मनोरंजन ऐप्स की अंधी दौड़ और बढ़ती अश्लीलता 

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डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स तेज़ मुनाफ़े की दौड़ में कला, संवेदनशीलता और समाजिक मूल्यों को पीछे छोड़ते हुए अश्लीलता को नया ‘मनोरंजन’ बना रहे हैं — इसका दुष्प्रभाव विशेषकर युवाओं की मानसिकता पर गहरा और खतरनाक है।

– डॉ सत्यवान सौरभ

डिजिटल क्रांति ने जिस तेज़ी से दुनिया को बदला है, उतनी ही तीव्रता से उसने हमारे मनोरंजन के साधनों को भी प्रभावित किया है। मोबाइल फोन, इंटरनेट और सस्ते डेटा ने मनोरंजन को घरों से निकलकर सीधा हर व्यक्ति की जेब और हाथों तक पहुँचा दिया है। आज सैकड़ों एंटरटेनमेंट ऐप्स—वेब सीरीज़, शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया स्ट्रीमिंग और लाइव शो—हर सेकंड दर्शकों का ध्यान खींचने की होड़ में हैं। यह सुविधा जितनी शानदार लगती है, उतनी ही गहरी चिंताओं को भी जन्म देती है। क्योंकि इसी आसानी ने मनोरंजन की परिभाषा को खतरनाक रूप से बदल दिया है। अब मनोरंजन का अर्थ कला, संस्कृति, कहानी या संवेदनशीलता नहीं रह गया है—बल्कि तेज़ व्यूज़, वायरल कंटेंट और उत्तेजक दृश्यों की अंधी प्रतिस्पर्धा बन गया है।

आज स्थिति यह है कि अनेक ऐप्स जान-बूझकर अश्लीलता, फूहड़ हरकतों, भद्दे संवादों और उत्तेजक दृश्यों को परोस रहे हैं। यह सामग्री न तो किसी रचनात्मकता की मिसाल है और न ही इससे समाजिक चेतना का विस्तार होता है। इसके पीछे केवल एक लक्ष्य है—तेज़ी से अधिक दर्शक, और इन दर्शकों के माध्यम से विज्ञापन व सब्सक्रिप्शन से होने वाला मुनाफ़ा। मनोरंजन उद्योग ऐसे मोड़ पर आ खड़ा हुआ है जहाँ कला और संस्कृति की प्रतिष्ठा आर्थिक लालच के सामने निरर्थक होती जा रही है।

कभी भारतीय सिनेमा, थियेटर और साहित्य समाज के जीवन-मूल्यों को सहेजने का माध्यम माने जाते थे। कहानी, संवाद, अभिनय और कल्पना की शक्ति दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती थी। आज डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स ने इसका बिल्कुल उल्टा माहौल तैयार कर दिया है। वेब सीरीज़ और शॉर्ट वीडियो में आपत्तिजनक भाषा, निर्बाध अश्लीलता और अनावश्यक अंतरंग दृश्यों को ऐसे दिखाया जा रहा है जैसे यही “आधुनिकता” या “यथार्थवाद” हो। जबकि सच्चाई यह है कि यह यथार्थ नहीं, बल्कि एक जानबूझकर पैदा किया गया भ्रम है—जिसमें दर्शक को उत्तेजना व सनसनी के माध्यम से बांधकर रखा जाए।

इस दौड़ की सबसे बड़ी कीमत युवा पीढ़ी चुका रही है। किशोरों के हाथ में मोबाइल है और मोबाइल के अंदर ऐसी दुनिया है जो बिना किसी रोक-टोक के उन्हें प्रभावित कर रही है। किशोरावस्था वह समय होता है जब व्यक्तित्व, सोच, नैतिकता और सामाजिक मूल्य बनते हैं। लेकिन इन ऐप्स पर उपलब्ध सामग्री उन्हें तेज़-तर्रार, उथला और अक्सर भ्रमित कर देने वाला दृष्टिकोण देती है। संबंधों के प्रति गलत धारणाएँ बनती हैं, महिलाओं के प्रति सम्मान घटता है, और जीवन को केवल शारीरिक आकर्षण, भौतिकता और दिखावे के रूप में समझने की प्रवृत्ति बढ़ती है।

आज का युवा जिस प्रकार की सामग्री रोज़ देख रहा है, वह उसके व्यवहार, शब्दों, संवेदनाओं और जीवन के आकलन को धीरे-धीरे बदल रही है। जिस चीज़ को वह “मनोरंजन” या “ट्रेंड” समझ रहा है, वह वास्तव में उनके भीतर मूल्यहीनता और अवसाद पैदा कर रही है। कई मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि इस प्रकार का कंटेंट आँखों को आकर्षित भले करे, लेकिन दिमाग पर भारी बोझ डालता है। तेज़–तेज़ दृश्यों, अश्लील संवादों, अनियंत्रित भावनाओं और आक्रामक प्रस्तुतियों से किसी भी किशोर का मानसिक संतुलन प्रभावित होना स्वाभाविक है।

लेकिन समस्या का एक और पहलू भी है—कंटेंट निर्माता और ऐप कंपनियाँ ज़िम्मेदारी से बचने के लिए ‘यूज़र चॉइस’, ‘एडल्ट टैग’ या ‘व्यूअर डिस्क्रेशन’ जैसे शब्दों का सहारा लेती हैं। वे यह कहती हैं कि दर्शक स्वयं चयन करें कि वे क्या देखना चाहते हैं। यह तर्क पूरी तरह गलत नहीं, लेकिन अधूरा अवश्य है। क्योंकि जब कोई ऐप अपनी पूरी मार्केटिंग रणनीति ही उत्तेजक और भड़काऊ सामग्री पर आधारित रखता है, तब दर्शक का चुनाव स्वतंत्र कम और प्रभावित अधिक होता है। जिस सामग्री को लगातार प्रमोट किया जाएगा, वही अधिक देखी जाएगी।

नियामक तंत्र की स्थिति भी उतनी ही कमज़ोर है। भारत में फिल्मों के लिए सेंसर बोर्ड है, टीवी के लिए प्रसारण नियंत्रण है, लेकिन डिजिटल ऐप्स लगभग बिना किसी प्रभावी नियंत्रण के चल रहे हैं। दिशा-निर्देश तो बनाए गए हैं, पर उनका पालन न तो कठोर है और न ही नियमित। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को लगता है कि वे आम मीडिया कानूनों से ऊपर हैं। उनका तर्क है कि इंटरनेट एक “स्वतंत्र माध्यम” है। लेकिन क्या स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि समाजिक संतुलन को बिगाड़ने वाली सामग्री को खुली छूट दे दी जाए? क्या संस्कृति, नैतिकता और संवेदनाओं को नज़रअंदाज़ कर देना ही स्वतंत्रता है?

समस्या का एक सामाजिक आयाम भी है। परिवार अपने स्तर पर बच्चों को रोकने की कोशिश करते हैं, लेकिन डिजिटल दुनिया की जटिलता इतनी है कि पूरी तरह नियंत्रण लगभग असंभव है। विशेषकर मध्यम वर्गीय और ग्रामीण परिवारों में डिजिटल साक्षरता अभी विकसित नहीं हुई है। माता-पिता यह नहीं जानते कि कौन-सा कंटेंट बच्चों के लिए अच्छा है और कौन-सा हानिकारक। ऐप कंपनियाँ भी माता-पिता को मार्गदर्शन देने के बजाय उनका उपयोगकर्ता विस्तार करने में अधिक रुचि रखती हैं।

ऐसे समय में हमें यह समझना होगा कि समाधान केवल प्रतिबंधों में नहीं है। समाधान एक व्यापक सामाजिक जागरूकता, नैतिक उत्पादन नीति और कड़े नियमन के संतुलन में है। मनोरंजन कंपनियाँ स्वयं यह तय करें कि क्या दिखाना उचित है। वे कला और व्यावसायिकता के बीच संतुलन बनाएं। अश्लीलता के सहारे व्यूज़ पाने की आदत छोड़ें और रचनात्मक, भावनात्मक तथा सामाजिक रूप से उपयोगी सामग्री प्रस्तुत करें।

साथ ही, सरकार को डिजिटल प्लेटफार्मों पर वैसा ही नैतिक नियंत्रण लागू करना होगा जैसा टीवी या फिल्मों पर होता है। पारदर्शी नियम, कठोर दंड और स्पष्ट श्रेणीकरण इस दिशा में आवश्यक कदम हो सकते हैं।

समाज का कर्तव्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अभिभावकों को डिजिटल साक्षरता दी जानी चाहिए। युवाओं को यह समझाया जाना चाहिए कि मनोरंजन और उत्तेजना में बहुत अंतर होता है। फूहड़ता से मिली त्वरित प्रसन्नता जीवन के गहरे अनुभवों और रचनात्मक आनंद का विकल्प नहीं हो सकती।

मनोरंजन का उद्देश्य केवल चौंकाना या उत्तेजित करना नहीं है; उसका उद्देश्य मन को संवेदनशील बनाना, सोच को गहराई देना और समाज को बेहतर दिशा देना है। लेकिन जब ऐप्स की दुनिया कला को छोड़कर अश्लीलता की ओर भागने लगे, तब संस्कृति और सभ्यता दोनों संकट में पड़ती हैं।

हमारे सामने आज यही प्रश्न है—क्या हम ऐसी डिजिटल दुनिया चाहते हैं जहाँ मनोरंजन का आधार रचनात्मकता, सांस्कृतिक मूल्य और सामाजिक ज़िम्मेदारी हो? या हम ऐसे युग में प्रवेश करने जा रहे हैं जहाँ उत्तेजना ही कला बन जाएगी और सनसनी ही मनोरंजन?

समय की मांग है कि हम स्पष्ट रूप से कहें: हमें मनोरंजन चाहिए—लेकिन ऐसा नहीं जो समाज को खोखला कर दे।

अगर डिजिटल दुनिया इस दिशा में नहीं बदली, तो आने वाली पीढ़ियाँ एक ऐसे सांस्कृतिक अंधकार में प्रवेश करेंगी, जहाँ मनोरंजन तो बहुत होगा, पर उसका कोई अर्थ नहीं बचेगा।

– डॉo सत्यवान सौरभ,

कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, आकाशवाणी एवं टीवी पेनालिस्ट,

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