प्रकृति, पैसा और स्वास्थ्य: एक संतुलित दृष्टि

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– डॉ० प्रियंका सौरभ

आज के दौर में स्वास्थ्य को लेकर हमारी सोच तेजी से बदली है। आधुनिक जीवनशैली, तकनीक, महंगी चिकित्सा सुविधाएँ और बढ़ती आय ने यह विश्वास पैदा कर दिया है कि पैसा ही बेहतर स्वास्थ्य की कुंजी है। बड़े शहरों में रहने वाला व्यक्ति मानता है कि यदि उसके पास अच्छे अस्पताल, नामी डॉक्टर, निजी बीमा और आधुनिक उपकरण हैं, तो बीमारी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती। लेकिन जब हम देखते हैं कि देश-दुनिया की नामचीन हस्तियाँ—जिनके पास धन, संसाधन और सर्वोत्तम चिकित्सा सुविधाएँ उपलब्ध थीं—गंभीर बीमारियों का शिकार हुईं, तो यह विश्वास डगमगाने लगता है।

यह प्रश्न स्वाभाविक है कि आखिर इतनी देखभाल, इतनी सावधानी और इतने संसाधनों के बावजूद भी लोग कैंसर, हृदय रोग और अन्य जटिल बीमारियों से क्यों नहीं बच पाए। क्या आधुनिक जीवनशैली वास्तव में हमें स्वस्थ बना रही है, या हम अनजाने में अपने शरीर की प्राकृतिक शक्ति को कमजोर कर रहे हैं? यह सवाल केवल अमीर और मशहूर लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि हर उस व्यक्ति से जुड़ा है जो तेज़ रफ्तार, कृत्रिम और तनावपूर्ण जीवन जी रहा है।

मानव शरीर प्रकृति की देन है और लाखों वर्षों के विकास का परिणाम है। हमारा शरीर प्राकृतिक भोजन, शुद्ध हवा, स्वच्छ पानी, धूप और शारीरिक श्रम के साथ तालमेल बैठाकर विकसित हुआ है। जब हम इस प्राकृतिक संतुलन से दूर होते जाते हैं—अत्यधिक प्रोसेस्ड भोजन खाते हैं, घंटों बंद कमरों में रहते हैं, मोबाइल और स्क्रीन के सामने जीवन बिताते हैं—तो शरीर का संतुलन बिगड़ने लगता है। बीमारियाँ अचानक नहीं आतीं, वे वर्षों की गलत आदतों, तनाव और असंतुलन का परिणाम होती हैं।

आज का भोजन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। पैकेट में बंद, लंबे समय तक टिकने वाला और स्वाद बढ़ाने वाले रसायनों से भरपूर भोजन हमारी थाली में जगह बना चुका है। फल के नाम पर जूस, सब्ज़ियों के नाम पर फ्रोजन पैक और दूध के नाम पर प्रोसेस्ड उत्पाद हमारे दैनिक आहार का हिस्सा बन गए हैं। यह सुविधाजनक ज़रूर है, लेकिन शरीर के लिए हमेशा हितकारी नहीं। प्रकृति हमें भोजन उसके संपूर्ण रूप में देती है—जिसमें फाइबर, विटामिन और पोषक तत्व संतुलित होते हैं। जब हम उस रूप को बदल देते हैं, तो उसका प्रभाव भी बदल जाता है।

स्वच्छता और सुरक्षा के नाम पर हमने अपने आसपास का वातावरण भी अत्यधिक कृत्रिम बना लिया है। हर चीज़ को कीटाणुरहित करने की होड़ लगी है। साबुन, सैनिटाइज़र और केमिकल क्लीनर के बिना जीवन अधूरा सा लगने लगा है। इसमें संदेह नहीं कि स्वच्छता आवश्यक है, लेकिन अति हमेशा हानिकारक होती है। वैज्ञानिक भी मानते हैं कि सीमित मात्रा में प्राकृतिक बैक्टीरिया से संपर्क हमारी रोग-प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाता है। जो शरीर हर छोटी चुनौती से बचा लिया जाता है, वह बड़ी चुनौती आने पर कमजोर पड़ सकता है।

ग्रामीण जीवन और शहरी जीवन की तुलना इस संदर्भ में अक्सर की जाती है। गाँवों में रहने वाले बुज़ुर्ग अपेक्षाकृत सादा भोजन करते हैं, शारीरिक श्रम अधिक होता है और जीवन की गति धीमी होती है। मानसिक तनाव भी अपेक्षाकृत कम होता है। यही कारण है कि छोटी-मोटी बीमारियाँ वे बिना दवा के भी झेल लेते हैं। वहीं शहरों में रहने वाला व्यक्ति आरामदायक जीवन जीता है, लेकिन एक साधारण बुखार भी उसे बिस्तर से बाँध देता है। यह अंतर केवल चिकित्सा सुविधाओं का नहीं, बल्कि जीवनशैली और मानसिक स्थिति का भी है।

हालाँकि यह मान लेना भी गलत होगा कि प्रकृति से जुड़ाव ही हर बीमारी का इलाज है। कई बीमारियाँ आनुवंशिक होती हैं, कई संक्रमण के कारण होती हैं और कई उम्र के साथ स्वाभाविक रूप से आती हैं। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने इन क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति की है। टीके, एंटीबायोटिक, सर्जरी और आधुनिक जांच तकनीकों ने करोड़ों लोगों की जान बचाई है। यदि हम केवल “प्राकृतिक” के नाम पर विज्ञान को नकार दें, तो यह भी एक खतरनाक सोच होगी।

असल समस्या तब पैदा होती है जब हम किसी एक छोर पर चले जाते हैं। या तो हम पूरी तरह मशीनों, दवाओं और सुविधाओं पर निर्भर हो जाते हैं, या फिर विज्ञान को नकारकर हर समस्या का समाधान केवल घरेलू नुस्खों में खोजने लगते हैं। दोनों ही दृष्टिकोण अधूरे हैं। स्वास्थ्य एक संतुलन का नाम है—जहाँ प्रकृति और विज्ञान दोनों की अपनी-अपनी भूमिका है।

मानसिक स्वास्थ्य इस संतुलन का एक और महत्वपूर्ण पहलू है, जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। आज का इंसान शारीरिक रूप से भले ही सुविधाओं से घिरा हो, लेकिन मानसिक रूप से असुरक्षित, चिंतित और तनावग्रस्त है। प्रतिस्पर्धा, असफलता का डर, सामाजिक दबाव और भविष्य की चिंता हमारे मन को लगातार व्यस्त रखते हैं। यह मानसिक तनाव धीरे-धीरे शरीर पर असर डालता है और गंभीर बीमारियों का कारण बनता है। पैसा इस तनाव को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकता।

यह भी समझना ज़रूरी है कि अमीर लोगों की बीमारियाँ हमें ज़्यादा इसलिए दिखती हैं क्योंकि वे सार्वजनिक जीवन में होते हैं। आम लोगों में भी वही बीमारियाँ होती हैं, लेकिन वे चर्चा में नहीं आतीं। इसका अर्थ यह नहीं कि धन अपने आप बीमारी लाता है, बल्कि यह कि धन बीमारी से पूर्ण सुरक्षा नहीं दे सकता।

आज ज़रूरत इस बात की है कि हम स्वास्थ्य को केवल इलाज की दृष्टि से न देखें, बल्कि जीवनशैली की दृष्टि से समझें। सादा और संतुलित भोजन, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद, प्रकृति के साथ समय और मानसिक शांति—ये सब किसी भी दवा से कम प्रभावी नहीं हैं। इसके साथ ही, आवश्यकता पड़ने पर समय पर डॉक्टर से सलाह लेना और आधुनिक चिकित्सा का लाभ उठाना भी उतना ही ज़रूरी है।

अंततः यह स्वीकार करना होगा कि न तो पैसा हमें अमर बना सकता है और न ही केवल प्राकृतिक जीवनशैली सभी बीमारियों से बचा सकती है। असली समाधान संतुलन में है। जब हम प्रकृति की समझ के साथ विज्ञान को अपनाते हैं, तब ही स्वस्थ और सार्थक जीवन संभव है। शायद यही वह रास्ता है, जिस पर चलकर हम न केवल लंबा, बल्कि बेहतर जीवन भी जी सकते हैं।

  -डॉ. प्रियंका सौरभ,, कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।

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