संस्कार और चरित्र निर्माण का पर्व है दीपावली

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बाल मुकुन्द ओझा

बुराई पर अच्छाई, अंधकार पर प्रकाश तथा अज्ञान पर ज्ञान की विजय का त्योहार हैं दीपावली। दीपावली संस्कार और चरित्र निर्माण का पर्व है। तन-मन को प्रफुल्लित करने वाला यह पर्व हमारे जीवन में हजारों खुशियाँ प्रदान करता है। त्योहार जीवन को प्रेम, बन्धुत्व और शुद्धता से जीने की सीख देता है। मन और चित को शांति प्रदान करता है और हमारे अन्दर की बुराइयों को अन्तर्मन से बाहर निकाल कर अच्छाइयों को ग्रहण करने की ताकत प्रदान करता है। चौदह साल का बनवास काटकर भगवान राम जब अयोध्या लौटे तब वहाँ के निवासियों ने दीप प्रज्ज्वलित कर उनका स्वागत किया। इस वर्ष दीपावली का पर्व 20 अक्तूबर को हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। दीपावली का त्योहार कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। इस पंच दिवसीय पर्व को सभी वर्गों के लोग अत्यंत हर्ष व उत्साह के साथ मनाते हैं। कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से प्रारंभ होकर कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया तक चलने वाला दीपावली का त्योहार सुख समृद्धि की वृद्धि, व्यापार वृद्धि तथा समस्त सुखों की प्राप्ति कराने वाला होता है। दीपावली को पंच पर्वो का त्योहार कहा जाता है जो धनतेरस से शुरू होकर भाई दूज पर समाप्त होते हैं।

त्योहार देश की सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और राष्ट्रीय एकता के जीवन्त प्रतीक होते हैं। इसमें देश के इतिहास का समावेश होता है। त्योहार बिना जाति, धर्म ओर भेदभाव के सभी लोग मिलजुल कर मनाते हैं और एक दूसरे के सुख दुख में भागीदारी देते हैं। एक दूसरे से मिलन का यह सुनहरा अवसर प्रदान करते हैं। त्योहार आपसी कटुता, शत्रुता और बैर भाव को दूर भगाते हैं। दीपावली भी एक ऐसा ही त्योहर है जो हमें समता, समानता और भाईचारे का सन्देश देता है। त्योहार जीवन को प्रेम, बन्धुत्व और शुद्धता से जीने की सीख देता है। मन और चित को शांति प्रदान करता है और हमारे अन्दर की बुराइयों को अन्तर्मन से बाहर निकाल कर अच्छाइयों को ग्रहण करने की ताकत प्रदान करता है। चौदह साल का बनवास काटकर भगवान राम जब अयोध्या लौटे तब वहाँ के निवासियों ने दीप प्रज्ज्वलित कर उनका स्वागत किया।

भारत में सभी धर्मों और वर्गों के लोग यह त्योहार मिलजुल कर मानते है। दीपावली का शाब्दिक अर्थ है ’’दीपों की पंक्ति’’ या ‘‘दीपों की माला’’। यह पर्व सामाजिक सांस्कृतिक धार्मिक व्यापारिक और ऐतिहासिक महत्व का है। दीपावली का त्योहार कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। इसी दिन समुद्र मंथन से मां लक्ष्मी ने अवतार लिया था। मां लक्ष्मी को धन और वैभव की देवी माना जाता है। इसी वजह से दिवाली वाले दिन हम लोग लक्ष्मी जी की पूजा करते हैं और वरदान में खूब सारा धन और वैभव मांगते हैं। लक्ष्मी के समुद्र मंथन में निकलने से दो दिन पहले सोने का कलश लेकर भगवान धनवंतरी भी अवतरित हुए थे, इसी वजह से दिवाली के पहले धनतेरस का त्योहार मनाया जाता है।

दीपावली के साथ कई ऐतिहासिक और धार्मिक घटनाएँ जुड़ी हुई हैं। यह दिन केवल भगवान राम के अयोध्या वापसी का पावन दिन नहीं है अपितु इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने राक्षस राज नरकासुर का वध किया था। इसी दिन भगवान विष्णु ने नरसिंह का अवतार लेकर हिरणकश्यप को मारा था। इसी दिन समुद्र मंथन के बाद लक्ष्मी व धन्वन्तरि प्रकट हुए थे। जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी का निर्वाण दिवस भी इसी दिन है। सिक्खों के लिए भी दीपावली के त्यौहार का बहुत महत्त्व है। इसी दिन अमृतसर में स्वर्ण मन्दिर का शिलान्यास हुआ। इसके अलावा 1619 में दीपावली के दिन सिक्खों के छठे गुरू हर गोविन्द सिंह को जेल से रिहा किया गया। नेपालियों के लिए भी दीपावली का दिन बहुत महत्व का है। इस दिन नेपाल में नया वर्ष शुरू होता है। पंजाब में स्वामी रामतीर्थ का जन्म व महाप्रयाण दोनों दीपावली के दिन हुआ। आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद ने दीपावली के दिन अजमेर के निकट अवसान लिया था। इस दिन लक्ष्मी पूजन का विशेष प्रावधान है। दीपावली सच्चे अर्थों में चौतरफा हर्षाेल्लास का दिन है।

बुराई पर अच्छाई का प्रतीक यह पर्व अब रश्मि बनता जा रहा है। अच्छी बातें अब केवल वेद वाक्यों, ग्रन्थों, महापुरूषों के आदर्शों और नेताओं के भाषण तक सीमित होकर रह गई है। भारत ऋषि मुनियों, संतों और महापुरूषों की जन्मस्थली है जिन्होंने सदा सर्वदा सद्मार्ग पर चलने की सीख और प्रेरणा देशवासियों को दी। हम धीरे-धीरे इन आदर्शों को आत्मसात करने की बजाय बैर-भाव और शत्रुता को बढ़ावा देने में लगे हुए हैं। देश में इस समय जो वातावरण बना हुआ है, उससे बन्धुत्व, प्रेम और समता के स्थान पर अविश्वास, घृणा और बुराई को अधिक बल मिल रहा है। इसके लिए किसी एक को दोषी ठहराना ठीक नहीं होगा। हम सबको अपनी अन्तर आत्मा में झांक कर विवेचना करनी होगी। जब तक हम अपने अंदर की बुराइयों का त्याग नहीं करेंगे तब तक दीपावली की सीख, प्रेरणा और आदर्शों को आत्मसात करने की बातें थोथी और कागजी होगी।

– बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

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