मदन लाल ढींगरा ने फांसी के फंदे को चूम जगाई क्रांति की ज्वाला

0
6

बाल मुकुन्द ओझा

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में मदनलाल ढींगरा का नाम बहुत आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है। स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारियों में उनका नाम अव्वल था। 25 वर्ष के अपने अल्प जीवन में उन्होंने देशप्रेम की ऐसी अलख जगायी कि इतिहास में उनका नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गया। ढींगरा ने हस्ते हँसते फांसी के फंदे को चूम लिया था। ढींगरा ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने परिवार की इच्छाओं के विपरीत देश के लिए सब कुछ न्यौछावर कर दिया था।

आजादी को प्राप्त करने के लिए कितनी ही माताओं ने अपने नौनिहालों को देश पर कुर्बान किया यह इतिहास के पन्नों में दर्ज है। आज जरुरत इस बात की है की इतिहास की यह धरोहर किताबों से बाहर आकर हमें बलिदान की गाथा बताएं। भारत की आजादी के लिए अनेक क्रांतिवीर हँसते हँसते फांसी के फंदे पर झूल गए। इनमें एक मदन लाल ढींगरा की 18 फरवरी को 144 वीं जयंती है।

मदन लाल ढींगरा का जन्म 18 फरवरी 1883 को पंजाब के एक हिंदू परिवार में हुआ था। उनके पिता सिविल सर्जन थे। मदनलाल में अपने स्कूली जीवन से ही देशभक्ति की भावना कूट कूट कर भरी थी। मदन लाल को क्रन्तिकारी गतिविधियों के कारण लाहौर के एक विद्यालय से निकाल दिया गया, तो परिवार ने भी उनसे अपना नाता तोड़ लिया। उनका परिवार अंग्रेजों का विश्वासपात्र था। ढींगरा ने रोजी रोटी के लिए अनेक स्थानों पर काम किया। उन्होंने एक यूनियन बनाने का प्रयास किया परंतु वहां से भी उन्हें निकाल दिया गया। कुछ दिन उन्होंने मुम्बई में भी काम किया।

 मदन लाल ने सन् 1900 में एमबी इंटरमीडिएट कॉलेज अमृतसर में स्कूली शिक्षा प्राप्त की। उसके बाद वह लाहौर स्थित गवर्नमेंट कॉलेज यूनिवर्सिटी में शिक्षा प्राप्त करने चले गए। अपनी बड़े भाई से विचार विमर्श कर वे 1906 में उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैड गये। जहां उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज’ लंदन में यांत्रिक प्रौद्योगिकी में प्रवेश लिया। इसके लिए उनके बड़े भाई एवं इंग्लैंड के कुछ राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं से आर्थिक सहायता भी मिली। लन्दन में पढ़ाई के दौरान ढींगरा भारत भवन के संपर्क में आए जहाँ उनकी मुलाकात वीर सावरकर एवं श्यामजी कृष्ण वर्मा से हुई। भारत भवन या इंडिया हाउस 1905 में श्यामजी कृष्ण वर्मा द्वारा स्थापित किया गया क्रांतिकारी संगठन था। सावरकर और श्यामजी कृष्ण वर्मा ढींगरा की प्रखर देशभक्ति से बहुत प्रभावित हुए। भारत भवन का एक महत्वपूर्ण सदस्य बनकर उन्होंने  मन ही मन यह संकल्प ले लिया कि भारत मां के लिए अपने जीवन की आहुति देनी है। उन्होंने सन 1857 की भारत की क्रांति की 50वीं वर्षगांठ वहां धूमधाम से मनाई। 

लंदन में रह रहे प्रवासी क्रांतिकारी भारत के खुदीराम बोस, कन्हाई लाल दत्त, सतिन्दर पाल और काशी राम जैसे क्रान्तिकारियों को मृत्युदण्ड दिये जाने से बहुत क्रोधित थे। ब्रिटिश सरकार का एक भारतीय सेना का अवकाश प्राप्त अधिकारी कर्नल विलियम वायली लंदन में रहता था। वायली लंदन में रह रहे भारतीय छात्रों की जासूसी करता था। वायली उसके पिता के दोस्त थे और उसने मदनलाल के पिता को सलाह दी थी कि वह अपने पुत्र को इंडिया हाउस से दूर रहने की सलाह दे। लंदन में रह रहे क्रान्तिकारियो ने अंग्रेजों के जासूस वायली की हत्या करने का निश्चय किया। इस काम का जिम्मा ढींगरा को सौंपा गया। उन्होंने इंडिया हाउस में रहकर बंदूक चलाने का प्रशिक्षण लिया था। मदन लाल ने अंग्रेज अधिकारी विलियम हट कर्जन वायली की गोली मारकर हत्या कर दी। ढींगरा ने अपने पिस्तौल से स्वयं को भी गोली मारनी चाही किन्तु उन्हें पकड़ लिया गया। कर्जन वायली की हत्या के आरोप में अदालत ने उन्हें मृत्युदण्ड का आदेश दिया और 17 अगस्त सन 1909 को लन्दन की पेंटविले जेल में फाँसी पर लटका कर उनकी जीवन लीला समाप्त कर दी गयी।  मदनलाल मर कर भी अमर हो गये। मदन लाल ढींगरा ने अदालत में खुले शब्दों में कहा कि “मुझे गर्व है कि मैं अपना जीवन समर्पित कर रहा हूं।

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here