बाल मुकुंद ओझा
राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस उन लोगों की याद में मनाया जाता है जिन्होंने भोपाल गैस त्रासदी में अपनी जान गँवा दी थी। उन मृतकों को सम्मान देने और याद करने के लिये भारत में हर वर्ष 2 दिसंबर को मनाया जाता है। भोपाल गैस त्रासदी की वर्ष 2025 में 41वीं वर्षगांठ है। राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस का उद्देश्य लोगों को जागरूक बनाना, जल, वायु, मृदा और ध्वनि प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों के बीच जागरुकता फैलना है। साथ ही देश में बढ़ते औद्योगिक प्रदूषण को नियंत्रित करने के उपायों के बारे में लोगों को बताया जाता है। राष्ट्रीय प्रदूषण रोकथाम दिवस मनाने के पीछे का इतिहास भोपाल गैस त्रासदी से जुड़ा हुआ है। भोपाल में 1984 में हुई गैस त्रासदी के बाद ही राष्ट्रीय प्रदूषण रोकथाम दिवस की शुरुआत की गयी थी। 2 और 3 दिसम्बर को भोपाल के यूनियन कार्बाइड प्लांट से मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के निकलने की वजह से लगभग 5 लाख लोगों की जान चली गयी थी। राष्ट्रीय स्वास्थ्य पोर्टल के अनुसार हर साल 70 लाख लोग वायु प्रदूषण के कारण जान गंवाते हैं। हालत इतनी खराब है कि वैश्विक स्तर पर हर 10 में से 9 लोगों तक शुद्ध हवा नहीं पहुंच पाती है। हवा में मौजूद प्रदूषक कण शरीर की सुरक्षा के लिए मौजूद बाधाओं को पार कर दिल, दिमाग और फेफड़ों पर असर डालते हैं।
प्रदूषण आज दुनियाभर चिंता का विषय है। यह केवल भारत के लिए ही नहीं है बल्कि पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है जो कई तरह के प्रदूषणों से पीड़ित है। वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण और अन्य, लाखों लोगों के जीवन को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं। भारत दुनिया के सबसे प्रदूषित देशों में दूसरे स्थान पर है। प्रदूषण का स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है और औसतन एक भारतीय की जीवन प्रत्याशा को 5.3 साल तक कम कर देता है। प्रदूषण का अर्थ है हमारे आस पास का परिवेश गन्दा होना और प्राकृतिक संतुलन में दोष पैदा होना। प्रदूषण कई प्रकार का होता है जिनमें वायु, जल और ध्वनि-प्रदूषण मुख्य है। पर्यावरण के नष्ट होने और औद्योगीकरण के कारण प्रदूषण की समस्या ने विकराल रूप धारण कर लिया है जिसके फलस्वरूप मानव जीवन दूभर हो गया है। महानगरों में वायु प्रदूषण अधिक फैला है। वहां चौबीसों घंटे कल-कारखानों और वाहनों का विषैला धुआं इस तरह फैल गया है कि स्वस्थ वायु में सांस लेना दूभर हो गया है। यह समस्या वहां अधिक होती हैं जहां सघन आबादी होती है और वृक्षों का अभाव होता है। कल-कारखानों का दूषित जल नदी-नालों में मिलकर भयंकर जल-प्रदूषण पैदा करता है। बाढ़ के समय तो कारखानों का दुर्गंधित जल सब नाली-नालों में घुल मिल जाता है। इससे अनेक बीमारियां पैदा होती है। इसी भांति ध्वनि-प्रदूषण ने शांत वातावरण को अशांत कर दिया है। कल-कारखानों और यातायात का कानफाडू शोर, मोटर-गाड़ियों की चिल्ल-पों, लाउड स्पीकरों की कर्णभेदक ध्वनि ने बहरेपन और तनाव को जन्म दिया है। हमने प्रगति की दौड़ में मिसाल कायम की है मगर पर्यावरण का कभी ध्यान नहीं रखा जिसके फलस्वरूप पेड़ पौधों से लेकर नदी तालाब और वायुमण्डल प्रदूषित हुआ है और मनुष्य का सांस लेना भी दुर्लभ हो गया है। इसके अलावा वृक्षों की अंधाधुंध कटाई ने भी पर्यावरण को बहुत अधिक क्षति पहुंचाई है। विश्व में हर साल एक करोड़ हैक्टेयर से अधिक वन काटा जाता है। भारत में 10 लाख हैक्टेयर वन प्रतिवर्ष काटा जा रहा है। वनों के कटने से वन्यजीव भी लुप्त होते जा रहे हैं। वनों के क्षेत्रफल के नष्ट हो जाने से रेगिस्तान के विस्तार में मदद मिल रही है।
मानव जीवन के लिये पर्यावरण का अनुकूल और संतुलित होना बहुत जरूरी है। पर्यावरण के प्रदूषित होने से हमारे स्वस्थ जीवन में कांटे पैदा हो गए है। विभिन्न असाध्य बीमारियों ने हमें असमय अंधे कुए की ओर धकेल दिया है जिसमें गिरना तो आसान है मगर निकलना भारी मुश्किल। यदि हमने अभी से पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान नहीं दिया तो आने वाला मानव जीवन अंधकारमय हो जायेगा। यह प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने आस-पड़ौस के पर्यावरण को साफ सुथरा रखकर पर्यावरण को संरक्षित करे तभी हमारे सुखमय जीवन को सुरक्षित और संरक्षित रखा जा सकता है।

बाल मुकुन्द ओझा
वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार
डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर


