अगर पत्नी की गलतियों से पति कमाने में असमर्थ हो जाए तो वह भरण-पोषण का दावा नहीं कर सकती : हाईकोर्ट

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प्रयागराज, 23 जनवरी (हि.स.)। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि अगर कोई पत्नी अपने कामों या गलतियों से अपने पति की कमाने की क्षमता को खत्म करती है या उसमें योगदान देती है तो उसे ऐसी स्थिति का फायदा उठाने और मेंटेनेंस का दावा करने की इजाज़त नहीं दी जा सकती।

जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला की कोर्ट ने फैसला सुनाया कि ऐसे मामले में मेंटेनेंस देना “गंभीर अन्याय” होगा। खासकर जब पति की कमाने की क्षमता पत्नी के परिवार के आपराधिक कामों से खत्म हो गई हो।

कोर्ट ने आगे कहा कि भारतीय समाज में यह माना जाता है कि एक पति से, भले ही उसके पास रेगुलर नौकरी न हो, उम्मीद की जाती है कि वह अपनी क्षमता के अनुसार खुद और अपने परिवार का पेट पालने के लिए कोई काम करे, लेकिन यह मामला अलग था।

कोर्ट ने कहा, “पहले, दूसरी पार्टी अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने में सक्षम थी और उसके पास पर्याप्त साधन थे, लेकिन याचिकाकर्ता के भाई और पिता द्वारा किए गए आपराधिक कृत्य के कारण उसकी कमाने की क्षमता पूरी तरह से खत्म हो गई।”

इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत अंतरिम मेंटेनेंस की मांग करने वाली पत्नी द्वारा दायर आपराधिक रिवीजन याचिका को खारिज कर दिया।

एडिशनल प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट, कुशीनगर, पडरौना ने 7 मई, 2025 को पत्नी की अंतरिम मेंटेनेंस की अर्जी खारिज कर दी थी। पति एक होम्योपैथिक डॉक्टर था और अपना क्लिनिक चलाता था। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने पाया कि 13 अप्रैल, 2019 को जब वह अपने प्रोफेशनल काम में लगा हुआ था तो याचिकाकर्ता (पत्नी) का सगा भाई और पिता, कुछ अन्य लोगों के साथ, उसके क्लिनिक में आए और गाली-गलौज की।

जब पति ने विरोध किया तो पत्नी के भाई ने गोली चला दी। इस हमले में पति को गंभीर गोली लगी, जिससे एक छर्रा पति की रीढ़ की हड्डी में फंस गया। रिकॉर्ड पर मौजूद मेडिकल सलाह से पता चला कि छर्रे को निकालने के लिए किसी भी सर्जरी में लकवा होने का बहुत ज़्यादा खतरा है। नतीजतन, पति अब थोड़े समय के लिए भी आराम से बैठ नहीं पाता। इस वजह से वह बेरोजगार हो गया और कोई इनकम नहीं कमा पा रहा है।

हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ता-पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि उसके अंतरिम मेंटेनेंस की अर्जी को खारिज करने वाला आदेश गैर-कानूनी और मनमाना था, क्योंकि पति पत्नी को मेंटेनेंस देने के लिए बाध्य है। हालांकि, हाईकोर्ट ने पाया कि इस मामले में, पति की मेडिकल कंडीशन के बारे में कोर्ट के तथ्यात्मक निष्कर्षों पर कोई विवाद नहीं था।

न्यायालय ने कहा कि हालांकि पत्नी का भरण-पोषण करना पति का पवित्र कर्तव्य है, लेकिन इस मामले के तथ्यों में, पत्नी और उसके परिवार के सदस्यों के व्यवहार ने पति को अपनी आजीविका कमाने में असमर्थ बना दिया था। इस संबंध में कोर्ट ने शमीमा फारूकी बनाम शाहिद खान मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि भरण-पोषण करने की पति की ज़िम्मेदारी उसकी कमाने की क्षमता पर निर्भर करती है।

हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि पति की शारीरिक अक्षमता, खासकर उसकी रीढ़ की हड्डी में गोली लगने से लकवा होने का खतरा, याचिकाकर्ता पक्ष के कारण हुआ था, इसलिए उसे भरण-पोषण न देने के लिए ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इस प्रकार, हाईकोर्ट ने कहा कि निचली अदालत के आदेश में कोई बड़ी अनियमितता या स्पष्ट अवैधता नहीं की थी। कोर्ट ने रिवीजन याचिका खारिज कर दी।

#प्रयागराज, #इलाहाबाद _उच्च_ न्यायालय 

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