सुनो नहरों की पुकार : जब आस्था पर्यावरण से संवाद करती है

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“आस्था का सच्चा स्वरूप यही है कि हम प्रकृति का सम्मान करें, नहरों को निर्मल रखें और आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ जल का उपहार दें।”

 –  डॉ. प्रियंका सौरभ

आज जब हम पूजा, परंपरा और श्रद्धा की बात करते हैं, तो अक्सर भूल जाते हैं कि धर्म का मूल उद्देश्य जीवन की रक्षा है—विनाश नहीं। जल, जो जीवन का आधार है, वही यदि हमारी आस्था के नाम पर अपवित्र हो जाए, तो यह आत्ममंथन का विषय बनता है। “सुनो नहरों की पुकार” ऐसा ही एक जनजागरण अभियान है, जो हमें हमारी ही भूलों से रूबरू कराता है और बताता है कि सच्ची पूजा क्या है।

नहरें सिर्फ़ पानी का बहाव नहीं हैं। वे खेतों की हरियाली, पशुओं की प्यास, गाँवों की संस्कृति और सभ्यता की धमनियाँ हैं। इन्हीं नहरों के सहारे किसान अपने खेतों में सोना उगाता है, पशु जीवन पाते हैं और ग्रामीण समाज की अर्थव्यवस्था चलती है। परंतु आज यही जीवनरेखाएँ हमारी असावधानी और अंधी परंपराओं के कारण कराह रही हैं।

पूजा के बाद की सामग्री—मूर्तियाँ, फूल, कपड़े, प्लास्टिक, सिंदूर, अगरबत्ती, नारियल, यहाँ तक कि मृत पालतू पशु—नहरों में प्रवाहित कर दिए जाते हैं। जो कर्म श्रद्धा के नाम पर किए जाते हैं, वे दरअसल प्रकृति के विरुद्ध अपराध बन चुके हैं।

इसी पीड़ा और चिंता से जन्मा “सुनो नहरों की पुकार” अभियान। इसकी शुरुआत रोहतक में डॉ. जसमेर सिंह हुड्डा (संयोजक) और हिसार में माननीय भूपेंद्र सिंह गोदारा के प्रयासों से हुई। यह कोई एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि वर्षों की तपस्या और निरंतर जागरूकता का परिणाम है।

यह अभियान न किसी राजनीतिक लाभ के लिए है, न किसी संगठनात्मक प्रसिद्धि के लिए। इसका उद्देश्य केवल एक है—नहरों को प्रदूषण से मुक्त करना और समाज की सोच में बदलाव लाना।

गुरेरा गाँव की मिट्टी से उठे मास्टर भूपेंद्र गोदारा ने इस अभियान को जन-जन तक पहुँचाने का संकल्प लिया। उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चले अनेक जागरूक साथी—सुबेदार मेजर दलीप सिंह, टेकचन्द बागड़ी, श्री दलवीर पोटलिया, रिटायर्ड आचार्य विजेन्द्र सिंह, कृष्ण कुमार, प्राचार्य अजीत सिंह, निहाल सिंह गोदारा, श्री पवन कुमार सहित कई समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता। इन सभी का स्पष्ट विश्वास है कि जब तक समाज अपनी आदतें नहीं बदलेगा, तब तक नहरों की आत्मा को शांति नहीं मिलेगी। नियम-कानून अपनी जगह हैं, पर वास्तविक बदलाव तभी आएगा जब जनमानस जागेगा।

कोरोना जैसे भयावह समय में भी यह कारवाँ नहीं रुका। रविवार हो या छुट्टी, त्योहार हो या बारिश—टीम नहरों के किनारे हाथों में तख्तियाँ लिए खड़ी दिखाई दी। तख्तियों पर लिखे वाक्य केवल नारे नहीं थे, बल्कि समाज से संवाद थे—

“जल है तो कल है”, “नहरों को प्रदूषित मत करो”, “आस्था है तो स्वच्छता भी हो”।

हिम्मत सिंह, राममूर्ति, नरेंद्र कुल्हड़िया, प्रवीण वकील, सुरेंद्र गोदारा, संदीप, सीताराम, शेर सिंह, विकास गोदारा, रामभगत पुनिया जैसे समाजसेवियों ने इस आवाज़ को मजबूती दी। वहीं सुमन गोदारा, संतोष गोदारा, रचना, पुष्पा, कमला, सुनीता, शीला, तारा देवी, सुदेश ढांडा जैसी महिलाओं की सक्रिय भागीदारी ने अभियान को सामाजिक गहराई प्रदान की।

गुरेरा से इंस्पेक्टर उदयभान गोदारा ने भी लोगों से आह्वान किया कि जब तक यह संदेश हर गली और हर घर तक नहीं पहुँचेगा, तब तक बदलाव अधूरा रहेगा। जब जीवनदायिनी जलधारा में प्लास्टिक, रसायन और जैविक कचरा घुल जाता है, तो वही जल विष बन जाता है। यह विषाक्त जल खेतों में जाता है, मिट्टी को बीमार करता है, फसलों की गुणवत्ता घटाता है और अंततः हमारे भोजन में प्रवेश करता है।

यह संकट केवल कृषि तक सीमित नहीं है। नहरों का पानी पीने वाले पशु, पक्षी और अन्य जीव रोगग्रस्त हो जाते हैं। जलजनित रोग, त्वचा रोग, पाचन संबंधी समस्याएँ और दीर्घकाल में गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ता जा रहा है। वैज्ञानिक लगातार चेतावनी दे रहे हैं कि जल प्रदूषण मानव स्वास्थ्य के लिए एक मौन आपदा बन चुका है।

“सुनो नहरों की पुकार” अभियान का मूल संदेश सीधा और स्पष्ट है—धर्म का अर्थ है प्रकृति की रक्षा। यदि भगवान सर्वव्यापी हैं, तो वे नदियों, नहरों, पेड़ों और जीवों में भी हैं। फिर उनकी पूजा के नाम पर इन्हीं तत्वों को दूषित करना कैसी आस्था है? पूजा सामग्री को नहरों में बहाना धर्म नहीं, बल्कि अधर्म है।

मास्टर भूपेंद्र गोदारा का प्रश्न समाज से सीधा संवाद करता है— “हे प्रभु, आपके नाम पर लोग प्रकृति का इतना अपमान क्यों कर रहे हैं? यह कैसी श्रद्धा है, जो जीवनदायिनी नहरों को विष से भर रही है?” यही प्रश्न इस आंदोलन की आत्मा है।

कोई भी आंदोलन तब तक सफल नहीं होता, जब तक जनता उसका हिस्सा न बने। इस अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि इसने हजारों लोगों की सोच बदली है। अब अनेक स्थानों पर लोग पूजा सामग्री को नहरों में बहाने के बजाय मिट्टी में दबा रहे हैं, पौधों के नीचे रख रहे हैं या जैविक खाद बनाने की ओर बढ़ रहे हैं।

ये छोटे-छोटे कदम दिखने में साधारण हैं, लेकिन इन्हीं से बड़े परिवर्तन जन्म लेते हैं। जब आदतें बदलती हैं, तभी संस्कृति बदलती है। “सुनो नहरों की पुकार” केवल एक चेतावनी नहीं, बल्कि एक सामूहिक प्रार्थना है— नहरों को स्वच्छ रखो, जीवन को सुरक्षित रखो।

यदि नहरें बचेंगी तो खेत हरे-भरे रहेंगे, पशु-पक्षी सुरक्षित रहेंगे और आने वाली पीढ़ियाँ स्वच्छ जल का उपहार पाएँगी। यह अभियान हमें याद दिलाता है कि जल ही जीवन है और इसकी रक्षा करना किसी एक व्यक्ति या संगठन की नहीं, बल्कि हम सबकी साझा जिम्मेदारी है।

आज समय आ गया है कि हम आस्था और अंधविश्वास के बीच का अंतर समझें। सच्ची श्रद्धा वही है, जो जीवन को बचाए—न कि उसे संकट में डाले। “सुनो नहरों की पुकार” दरअसल हमारी अंतरात्मा की पुकार है। सवाल सिर्फ़ इतना है—क्या हम इसे सुनने को तैयार हैं?

— डॉ. प्रियंका सौरभ

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