मैथिली ठाकुर से क्या दिक्कत है?

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मैथिली ठाकुर से क्या दिक्कत है?। आप कहेंगे कि मैथिली को राजनैतिक अनुभव नहीं है। सदन में होने के लिये आवश्यक बौद्धिकता नहीं होगी उसमें। यही न? बिहार में नीतीश जी को छोड़ दिया जाय तो दोनों पक्षों के शीर्ष पर दिख रहे नई पीढ़ी के अधिकांश नेताओं से अधिक बौद्धिक है वह लड़की। नाम ले कर बताएं क्या? तुलना कर के देख लीजियेगा।

आप कहेंगे कि उसकी आयु कम है। तेजस्वी जी, तेजप्रताप जी, सम्राट जी, चिराग जी आदि लोग जब राजनीति में आये तब क्या उम्र थी उनकी? जिस आयु में वह चुनाव लड़ने आई है, लगभग उसी आयु में हमने तेजस्वी जी को बिहार का उपमुख्यमंत्री बना दिया था। फिर उस लड़की के लिए अलग मापदंड क्यों है?

आप कह रहे हैं कि गीत संगीत के लोगों को टिकट देना गलत है। मैं इस बात का समर्थन करना चाहता हूं, लेकिन फिर पवन सिंह के पीछे चलती लाखों की भीड़ याद आती है। आज ही खेसारी लाल यादव का नॉमिनेशन है, उनके पीछे खड़ी भीड़ देख लीजिये। नाचने गाने वाले लोग एकतरफा जीत जाएंगे, राजनैतिक दलों को यह भरोसा तो हमीं ने दिया है न?

यूपी बिहार में कमसे कम आधा दर्जन नेता ऐसे हैं जो भोजपुरी फिल्मी दुनिया से आये हैं। आप उन सभी से मैथिली ठाकुर की तुलना कर के देखिये। इस लड़की ने कभी फूहड़ नहीं गाया, हिट होने के लिए अश्लीलता नहीं परोसी। यदि आपको वे लोग नापसंद नहीं हैं, फिर यह क्यों नापसंद है?

इसी चुनाव में लोजपा ने मढ़ौरा से सीमा सिंह को टिकट दिया है। वे “आईटम डांसर” हैं। 300 भोजपुरी फिल्मों में अश्लील गानों पर अर्धनग्न नाची हैं। हम आप उनका विरोध कर पा रहे हैं क्या? मैथिली क्या उनसे भी बुरी कैंडिडेट है?

कहा जा रहा है कि ‘वह स्टार है, जीतने के बाद भी लोगों से मिलेगी नहीं।’ सम्भव है कि सचमुच ऐसा ही हो। पर यह भी तो सम्भव है कि जीतने के बाद वह नेताओं से अधिक क्षेत्र में रहने लगे। हम पहले ही दावा कैसे कर लेते हैं?

मैथिली ठाकुर का राजनीति में कूद पड़ना कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं है। वे जिस पैटर्न से राजनीति में आईं हैं, वह नया नहीं है। इसी पैटर्न से लोग आते रहे हैं और इस बार भी बहुत लोग आए हैं।

अब राजनीति का जो स्वरूप है उसमें किसी सामान्य कार्यकर्ता का चुनाव लड़ कर जीत जाना बहुत बड़ी बात है। पार्टियां राज्य भर में एक आध कार्यकर्ताओं को टिकट दे देती हैं ताकि कार्यकर्ताओं की उम्मीद बनी रहे। लोग दरी बिछाते रहें, नारा लगाते रहें। टिकट पर दावेदारी अब या तो पूंजीपतियों की है, या दूसरे फील्ड से आये चर्चित लोगों की… पैसा न हो तो आदमी पंचायत का चुनाव नहीं जीत पायेगा, विधायक बनना तो बहुत बड़ी बात है।

मैथिली को शुभकामनाएं। उम्मीद है कि इसके बाद भी वह अपने अंदर की गायिका को ही आगे रखेगी।

सर्वेश तिवारी श्रीमुख

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