वित्‍त मंत्री सीतारमण 9वीं बार पेश करेंगी बजट

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इन मुख्य आंकड़ों पर रहेगी नजर

नई दिल्‍ली, 31 जनवरी (हि.स)। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण रविवार, एक फरवरी को लगातार 9वीं बार केंद्रीय बजट पेश कर एक रिकॉर्ड बनाने जा रही हैं। इस बार सभी की निगाहें बहुप्रतीक्षित सीमा शुल्क सुधारों पर टिकी होंगी। सीतारमण ने 2019 में अपने पहले केंद्रीय बजट में दशकों से चले आ रहे चमड़े के ब्रीफकेस की जगह लाल कपड़े में लिपटे पारंपरिक ‘बही-खाता’ का अनुकरण किया था। पिछले 4 वर्षों की तरह इस साल का बजट भी कागज रहित रूप में पेश किया जाएगा।

सीतारमण ऐसे समय में बजट पेश करने जा रही हैं, जब भारत जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और अगामी दो वर्षों में तीसरी बड़ी इकोनॉमी बनने की ओर बढ़ रहा है। वहीं, कई गंभीर आर्थिक चुनौतियां भी सरकार के सामने खड़ी हैं। आइए जानते हैं कि केंद्रीय बजट पेश करते वक्त वित्त मंत्री के सामने कौन-सी बड़ी चुनौतियां होंगी-

राजकोषीय घाटा: सरकार के कुल खर्च और आय के बीच का अंतर राजकोषीय घाटा कहलाता है। चालू वित्त वर्ष 2025-26 के लिए इसके जीडीपी के 4.4 फीसदी पर रहने का अनुमान जताया गया है। केंद्रीय बजट में 4.5 फीसदी से नीचे का लक्ष्य हासिल करने के बाद बाजार अब कर्ज जीडीपी अनुपात में कमी की दिशा में आगे बढ़ने के लिए सटीक आंकड़ों का इंतजार कर रहा है। ऐसे में उम्मीद है कि सरकार अगामी वित्त वर्ष 2026-27 के लिए चार फीसदी के राजकोषीय घाटे की घोषणा कर सकती है।

पूंजीगत व्यय: चालू वित्त वर्ष 2025-26 के लिए सरकार का नियोजित पूंजीगत व्यय 11.2 लाख करोड़ रुपये तय किया गया है। निजी क्षेत्र के निवेशकों की सावधानी को देखते हुए सरकार आगामी केंद्रीय बजट में बुनियादी ढांचे पर खर्च को बनाए रख सकती है और इसमें 10-15 फीसदी की वृद्धि कर सकती है। यह राशि 12 लाख करोड़ रुपये से अधिक होने की संभावना है।

कर्ज की रूपरेखा: वित्त मंत्री ने वित्‍त वर्ष 2024-25 के बजट भाषण में कहा था कि वित्त वर्ष 2026-27 से राजकोषीय नीति का प्रयास केंद्र सरकार के कर्ज को जीडीपी के फीसदी के रूप में कम करने का होगा। बाजार यह देखना चाहेगा कि सरकार कर्ज-जीडीपी अनुपात को कब तक 60 फीसदी के लक्ष्य तक लाने की बात कहती है। 2024 में यह अनुपात 85 फीसदी था, जिसमें केंद्र का हिस्सा 57 फीसदी था।

उधारी: वित्त वर्ष 2025-26 में सरकार की सकल उधारी का केंद्रीय बजट 14.80 लाख करोड़ रुपये था। सरकार अपने राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए बाजार से कर्ज लेती है। उधारी का आंकड़ा देश की आर्थिक सेहत और राजस्व संग्रह की स्थिति का संकेत देता है।

कर राजस्व: वित्त वर्ष 2025-26 के केंद्रीय बजट में सकल कर राजस्व का लक्ष्य 42.70 लाख करोड़ रुपये रखा गया था, जो पिछले वर्ष से 11 फीसदी अधिक है। इसमें 25.20 लाख करोड़ रुपये प्रत्यक्ष कर (आयकर और कॉरपोरेट कर) और 17.5 लाख करोड़ रुपये अप्रत्यक्ष कर (सीमा शुल्क, उत्पाद शुल्क और जीएसटी) से आने का अनुमान है।

जीएसटी: वित्त वर्ष 2025-26 में जीएसटी राजस्‍व संग्रह 11 फीसदी बढ़कर 11.78 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। सितंबर 2025 से दरों में की गई कटौती के बाद राजस्व वृद्धि में तेजी आने की उम्मीद है, इसलिए अगामी वित्त वर्ष 2026-27 के अनुमानों पर विशेष ध्यान रहेगा।

जीडीपी ग्रोथ की रफ्तार: आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के मुताबिक वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की जीडीपी ग्रोथ 6.8 से 7.2 फीसदी के बीच रह सकती है, जबकि सरकार ने 2047 तक विकसित भारत बनने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए देश को लगातार 8 फीसदी या उससे अधिक की विकास दर बनाए रखना जरूरी होगा।

रुपये में लगातार गिरावट: आरबीआई के हस्तक्षेप के बावजूद भारतीय रुपया दबाव में बना हुआ है। 30 जनवरी को अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में रुपया अमेरिकी मुद्रा डॉलर के मुकाबले 92.02 के रिकॉर्ड निचले स्तर को छूने के बाद कारोबार के अंत में मामूली बढ़त लिए 91.97 पर बंद हुआ।

किसान और कृषि उत्पादकता: कृषि वर्ष 2024–25 में भारत का खाद्यान्न उत्पादन 3,577.3 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है, जो पिछले कृषि वर्ष से 254.3 एलएमटी अधिक है। हालांकि, अनाज, मक्का, सोयाबीन और दालों की पैदावार अब भी वैश्विक औसत से कम है। विशेषज्ञों के अनुसार किसानों की आय बढ़ाने के लिए उत्पादकता सुधार, बेहतर बीज, आधुनिक तकनीक और सिंचाई पर फोकस जरूरी है।

स्वच्छता और वायु प्रदूषण: जनवरी 2026 में आई ऊर्जा और स्वच्छ हवा पर अनुसंधान केंद्र (सीआरईए) की रिपोर्ट के अनुसार भारत के 44 फीसदी शहर क्रॉनिक एयर पॉल्यूशन से जूझ रहे हैं। राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में साल के 365 दिनों में से केवल 79 दिन ही हवा ‘अच्छी’ श्रेणी में रहती है।

अमेरिका का हाई टैरिफ: अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर 50 फीसदी टैरिफ लगाया हुआ है, जिसमें 25 फीसदी बेस टैरिफ और 25 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ शामिल है, जो रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदने के कारण लगाया गया है। इससे भारतीय निर्यात पर बड़ा असर पड़ा है।

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