कौन संत कौन ‘असंत’ ? सांसत में भक्तजन                                                                         

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−निर्मल रानी

कहने को तो ‘बांटो और राज करो ‘ की नीति अंग्रेज़ों की बनाई हुई थी। परन्तु आज सत्ता हासिल करने के लिये या सत्ता में बने रहने के लिये यही नीति लगभग दुनियाभर के राजनीतिज्ञों द्वारा अपनाई जा रही है। ज़ाहिर है हमारा देश और यहाँ की राजनीति भी इससे अछूती नहीं है। और कहना ग़लत नहीं होगा कि ‘बांटो और राज करो ‘ की नीति का अनुसरण भले ही मौक़ा मिलने पर सारे ही दल क्यों न करते हों परन्तु देखा यही जा रहा है कि भारतीय जनता पार्टी व इसकी सरकारों को इस मामले में कुछ ज़्यादा ही महारत हासिल है। आप देखिये कि स्वयं को मज़बूत व विपक्ष को कमज़ोर करने के लिये विपक्षी दलों ख़ासकर कांग्रेस के कितने ही नेता भाजपा ने अपने पाले में कर लिये। चाहे वह भ्रष्टाचार का आरोपी हो,आरोपी हो,अपराधी हो या भ्रष्ट हो परन्तु भाजपा में शामिल होते ही उसे ‘मिस्टर क्लीन ‘ का प्रमाण पत्र दे दिया जाता है। ऐसे कितने ही भ्रष्ट लोग आज मंत्री सांसद व विधायक यहाँ तक कि मुख्यमंत्री तक बने हुए हैं। 

                        इसी तरह जब भारत में इतिहास का सबसे प्रमुख किसान आंदोलन 9 अगस्त 2020 से 11 दिसंबर 2021 तक चला था !इसमें केंद्र सरकार के तीन विवादित कृषि क़ानूनों के विरोध में देश के किसान दिल्ली बॉर्डर पर बैठे थे। उस समय भी भाजपा सरकार ने तरह तरह के हथकंडे अपनाये थे। उनमें एक हथकंडा किसान आंदोलन में शामिल संयुक्त किसान मोर्चा में शामिल किसान संगठनों में फूट डालना भी शामिल था। चूँकि इस आंदोलन में पंजाब व हरियाणा के सिख बड़ी संख्या में शामिल थे इसलिये भाजपा सरकार के कई मंत्रियों ने इसे ‘ख़ालिस्तानी समर्थक’ आंदोलन बताने की भी कोशिश की। परन्तु किसानों की एकजुटता के आगे यह सरकारी एजेंडा फुस्स हो गया। याद कीजिये जब कभी सत्ता के ख़िलाफ़ देश की विशिष्ट हस्तियां या पूर्व जज अथवा पूर्व आई ए एस एकजुट हुये या फ़िल्म जगत के लोग,लेखक,साहित्यकार आदि ने सत्ता की नाकामियां उजागर करने के लिये आवाज़ें उठाएँ उसी वक़्त सत्ता ने भी इन्हीं वर्ग विशेष से सम्बद्ध अपने समर्थकों को खड़ा कर दिया। पिछली बार तो सत्ता को अपनी इन कोशिशों में उस समय शर्मिंदा भी होना पड़ा जबकि सत्ता के समर्थन में खड़े होने वाले कई तथाकथित ‘विशिष्ट ‘ लोगों के भ्र्ष्ट व काले कारनामों का रिकार्ड भी विपक्ष ने ढूँढकर सार्वजनिक कर दिया। 

                   बहरहाल अफ़सोस यह है कि भाजपा की ‘बांटो और राज करो ‘ की नीति की ज़द में अब साधु संत भी आ चुके हैं। जो भी संत भाजपा की किसी भी नीति की आलोचना करते हैं या एक संत के नाते शास्त्र सम्मत बातें करते हैं या कुछ ऐसी व्यवस्था देते हैं जो कि राजनैतिक होने के बजाये शुद्ध धार्मिक हो, उसे भाजपा सहन नहीं कर पाती। देश में अनेकानेक ऐसे योग्य संत हैं जो धर्म को राजनीति से अलग रखना चाहते हैं वह भाजपा की सत्ता या उसके प्रभाव में क़तई नहीं आते। परन्तु भाजपा की तो राजनीति ही धर्म के नाम पर चलती है। इसलिये भाजपा सत्ता समर्थक संतों को तरजीह देती है और उन्हें बढ़ावा भी देती है। उदाहरण के तौर पर सोशल मीडिया की ‘कृपा ‘ से इनदिनों बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर और कथावाचक पंडित धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री का नाम चर्चा में है। दूसरों का भविष्य बताने वाले इस नवोदित संत ने कुछ वर्ष पूर्व ही सोशल मीडिया द्वारा ‘अवतार’ लिया है। इन्हें लोग ‘बाबा बागेश्वर’ या ‘बागेश्वर धाम सरकार’ के नाम से भी जानते हैं। वे मध्य प्रदेश के छतरपुर ज़िले के गढ़ा गांव में स्थित बागेश्वर धाम के प्रमुख हैं। शंकराचार्य स्तर के कई संत धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री की ज्योतिष विद्या और उनके ‘पर्ची ‘ निकालने को ढोंग व शास्त्र विरोधी बता चुके हैं। परन्तु चूँकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनके ‘हिन्दू राष्ट्र निर्माण मिशन ‘ के समर्थक हैं तथा उन्हें  प्रधानमंत्री का संरक्षण हासिल है लिहाज़ा उनकी गिनती सत्ता के दुलारे संतों में की जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री की निकटता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि नरेंद्र मोदी ने 23 फ़रवरी 2025 को बागेश्वर धाम का दौरा किया। यहाँ धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री ने बड़ी ही चतुराई से मोदी के गले में अपना नाम लिखा हुआ पटका तक डाल दिया। यहाँ  मोदीने एक कैंसर अस्पताल का शिलान्यास किया। प्रधानमंत्री से  इस ‘घनिष्ट निकटता’ के बाद अब धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री को किसी वरिष्ठ संत या शंकराचार्य से किसी तरह का प्रमाण पत्र लेने की ज़रुरत ही क्या ?

                            इसी तरह सत्ता के एक और प्रिय संत हैं स्वामी रामभद्राचार्य जी। भारत सरकार ने उन्हें 2015 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया है। यह भारत का दूसरा सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार है। इसके बाद उन्हें साहित्य के क्षेत्र में 2023 के लिए सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार भी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 16 मई 2025 को प्रदान किया गया । ज्ञानपीठ भारत का सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार है। देश के सम्मानित संतों में गिनती होने के बावजूद स्वामी रामभद्राचार्य जी अपने बयानों के कारण कभी कभी विवादों में भी घिर जाते हैं। उदाहरण के तौर पर रामभद्राचार्य स्वयं को श्रेष्ठतम ब्राह्मण बता चुके हैं क्योंकि उनके अनुसार वे ‘वशिष्ठ वंशीय सरयू पारण ब्राह्मण हैं। इनका परिवार परंपरागत रूप से विद्यार्थियों को निःशुल्क शिक्षा देता रहा है। जबकि उन्होंने चौबे,उपाध्याय, त्रिगुणायत, दीक्षित, पाठक उपनामों के ब्राह्मणों को “नीच” या “अधम” कहा, क्योंकि वे विद्यार्थियों से शुल्क लेकर पढ़ाते हैं, जिसे वे गोमांस के समान पापपूर्ण मानते हैं। रामभद्राचार्य जी के अनुसार ऐसे “उच्च कुल” ब्राह्मण अपनी बेटियां अधम ब्राह्मणों को नहीं देते। रामभद्राचार्य जी के इस बयान से ब्राह्मण समाज में आक्रोश फैल गया था। वे अपने ब्राह्मण होने पर गर्व जताते हुए कहते हैं कि पहले वे ब्राह्मण हैं, फिर सन्यासी और जगद्गुरु। रामभद्राचार्य जी के कई बयानों को दलित विरोधी भी माना गया है। ख़ासकर उनके द्वारा की गयी आरक्षण, अंबेडकर और जातिगत टिप्पणियों को लेकर । वे मेरठ में अपनी एक कथा में अंबेडकर को संस्कृत न जानने वाला तथा मनुस्मृति को पहला संविधान भी बता चुके हैं। वे यह भी कह चुके हैं कि “जो राम को नहीं भजता वह चमार है”। उनके इस तरह के बयानों को उनकी जातिवादी सोच के नज़रिये से देखा गया।

                                परन्तु शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी ने तो रामभद्राचार्य जी को विकलांग बताकर उनके संन्यासी होने के अधिकार को ही चुनौती दे डाली है ? शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी ने कहा कि नारद परिव्राजक उपनिषद और संन्यास उपनिषद जैसे धर्म शास्त्रों के अनुसार कोई भी शारीरिक रूप से अक्षम, जैसे नेत्रहीन अर्थात विकलांग व्यक्ति संन्यास नहीं ले सकता। वे रामभद्राचार्य को शास्त्र-विरुद्ध बताते हुए ‘ढोंगी’ और ‘संन्यास का अधिकार न होने वाला’ व्यक्ति कहते हैं। उनका तर्क है कि विकलांग व्यक्ति संन्यासी नहीं हो सकता, इसलिए रामभद्राचार्य (जो जन्म से नेत्रहीन हैं) खुद को जगद्गुरु या संन्यासी कहकर घूम रहे हैं, जो शास्त्र-विरुद्ध है। अब भक्तों को कैसे पता चले कि अविमुक्तेश्वरानंद जी ठीक कह रहे हैं या रामभद्राचार्य जी ? उधर रामभद्राचार्य जी भी अविमुक्तेश्वरानंद जी को शंकराचार्य मानने से इंकार करते हैं। ज़ाहिर है इन हालत में भक्तजन इस बात को लेकर सांसत में हैं कि कौन संत है और कौन असंत ?                                                               

      निर्मल रानी 

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