
विश्व एड्स दिवस हर वर्ष 1 दिसंबर को एचआईवी/एड्स के प्रति जागरूकता बढ़ाने, इससे जुड़े मिथकों को मिटाने और एड्स से प्रभावित लोगों के प्रति संवेदना व्यक्त करने के उद्देश्य से मनाया जाता है। यह दिवस हमें न केवल इस वैश्विक स्वास्थ्य चुनौती को समझने का अवसर देता है, बल्कि उन प्रयासों को भी सलाम करता है जो सरकारें, स्वास्थ्य संगठन, स्वयंसेवी समूह और समाज मिलकर इस बीमारी से लड़ने के लिए कर रहे हैं। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में यह दिवस और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि एचआईवी/एड्स के मामले और उनके समाधान समाज के व्यापक स्वास्थ्य ढांचे से जुड़े हुए हैं
भारत ने पिछले दो दशकों में एचआईवी/एड्स नियंत्रण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है। 2000 के दशक की शुरुआत में देश में संक्रमित व्यक्तियों की संख्या तेजी से बढ़ रही थी, लेकिन राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (NACO) और विभिन्न राज्य सरकारों के सतत अभियानों से संक्रमण दर में उल्लेखनीय कमी आई। आज भारत विश्व में एचआईवी संक्रमणों के बोझ वाले शीर्ष देशों में होते हुए भी संक्रमण को नियंत्रित करने के सफल उदाहरणों में शामिल है।
देश के कुछ राज्यों—जैसे महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, मणिपुर और नागालैंड—में संक्रमण दर अपेक्षाकृत अधिक रही है, लेकिन जागरूकता, परीक्षण सुविधाओं और इलाज की उपलब्धता बढ़ने से स्थिति धीरे-धीरे सुधर रही है।
भारत में एचआईवी संक्रमण का सबसे बड़ा कारण असुरक्षित यौन संबंध हैं। इसके अलावा संक्रमित सीरिंजों का उपयोग, रक्त संक्रमण, जन्म के दौरान मां से बच्चे में संक्रमण और असुरक्षित चिकित्सा प्रक्रियाएं भी इसके प्रसार के कारण हैं।
जोखिम समूहों में हाई-रिस्क व्यवहार वाले समूह प्रमुख हैं—जैसे वाणिज्यिक यौनकर्मी, ट्रक चालक, इंजेक्शन द्वारा नशीले पदार्थ लेने वाले लोग, ट्रांसजेंडर समुदाय तथा पुरुष-से-पुरुष यौन संबंध रखने वाले पुरुष (MSM)। सरकार और गैर-सरकारी संगठन इन समूहों के लिए विशेष जागरूकता और उपचार कार्यक्रम चलाते हैं।
भारत में एचआईवी/एड्स नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम (NACP) सबसे प्रमुख सरकारी योजना है। यह कार्यक्रम जागरूकता अभियान, एचआईवी परीक्षण केंद्र, काउंसलिंग सेवाएं, ART (एंटी-रेट्रो वायरल थेरेपी) उपचार, गर्भवती महिलाओं की जांच और संक्रमण को रोकने के उपायों पर केंद्रित है।
सरकार ने देशभर में हजारों ART केंद्र स्थापित किए हैं, जहां संक्रमित व्यक्ति जीवनभर मुफ्त उपचार प्राप्त कर सकते हैं। इसके अलावा ‘90-90-90’ लक्ष्य (90% संक्रमित व्यक्तियों की पहचान, 90% को उपचार, और 90% में वायरल लोड नियंत्रण) को हासिल करने की दिशा में लगातार प्रगति की जा रही है।
एड्स के प्रति समाज में मौजूद भ्रांतियां और भेदभाव संक्रमित व्यक्तियों के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक हैं। आज भी कई क्षेत्रों में एचआईवी संक्रमित लोगों को सामाजिक दूरी, रोजगार में भेदभाव, रिश्तों में अस्वीकार और स्वास्थ्य सुविधाओं में उपेक्षा झेलनी पड़ती है।
विश्व एड्स दिवस जैसे अवसर इस भेदभाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। स्कूलों, कॉलेजों, पंचायतों और शहरी क्षेत्रों में रैलियां, पोस्टर अभियान, स्वास्थ्य शिविर और संवाद कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनसे जागरूकता फैलती है और समाज को वैज्ञानिक जानकारी मिलती है।
एचआईवी से बचाव पूरी तरह संभव है, बशर्ते आवश्यक सावधानियों का पालन किया जाए। असुरक्षित यौन संबंध से बचना, कंडोम का नियमित उपयोग, नशीले पदार्थों के लिए साझा सुई का प्रयोग न करना, केवल प्रमाणित रक्त का ही उपयोग करना और गर्भवती महिलाओं की समय पर जांच कराना प्रमुख उपाय हैं।
सरकार और संगठनों द्वारा कंडोम वितरण, टेस्टिंग कैंप और पीपीटीसीटी (Prevention of Parent to Child Transmission) जैसी योजनाओं से संक्रमण रोकथाम के प्रयास लगातार किए जा रहे हैं।
आज एचआईवी संक्रमित व्यक्ति भी पूर्ण जीवन जी सकता है। ART दवाओं की वजह से वायरस की मात्रा शरीर में इतनी कम हो जाती है कि रोगी स्वस्थ जीवन जी सकता है और दूसरों को संक्रमण फैलने का खतरा भी कम हो जाता है।
भारत में चिकित्सा अनुसंधान संस्थान वैक्सीन और दीर्घकालीन उपचार पद्धतियों पर काम कर रहे हैं। दवाओं की किफायती कीमत और सरकारी सहायता ने उपचार को और आसान बनाया है। इससे मृत्यु दर और संक्रमण दर दोनों में कमी आई है।
यह दिन न केवल एचआईवी/एड्स के प्रति जागरूकता बढ़ाने का अवसर है बल्कि समाज में दया, सम्मान और समर्थन का संदेश भी देता है। यह अवसर उन लाखों लोगों को याद करने का भी है जिन्होंने एड्स के कारण अपनी जान गंवाई और उन स्वास्थ्य योद्धाओं को सम्मानित करने का जिनके अथक प्रयासों ने लाखों जीवन बचाए हैं।
भारत में इस दिन सरकारी भवनों, अस्पतालों, स्कूलों और संस्थानों में कार्यक्रम आयोजित होते हैं। लाल रिबन पहनने की परंपरा भी इसी दिन की पहचान है, जो जागरूकता और समर्थन का प्रतीक है।
भारत ने एचआईवी/एड्स से लड़ाई में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं—खासकर सामाजिक भेदभाव और जागरूकता की कमी के क्षेत्र में। आवश्यकता है कि समाज, सरकार और स्वास्थ्य सेवा प्रदाता मिलकर एक ऐसी वातावरण का निर्माण करें जहाँ एचआईवी संक्रमित व्यक्तियों को सम्मान, सहायता और उचित उपचार मिले।
विश्व एड्स दिवस हमें यही संदेश देता है कि शिक्षा, जागरूकता, सहानुभूति और वैज्ञानिक उपायों के माध्यम से हम एचआईवी-मुक्त भारत की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ सकते हैं।


