मानवता के मुखौटे में छिपा एजेंडाः लंदन के खालिस्तानी समर्थक और बांग्लादेश में हिन्दुओं पर अत्याचार

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– कैलाश चन्‍द्र

आज वैश्विक मंच पर कुछ ऐसे समूह सक्रिय हैं जो स्वयं को मानवाधिकारों का ठेकेदार और उत्पीड़ितों की आवाज बताने में पीछे नहीं रहते। लंदन, टोरंटो और यूरोप के कई शहरों में सक्रिय खालिस्तानी समर्थक इसी श्रेणी में आते हैं। ये लोग भारत में कथित अल्पसंख्यक अत्याचारों के नाम पर प्रदर्शन करते हैं, नारे लगाते हैं और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर दबाव बनाने की कोशिश करते हैं लेकिन यही लोग जब बांग्लादेश, पाकिस्तान या अन्य इस्लामी देशों में हिन्दुओं पर हो रहे संगठित अत्याचारों, नरसंहार, बलात्कार और मंदिर विध्वंस की घटनाओं का सामना करते हैं तो उनकी तथाकथित मानवता अचानक मौन धारण कर लेती है।

यह मौन सामान्य नहीं है। यह चयनित संवेदना (Selective Outrage) का परिणाम है, जो किसी नैतिक मूल्य से नहीं उपजा है, यह एक सुनियोजित राजनीतिक एजेंडे से संचालित है। कई बार स्थिति इससे भी आगे बढ़ जाती है, जब बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचारों के विरोध के बजाय ये समूह “जय बांग्लादेश” जैसे नारे लगाते दिखाई देते हैं। यह आचरण स्पष्ट करता है कि इनके लिए मानवाधिकार सार्वभौमिक मूल्य नहीं बल्कि राजनीतिक औजार मात्र है।

सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि लंदन और पश्चिमी देशों में सक्रिय अधिकांश खालिस्तान समर्थक संगठन मानवीय चिंता के लिए खड़े न होकर भारत-विरोधी नैरेटिव को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से खड़े किए गए हैं। इनमें से अनेक लोग अवैध प्रवासी हैं, कुछ स्थानीय वेलफेयर योजनाओं पर निर्भर हैं और कुछ का संबंध छोटे आपराधिक गिरोहों, ड्रग मनी, हवाला और धन-शोधन नेटवर्क से जुड़ा रहा है। जब आर्थिक आधार ही संदिग्ध और अंधेरे स्रोतों से आता हो, तब विचारधारा और राजनीतिक रुख भी उसी दिशा में ढल जाता है। ऐसे में इनकी राजनीति को “मानवाधिकार आंदोलन” कहना सत्य का अपमान होगा। यह वस्तुतः फंडिंग आधारित, एजेंडा चालित और भारत-विरोधी राजनीति है।

इस पूरे तंत्र के पीछे गहरा और खतरनाक गठजोड़ काम करता है, जिसे कई सुरक्षा विश्लेषणों में आईएसआई-खालिस्तानी-इस्लामिस्ट गठजोड़ के रूप में चिन्हित किया गया है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ‘आईएसआई’ लंबे समय से भारत को “हजार घावों से कमजोर करने” की रणनीति पर काम करती रही है। इसी रणनीति के अंतर्गत खालिस्तानी अलगाववादियों को वित्तीय सहायता, प्रचार संसाधन और अंतरराष्ट्रीय मंच उपलब्ध कराए जाते हैं। लंदन और यूरोप में सक्रिय कुछ इस्लामी कट्टरपंथी नेटवर्क और संगठन इन्हें लॉजिस्टिक सहायता देते हैं। इन सभी का साझा उद्देश्य एक ही है- भारत को वैश्विक मंच पर बदनाम करना और उसकी सामाजिक-सांस्कृतिक एकता पर प्रश्नचिह्न लगाना।

ऐसे गठबंधन के लिए बांग्लादेश या पाकिस्तान में हिन्दुओं पर होने वाले अत्याचार कोई मुद्दा नहीं बनते क्योंकि वे इनके “विक्टिम बनाम पर्पट्रेटर” नैरेटिव में फिट नहीं बैठते। इनके वैचारिक ढांचे में मुसलमान सदैव पीड़ित और भारत अथवा हिन्दू समाज सदैव उत्पीड़क के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यदि ये लोग बांग्लादेश में हिन्दू लड़कियों पर हो रहे अत्याचार, परिवारों के कत्लेआम और मंदिर विध्वंस की निंदा करेंगे तो यह पूरा झूठा नैरेटिव ध्वस्त हो जाएगा और इनके इस्लामी सहयोगी उनसे दूरी बना लेंगे।

यही कारण है कि जब बांग्लादेश में हिन्दुओं के गाँव जलाए जाते हैं, महिलाओं के साथ अमानवीय व्यवहार होता है और सैकड़ों परिवार पलायन को मजबूर होते हैं तब ये तथाकथित मानवाधिकार रक्षक चुप रहते हैं। यह चुप्पी उनकी सच्चाई उजागर करती है। उनके लिए मानवाधिकार नहीं बल्कि राजनीतिक गठबंधन और फंडिंग अधिक महत्वपूर्ण है।

अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों जैसे SOAS लंदन, हार्वर्ड और टोरंटो विश्वविद्यालयों में वर्षों से लेफ्ट-इस्लामिस्ट-खालिस्तानी गठजोड़ सक्रिय देखा जा सकता है। इनके सेमिनार, शोधपत्र और अभियानों का केंद्रीय विचार यही होता है कि “भारत एक दमनकारी राष्ट्र है, मुसलमान हमेशा पीड़ित हैं और खालिस्तानी अलगाववादी उनके स्वाभाविक सहयोगी हैं।” इस वैचारिक पूर्वाग्रह के कारण बांग्लादेश या पाकिस्तान में हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार इनके लिए असुविधाजनक सत्य बन जाते हैं। इसलिए या तो इन घटनाओं को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया जाता है या फिर इन पर बोलने वालों को “दक्षिणपंथी” और “नफरत फैलाने वाला” बताकर चुप कराने की कोशिश की जाती है।

लंदन की सड़कों पर “जय बांग्लादेश” के नारे लगाना इसी नैरेटिव हाइजैकिंग का हिस्सा है। इसका उद्देश्य पीड़ित हिन्दू परिवारों की पीड़ा को दबाकर भारत-विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाना है। यह व्यवहार बताता है कि इनकी राजनीति नैतिकता, करुणा या मानवता पर आधारित नहीं है, बल्कि धन, गठबंधन और भारत-विरोधी सोच पर टिकी हुई है।

ऐसे में हम सभी को स्पष्ट रूप से समझना होगा कि लंदन और अन्य पश्चिमी देशों में सक्रिय खालिस्तानी समर्थकों की गतिविधियाँ किसी स्वतःस्फूर्त जनआंदोलन का परिणाम नहीं हैं। यह एक सुनियोजित, फंडेड और राजनीतिक रूप से इंजीनियर किया गया प्रयास है, जिसमें मानवता केवल मुखौटा है। वास्तविक उद्देश्य भारत को बदनाम करना, उसकी सामाजिक एकता को कमजोर करना और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसके विरुद्ध वातावरण बनाना है। अत: इन परिस्‍थ‍ितियों में भारत और विश्व के विवेकशील नागरिकों का दायित्व है कि वे मानवाधिकार के नाम पर चल रहे इस पाखंड को पहचानें और सच्चे पीड़ितों विशेषकर बांग्लादेश और पाकिस्तान में उत्पीड़ित हिन्दुओं की आवाज को मजबूती से उठाएँ।

(लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं।)

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