युवा सांस्कृतिक विरासत के साथ आधुनिक बनें,लेकिन स्वार्थी एवं लालची नहीं : दत्तात्रेय होसबाले

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राष्ट्र पुनर्निर्माण के लिए पंच परिवर्तन को आत्मसात करें युवा : दत्तात्रेय होसबाले

प्रयागराज, 25 जनवरी (हि.स.)। देश के युवा सांस्कृतिक विरासत से जुड़े हुए आधुनिकता को अपनाएं, लेकिन उपभोगवादी न बने, स्वार्थी न बने और लालची न बने, तभी भारत पुनः सर्वोच्च शिखर पर पहुंचेगा।

यह बात रविवार को मोतीलाल नेहरू राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान के एमपी हाल में युवा विद्यार्थी सम्मेलन एवं संवाद कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ(आरएसएस) के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने कही। वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष अभियान के तहत ‘राष्ट्र पुनर्निर्माण में युवाओं की भूमिका’ विषय पर आयोजित समारोह को संबोधित किए।

उन्होंने राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के लिए युवाओं को पंच परिवर्तन(स्वदेशी, नागरिक कर्तव्य,पर्यावरण, सामाजिक समरसता एवं कुटुम्ब प्रबोधन) को आत्मसात करने का आह्वान किया। कहा कि भारत को सच्चे अर्थो में भारत बनाने के लिए युवकों को अपने घरो से बाहर निकलना होगा।

सरकार्यवाह ने अपने ओजस्वी उद्बोधन में आगे कहा कि ‘देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखे’हम सभी का मूलमंत्र होना चाहिए। भारत के बारे में दृष्टि सही होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत महान था या नहीं यह प्रश्न नहीं है आज भारत को महान कैसे बना सकते हैं? विचारणीय विषय यह है। देश के सभी महापुरुषों ने ऊंच—नीच का भेदभाव छोड़ने के लिए कहा है। उद्योग व्यापार शिक्षा सभी क्षेत्रों में भारतीयता दिखनी चाहिए। भारत की सांस्कृतिक एकता महत्वपूर्ण है। इसके लिए मिलजुल कर प्रयास करना होगा। पर्यावरण की रक्षा करने के साथ ही साथ भावी पीढ़ी को अच्छा नागरिक बनाना हम सभी का कर्तव्य है। भारत की ज्ञान परम्परा को आगे बढ़ाना है।

उन्होंने आगे कहा कि भारत की नई पीढ़ी अपने कर्तव्यों के बारे में दृढ़ प्रतिज्ञ हो पूर्व से आज तक कई परिवर्तन हुए और परिवर्तन प्रकृति का नियम है। राष्ट्र एवं समाज के लिए अच्छी बातें सुनने में अच्छी लगती हैं, करने में कठिनाई होती है, बोलने में अच्छी लगती है परंतु स्वीकार करने में कठिनाई होती है, जिसे हमें स्वीकार करना होगा। जिस दिन हम इसे स्वीकार कर लेंगे उसे दिन देश हमारा लक्ष्य की प्राप्ति कर लेगा।

उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि हनुमान जी ने रामायण में कहा कि नाम लेने से ही हम सफल नहीं रहेंगे। इसके लिए हमें कुछ कार्य अवश्य करना होगा। लंका समृद्ध होने के बावजूद विभीषण को वहां का राज्य दे दिया और वहां से वापस अयोध्या आ गए। इस संस्कृति को आज भी भारत लेकर चल रहा है। भारत ने कभी किसी राष्ट्र का दमन करने के लिए अपने को विकसित नहीं किया। वह अपनी संस्कृति में सहजता,सरलता एवं सम्भाव रखते हुए,सभी का आदर करना चाहता है। किसी को हड़पने की आकांक्षा, इच्छा नहीं रखता है। कई सारी संस्कृतियां भारतीय संस्कृति की मुख्य धारा में विलीन हो गई और यही की बनके रह गई, यह भारत की संस्कृति की महत्ता है।

उन्होंने कहा कि भारत अपने ज्ञान को संग्रहालय एवं पुस्तकालय में रखने के लिए नहीं विचार करता है। यह अपने अनुभवों को,अपने ज्ञान को बांटने के विचार के लिए जाना जाता है। धर्मपाल जी की ‘प्राइड ऑफ इंडिया’ पुस्तक में भारत के शिक्षा प्रणाली,पंचायत व्यवस्था एवं संस्कृति की अभिव्यक्ति पर व्याख्या की गई है, परंतु आज कुछ लोग विमर्श ऊपर फिल्म चलाते हैं कि आर्य बाहर से आए। सच्चाई यह है कि प्राचीन काल से ही आर्य भारत में निवास कर रहे हैं और भारत की संस्कृति के उत्थान के लिए सतत प्रयास करते रहे।

उन्होंने कहा कि भारत की स्वतंत्रता के लिए लाल-बाल-पाल ने आगे बढ़कर अपने आप को देश के लिए समर्पित किया था। भारत की आंतरिक सुरक्षा के विषय में कहा कि भारत की समरसता अखंडता और एकता अनंत काल तक स्थापित रहे, वह आंतरिक सुरक्षा से ही होगा।

पर्यावरण की चर्चा के क्रम में उन्होंने इंदौर का उदाहरण देते हुए बताया कि विगत 8 वर्षों से इंदौर स्वच्छता के लिए प्रथम स्थान प्राप्त कर रहा है। क्या प्रयागराज भी इस स्थान पर पहुंच सकता है। जिस दिन प्रयागराज के युवा संकल्पित हो जाएंगे, उसे दिन प्रयागराज को भी यह गौरव प्राप्त हो जाएगा।

यदि हम लालसा और उपभोग में फसेंगे तो पुरुषार्थ का सही प्रयोग नहीं कर सकेंगे। प्रत्येक व्यक्ति को अपने पुरुषार्थ का प्रयोग करते हुए राष्ट्र को उन्नति तक ले जाने का प्रयास करना होगा। राष्ट्र प्रथम की भावना हम सभी में होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि राजगोपालाचारी ने अपनी पुस्तक में बताया कि हमें ‘पर कैपिटा इनकम’ ना देखते हुए ‘पर कैपिटा करेक्टर’ की ओर दृष्टि करनी होगी, तभी हमारा राष्ट्र चरित्र से मजबूत बन सकता है। सरकार्यवाह ने नवाचार के लिए भी युवाओं को प्रेरित किया।

उन्होंने जोर देकर कहा कि जब तक खंडित भारत एक ना हो जाए, तब तक हमारी साधना चलेगी। संयुक्त परिवार के विखंडन पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि हमें अपने परिवार के साथ अवश्य बैठना चाहिए और परिवार को लेकर चलना ही हमारे लिए हीतकर होगा। वह देश के निर्माण में भी सहायक है।

विभिन्न कॉलेजों के छात्रों द्वारा पूछे गए प्रश्नों का समाधान भी सरकार्यवाह ने जिज्ञासा सत्र में किया। विकसित भारत बनाने में संघ की भूमिका संघ की दृष्टि से भारत की पहचान अखंड भारत का महत्व जैसी जिज्ञासाओं का उन्होंने तार्किक समाधान किया।

एमएनआईटी के निदेशक प्रोफेसर रमाशंकर वर्मा ने अपने अध्यक्ष की उद्बोधन में कहा कि इस तरह के युवा संवाद से युवकों का चिंतन राष्ट्रोन्मुखी हो जाता है। मंच पर सह प्रांत संघ चालक प्रोफेसर राणा कृष्ण पाल एवं ट्रिपल आईटी के निदेशक मुकुल यश सुतावडे उपस्थित थे। कार्यक्रम का शुभारंभ भारत माता के चित्र के समक्ष सरकार्यवाह द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। वैदिक बटुकों ने स्वस्ति वाचन कर मंगलाचरण किया। विषय प्रवर्तन विभाग कार्यवाह डा संजय जी तथा संचालन डा.अजय ने किया।

कार्यक्रम में प्रमुख रूप से अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख स्वान्त रंजन, सह क्षेत्र कार्यवाह अनिल कुमार, क्षेत्र प्रचारक अनिल, क्षेत्र सेवा प्रमुख युद्धवीर, प्रान्त प्रचारक रमेश, सह प्रान्त प्रचारक सुनील, सह प्रांत कार्यवाह डॉ. राज बिहारी, प्रांत प्रचार प्रमुख डॉ मुरारजी त्रिपाठी, आलोक मालवीय, रामचंद्र, प्रोफेसर सत्यपाल, पूर्व कुलपति प्रोफेसर राजाराम यादव, पंत संस्थान के निदेशक प्रोफेसर योगेंद्र सिंह, ईश्वर शरण डिग्री कॉलेज के प्राचार्य डॉ. आनंद शंकर सिंह, प्रोत्र आर पी तिवारी, प्रोफेसर लक्ष्मी कान्त के अतिरिक्त भाग विद्यार्थी प्रमुख अविनाश मेडिकल कॉलेज के सुधांशु, ट्रिपल आईटी के नेत्रानन्द प्रतियोगी छात्र दिग्विजय, एमएनआईटी की शोध छात्रा स्मृति सिंह समेत लगभग 1500 युवा उपस्थित थे।

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