बुजुर्गों को संभालो वरना भविष्य में सामाजिक संकट होगा पैदा-हाईकोर्ट

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जयपुर, 09 फ़रवरी (हि.स.)। राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा है कि भारतीय संस्कृति में बुजुर्गों को भगवान का दर्जा दिया जाता है, लेकिन संयुक्त परिवारों के टूटने, शहरीकरण और बदलती जीवन शैली ने वर्तमान में उन्हें असहाय और उपेक्षित बना दिया है। इसके साथ ही अदालत ने राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को कहा है कि वह प्रदेश में संचालित वृद्धाश्रमों का दौरा कर अदालत में 15 फरवरी को रिपोर्ट पेश करे। अदालत ने कहा कि प्राधिकरण देखे की क्या इन वृद्धाश्रमों की इमारत राज्य सरकार ने बनाई है और इनमें रहने वाले क्या वरिष्ठ नागरिक हैं। इसके साथ ही अदालत ने बताने को कहा है कि इनमें पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं मौजूद हैं या नहीं और क्या सरकार इन्हें कोई वित्तीय सहायता दे रही है। जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने यह आदेश लोक उत्थान संस्थान की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि वृद्धाश्रम केवल कागजों में नहीं हो सकते। यहां रहने वाले बुजुर्गों को पूर्ण सम्मान, बेहतर चिकित्सा और सुरक्षा के साथ मानवीय गरिमा के साथ जीने का हक मिलना चाहिए। अदालत ने कहा कि वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल सिर्फ परिवार की नैतिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि संवैधानिक जिम्मेदारी है। अदालत ने कहा कि देश में बुजुर्गों की संख्या तेजी से बढ रही है। देश में महिलाओं की जीवन प्रत्याशा पुरुषों के मुकाबले अधिक है। वहीं तीस फीसदी बुजुर्ग महिलाएं और 28 फीसदी बुजुर्ग पुरुष गंभीर बीमारियों से पीडित हैं। इस आबादी का बड़ा हिस्सा गांवों में रहता है, लेकिन वहां तुलनात्मक रूप से सुविधाएं सीमित हैं। अदालत ने यह भी कहा कि साल 2022 में देश में 10.5 फीसदी सीनियर सिटीजन थे, जो 2050 में बढक़र करीब 20.8 फीसदी हो जाएंगे। इसके अलावा साल 2046 तक देश की बुजुर्ग आबादी 14 साल तक के बच्चों की संख्या से अधिक हो जाएगी। ऐसे में बूढी आबादी को सामाजिक संबल की जरूरत है।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता कपिल प्रकाश माथुर ने अदालत को बताया गया कि जयपुर में 4 वृद्धाश्रम सहित प्रदेश में कुल 31 वृद्धाश्रम संचालित किए जा रहे हैं। इसका विरोध करते हुए याचिकाकर्ता के अधिवक्ता नितिन सोनी ने कहा कि राज्य सरकार कई पुनर्वास केन्द्रों को वृद्धाश्रम बता रही है, जबकि वास्तव में इतने वृद्धाश्रम संचालित नहीं हो रहे हैं। इस पर अदालत ने राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को इस संबंध में रिपोर्ट पेश करने को कहा है। जनहित याचिका में वरिष्ठ नागरिक कल्याण अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए जनहित याचिका दायर की गई है। पूर्व में अदालत ने दिशा-निर्देश जारी करते हुए इसका निस्तारण कर दिया था, लेकिन बाद में पालना नहीं होने पर अदालत ने मामले में पेश अवमानना याचिका को पुन: जनहित याचिका के तौर पर सुनना तय किया था।

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