऊपर उठे ही जलवाष्प जल की नन्हीं बूंदों में बदल जाती है तब हम इसे कोहरा कहते हैं। तकनीकी रूप से बूंदों के रूप में संघनित जलवाष्प के बादल को कोहरा कहा जाता है। सर्दियों में कैसे बनता है कोहरा?  सर्दियों के मौसम में उत्तर भारत के कई राज्य कोहरे की मोटी चादर में ढक जाते हैं । इसकी वजह से न केवल राहगीरों को बल्कि ट्रेन ड्राइवरों और एयरोप्लेंस के पायलटों तक को रास्ता ठीक से नहीं दिखाई देता। घने कोहरे के चलते लोगों को सुबह के वक्त गाड़ियों की लाइट जलानी पड़ती है । कोहरे के कहर ने सडकों पर दौड़ते वाहनों की न सिर्फ रफ्तार थम गयी बल्कि वाहनों में यात्रा करने बाले यात्रियों को दुर्घटनाओं का डर सताने लगा | वैसे तो इस मौसम में कोहरा पड़ना आम बात है लेकिन आखिर सर्दियों में इतना कोहरा आता कहाँ से है? देश के  महानगरों में सर्दियों में ऊषाकाल एवं प्रातःकाल मे नमी वाले दिनों मे ऐसा कोहरा प्रायः छा जाता है। क्योंकि वायुमण्डल में धुआँ धूल एवं अन्य कण जल कणों को स्थिर रखने के लिए उपस्थित रहते है। इससे साइकिल या मोटर साइकिल चालक के कपडे़ नम हो जाते हैं। गांवों के मुकाबले शहरों में कोहरा अध‍िक घना होता है क्योंकि शहरों की हवा में धूल और धुएं के कण अध‍िक होते हैं। ये कोहरे में मौजूद पानी की बूंदों के साथ मिलकर इसे गहरा बना देते हैं।

कोहरा के बारे में बताया जाता है यह अच्छा और बुरा दोनों है। कोहरा अधिक समय तक न रहे और सूर्योदय के बाद जल्द खत्म हो जाए तो फसल तथा पौधों के लिए बहुत फायदेमंद होता है। इससे फसलों में नमी बनी रहती है। पानी में ऊष्माधारण क्षमता अधिक होती है और कोहरे में पानी की बूंदें होती हैं, इसलिए कोहरा होने पर टेम्प्रेचर माइल्ड रहता है, जो फसलों को लाभ पहुंचाता है। जमीन पर रेंगने वाले कई जीव खासकर रेगिस्तानी इलाकों में रहने वाले कोहरे से मिलने वाली पानी की बूंदों पर ही जीवित रहते हैं। तटीय इलाकों में रहने वाले कई लोग खेतों में फॉग नेट लगाते हैं, ताकि कोहरे से पानी की बूंदें टूटकर फसलों पर गिरें। सैनिक कोहरे का फायदा उठाकर दुश्मनों को चकमा देते हैं।

कोहरे से हर साल हजारों फ्लाइट और ट्रैन कैंसिल होती हैं। सैकड़ों ट्रेन समय पर नहीं चल पातीं। दुर्घटनाओं में कई लोगों की जान चली जाती है। व्यापार की रफ्तार धीमी होती है। इन सबसे अरबों रुपए का घाटा होता है। कोहरा छंटने के बाद कई बार शीत-लहर शुरू हो जाती है। अचानक तापमान गिरने से पाला पड़ने की आशंका होती है, जो फसलों को नष्ट कर देता है।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी  32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

पीएम ने सशस्त्र सीमा बल के जवानों को स्थापना दिवस की बधाई दी

0

प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने सशस्त्र सीमा बल के स्थापना दिवस पर उससे जुड़े सभी कर्मियों को हार्दिक बधाई दी है।

प्रधानमंत्री ने कहा कि एसएसबी का अटूट समर्पण सेवा की सर्वोच्च परंपराओं को दर्शाता है और कर्तव्य की उनकी भावना राष्ट्र की सुरक्षा का एक मजबूत स्तंभ बनी हुई है। उन्होंने कहा कि चुनौतीपूर्ण भूभागों से लेकर ऑपरेशन की कठिन परिस्थितियों तक, एसएसबी हमेशा सतर्क रहती है।

प्रधानमंत्री ने एक्‍स पर लिखा;

“मैं सशस्त्र सीमा बल के स्थापना दिवस पर, इस बल से जुड़े सभी कर्मियों को हार्दिक बधाई देता हूं। एसएसबी का अटूट समर्पण सेवा की सर्वोच्च परंपराओं को दर्शाता है। कर्तव्य की उनकी भावना हमारे राष्ट्र की सुरक्षा का एक मजबूत स्तंभ बनी हुई है। चुनौतीपूर्ण भूभागों से लेकर ऑपरेशन की कठिन परिचालन परिस्थितियों तक, एसएसबी हमेशा सतर्क रहती है। उनके आगे के प्रयासों में उन्हें शुभकामनाएं।

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने सशस्त्र सीमा बल (SSB) के सभी जवानों और उनके परिवारों को स्थापना दिवस की बधाई दी।

X प्लेटफॉर्म पर एक पोस्ट में केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा सशस्त्र सीमा बल (SSB) के सभी जवानों और उनके परिवारों को स्थापना दिवस की बधाई। उन्होंने कहा कि हमारी सीमाओं की रक्षा करने से लेकर संकट के समय नागरिकों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहने तक सशस्त्र सीमा बल ने हमेशा देश को गौरवान्वित किया है। अपने कर्तव्य का पालन करते हुए सर्वोच्च बलिदान देने वाले शहीदों को सलाम।

प्रसिद्ध भारतीय शास्त्रीय नृत्यांगना यामिनी कृष्णमूर्ति : जीवन, साधना और योगदान

0


भारतीय शास्त्रीय नृत्य परंपरा को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने वाली महान नृत्यांगनाओं में यामिनी कृष्णमूर्ति का नाम अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने नृत्य को केवल कला का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे साधना, अनुशासन और आध्यात्मिक अनुभूति का स्वरूप प्रदान किया। उनकी नृत्य शैली में शुद्धता, सौंदर्य और भावाभिव्यक्ति का ऐसा अद्भुत संगम दिखाई देता है, जिसने दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। वे भारतीय सांस्कृतिक विरासत की सशक्त प्रतिनिधि रहीं।
यामिनी कृष्णमूर्ति का जन्म बीस दिसंबर उन्नीस सौ चालीस को तमिलनाडु के चिदंबरम नगर में हुआ। उनका परिवार विद्वान और सांस्कृतिक वातावरण से जुड़ा हुआ था। बचपन से ही उन्हें कला, संगीत और नृत्य के प्रति आकर्षण था। परिवार ने उनकी रुचि को पहचाना और उन्हें शास्त्रीय नृत्य की विधिवत शिक्षा दिलाने का निर्णय लिया। यही निर्णय उनके जीवन की दिशा तय करने वाला सिद्ध हुआ।
उन्होंने बहुत कम आयु में नृत्य की शिक्षा आरंभ कर दी थी। उन्हें भारत के प्रसिद्ध गुरुओं से प्रशिक्षण प्राप्त हुआ। उन्होंने भरतनाट्यम और कुचिपुड़ी जैसे शास्त्रीय नृत्य रूपों में गहन साधना की। कठोर अभ्यास, अनुशासन और गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण उनके प्रशिक्षण की विशेषता रही। वे घंटों अभ्यास करती थीं और नृत्य की सूक्ष्म से सूक्ष्म बारीकियों को आत्मसात करती थीं।
यामिनी कृष्णमूर्ति ने जब मंच पर पहली बार प्रस्तुति दी, तभी यह स्पष्ट हो गया था कि वे साधारण नृत्यांगना नहीं हैं। उनकी देह की भंगिमाएं, नेत्रों की भाषा, मुद्राओं की शुद्धता और भावों की गहराई दर्शकों को गहराई से प्रभावित करती थी। उनके नृत्य में सौंदर्य के साथ-साथ गंभीरता और आध्यात्मिक भाव भी स्पष्ट रूप से झलकता था।
उन्होंने भरतनाट्यम नृत्य शैली को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उनकी प्रस्तुति में शास्त्रीय मर्यादा का पूर्ण पालन होता था, साथ ही उसमें नवीनता और सजीवता भी दिखाई देती थी। उन्होंने कुचिपुड़ी नृत्य को भी विशेष पहचान दिलाई। इन दोनों नृत्य शैलियों में उनकी समान दक्षता उन्हें अन्य कलाकारों से अलग बनाती है।
यामिनी कृष्णमूर्ति ने भारत ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी भारतीय शास्त्रीय नृत्य का व्यापक प्रचार किया। उन्होंने अनेक देशों में मंच प्रस्तुतियां दीं और भारतीय संस्कृति की गरिमा को विश्व के सामने प्रस्तुत किया। उनकी नृत्य प्रस्तुतियों ने विदेशी दर्शकों को भारतीय दर्शन, परंपरा और सौंदर्यबोध से परिचित कराया। वे सांस्कृतिक दूत के रूप में भारत का गौरव बनीं।
उनके योगदान के लिए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्मविभूषण जैसे सर्वोच्च नागरिक सम्मानों से सम्मानित किया गया। ये सम्मान न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियों का प्रतीक हैं, बल्कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य की प्रतिष्ठा को भी दर्शाते हैं। इसके अतिरिक्त उन्हें कई सांस्कृतिक संस्थानों और सभाओं द्वारा भी सम्मान प्रदान किया गया।
यामिनी कृष्णमूर्ति केवल एक महान नृत्यांगना ही नहीं, बल्कि एक श्रेष्ठ गुरु भी थीं। उन्होंने अपने ज्ञान और अनुभव को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए नृत्य प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना की। उनके शिष्य आज देश और विदेश में भारतीय शास्त्रीय नृत्य का प्रचार कर रहे हैं। गुरु और शिष्य परंपरा को उन्होंने पूरी निष्ठा और आदर के साथ निभाया।
निजी जीवन में यामिनी कृष्णमूर्ति अत्यंत अनुशासित और सरल स्वभाव की थीं। उनका जीवन कला और साधना को समर्पित था। वे मानती थीं कि नृत्य केवल मंच प्रदर्शन नहीं, बल्कि आत्मा की अभिव्यक्ति है। इसी विचारधारा ने उन्हें जीवनभर प्रेरित किया। उन्होंने कभी भी कला से समझौता नहीं किया और शुद्धता को सर्वोच्च स्थान दिया।
अपने जीवन के अंतिम वर्षों तक वे नृत्य और कला से सक्रिय रूप से जुड़ी रहीं। वे विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों, संगोष्ठियों और कार्यशालाओं में भाग लेती थीं और युवाओं को मार्गदर्शन देती थीं। उनका व्यक्तित्व प्रेरणास्रोत था और उनकी उपस्थिति मात्र से ही वातावरण में गरिमा का संचार हो जाता था।
यामिनी कृष्णमूर्ति का निधन तीस अगस्त दो हजार चौबीस को हुआ। उनके निधन से भारतीय कला जगत को अपूरणीय क्षति पहुंची। हालांकि वे शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं रहीं, लेकिन उनकी कला, शिक्षाएं और योगदान सदैव जीवित रहेंगे। वे आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का अमर स्रोत हैं।
समग्र रूप से यामिनी कृष्णमूर्ति भारतीय शास्त्रीय नृत्य की एक उज्ज्वल ज्योति थीं। उनका जीवन परिचय समर्पण, साधना और सांस्कृतिक गौरव की कहानी है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सच्ची कला समय और सीमाओं से परे होती है। भारतीय नृत्य परंपरा में उनका स्थान सदैव सर्वोच्च रहेगा और उनका नाम श्रद्धा के साथ स्मरण किया जाता रहेगा।(चेटजीपीजी)

भारतीय सिनेमा की प्रसिद्ध अभिनेत्री नलिनी जयवंत

0


भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम युग में जिन अभिनेत्रियों ने अपनी सशक्त अभिनय प्रतिभा, गरिमामय व्यक्तित्व और सजीव अभिव्यक्ति से दर्शकों के मन पर अमिट छाप छोड़ी, उनमें नलिनी जयवंत का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने अपने अभिनय से न केवल नायिका की पारंपरिक छवि को सुदृढ़ किया, बल्कि संवेदनशील और सशक्त स्त्री पात्रों को भी नई पहचान दी। उनका जीवन संघर्ष, साधना और सिनेमा के प्रति समर्पण का अनुपम उदाहरण है।
नलिनी जयवंत का जन्म चौदह फरवरी उन्नीस सौ छब्बीस को मुंबई में हुआ। उनका परिवार शिक्षित और सांस्कृतिक मूल्यों से परिपूर्ण था। बचपन से ही उनमें कला के प्रति विशेष रुचि दिखाई देती थी। संगीत, नृत्य और अभिनय की ओर उनका झुकाव स्वाभाविक था। परिवार ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उनकी प्रारंभिक शिक्षा मुंबई में ही हुई, जहां उन्होंने अध्ययन के साथ-साथ रंगमंच और सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी की।
फिल्मी दुनिया में उनका प्रवेश किशोरावस्था में ही हो गया था। आरंभिक दौर में उन्हें छोटे और सहायक भूमिकाएं मिलीं, किंतु उनकी सहज अभिनय शैली और प्रभावशाली उपस्थिति ने शीघ्र ही फिल्म निर्माताओं का ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने जिस भी भूमिका को निभाया, उसमें स्वाभाविकता और गहराई स्पष्ट दिखाई देती थी। धीरे-धीरे वे मुख्य नायिका के रूप में स्थापित होने लगीं।
नलिनी जयवंत का अभिनय सौंदर्य केवल बाहरी आकर्षण तक सीमित नहीं था। उनकी आंखों की अभिव्यक्ति, संवाद अदायगी और भावनात्मक संतुलन उन्हें अन्य अभिनेत्रियों से अलग पहचान देता था। वे दुख, प्रेम, संघर्ष और आत्मसम्मान जैसे भावों को अत्यंत सजीव ढंग से प्रस्तुत करती थीं। यही कारण था कि दर्शक उनसे भावनात्मक रूप से जुड़ जाते थे।
उनके फिल्मी जीवन की सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में सामाजिक और पारिवारिक कथानक वाली रचनाएं शामिल रहीं। उन्होंने कई ऐसे पात्र निभाए जो उस समय की सामाजिक परिस्थितियों, स्त्री की पीड़ा और उसके आत्मसम्मान को उजागर करते थे। उनकी भूमिकाओं में एक गरिमा और गंभीरता रहती थी, जो दर्शकों को सोचने पर विवश कर देती थी। वे केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं थीं, बल्कि समाज का आईना भी प्रस्तुत करती थीं।
नलिनी जयवंत ने अपने अभिनय करियर में अनेक प्रसिद्ध कलाकारों के साथ काम किया। उनके सह कलाकारों के साथ उनकी जोड़ी को दर्शकों ने खूब सराहा। पर्दे पर उनकी उपस्थिति संतुलित और प्रभावशाली रहती थी। वे कभी भी अपने अभिनय को अतिरंजित नहीं करती थीं, बल्कि सहजता के साथ पात्र में ढल जाती थीं। यही विशेषता उन्हें एक सशक्त अभिनेत्री के रूप में स्थापित करती है।
उनके अभिनय की सराहना आलोचकों द्वारा भी की गई। उन्हें कई बार प्रशंसा और सम्मान प्राप्त हुए। उनकी फिल्मों को न केवल व्यावसायिक सफलता मिली, बल्कि कलात्मक दृष्टि से भी उन्हें महत्वपूर्ण माना गया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सिनेमा में सफलता के लिए केवल बाहरी सौंदर्य नहीं, बल्कि गहन अभिनय क्षमता और अनुशासन भी आवश्यक है।
निजी जीवन में नलिनी जयवंत अत्यंत सादगीपूर्ण और आत्मसम्मान से परिपूर्ण महिला थीं। उन्होंने फिल्मी चकाचौंध से दूर रहकर एक संतुलित जीवन जीना पसंद किया। अभिनय के साथ-साथ वे साहित्य और संगीत में भी रुचि रखती थीं। उनका जीवन अनुशासन और आत्मनियंत्रण का उदाहरण था। उन्होंने कभी भी अनावश्यक विवादों या प्रचार से स्वयं को नहीं जोड़ा।
अपने करियर के उत्कर्ष काल में भी उन्होंने सीमित फिल्मों में काम किया। वे केवल वही भूमिकाएं स्वीकार करती थीं जिनमें उन्हें सार्थकता दिखाई देती थी। इस चयनशीलता के कारण उनका फिल्मी जीवन अपेक्षाकृत संक्षिप्त रहा, किंतु अत्यंत प्रभावशाली रहा। उनकी प्रत्येक भूमिका दर्शकों के मन में स्थायी स्मृति बनकर रह गई।
समय के साथ उन्होंने सिनेमा से दूरी बना ली और शांत जीवन को अपनाया। यह निर्णय उनके आत्मसम्मान और स्वाभाविक प्रवृत्ति को दर्शाता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि कलाकार का मूल्य उसके कार्य से होता है, न कि निरंतर परदे पर बने रहने से। उनके द्वारा निभाए गए पात्र आज भी सिनेमा प्रेमियों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
नलिनी जयवंत का निधन बीस दिसंबर उन्नीस सौ छानवे को हुआ। उनके निधन से भारतीय सिनेमा ने एक संवेदनशील और सशक्त अभिनेत्री को खो दिया। हालांकि वे आज हमारे बीच नहीं हैं, परंतु उनका अभिनय, उनकी फिल्में और उनकी गरिमामय छवि आज भी जीवित है। वे उन अभिनेत्रियों में शामिल हैं जिन्होंने सिनेमा को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया।

समग्र रूप से देखा जाए तो नलिनी जयवंत भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय हैं। उनका जीवन परिचय संघर्ष, साधना और आत्मसम्मान की कहानी है। उन्होंने अपने अभिनय से यह प्रमाणित किया कि सच्ची कला समय की सीमाओं से परे होती है। आज भी जब उनके अभिनय को स्मरण किया जाता है, तो उनके व्यक्तित्व की गरिमा और कला की ऊंचाई स्पष्ट रूप से अनुभव की जा सकती है।(चैटजीपीजी)