केरल कांग्रेस में अंदरूनी कलह,शशि थरूर ने नेतृत्व की अनदेखी पर जताया असंतोष

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नई दिल्ली/कोझिकोड, 24 जनवरी (हि.स.)। केरल में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की इकाई में एक बार फिर अंदरूनी कलह सामने आ गई है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता और त्रिवेंद्रम से सांसद डॉ. शशि थरूर ने पार्टी हाईकमान द्वारा उनके साथ किए गए व्यवहार पर खुलकर नाराजगी जताई है।

यह विवाद 19 जनवरी, 2026 को कोच्चि में आयोजित “महा पंचायत” कार्यक्रम से शुरू हुआ, जहां लाेकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के मंच पर आने के बाद थरूर को अपना भाषण छोटा करना पड़ा। वहीं, राहुल गांधी ने अपने संबोधन में थरूर का नाम तक नहीं लिया, जबकि अन्य कई नेताओं का जिक्र किया।

कोझिकोड में शनिवार को मीडिया से बातचीत में शशि थरूर ने कहा कि उन्होंने अपनी शिकायतें पार्टी नेतृत्व को पहले ही लिखित रूप में सौंप दी हैं। उन्होंने स्पष्ट किया, “मैं सार्वजनिक बहस से बचना पसंद करता हूं और अपनी चिंताओं को पार्टी के आंतरिक मंचों पर ही उठाता हूं। मीडिया में मेरे असंतोष के बारे में कुछ रिपोर्टें सही हैं, तो कुछ गलत भी।”

दिल्ली में केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (केपीसीसी) और हाईकमान के बीच केरल में इसी साल हाेने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर हुई महत्वपूर्ण बैठक में शशि थरूर की अनुपस्थिति ने विवाद को और हवा दी।

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, थरूर ने पहले से ही अपनी अनुपस्थिति की जानकारी दे दी थी, क्योंकि वह कोझिकोड में आयाेजित केरल लिटरेचर फेस्टिवल में व्यस्त थे। हालांकि, सूत्रों का कहना है कि असली वजह कोच्चि कार्यक्रम में मिला कथित अपमान है, जहां प्रोटोकॉल का उल्लंघन हुआ और उन्हें साइडलाइन किया गया।

दूसरी ओर, पार्टी के वरिष्ठ नेता रमेश चेन्निथला ने विवाद को कम करने की कोशिश में थरूर को “कांग्रेस का अभिन्न अंग” बताया और कहा कि उनकी गैरमौजूदगी अक्सर पेशेवर प्रतिबद्धताओं के कारण होती है, न कि राजनीतिक विरोध के। फिर भी, पार्टी के अंदर तनाव बरकरार है।

थरूर के समर्थक मानते हैं कि पार्टी को उनके अनुभव और योगदान का सम्मान करना चाहिए, जबकि अन्य नेता चुनाव से पहले किसी भी विवाद से बचने की बात कह रहे हैं।

वहीं, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केरल में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले यह अंदरूनी कलह कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती है। थरूर जैसे प्रभावशाली और अनुभवी नेता की नाराजगी संगठनात्मक एकता, उम्मीदवार चयन और चुनावी रणनीति पर असर डाल सकती है। यदि हाईकमान समय रहते संवाद नहीं स्थापित कर पाया, तो यह पार्टी की एकजुट छवि को नुकसान पहुंचा सकता है और यूडीएफ की संभावनाओं को कमजोर कर सकता है।

कांग्रेस अब थरूर और अन्य नेताओं के बीच सामंजस्य बिठाने की कोशिश में जुटी है, ताकि आगामी चुनावों में मजबूत मोर्चा पेश किया जा सके।

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