रक्तहीन क्रांति के 105 साल

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प्रयाग पाण्डे

भारत की आजादी के लिए हुए जन संघर्षों की विस्तृत शृंखला में 14 जनवरी, 1921 की तारीख को नहीं भुलाया जा सकता । इसी रोज उत्तराखंड की जनता ने अहिंसक सामूहिक प्रतिरोध के बूते न केवल सर्वशक्तिमान ब्रिटिश सत्ता को घुटनों के बल ला दिया, बल्कि पिछले लंबे समय से चली आ रही कुली-बेगार जैसी अमानुषिक कुप्रथा से मुक्ति पा ली थी। उत्तराखंड में कुली-बेगार उन्मूलन आंदोलन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के भारत में प्रारंभ किए गए असहयोग आंदोलन के रूप में अभिव्यक्त हुआ और पूर्णतः सफल रहा। उत्तराखंड को गोरखा सैनिक शासन के जुल्मी शिकंजे से मुक्त करा कर अंग्रेजों ने 1815 में यहां अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था। ब्रिटिश राज कायम होने के बाद बेशक हरिद्वार का ‘दास बाजार’ धीरे-धीरे कमजोर पड़ा, लेकिन अंग्रेज यहां के पूर्ववर्ती राजाओं की भांति गांवों के प्रधानों/ पटवारियों के माध्यम से इस क्षेत्र के काश्तकारों से कुलियों का काम अनवरत लेते रहे। 1815 में यहां ईष्ट इंडिया कंपनी और 1858 में ब्रिटिश शासनकाल में यह कुप्रथा उत्तराखंड के भोले – भाले ग्रामीण काश्तकारों के अपमान और शोषण का औजार बन गई थी। 1863 -73 के दसवें भूमि बंदोबस्त में जे.ओ.बी. बेकट ने बड़ी चालाकी से कुली – बेगार, कुली – उतार और कुली – बर्दायश को भूमि बंदोबस्ती इकरारनामों का हिस्सा बना दिया था।

कुली- बेगार कुप्रथा के तहत यहां के प्रत्येक जमींदार, हिस्सेदार और आसामी को सरकार ने कुली का दर्जा दिया था। जिनके पास भी काश्तकारी की जमीन हो, वे सभी कुली कहलाते थे। भूमिहीन इस कलंक से मुक्त थे। तब पहाड़ में भूमिधर होना सम्मान की नहीं बल्कि ‘कुली’ होने का अभिशाप था। यह कुख्यात कुली प्रथा तीन चरणों में विभक्त थी, जिसे कुली – उतार, कुली – बेगार और कुली- बर्दाश्त कहा जाता था। अंग्रेज साहबों के दौरों और सैर-सपाटों के वास्ते पटवारी कुलियों की मांग तथा कुली बर्दाश्त का रूक्का प्रधानों/ थोकदारों को भेजते थे। कुली -उतार के तहत सरकारी आदेश पर लोगों को सामान ढोने के लिए गांव से उतर कर सड़क में बने पड़ावों में एकत्र होना पड़ता था। दौरे पर आने वाले पुलिस, प्रशासन, जंगलात विभाग एवं सेना के अधिकारियों, सैलानियों, सर्वे दलों और अंग्रेज काश्तकारों का सारा सामान, यहां तक कि कमोड, जूते और ऐसी सामग्री ढोने को मजबूर किया जाता था, जिससे यहां की धर्मभीरु जनता की धार्मिक भावनाएं आहत होती हों। स्कूल, सड़कें, पुल, डाक बंगले और वन विभाग की चौकियां आदि सार्वजनिक उपयोग के निर्माण कार्य भी बेगार द्वारा कराए जाते थे। साहब लोगों के रहने के लिए मुफ्त में टेंट गाड़ना, पानी भरना, उनके जूठे बर्तन साफ करना, उनके घोड़ों के लिए घास और जलावन के लिए ईंधन की व्यवस्था करना आदि छोटे-मोटे काम कुली- बेगार कहलाते थे। जबकि कुली- बर्दाश्त कुप्रथा रसद से जुड़ी थी। इसके अंतर्गत साहब लोगों के दौरों के दौरान पटवारी गांव वालों से घास, लकड़ी, कोयला, अन्न, घी, दूध – दही, अंडा-मुर्गा, दालें, सब्जी, बर्तन और अन्य खाद्य सामग्री मुफ़्त अथवा नाममात्र की कीमत पर लेते थे।

पहाड़ के प्रत्येक गांव में कुली रजिस्टर बनते थे, इन रजिस्टरों में ‘कुलियों’ के नाम कटते और जुड़ते रहते थे। हरेक गांव में कुलियों की संख्या निर्धारित थी। सरकारी आज्ञा पर इन्हें निर्धारित कुली पड़ावों में हर हालत में हाज़िर होना पड़ता था। व्यक्तिगत अथवा पारिवारिक सुख-दुःख, प्रतिकूल मौसम और तीज- त्यौहार, किसी भी परिस्थिति में कुली को बारी से छूट नहीं मिलती थी। बोझा नहीं ढोने वालों को अर्थदंड देना पड़ता था। अंग्रेज साहबों की सुविधा के लिए बेगारी देना उत्तराखंड के लोगों विशेषकर ग्रामीण काश्तकारों के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी था। इस अमानुषिक कुप्रथा से संपूर्ण उत्तराखंड की जनता त्रस्त थी। अपमान सहने को विवश थी। उत्तराखंड में प्रचलित इस अमानुषिक व्यवस्था के विरुद्ध अतीत में अनेक बार विरोध के छुटपुट स्वर मुखरित होते रहे, लेकिन कोई बड़ा जनांदोलन खड़ा नहीं हो पाया था। 1913 में बदरी दत्त पाण्डे ने ‘अल्मोड़ा अखबार’ के संपादक का दायित्व संभाला। इसके बाद उन्होंने इस प्रथा के विरुद्ध लिखना शुरू किया। बदरी दत्त पाण्डे ने लाला चिरंजीलाल और लक्ष्मीदत्त त्रिपाठी के साथ ग्रामीण क्षेत्रों का भ्रमण कर इस कुप्रथा के विरुद्ध जन जागरण अभियान की शुरुआत की।

1904 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस प्रथा को नियम विरुद्ध और गैर कानूनी करार दिया। व्यवस्थापिका सभा में भी इस प्रथा के विरोध में प्रस्ताव पारित हुआ। बावजूद इसके तब उत्तराखंड में तैनात मनबढ़ अंग्रेज अधिकारियों ने इस व्यवस्था को कायम रखा। यही नहीं 1913 में अल्मोड़ा के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर ने अल्मोड़ा शहरवासियों को भी कुली उतार देने के आदेश जारी कर दिए। बोझा नहीं ढोने वालों के ऊपर प्रतिवर्ष दो रुपया कुली-कर लगा दिया गया। रायबहादुर तारा दत्त गैरोला ने प्रांतीय कौंसिल में इस व्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठाई, लेकिन कोई परिणाम नहीं निकला। इस विषय में ब्रिटिश पार्लियामेंट में भी चर्चा हुई। ब्रिटिश पार्लियामेंट में तत्कालीन भारत मंत्री ने यह कह कर अपना पल्ला झाड़ लिया कि यह व्यवस्था अंग्रेजों ने कायम नहीं की है, इसलिए इसे हटाने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। कालांतर में भारत मंत्री के इस वक्तव्य का उत्तराखंड की जनता ने ऐसा प्रतिउत्तर दिया, जिसकी मिसाल दुनिया के इतिहास में कम ही पाई जाती है।

1916 में नैनीताल में कुमाऊं परिषद का गठन हुआ। तब कुमाऊं परिषद को ‘कुमाऊं की कांग्रेस’ कहा जाता था। इसी साल कुमाऊं परिषद का अल्मोड़ा में पहला अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन में कुली-बेगार कुप्रथा के विरोध में प्रस्ताव पास हुआ। इसके बाद गोविंद बल्लभ पन्त, हरगोविंद पन्त और बदरी दत्त पाण्डे ने कुली बेगार व्यवस्था के विरोध में गांव-गांव जन सभाएं करनी प्रारंभ कर दी। 1918 में कुमाऊं परिषद का हल्द्वानी में सम्मेलन हुआ। सम्मेलन की अध्यक्षता रायबहादुर तारा दत्त गैरोला ने की। इस सम्मेलन में ब्रिटिश सरकार को दो साल के भीतर कुली-बेगार प्रथा को बंद करने का नोटिस देने का निर्णय लिया गया। नोटिस में कहा गया कि यदि तय समयावधि में इस प्रथा को नहीं हटाया गया तो उत्तराखंड की जनता सत्याग्रह करेगी। इसी के साथ कुली- बेगार प्रथा के विरुद्ध गांव-गांव जन जागरण अभियान शुरू हो गया।

इसी कालखंड में भारत के राजनैतिक क्षितिज में महात्मा गांधी का पदार्पण हुआ। भारत की राजनीति में गांधी युग की शुरुआत हुई। 1918 में बदरीदत्त पाण्डे कोलकाता गए, वहां उन्होंने महात्मा गांधी से भेंट की और उन्हें उत्तराखंड के इस कुली कलंक से अवगत कराया। 1920 में हरगोविंद पन्त की अध्यक्षता में कुमाऊं परिषद का काशीपुर में अधिवेशन हुआ। अधिवेशन में कुली – उतार उन्मूलन का संकल्प पारित हुआ। इसी साल दिसंबर में कांग्रेस का नागपुर में अधिवेशन हुआ। इस अधिवेशन में बदरीदत्त पाण्डे, भुवनेश्वर पाण्डे, हरगोविंद पन्त, लाला चिरंजीलाल, लक्ष्मण दत्त भट्ट एवं शिवनंदन पाण्डे आदि पहाड़ के 22 नेता नागपुर गए। इन नेताओं ने गांधी जी से अल्मोड़ा आने का आग्रह किया। गांधी जी ने कहा: ‘भाई मुझे बहुत काम है। मेरे कुर्मांचली भाइयों से कह दें कि कुली देना नहीं होता है।’ एक अगस्त,1920 से गांधी जी ने ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध देशव्यापी असहयोग आंदोलन शुरू कर दिया था। उत्तराखंड में असहयोग आंदोलन कुली-बेगार विरोधी आंदोलन के रूप में अभिव्यक्त हुआ। 10 जनवरी,1921 को बदरी दत्त पाण्डे, हरगोविंद पन्त एवं लाला चिरंजीलाल के नेतृत्व में पचास नवयुवकों का दल बागेश्वर को कूच कर गया। 12 जनवरी की रात तक बागेश्वर में हजारों लोग एकत्र हो गए। इसी बीच अल्मोड़ा के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर डब्ल्यू.सी. डाइबिल भी 21 अंग्रेज अधिकारियों और पचास सशत्र पुलिस जवानों के साथ बागेश्वर पहुंच गए थे।

बागेश्वर में विशाल जनसभा हुई, जिसमें पचास हजार से अधिक लोग सम्मिलित हुए।सभा में महात्मा गांधी जी के जयकारे लगे और उन्हें अवतार बताया गया। कुली – बेगार आंदोलन के अन्य नेताओं के अलावा मोहन सिंह मेहता, रामदत्त, जीत सिंह एवं पुरुषोत्तम आदि ने इस विशाल जनसभा को संबोधित किया। सभा में मौजूद सभी लोगों ने मकर संक्रांति के दिन भगवान बागनाथ जी के मंदिर में कुली-बेगार नहीं देने की शपथ ली। सरयू नदी के पवित्र जल को अंजलि में लेकर कुली-बेगार से मुक्ति का संकल्प लिया। सभी प्रधान और मालगुजारों ने कुली -बेगार के रजिस्टर सरयू नदी के पवित्र जल में प्रवाहित कर दिए। कुली-बेगार आंदोलन सफल हुआ। अपार जनशक्ति के सामने अत्याचारी अंग्रेज शासक बौने साबित हुए। बागेश्वर राष्ट्रीय जागृति का केंद्र बन गया। कुली -बेगार आंदोलन की इस सफलता के बाद यहां की जनता ने बड़ी श्रद्धा एवं कृतज्ञता के साथ बदरी दत्त पाण्डे जी को ‘कुमाऊं केसरी’ की उपाधि से विभूषित किया।

महात्मा गाधी के पौत्र एवं साबरमती सत्याग्रहाश्रम के साधक प्रभुदास गांधी ने कुली-बेगार आंदोलन के बारे में लिखा था- ”गांधी जी ने सन 1920 में नागपुर की कांग्रेस में विदेशी सरकार का अन्याय और उत्पीड़न मिटाने के लिए आत्म बल का प्रयोग करने की बात कही थी और शांतिमय असहकार का मंत्र दिया था। किंतु उन्होंने उस समय अपने किसी दूत को अल्मोड़ा भेजा नहीं था। पहाड़ की जुझारू जनता ने शांत, असहयोग के युद्ध की विद्या गांधी जी के नाम पर स्वयं ही सीख ली और रक्तपात की एक भी घटना अपनी ओर से पैदा न होने देने की सावधानी रखते हुए जी-जान से उन्होंने बड़े-बड़े अधिकारियों से मोर्चा लिया। बागेश्वर के पास पुण्य सलिला सरयू में खड़े रह कर अंजलि से सूर्य भगवान को अर्ध्य चढ़ाते हुए, उन्होंने प्रतिज्ञा की कि मर जायेंगे, परन्तु बेगारी जुल्म को जरा भी बर्दाश्त नहीं करेंगे। इन सबका आत्म बल इतना ऊंचा सिद्ध हुआ कि तत्काल बेगारी के असुर को उत्तराखंड से विदा लेनी पड़ी। गांव-गांव में प्रत्येक घर के ऊपर बेगारी की बारी का जो क्रम बना हुआ था, उस क्रम वाली बहियों को सरयू जल में समाधि दे दी गई और ब्रिटिश सेना के गोरे सैनिकों का अत्याचार भी बेगारी को पुनः चालू नहीं करा सका। इस प्रकार भयानक पशुबल के सामने पहाड़ी भाइयों के आत्मबल ने शत प्रतिशत विजय पाई।”

(लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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