आत्महत्या करते विश्व गुरु भारत के ‘गुरुजन ‘                                                                        

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−निर्मल रानी 

मतदाता सूची के संशोधन के लिए देश के कई राज्यों में चलाया जा रहा विवादित विशेष गहन संशोधन (SIR) इन दिनों काफ़ी चर्चा में है। SIR को लेकर कथित तौर पर बरती जा रही अनियमिततायें तो चर्चा में हैं ही साथ ही इस अभियान के दौरान बड़ी संख्या में बूथ लेवल ऑफ़िसर (बीएलओ) की आत्महत्याओं के मामले भी सुर्खियों में हैं। अलग अलग रिपोर्ट्स के मुताबिक़ नवंबर-दिसंबर 2025 में कम से कम 12 से 20 बीएलओ ने आत्महत्या की है, जबकि आत्महत्या सहित हार्ट अटैक व स्ट्रोक आदि से 30 से अधिक बीएलओ की मृत्यु होने का समाचार है। आत्महत्या करने वाले कई बी एल ओ ने भले ही अपने सुसाईड नोट या आत्महत्या से पूर्व जारी अपने वी डी ओ सन्देश में स्पष्ट रूप से काम के भारी दबाव व तनाव की बात क्यों न की हो परन्तु  चुनाव आयोग इन मौतों को SIR से जोड़ने से इंकार करता है और इन्हें “अन्य प्रकार के मामले” बताता है। आयोग ने इन मौतों को लेकर कुछ विपक्षी दलों द्वारा लगाए जा रहे आरोपों को “राजनीतिक” क़रार देते हुये कहा है कि ये मौतें SIR प्रक्रिया से सीधे जुड़ी नहीं हैं, और अधिकांश मामलों की जांच चल रही है।

                      बहरहाल SIR प्रक्रिया व इसी दौरान बूथ लेवल  ऑफ़िसर (बीएलओ) की आत्महत्याओं के सन्दर्भ में एक सबसे अहम बात यह है कि आत्महत्या करने वाले इन बूथ स्तरीय अधिकारियों में अधिकांशतः शिक्षक ही शामिल हैं ? बीएलओ आमतौर पर सरकारी स्कूल शिक्षक ही होते हैं, क्योंकि चुनाव आयोग सरकारी कर्मचारियों, ख़ासकर शिक्षकों को ही इस भूमिका के लिए नियुक्त करता है। तो क्या राष्ट्र निर्माण की धुरी समझे जाने वाले शिक्षक समाज की नौबत अब यहाँ तक आ पहुंची है कि उन्हें आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ रहा है ? वह भी किसी ग़ैर शिक्षण संबंधी कार्य का निर्वहन करते हुये? इन घटनाओं ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या देश के ‘गुरुजनों’ को ऐसी सरकारी ड्यूटी पर लगाना चाहिये जहाँ न केवल उन्हें तनावग्रस्त होना पड़े बल्कि उनकी ड्यूटी के दौरान बाधित होने वाले शिक्षण कार्यों से भी देश के छात्रों का भविष्य प्रभावित हो ?

                   भारत सरकार या चुनाव आयोग की नज़रों में शिक्षक की अहमियत क्या है यह तो सरकार व चुनाव आयोग की उदासीनता से बख़ूबी समझा जा सकता है। परन्तु भारत रत्न ए पी जे अब्दुल कलाम की नज़रों में शिक्षक का महत्व क्या है यह विभिन्न अवसरों पर उन्होंने बयान किया है। अब्दुल कलाम शिक्षकों को समाज का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ मानते थे। वे अक्सर कहते रहते थे कि “शिक्षक राष्ट्र-निर्माता होते हैं” कलाम साहब कहते थे कि “शिक्षक वो नहीं जो छात्र के दिमाग़ में तथ्य ठूँसे, बल्कि एक अच्छा शिक्षक वो है जो छात्र के दिमाग़ में रचनात्मकता की लौ जलाए। शिक्षक का काम सिर्फ़ पढ़ाना नहीं, बल्कि छात्रों के अंदर सपने जगाना और उन्हें पंख देना है।” कलाम साहब का मानना था कि “अगर कोई देश भ्रष्टाचार-मुक्त और सुन्दर मन वाला समाज चाहता है, तो मुझे पूरा यक़ीन है कि समाज के तीन सदस्य इसमें बड़ी भूमिका निभा सकते हैं – माँ, पिता और गुरु।” यहाँ तक कि शिलांग में अपने जीवन के अंतिम क्षणों में दिये गये अपने अंतिम भाषण में भी उन्होंने अपनी एक स्मृति का उल्लेख इन शब्दों में किया था – “मुझे याद है मेरे शिक्षक ने कहा था – अगर तुम अच्छे शिक्षक बनो, तो तुम्हारा छात्र तुम्हें पार कर जाएगा। मैंने यही किया और आज मेरा छात्र (वे IIM शिलांग के छात्रों की ओर इशारा कर रहे थे) मुझे पार कर जाएगा। यह शिक्षक का सबसे बड़ा इनाम है।” कलाम साहब के लिए शिक्षक कोई नौकर नहीं, बल्कि वह राष्ट्र की आत्मा को गढ़ने वाले माली के समान है। वे मानते थे कि एक अच्छा शिक्षक पूरे देश के भविष्य को बदल सकता है। शायद यही वजह थी कि वे स्वयं को भारत रत्न,पूर्व राष्ट्रपति या मिसाईल मैन कहलवाना नहीं बल्कि प्रोफ़ेसर कहलाना ज़्यादा पसंद करते थे। 

                             इस सन्दर्भ में हरियाणा सरकार के हाल ही में लिये गये उस फ़ैसले की प्रशंसा करना ज़रूरी है जिसमें राज्य सरकार ने शिक्षकों को केवल शिक्षण कार्य और शिक्षण से जुड़ी गतिविधियों तक ही सीमित रखने का आदेश जारी किया है। यह फ़ैसला शिक्षा के अधिकार अधिनियम-2009 की धारा 27 के तहत लिया गया है जिसमें चुनाव ड्यूटी, सर्वे, डेटा एंट्री जैसे ग़ैर-शैक्षणिक कार्यों से शिक्षकों को मुक्त कर केवल स्कूलों में उनकी उपस्थिति सुनिश्चित की गई है। ख़बर तो यह है कि यह आदेश वार्षिक परीक्षाओं की तैयारी को ध्यान में रखते हुए जारी किया गया है। परन्तु यदि हरियाणा सहित देश के सभी राज्य इस प्रकार के स्थाई आदेश जारी करें तो सम्भवतः चुनाव,SIR या जनगणना जैसे अन्य विभागों के काम के बोझ से दबकर आत्म हत्या किये जाने जैसी ख़बरों पर ज़रूर विराम लग सकेगा। परन्तु बड़े आश्चर्य की बात है कि ‘गुरु ‘ को लेकर तरह तरह के उपदेश देने व उनके सम्मान का दिखावा करने वाली सरकारों ने आज गुरु को उस अंजाम तक पहुंचा दिया है जहां उन्हें आत्म हत्या करनी पड़ रही है ? आज क्यों नहीं याद आती सरकार को संत कबीर दास की वह वाणी जिसमें उन्होंने कहा था कि -‘गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय। बलिहारी गुरू आपने गोविन्द दियो बताय।। अर्थात गुरू और गोबिंद (भगवान) एक साथ खड़े हों तो किसे प्रणाम करना चाहिए – गुरू को अथवा गोबिन्द को? ऐसी स्थिति में गुरू के श्री चरणों में शीश झुकाना उत्तम है जिनके कृपा रूपी प्रसाद से गोविन्द का दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। या फिर संत कबीर के ही यह वचन कि -गुरू बिन ज्ञान न उपजै, गुरू बिन मिलै न मोष। गुरू बिन लखै न सत्य को गुरू बिन मिटै न दोष।। अर्थात – हे सांसरिक प्राणियों। बिना गुरू के ज्ञान का मिलना असम्भव है। तब तक मनुष्य अज्ञान रूपी अंधकार में भटकता हुआ मायारूपी सांसारिक बन्धनों मे जकड़ा रहता है जब तक कि गुरू की कृपा प्राप्त नहीं होती। मोक्ष रूपी मार्ग दिखलाने वाले गुरू ही हैं। बिना गुरू के सत्य एवं असत्य का ज्ञान नहीं होता। उचित और अनुचित के भेद का ज्ञान नहीं होता फिर मोक्ष कैसे प्राप्त होगा? अतः गुरू की शरण में जाओ। गुरू ही सच्ची राह दिखाएंगे। परन्तु कितना दुःखद है कि गुरु पूर्णिमा व शिक्षक दिवस के अवसर पर गुरु सम्मान का दिखावा करने वाली आज की सरकारों के दौर में विश्व गुरु भारत के ‘गुरुजन ‘ स्वयं आत्महत्या करते दिखाई दे रहे हैं ?                                                                   

 निर्मल रानी

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