बिजनाैर में आतंक का पर्याय बन चुके गुलदारों के लिए गन्ने की फसल बनी मुफीद

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बिजनौर, 31 दिसंबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में पिछले पांच वर्षों से आतंक का पर्याय बन चुके गुलदारों का कुनबा गन्ने की फसल में तेजी से फल फूल रहा है। एक जनवरी 2025 से अब तक वन विभाग के अधिकारियों ने लगभग 36 गुलदार और शावकों का रेस्क्यू किया है। जनपद में अब तक 100 से अधिक गुलदार पिंजरे में कैद हो चुके हैं। यही नहीं, तीन वर्षों में कई गुलदार सड़क दुर्घटना, बीमारी या प्राकृतिक मौत का शिकार हो चुके हैं। वही लगातार गुलदार को पकड़े जाने के बाद भी संख्या कम होने का नाम नहीं ले रही है। वन विभाग के आंकड़ों की मानें तो जनपद में 500 से अधिक गुलदार मौजूदा होने की संभावना है।

ग्रामीण इससे कहीं अधिक संख्या बताते हैं। इस सब के पीछे जनपद में बहुतायत होने वाली गन्ने की फसल को मुख्य कारण माना जा रहा है। मादा गुलदार साल में दो बार बच्चों को जन्म देती है। तीन साल में गुलदार का शावक शिकार करने योग्य हो जाता है। इस बीच गन्ने की फसल उसके ठिकाने के रूप में उपयुक्त साबित होती है। इसीलिए जनपद में गुलदारों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। जनपद में लगभग 2 लाख 60 हजार हेक्टेयर में गन्ने की फसल हो रही है जो गुलदारों के लिए वन से भी ज्यादा मुफीद है। गन्ने में रहते हुए आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से गुलदार के लिए शिकार करना आसान होता है। कुत्ते, आवारा पशु तथा खेतों में काम करने वाले मजदूर, किसान उसके आसान शिकार बनते हैं। पिछले तीन-चार सालों में पैदा हुए गुलदार शावकों की पीढ़ी ने जवान होने तक वनों का दीदार भी नहीं किया है और न ही वन क्षेत्र के जीवन संघर्ष से वे वाकिफ हैं।

वन विभाग की टीम गुलदारों से सुरक्षा के उपाय की एक एडवाइजरी का ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार प्रचार प्रसार करती रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में पिंजरे निरंतर लगाए जा रहे हैं। डीएफओ बिजनौर जय सिंह कुशवाहा का कहना है कि जनपद में गन्ने की रकबे के कारण गुलजारों की संख्या लगातार बढ़ी है, पर विभाग द्वारा ग्रामीणों को सुरक्षा एडवाइजरी का भी पालन करने के लिए सचेत किया जा रहा है। जहां गुलदार दिखने की सूचना मिलती है, वहां विभाग द्वारा पिंजरे भी लगाए जा रहे हैं ।

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