आज जम्मू− कश्मीर का भारत में हुआ था विलय

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1925 का साल था। जम्मू-कश्मीर के इतिहास में एक नया अध्याय खुलने जा रहा था। महाराजा हरि सिंह ने जब गद्दी संभाली तो उनकी शुरुआत किसी आधुनिक युग के शासक की तरह हुई। ताजपोशी के तुरंत बाद उन्होंने जो घोषणाएँ कीं, वे इतनी क्रांतिकारी थीं कि पूरा राज्य चकित रह गया। इतिहासकार एच.एल. सक्सेना ने अपनी किताब “The Tragedy of Kashmir” में लिखा है कि अपने पहले ही संबोधन में हरि सिंह ने कहा था— “मैं एक हिंदू हूँ, लेकिन शासक के रूप में मेरा धर्म केवल न्याय है।” उन्होंने न सिर्फ़ यह कहा बल्कि उसे निभाया भी। वह ईद के जश्नों में शामिल हुए, और जब 1928 में श्रीनगर बाढ़ में डूबा तो वे स्वयं बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों का दौरा करने पहुँचे।

क्रांतिकारी राजा और ‘खुशामदी टट्टू अवार्ड’

हरि सिंह चापलूसी और चमचागिरी से सख़्त नफरत करते थे। उनके मंत्री जॉर्ज एडवर्ड वेकफ़ील्ड के हवाले से एम.वाई. सर्राफ़ ने लिखा कि महाराजा ने हर साल एक विशेष “खुशामदी टट्टू अवार्ड” देने की घोषणा की थी — यह अवार्ड उस व्यक्ति को दिया जाता था जो साल का सबसे बड़ा “चमचा” हो! कहा जाता है कि यह अवार्ड बंद दरबार में दिया जाता था ताकि लोग समझें कि सत्ता के करीब पहुँचने का रास्ता खुशामद नहीं, काम है।

आधुनिकीकरण की दिशा में साहसिक कदम

अपने राजतिलक समारोह में ही हरि सिंह ने जम्मू और कश्मीर घाटी में 50-50, तथा गिलगित और लद्दाख में 10-10 स्कूल खोलने की घोषणा की। उन्होंने आदेश दिया कि इन स्कूलों के निर्माण के लिए लकड़ी वन विभाग से मुफ़्त मिलेगी। इसके अलावा, उन्होंने तकनीकी शिक्षा का विस्तार, श्रीनगर में अस्पताल की स्थापना, और पीने के पानी की व्यवस्था जैसे कई कार्य शुरू किए।
उन्होंने विवाह की न्यूनतम आयु तय की — लड़कों के लिए 18 वर्ष और लड़कियों के लिए 14 वर्ष। उन्होंने बच्चों के लिए टीकाकरण को अनिवार्य किया और किसानों को महाजनों से मुक्ति दिलाने के लिए “कृषि राहत अधिनियम” बनाया। अनिवार्य शिक्षा लागू की गई — लोग इसे “जबरी स्कूल” कहने लगे, क्योंकि अब हर बच्चे को स्कूल भेजना ज़रूरी था।

दलितों के लिए मंदिरों के द्वार खोलने वाला पहला शासक

अक्टूबर 1932 में हरि सिंह ने एक ऐसा कदम उठाया जिसने भारतीय समाज को हिला दिया। उन्होंने राज्य के सभी मंदिरों को दलितों के लिए खोल दिया — यह निर्णय गांधीजी के छुआछूत विरोधी आंदोलन से भी पहले का था। यह अपने समय का सबसे प्रगतिशील और साहसी फ़ैसला था। इस घोषणा के विरोध में रघुनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी ने इस्तीफ़ा दे दिया, लेकिन हरि सिंह डरे नहीं। कोल्हापुर के शाहूजी महाराज के बाद इस तरह की सामाजिक समानता का उदाहरण शायद ही कहीं और मिला हो।

‘कश्मीर कश्मीरियों के लिए’ और राज्य उत्तराधिकार कानून

1889 के बाद से बाहरी अधिकारियों का कश्मीर में प्रभाव बढ़ गया था। नौकरियों में पंजाबी अधिकारियों का दबदबा था, जिससे स्थानीय कश्मीरी — चाहे पंडित हों या मुसलमान — दोनों ही हाशिए पर चले गए। जब 1925 में हरि सिंह राजा बने, तब तक यह असंतोष चरम पर पहुँच चुका था।
उन्होंने इस अन्याय को समाप्त करने के लिए 31 जनवरी 1927 को “राज्य उत्तराधिकार कानून” लागू किया, जिसके तहत केवल वे लोग “राज्य के नागरिक” माने गए जो महाराजा गुलाब सिंह के समय से कश्मीर में रह रहे थे। बाहरी लोगों को ज़मीन खरीदने, सरकारी नौकरी पाने और ठेके लेने से रोक दिया गया। यही कानून आगे चलकर अनुच्छेद 35-ए की नींव बना।

शुरुआती आदर्शवाद से अधिनायकवाद तक

हरि सिंह की शुरुआत भले ही प्रगतिशील थी, लेकिन समय के साथ वह राजपूत कुलीनतंत्र के प्रतीक बन गए। उच्च पदों पर डोगराओं का कब्जा हो गया और सेना में केवल राजपूतों को जगह मिलने लगी। जब शिक्षित मुस्लिम युवाओं ने अपनी हिस्सेदारी माँगी, तो टकराव बढ़ा और 1930 के दशक में कश्मीर आंदोलन की नींव पड़ी।
शेख अब्दुल्ला इसी आंदोलन से उभरे और आगे चलकर “नेशनल कॉन्फ्रेंस” की स्थापना की।

ब्रिटिशों से टकराव और लोकप्रियता का पतन

तीस के दशक में हरि सिंह की नीतियाँ बदल गईं। उन्होंने गोलमेज़ सम्मेलन में भारत के लिए ब्रिटिश राष्ट्रमंडल में समान अधिकारों की माँग की थी, जिससे अंग्रेज़ नाराज़ हो गए। गिलगित के नियंत्रण को लेकर भी उन्होंने ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी। लेकिन जब घाटी में असंतोष भड़का, तो ब्रिटिश सरकार ने उनकी जगह एक ब्रिटिश प्रधानमंत्री नियुक्त करवाया और प्रमुख मंत्रालय अपने अधिकारियों को दे दिए।
धीरे-धीरे उन्होंने जनता का विश्वास खो दिया। मंदी के दौर में उद्योग बर्बाद हुए, और शॉल उद्योग ढह गया। 1946 तक स्थिति इतनी बिगड़ गई कि शेख अब्दुल्ला ने “कश्मीर छोड़ो आंदोलन” शुरू किया — हरि सिंह अब जनता के लिए अत्याचारी शासक बन चुके थे।

सिंहासन तक का सफर – अंग्रेज़ी शिक्षा और कांडों की परछाई

हरि सिंह का रास्ता आसान नहीं था। वह महाराजा प्रताप सिंह के भतीजे थे, लेकिन उत्तराधिकारी नहीं माने जाते थे। अंग्रेजों ने उन्हें गद्दी के लिए तैयार किया। मेयो कॉलेज, अजमेर और देहरादून के इम्पीरियल कैडेट कोर में उनकी शिक्षा हुई।
लेकिन 1921 में जब वह ब्रिटेन गए, तो एक सेक्स स्कैंडल में फँस गए। मामला इतना बड़ा था कि सरकारी खज़ाने से रकम देकर उसे दबाना पड़ा। इस घटना ने उनकी छवि को झटका दिया, लेकिन उनकी प्रशासनिक कुशलता के कारण वे जल्द ही प्रमुख भूमिका में लौट आए।

भारत का विभाजन और आखिरी फैसला

15 अगस्त 1947 को जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब जम्मू-कश्मीर भी आज़ाद था। हरि सिंह ने भारत और पाकिस्तान दोनों से “स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट” का प्रस्ताव रखा — यथास्थिति बनी रहे। लेकिन पाकिस्तान ने इसे तोड़ते हुए कबायली हमले करवाए।
हरि सिंह समझ गए कि अकेले युद्ध संभव नहीं। भारत ने सहायता के बदले विलय की शर्त रखी। 26 अक्टूबर 1947 को उन्होंने भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। इस तरह “आज़ाद डोगरिस्तान” का सपना समाप्त हो गया।

डोगरा शासन का अंत और गुमनामी में अंतिम समय

हरि सिंह श्रीनगर से जम्मू लौटे — 48 ट्रकों में अपने कीमती गहने, कालीन, पेंटिंग्स और पेट्रोल का पूरा कोटा लेकर। वे फिर कभी श्रीनगर नहीं लौटे। 1949 में उन्हें सत्ता से हटा दिया गया और वे मुंबई चले गए, जहाँ 1961 में उनकी मृत्यु हो गई — लगभग गुमनाम ढंग से।
उनके बेटे कर्ण सिंह ने लिखा— “मेरे पिता के रिश्ते उस समय की चारों ताकतों से खराब थे — ब्रिटिश, कांग्रेस, मुस्लिम लीग और नेशनल कॉन्फ्रेंस। इसलिए जब फैसला करने का वक़्त आया, तो हर कोई उनके खिलाफ था।”

हरि सिंह – एक राजा जो अपने समय से आगे था

हरि सिंह ने अपने शासन में न्याय, शिक्षा और समानता के जो कदम उठाए, वे अपने समय से बहुत आगे थे। पर राजनीति, सांप्रदायिकता और ब्रिटिश प्रभाव ने उन्हें इतिहास के पन्नों में पीछे धकेल दिया।
26 अक्टूबर 1947 को लिए गए उनके फैसले ने भारत की अखंडता को हमेशा के लिए मजबूत कर दिया — और यही निर्णय उन्हें इतिहास में अमर बनाता है।

ओल्ड इज गोल्ड से साभार

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