ख्वाजा- “आज भी उस रूढ़िवादी सोच से लड़ाई,जिसका सामना पूरे कैरियर में किया”

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सिडनी, 02 जनवरी (हि.स.)।

ऑस्ट्रेलिया के अनुभवी बल्लेबाज़ उस्मान ख्वाजा ने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर के अंतिम पड़ाव पर क्रिकेट में मौजूद नस्लीय पूर्वाग्रह (रेशियल स्टीरियोटाइप) को लेकर खुलकर अपनी बात रखी है। सिडनी टेस्ट से ठीक दो दिन पहले मीडिया को दिए गए लगभग एक घंटे लंबे भावुक संबोधन में ख्वाजा ने कहा कि वह आज भी उन रूढ़िवादी सोच से लड़ रहे हैं, जिनका सामना उन्होंने पूरे करियर में किया।

39 वर्षीय ख्वाजा, जो ऑस्ट्रेलिया के पहले मुस्लिम टेस्ट क्रिकेटर हैं, ने संकेत दिए कि एशेज सीरीज़ के पहले टेस्ट से पहले उनकी तैयारी को लेकर जो आलोचना हुई, उसमें नस्लीय सोच की झलक साफ दिखाई देती है।

एशेज के पहले टेस्ट से पहले ख्वाजा के गोल्फ खेलने को लेकर सवाल उठाए गए थे। इसके बाद पीठ में ऐंठन (बैक स्पैज़्म) के कारण वह दोनों पारियों में ओपनिंग नहीं कर सके और ब्रिस्बेन टेस्ट से भी बाहर रहे। इस पर मीडिया और कुछ पूर्व खिलाड़ियों ने उनकी प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े किए।

ख्वाजा ने कहा, “यह मेरी परफॉर्मेंस की बात नहीं थी, बल्कि मुझ पर निजी हमले किए गए। कहा गया कि मैं टीम के प्रति कमिटेड नहीं हूं, स्वार्थी हूं, मेहनत नहीं करता, आलसी हूं। ये वही नस्लीय स्टीरियोटाइप हैं, जिनके साथ मैं बचपन से बड़ा हुआ हूं।”

उन्होंने आगे कहा कि ऑस्ट्रेलियाई टीम में किसी और खिलाड़ी के साथ इस तरह का व्यवहार उन्होंने कभी नहीं देखा।

उन्होंने कहा, “कई खिलाड़ी टेस्ट से एक दिन पहले गोल्फ खेलते हैं, कई लोग रात को शराब पीते हैं, लेकिन अगर उन्हें चोट लग जाए तो कोई कुछ नहीं कहता। उन्हें ‘ऑस्ट्रेलियन लैरिकिन्स’ कहा जाता है। लेकिन जब मुझे चोट लगी, तो मेरी ईमानदारी और मेरे चरित्र पर सवाल उठाए गए।”

ख्वाजा ने खुलासा किया कि उन्होंने भारत के खिलाफ पिछली घरेलू सीरीज़ के दौरान ही संन्यास के बारे में सोचना शुरू कर दिया था। हालांकि, अंतिम फैसला उन्होंने पिछले महीने एडिलेड टेस्ट के दौरान किया, जब ऑस्ट्रेलिया ने एशेज सीरीज़ अपने नाम कर ली।

एडिलेड टेस्ट में शुरुआती तौर पर टीम से बाहर रखे जाने के बावजूद, स्टीव स्मिथ के चोटिल होने के बाद उन्हें अंतिम समय में टीम में शामिल किया गया। उस मैच में उनकी 82 और 40 रन की पारियां निर्णायक साबित हुईं।

जूनियर क्रिकेट में नस्लवाद का अनुभव

इस्लामाबाद में जन्मे और बचपन में सिडनी आए ख्वाजा ने जूनियर क्रिकेट के दिनों को याद करते हुए कहा कि उस समय क्रिकेट “श्वेत-प्रधान (व्हाइट डॉमिनेटेड)” था और वहां नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ा।

उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर खुलकर बोलने के कारण वह आलोचना के केंद्र में रहे हैं। दो साल पहले आईसीसी द्वारा उनके जूतों पर लिखे “Freedom is a human right” और “All lives are equal” संदेशों को पहनने से रोके जाने का मामला भी चर्चा में रहा था।

बदलाव की कोशिश और भविष्य की उम्मीद

ख्वाजा क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया की मल्टीकल्चरल एक्शन प्लान (2023) को आकार देने में अहम भूमिका निभा चुके हैं। उनका मानना है कि ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट पहले से बेहतर जरूर हुआ है, लेकिन अभी भी सफर बाकी है।

उन्होंने कहा,“ऑस्ट्रेलिया एक मल्टीकल्चरल देश है। क्रिकेट में खासकर सबकॉन्टिनेंट के खिलाड़ियों की बड़ी भागीदारी है, लेकिन यह हमेशा राष्ट्रीय टीम में नजर नहीं आती। टीम में जगह पाना मुश्किल है, और किसी को गिफ्ट नहीं दी जानी चाहिए, लेकिन कहीं न कहीं अब भी चुनौतियां मौजूद हैं। मेरी उम्मीद है कि अगले उस्मान ख्वाजा का सफर थोड़ा आसान हो, और आने वाली पीढ़ियों में ऐसा समय आए जब किसी उस्मान ख्वाजा का सफर किसी जॉन स्मिथ जितना ही सामान्य हो।”

क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया का समर्थन

क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया के सीईओ टॉड ग्रीनबर्ग ने ख्वाजा की बातों से सहमति जताते हुए कहा, “एक खेल और एक समाज के तौर पर हमें अभी और काम करना है, लेकिन हम सही दिशा में हैं। उस्मान ने क्रिकेट को पहले से बेहतर बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है।”

ग्रीनबर्ग ने आगे कहा कि ख्वाजा की विरासत सिर्फ मैदान तक सीमित नहीं है।

उन्होंने कहा, “वह एक शानदार क्रिकेटर रहे हैं, लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि उन्होंने खेल के बाहर जो योगदान दिया है, वह बेहद गहरा है। उनका प्रभाव आने वाले समय में भी क्रिकेट में महसूस किया जाएगा।”

सिडनी टेस्ट के साथ उस्मान ख्वाजा का अंतरराष्ट्रीय सफर खत्म होगा, लेकिन क्रिकेट को अधिक समावेशी और समान बनाने की उनकी लड़ाई आगे भी जारी रहने की उम्मीद है।

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