अरावली पर्वत शृंखला : प्राकृतिक धरोहर को संभालना होगा

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योगेश कुमार सोनी

राजस्थान में अरावली पर्वत शृंखला (अरावली की पहाड़ियां) इन दिनों राजनीतिक जंग का मैदान बनी हुई हैं। अरावली को सब अपने-अपने हिसाब से परिभाषित कर रहे हैं। इस पर जबरदस्त विवाद छिड़ा हुआ है। भाजपा कह रही है कि पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जो ‘सेव अरावली’ कैंपेन चला रहे थे, उन्हीं के कार्यकाल में अरावली 100 मीटर की परिभाषा की सिफारिश की गई थी और हमने वो ही किया। हमें पहले यह समझना चाहिए कि अरावली भारत की रीढ़ है जो चार राज्यों से गुजरती है। यह उत्तर-पश्चिम भारत में लगभग 670 किलोमीटर लंबी मानी जाती है। यह दिल्ली के पास से शुरू होकर दक्षिण हरियाणा और राजस्थान के अंदर तक जाती है और फिर गुजरात में अहमदाबाद के आसपास के मैदानों तक पहुंचती है। भूगोलविद् सीमा जालान बताती हैं कि अरावली 67 करोड़ वर्ष पुरानी पर्वतमाला है और यह नहीं होतीं तो उत्तर भारत की जाने कितनी नदियां नहीं होतीं। जाने कितने जंगल, कितनी वनस्पतियां, कितने बहुमूल्य धातु और कितने इकोलॉजिकल वैभव नहीं होते।

विशेषज्ञों के अनुसार, अरावली केवल जीव-जंतुओं के लिए ही नहीं बल्कि इंसानों के लिए भी जीवनरेखा है। केंद्र सरकार ने 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली घोषित किया है और इस पर उच्चतम न्यायालय ने इस पर अपनी मुहर लगा दी। इसके अलावा हरियाणा सरकार के हस्तक्षेप करने का कारण यह है कि अरावली का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा उसके अधिकार क्षेत्र में आता है और बाकी हिस्सा राजस्थान में है। कुछ लोग कह रहे हैं कि बीते कई वर्षों से अरावली में चोरी-छुपे खनन हुआ है और 100 मीटर की परिभाषा काकोई औचित्य नहीं है।

कांग्रेस का आरोप है कि देश में प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है, वहीं केंद्र सरकार अरावली जैसी प्राकृतिक दीवार को कमजोर करने का काम कर रही है। उच्चतम न्यायालय में केंद्र सरकार की पैरवी भाजपा शासित चारों राज्यों की सरकारों ने की, जिससे सरकार की मंशा साफ नजर आती है। पहले ही अरावली में बड़े स्तर पर अवैध खनन हो रहा है। बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार हो रहा है, ऐसे में कैसे बचेगी अरावली और कैसे बचेगा पर्यावरण?

यह सब जानते हैं कि कोई भी प्राकृतिक व ऐतिहासिक धरोहर नष्ट या क्षतिग्रस्त अचानक नहीं होती। ऐसा होने में लंबा समय लगता है और यह खुला खेल हमेशा शासन-प्रशासन के सामने ही होता रहा है। शासन-प्रशासन को लगता है कि जनता को कुछ समझ नहीं आ रहा। यह कहने में संकोच नहीं कि अन्य देशों की अपेक्षा पर्यावरण व प्राकृतिक धरोहरों को बचाने व संभालने में हम उतने सक्षम नहीं हैं, जितने की हमें जरूरत हैं। दरअसल बात यह है कि लगातार बढ़ रही जनसंख्या को व्यवस्थित करने के लिए हम पर्यावरण व धरोहरों का विनाश करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाते हुए और हाई टेक दुनिया का निर्माण करना गलत नही हैं लेकिन मानव जीवन की सबसे अहम व मूलभूत जरूरत को दरकिनार करके तरक्की करना अपराध सा लगता है। प्रदूषण हमारा सबसे बड़ा दुश्मन बना हुआ है। इसका कारण भी धरोहरों को नष्ट करना है।

देश की तरक्की व जनता की जरूरत के लिए ऐसे मुद्दों की गंभीरता न समझना मानव जीवन पर ही भारी पड़ रहा है। मनुष्य की शहरीकरण की भूख ने प्रकृति को इतनी हानि पहुंचा दी कि उसको यह मालूम ही नहीं पड़ा कि वो कब काल के गर्भ में प्रवेश कर गया। यदि महानगरों की जीवनशैली की चर्चा करें तो पिछले दो दशकों कम आयु में होने वाली मौतों के आंकडे ने चौंका दिया। मनुष्य की आयु का घटना लगातार जारी है। इंसान की उम्र करीब 100 वर्ष होती थी लेकिन आज के दौर में साठ साल पर आकर सीमित रह गई। वैज्ञानिकों के अनुसार, लगातार हो रही आपदाओं के लिए प्राकृतिक संसाधनों का बेतहाशा इस्तेमाल जिम्मेदार है। उनका मानना है कि आज हमारी धरती अपने भार से कहीं अधिक भार वहन कर रही है। अगर यही हाल रहा तो अगले कुछ वर्ष बाद ही धरती रहने लायक नहीं बचेगी। मनुष्य अब भी सही राह पर चलने लगो तो वह अपना भविष्य सुधार सकता है। पर्यावरणविद् मानते हैं कि अगर इस परिभाषा को स्वीकार कर लिया जाएगा, तो अरावली के 90 फीसदी इलाके खनन के लिए खुल जाएंगे, जिससे आने वाले समय में समस्या और बढ़ेगी।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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