जंक फूड ने छीना बचपन हमारा

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May be an image of pasta, chow mein, ramen, fried rice and noodles

बाल मुकुन्द ओझा

दुनियाभर में अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड्स यानि जंक फूड्स के विरोध में आवाज मुखरित होने लगी है। ब्रिटेन ने अपनी आने वाली पीढ़ी की सेहत को ध्यान में रखते हुए जंक फूड्स के विज्ञापनों को लेकर कड़ा कदम उठाने का फैसला किया है। एक ताज़ा मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटेन ने 5 जनवरी से दिन में टीवी और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर जंक  फ़ूड के विज्ञापनों पर पूरी तरह रोक लगा दी है। यह प्रतिबंद उन जंक उत्पादों पर लागु होगा जिनमें फैट, नमक और चीनी की मात्रा अधिक होंगी। अंग्रेज सरकार ने अपने इस निर्णय को मोटापे के खिलाफ निर्णायक कदम बताया है।

हमारे देश की बात करे तो जंक फ़ूड पर यहां किसी तरह की रोक नहीं है। विज्ञापनों की भरमार देखी जा सकती है। जंक फूड ने देश के नौनिहालों से लेकर किशोर, युवा और बुजुर्ग तक को अपने आगोश में ले लिया है।  तीव्र गति से बढ़ते शहरीकरण, व्यस्त जीवन-शैली और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हो रहे बदलाव ने भारत में  लोगों के जीवन-यापन के तरीके को बदल कर रख दिया है। इन बदलावों के फलस्वरूप लोगों ने घर पर खाना पकाने और खाने की आदत में भी बदलाव किया है। महानगरों में  में रहने वाले परिवारों की  तैयार भोजन, फास्ट फूड और जंक फूड पर निर्भरता ज्यादा ही बढ़ गई  है। अब तो इनकी पहुँच घर घर में हो गई है। यह बच्चों के प्रिय नाश्ते में शुमार हो गया है। देखा तो यह गया है पूरा परिवार अल्पाहार में फास्ट फूड का उपयोग करने लगा है। अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड्स को शुगरी ड्रिंक्स, जंक फूड, पैकेज्ड फूड्स आदि विभिन्न नामों से भी जाना जाता है जिसमें खाने के नेचुरल तत्व हटा कर उसे कृत्रिम तत्वों में बदल दिया जाता है।

यह देखा जाता है इस प्रकार के खाध पदार्थों ने घर घर में अपने पांव पसार लिए है। विशेषकर महानगरों के स्कूल, कालेजों और नौकरी करने वाले अधिकतर युवा अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड्स अथवा फास्ट फूड पर चलते हैं, बल्कि यह कहना ज्यादा उचित होगा कि उन्हें इनका चस्का लगा हुआ है। नतीजा बड़ा ही खौफनाक है। इस फूड खाने के आदी युवा ऐसी बीमारियों के शिकार हो रहे हैं जो बुढ़ापे की बीमारियाँ समझी जाती हैं। बाजार में फूड के नाम पर जो चीजें सहज उपलब्ध हैं, उनमें शर्करा और चर्बी तो होती है, लेकिन प्रोटीन लगभग नदारद होती है। यही नहीं, उनमें पड़ने वाले कृत्रिम नमक और प्रिजर्वेटिव्स स्वास्थ्य के लिए जहर जैसे होते हैं। प्रोटीन की कमी उनमें कितनी ही स्वास्थ्य समस्याएँ पैदा करती हैं। इसमें पोषण की कमी होती है और शरीर के तंत्र के लिए हानिकारक होता है। ज्यादातर अल्ट्रा प्रोसेस्ड फूड उच्च स्तर पर वसा, शुगर, लवणता, और बुरे कोलेस्ट्रॉल से परिपूर्ण होते हैं, जो स्वास्थ के लिए जहर होते हैं। इनमें पोषक तत्वों की कमी होती है इसलिए आसानी से कब्ज और अन्य पाचन संबंधी बीमारियों का कारण बनते हैं।

इसके अलावा देश और दुनिया में जंक या फ़ास्ट फ़ूड फूड का उपभोग दिन प्रति दिन बढ़ता ही जा रहा है, जो भविष्य के लिए अच्छा नहीं है। सभी आयु वर्ग के लोग जंक फूड खाना पसंद करते हैं और आमतौर पर, जब वे अपने परिवार के साथ कुछ विशेष समय, जैसे- जन्मदिन, शादी की सालगिरह, आदि का आनंद लेने के दौरान वे इन्हें ही चुनते हैं। वे बाजार में उपलब्ध जंक फूड की विभिन्न किस्मों जैसेय कोल्ड ड्रिंक, वेफर्स, चिप्स, नूडल्स, बर्गर, पिज्जा, फ्रेंच फ्राईस, चाइनीज खाना आदि का प्रयोग करते हैं।

बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के खाद्य उत्पादों ने एक दशक में ही भारतीय बाजारों पर अपना कब्जा जमा लिया है। बड़े होटलों, रेस्ट्रां से लेकर जनरल स्टोर, किराने की दुकानों, थड़ियों और चायपान की दुकानों पर ये उत्पाद आपको आसानी से उपलब्ध हो जायेंगे। इनमें फास्ट फूड ऐसा उत्पाद है जो कुछ ही मिनटों में तैयार हो जाता है। मैगी इसका जीवन्त उदाहरण है। मैगी का उपयोग घर-घर में हो रहा है और बच्चे विशेष रूप से इसे बड़े चाव से खा रहे हैं। जंक फूड आमतौर पर चिप्स, कैंडी, बर्गर, पिज्जा, फ्रेंकी, चाऊमीन, चाकलेट, पेटीज जैसे तले-भुने फास्ट फूड को कहा जाता है। इसके अलावा दुकानों पर लटकने वाली चमकीली थैलियों में लेज, कुरकुरे, चिप्स आदि का सेवन भी घर-घर में धड़ल्ले से हो रहा है।

प्राचीनकाल में हमारे देश में दूध से बनी वस्तुओं का उपयोग होता था। गेहूं, चावल और दालों के देशी उत्पादों का बोलबाला था। देशी उत्पादों के उपयोग से हमारा स्वास्थ्य भी बना रहता और विभिन्न बीमारियों से भी उत्पाद हमारा बचाव करते। मगर धीरे-धीरे पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण हमने विदेशी उत्पादों को अपनाना शुरू कर दिया। रंग-बिरंगी, चमकीली थैलियों के इन उत्पादों ने जल्दी ही हमें अपनी ओर आकर्षित कर लिया।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

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