“संस्कारों की जड़ें अगर कमज़ोर हो जाएं, तो इंसान ऊंचाइयों पर पहुँचकर भी ‘बौना’ ही कहलाता है!”

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राज्यसभा में भाजपा सांसद राधा मोहनदास अग्रवाल ने एक ऐसी कड़वी सच्चाई पेश की है, जिसने विकास और तरक्की के बड़े-बड़े दावों की कलई खोलकर रख दी है। यह मुद्दा उन साढ़े तीन करोड़ भारतीयों का है जो सरहदों के पार सुनहरे भविष्य की तलाश में गए, लेकिन पीछे उन आँखों को धुंधला छोड़ गए जिन्होंने उन्हें इस काबिल बनाया था। विडंबना देखिए, जिन मां-बाप ने अपना पेट काटकर, अपनी पुश्तैनी ज़मीनें बेचकर और अपनी हर खुशी कुर्बान कर बच्चों को सात समंदर पार भेजा, आज वही बच्चे उनकी मौत पर कंधा देने तक को तैयार नहीं हैं।

सांसद ने सदन को इंदौर और दिल्ली की उन रूह कंपा देने वाली घटनाओं से रूबरू कराया, जहाँ विदेश में बैठे बच्चों के इंतज़ार में मां-बाप की लाशें हफ्तों तक घर में सड़ती रहीं। यह महज़ एक घटना नहीं, बल्कि उस आधुनिक सभ्यता का काला सच है जहाँ शुरू में तो बच्चे मां-बाप को अपनी ज़रूरत के लिए विदेश बुलाते हैं, लेकिन वक्त बीतने के साथ वही जन्मदाता उनके लिए एक ‘बोझ’ बन जाते हैं। 2007 का मौजूदा कानून अब बेअसर साबित हो रहा है, क्योंकि कानून की दलीलों से ज़्यादा ज़रूरी अब ज़मीर की अदालत में हिसाब करना है।

इसीलिए, राज्यसभा में एक कड़े समाधान का प्रस्ताव रखा गया है। सुझाव है कि अब विदेश जाने वाले हर युवा से एक शपथ-पत्र (Affidavit) लिया जाए, जो यह सुनिश्चित करे कि वह अपने माता-पिता के स्वास्थ्य, उनकी देखभाल और उनके सम्मान की पूरी ज़िम्मेदारी उठाएगा। इतना ही नहीं, हर 6 महीने में एक ‘ज़िम्मेदारी पूर्ति प्रमाण-पत्र’ देना अनिवार्य हो, और अगर कोई औलाद अपने इस कर्तव्य में फेल होती है, तो भारत सरकार के पास उसका पासपोर्ट रद्द कर उसे तुरंत वापस बुलाने का अधिकार होना चाहिए।

यह लड़ाई सिर्फ एक कानून की नहीं है, बल्कि उन बूढ़ी आँखों के सम्मान की है जिन्हें हमने तरक्की की अंधी दौड़ में लावारिस छोड़ दिया है। क्या वाकई हमें ऐसी शिक्षा और ऐसी सफलता चाहिए जो हमें इंसान से पत्थर बना दे?

“क्या आपको लगता है कि अब ‘कानून का डंडा’ ही ऐसी निर्दयी औलादों को सुधार सकता है? क्या अपनी जिम्मेदारी से भागने वाले ऐसे बच्चों का पासपोर्ट रद्द करना एक सही कदम होगा? अपनी राय कमेंट्स में पूरी बेबाकी से साझा करें

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