बिना नियमित जांच अप्रमाणित सामग्री के आधार पर नहीं ठहराया जा सकता दोषी-हाईकोर्ट

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जयपुर, 14 जनवरी (हि.स.)। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक पुलिस अधिकारी को पदावतन करने से जुड़े मामले में कहा है कि बिना नियमित जांच किए केवल अखबार में प्रकाशित फोटो या अप्रमाणित सामग्री के आधार पर व्यक्ति को दोषी ठहराकर उसे दंडित नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही अदालत ने याचिकाकर्ता एएसआई को पदावनत कर हैड कांस्टेबल बनाने के आदेश को रद्द कर दिया है। हालांकि अदालत ने विभाग को छूट दी है कि वह चाहे तो मामले में नियमानुसार नियमित जांच कर सकता है। जस्टिस गणेश राम मीणा की एकलपीठ ने यह आदेश अजीत मोगा की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि सेवा नियम, 1958 के नियम 19 के उपनियम 2 का प्रयोग अत्यंत असाधारण परिस्थितियों में ही किया जा सकता है। यह प्रावधान विभाग को जांच से बचने का लाइसेंस नहीं देता। समान परिस्थिति में जब एक अधिकारी को राहत दी गई तो दूसरे को दंड देना समानता के अधिकार के भी खिलाफ है।

याचिका में अधिवक्ता मुकेश कुमार ने अदालत को बताया कि जनवरी, 2020 में एक दैनिक समाचार पत्र में कुछ पुलिस अधिकारियों की अपराधियों के साथ मौजूदगी दर्शाते हुए तस्वीरें प्रकाशित हुई थी। इन तस्वीरों के आधार पर पुलिस के आलाधिकारियों ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता आपराधिक तत्वों के संपर्क में है। इसके बाद बिना नियमित विभागीय जाए किए उसे हेड कांस्टेबल पद पर पदावनत कर दिया गया। इसे चुनौती देते हुए कहा गया कि न तो उसे सुनवाई का मौका दिया गया और ना ही प्रकाशित फोटो की फॉरेंसिक जांच कराई गई, जबकि ये फोटो एआई से बनाई जा सकती हैं। वहीं इसी फोटो में दिख रहे पुलिस निरीक्षक जोधा राम को बर्खास्त किया गया था, लेकिन विभागीय अपील में उन्हें राहत दी गई और याचिकाकर्ता की अपील को खारिज कर दिया गया। वहीं राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि ऐसे मामलों में गवाह सामने नहीं आते और विभागीय जांच करना व्यावहारिक नहीं था। इसलिए नियम 19 के उपनियम 2 के तहत कार्रवाई की गई। दोनों पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने पदावनती आदेश को रद्द कर दिया है।

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