अनपढ़ होकर भी शिक्षा की अलख जगायी

पुण्यतिथि (25 जनवरी) पर विशेष- सीताराम अग्रवाल
भारत के विभाजन के दंश का शिकार 27 वर्ष का एक युवक पाकिस्तान से सिर्फ तीन कपड़ों में भारत आता है। यहां आने पर अमृतसर के गुरूद्वारा में रूकता है। पर सिर्फ 10-15 दिनों में ही उसकी आत्मा छटपटाने लगती है। ऐसा कैसे चलेगा। वहां से रोजी- रोटी की तलाश में निकल पड़ता है। रास्ते में एक व्यक्ति से 40 रुपये में एक भैंस खरीदता है तथा हाथों-हाथ उसे 102 रुपये में बेच कर उस व्यक्ति को 40 रुपये वापस देकर अपनी कुशाग्र व्यावसायिक बुद्धि का परिचय देता है। कुछ ही समय बाद युवक कलकत्ता (अब कोलकाता) चला आता है तथा अपनी लगन, मेहनत, निष्ठा के बलबूते अरबों रुपये का साम्राज्य खड़ा कर लेता है। परिस्थिति ने इस युवक को पढ़ने का मौका तो नहीं दिया, पर आगे एक ऐसी घटना हुई कि इन्होंने शिक्षण संस्थानों की एक श्रृंखला ही स्थापित कर दी, जहां आज हजारों बच्चे प्रति वर्ष उच्च कोटि की शिक्षा प्राप्त कर न सिर्फ अपनी आजीविका चला रहे हैं, बल्कि देश का नाम भी रोशन कर रहे हैं। कैसे हुआ यह चमत्कार। इस लेख के जरिये मैं इसकी एक झलक दिखाना चाहता हूं, क्योंकि इस महान व्यक्तित्व की वर्षों की लम्बी साधना को थोड़े से शब्दों में नही बांधा जा सकता।
यह मेरा सौभाग्य है कि इस हस्ती का सानिध्य, स्नेह व अपनापन कुछ वर्षों तक मुझे भी मिला। इस शख्सियत का नाम है सरदार जोधसिंह। इन्होंने गाय-भैंस व दूध के कारोबार में विशाल सम्पत्ति अर्जित की । इनके द्वारा स्थापित शिक्षण संस्थानों की श्रृंखला का नाम है- जेआईएस ग्रुप। एक फरवरी 1920 को जन्में जोधसिंह का स्वर्गवास 25 जनवरी 2018 को हुआ है। सरदार जोधसिंह का जन्म अविभाजित पंजाब के मोन्टोगोमेरी जिले के एक सुदूरवर्ती गांव में हुआ था। 1947 में भारत विभाजन के बाद ये वहां से चले आये। लानेवाले ने अमृतसर गुरूद्वारा के पास छोड़ दिया। अब इन्ही के शब्दों में- ‘पाकिस्तान से तीन कपड़े में आने के बाद 10-15 दिन तो गुरुद्वारे में गुजारे। पर सोचा, ऐसा कैसे चलेगा। कुछ धंधा- पानी तो करना चाहिए। मैंने गुरुद्वारे में रह रहे कुछ गांव वालों से पूछा कि वे कहां रहते हैं और क्या करते हैं। जवाब मिला- लुधियाना। मैंने पूछा कि मेरे लिए जगह है। बताया गया कि पूरी जगह खाली पड़ी है। बस निकल पड़ा। रास्ते में एक व्यक्ति भैंस ले जाते हुए दिखायी पड़ा। पूछा- बड़े मिया भैंस बेचेंगे। उसने कहा- हां। मैंने कहा- पाकिस्तान से आये हैं, मेरे पास पैसे नहीं है। मैं इस भैंस के 40 रुपये दे सकता हूँ। थोड़ी देर बाद। बड़े मियां राजी हो गये और उनसे लेकर वह भैंस मैंने 102 रुपये में बेच दी तथा उनके 40 रुपये दे दिये।
इसके कुछ समय बाद सरदार जी कलकत्ता आ गये। यहाँ उन्होंने गाय- भैंस व दूध का धंधा शुरू किया, जो जोर- शोर से चल पडा। यहाँ तक कि कई सरकारी डेयरियों मे इनका दूध सप्लाई होने लगा। फिर तो बंगाल में इनकी कई खटालें (जहाँ सामूहिक रूप से गाय भैंसें रखी जाती हैं, बंगाल में उसे खटाल कहते हैं) हो गयीं। ऐसी ही एक बहुत बड़ी खटाल कमरहट्टी स्थित मेरे घर के पास थी। कहते हैं, वहां करीब 4-5 हजार गाय-भैंसे थीं।
उस इलाके में एक विद्यालय में गणतंत्र दिवस समारोह में मेरा परिचय इनसे हुआ था। यह सिलसिला वर्षों चला । 15 अगस्त, सरस्वती पूजा के साथ विभिन्न समारोहों में हम मिलते रहे। मैंने एक बात और नोटिस की। वो कभी भाषण नहीं देते थे। उनके हिस्से की खानापूरी मुझे ही करनी पड़ती थी। शुरू-शुरू में कुछ बातें आशीर्वाद स्वरूप ही बोलने के लिए मैं जोर देता था तो वे मेरी पीठ थपथपा कर कहते- पुत्तर, आप अच्छा बोलते हो। आप ही बोलो। बाद में मुझे समझ में आया कि सरदार जी बोलने से ज्यादा कर्म करने में विश्वास करते थे। हां स्कूलों को आर्थिक मदद करने में कोई कोताही नहीं बरतते थे। आगे चल कर इसी खटाल के एक हिस्से में इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना की गयी, जिसका उद्घाटन तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने किया था। मुझे भी सरदार जी ने इस समारोह में आमंत्रित किया था। उन्होंने ज्योति बसु को तलवार भेंट की थी।
अब मैं बताता हूं कि वह घटना क्या धी, जिसकी वजह से दूध व्यवसाय के साथ ही सरदार जोधसिंह शिक्षण संस्थानों के निर्माण में जुट गये और जेआईएस ग्रुप ही बना डाला। उन्ही के शब्दों में-‘ मैं नहीं पढ़ सका, क्योंकि पैसे नहीं थे। पर बाद में जब पैसे हुए तो बड़े लड़के को पढ़ने के लिए स्कूल ले गया। वहां उन लोगों ने हमसे अंग्रेजी में बात की। अब न मुझे अंग्रेजी आती थी न मेरे लड़के को। हम अपनी बात उन्हें समझा नहीं पाये। अत: मेरे लड़के को दाखिला नहीं मिला। मुझे अफसोस हुआ। झटका-सा लगा। बस मन में विचार आया कि ऐसे शिक्षण संस्थान बनाये जायें, जहां इस तरह की बातें न हो और बच्चे भी जीवन में कुछ बन पाये।’
इसके बाद सरदार जोधसिंह ने अपने भाई ईश्वर सिंह के साथ मिलकर जेआईएस ग्रुप की स्थापना की। जेआईएस का अर्थ है जोध ईश्वर सिंह। इस समय इस ग्रुप के तहत शिक्षण संस्थानों का एक विशाल जाल है, जिसके तहत हजारों विद्यार्थी अध्ययन कर रहे हैं। प्रथम इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना आसनसोल में 1998 में , इसके बाद कल्याणी में 2000 में इंजीनियरिंग कालेज, नारूला इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी (जिसका उद्घाटन ज्योति बसु ने किया था ) 2001 में तथा पहला गैर सरकारी डेन्टल कालेज पानीहाटी में 2003 में स्थापित हुआ। एक बार मैंने सरदार जोधसिंह से इन कालेजों के बारे में उनका साक्षात्कार लेना चाहा तो उन्होंने साफ लहजे में कहा- देखो पुत्तर, मैं तो अंगूठाछाप हूं। मुझसे गाय- भैंस के बारे में किसी भी तरह की बात पूछ सकते हो, कालेजों के बारे में कुछ पूछना हो तो बच्चों से पूछो। आप कल्पना कर सकते हैं कि आज के जमाने में थोड़ा सा पढ़ा-लिखा धनाढ्य व्यक्ति अपनेआप को ऐसे दिखाता है, मानो वह विद्यासागर का अवतार हो, पर जेआईएस ग्रुप का प्रतिष्ठाता चेयरमैन अपने आप को खुलेआम अंगूठाछाप बताता है।
थोड़ी देर के लिए मान भी लिया जाये कि जोधसिंह जी को परिस्थितिवश स्कूली शिक्षा न मिली हो, तो भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि उनके अन्दर किसी दैवीय शक्ति की बदौलत ज्ञान का भंडार रहा होगा, तभी तो जानवरों के बीच रहनेवाले ने विद्या के इतने मंदिर बनवाये। इतना ही नहीं श्री जोधसिंह ने 2014 में राज्य का पहला गैर सरकारी विश्वविद्यालय बनवाया, जिसके चांसलर इस समय इनके बड़े सुपुत्र तरणजीत सिंह है, जिन्हें कभी अंग्रेजी न जानने के कारण स्कूल में दाखिला नहीं मिला था। इस समय तो पूरे जेआईएस ग्रुप तथा अन्य कारोबार की कमान भी इनके हाथ में है। इनके सुपुत्र सरदार समरप्रीत सिंह भी काफी होनहार हैं, जो विश्वविद्यालय के डायरेक्टर होने के साथ-साथ अन्य कामकाज भी संभाल रहे हैं।
अंत में यदि एक बात का जिक्र न करूँ तो यह लेख अधूरा लगेगा। कहते हैं हर सफल व्यक्ति की सफलता के पीछे उसकी धर्मपत्नी का हाथ होता है। यह बात उनकी सहधर्मिणी सरदारनी सतनाम कौर पर पूरी तरह लागू होती है। 15 अप्रैल 1929 को जन्मी कौर जेआईएस ग्रुप की चेयरपर्सन थीं। कामकाज संभालने के साथ आप धर्मपारायण भी थीं। डनलप स्थित घर के आसपास अनाथ बच्चों की देखभाल तथा गरीब तबके के लोगों की सहायता करती रहती थीं। वे इलाके में गुरूमाता के नाम से जानी जातीं थी। पति के गुजरने के मात्र 4 साल के अन्दर ही 11 जनवरी 2022 को वे भी उनके पास चलीं गयीं। जोधसिंह जी अपनी उम्र के ढलान में भले ही डनलप वाले घर में अधिकतर रहने लगे थे, पर पंजाभिला स्थित खटाल वाले घर को कभी नहीं भूले। उनका कहना था- “आप इसे तबेला कहो, खटाल कहो या फिर मेरा नशा, इसको छोड़ेंगे नहीं।”
