बच्चों में छिपा है देश का उज्ज्वल भविष्य

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बाल दिवस विशेष:

“बचपन को केवल देखा नहीं, समझा जाना चाहिए। हर मुस्कुराता बच्चा एक जीवित कविता है, जो हमें मानवता की सच्ची परिभाषा सिखाता है। बाल दिवस पर आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें — हर बच्चे की हँसी और हर सपने की सुरक्षा हमारी जिम्मेदारी है।” 

✍️ — डॉ. प्रियंका सौरभ

हर वर्ष 14 नवम्बर को भारत में बाल दिवस बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह दिन स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की जयंती के रूप में समर्पित है। बच्चों के प्रति उनके गहरे प्रेम और स्नेह के कारण बच्चे उन्हें स्नेहपूर्वक चाचा नेहरू कहकर पुकारते थे। नेहरू जी का मानना था कि “आज के बच्चे कल का भविष्य हैं, उन्हें सही दिशा देना ही सच्ची राष्ट्र सेवा है।” उनका यह विश्वास था कि अगर बच्चों को उचित वातावरण, शिक्षा और अवसर मिले तो वे भारत को विश्व में गौरव की ऊँचाइयों तक पहुँचा सकते हैं।

नेहरू जी बच्चों में भारत के उज्ज्वल भविष्य की झलक देखते थे। उनका कहना था कि किसी भी राष्ट्र की असली पूँजी उसके बच्चे हैं — न कि उसकी सेना या संपत्ति। बच्चों में असीम ऊर्जा, कल्पनाशक्ति और सृजनात्मकता होती है, जिसे यदि सही दिशा दी जाए तो वही समाज की सबसे बड़ी ताकत बनती है। उन्होंने स्वतंत्र भारत के निर्माण के साथ-साथ बच्चों के विकास को भी सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उनके नेतृत्व में शिक्षा, विज्ञान और बाल कल्याण से जुड़ी कई योजनाएँ प्रारंभ की गईं। उन्होंने बच्चों के लिए ‘राष्ट्रीय बाल निधि’, ‘बाल भवन’, ‘शिशु कल्याण परिषद’ जैसी संस्थाओं की नींव रखी, जिनका उद्देश्य बच्चों की प्रतिभा को निखारना और उन्हें रचनात्मक मार्ग पर प्रेरित करना था।

बाल दिवस केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि उस सोच का प्रतीक है जो बच्चों को राष्ट्र के केंद्र में रखती है। इस अवसर पर हमें यह चिंतन करना चाहिए कि हमारे बच्चे आज किन परिस्थितियों में पल बढ़ रहे हैं। आधुनिक युग में तकनीकी क्रांति ने बच्चों के जीवन को कई मायनों में प्रभावित किया है। इंटरनेट, मोबाइल और सोशल मीडिया ने जहाँ ज्ञान के द्वार खोले हैं, वहीं बचपन की मासूमियत और संवाद की परंपरा को भी कमज़ोर किया है। बच्चे अब खेल के मैदान से अधिक स्क्रीन पर समय बिताते हैं। शिक्षा का स्वरूप भी अंकों की दौड़ में सिमट गया है, जहाँ नैतिकता और संवेदनशीलता पीछे छूटती जा रही है।

आज के बच्चे अपार संभावनाओं के धनी हैं, पर उन पर प्रतिस्पर्धा और सफलता का बोझ बहुत अधिक बढ़ गया है। माता-पिता और समाज दोनों ही उनसे अपेक्षाओं का पहाड़ खड़ा कर देते हैं। इस दबाव के कारण अनेक बच्चे मानसिक तनाव, अवसाद और भय से ग्रसित हो रहे हैं। यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि स्वस्थ समाज की नींव तभी मजबूत होती है जब उसका बचपन खुश, स्वस्थ और सुरक्षित हो।

इस परिप्रेक्ष्य में बाल दिवस हमें यह याद दिलाता है कि बच्चे केवल माता-पिता की जिम्मेदारी नहीं हैं, बल्कि सम्पूर्ण समाज की धरोहर हैं। हर बच्चे के भीतर एक कलाकार, वैज्ञानिक, शिक्षक या नेता छिपा है। हमें केवल उसे पहचानने और प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है। शिक्षा व्यवस्था को इस प्रकार रूपांतरित किया जाना चाहिए कि वह केवल परीक्षा आधारित न होकर अनुभव, मूल्य और सृजनशीलता पर आधारित हो। आज ज़रूरत है कि स्कूलों में खेल, संगीत, कला और साहित्य को शिक्षा का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए ताकि बच्चे जीवन को सम्पूर्णता से जीना सीख सकें।

नेहरू जी ने जिस भारत का सपना देखा था, वह केवल आर्थिक या तकनीकी रूप से प्रगतिशील नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों से संपन्न भारत था। उन्होंने बच्चों को स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे की भावना के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। उनके लिए शिक्षा केवल ज्ञान का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की नींव थी। नेहरू जी ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए आईआईटी, आईआईएससी और नेशनल साइंस पॉलिसी जैसी संस्थाएँ स्थापित कीं, ताकि भावी पीढ़ी आधुनिक भारत के निर्माण में योगदान दे सके।

आज जब हम बाल दिवस मनाते हैं, तो यह हमारे लिए आत्ममंथन का समय भी है। क्या हमने नेहरू जी के आदर्शों के अनुरूप बच्चों के विकास के लिए उपयुक्त वातावरण बनाया है? क्या हर बच्चे को समान अवसर, शिक्षा और सुरक्षा मिल पा रही है? वास्तविकता यह है कि आज भी हमारे देश में करोड़ों बच्चे शिक्षा से वंचित हैं, अनेक बच्चे बाल श्रम और बाल शोषण के शिकार हैं। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में बाल सुरक्षा की स्थिति समान रूप से चिंताजनक है।

यदि हमें सच में बाल दिवस का अर्थ समझना है, तो हमें इन चुनौतियों का सामना करना होगा। समाज को यह स्वीकार करना होगा कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति उसके बच्चों के कल्याण से जुड़ी है। बाल अधिकारों की रक्षा केवल कानून बनाने से नहीं, बल्कि संवेदनशील समाज के निर्माण से होगी। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई भी बच्चा भूखा न सोए, कोई भी बच्चा भय में न जिए, और हर बच्चे को अपने सपनों को पूरा करने का अवसर मिले।

आधुनिक भारत में बाल अधिकारों की दिशा में सरकार और समाज दोनों ने प्रयास किए हैं। राष्ट्रीय बाल नीति (2013), समग्र शिक्षा अभियान, पोषण अभियान और बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) जैसी पहलें इस दिशा में सराहनीय कदम हैं। किंतु केवल नीतियाँ काफी नहीं हैं, जब तक उन्हें ज़मीनी स्तर पर सशक्त रूप से लागू न किया जाए। हर स्कूल, हर अभिभावक और हर नागरिक को इस दिशा में संवेदनशील बनना होगा।

बाल दिवस हमें यह भी याद दिलाता है कि बच्चों की हँसी सबसे पवित्र संगीत है। जब कोई बच्चा निडर होकर मुस्कुराता है, तो वह राष्ट्र की आत्मा की मुस्कान होती है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि यह मुस्कान कभी न बुझे। इसके लिए केवल सरकारी नीतियाँ नहीं, बल्कि सामाजिक सहयोग और पारिवारिक स्नेह आवश्यक है।

बच्चों को केवल जानकारी नहीं, बल्कि प्रेरणा चाहिए। उन्हें केवल किताबें नहीं, बल्कि उदाहरण चाहिए। यदि हम अपने जीवन में नैतिकता, संवेदना और करुणा को अपनाएँ, तो वही बच्चे उनसे सीखेंगे। परिवार बच्चों की पहली पाठशाला है, जहाँ उन्हें संस्कार, सहयोग और सामंजस्य का ज्ञान मिलता है।

आज का बाल दिवस हमें यह संकल्प लेने का अवसर देता है कि हम अपने बच्चों के लिए एक ऐसा समाज बनाएँ, जहाँ वे भयमुक्त होकर सोच सकें, अपने सपनों को साकार कर सकें और अपनी सृजनात्मकता से भारत का भविष्य गढ़ सकें। नेहरू जी का सपना तभी साकार होगा जब हर बच्चा सुरक्षित, शिक्षित और प्रसन्न होगा।

बाल दिवस केवल बच्चों का उत्सव नहीं, बल्कि मानवता की नयी शुरुआत का प्रतीक है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि बचपन केवल उम्र का पड़ाव नहीं, बल्कि जीवन की वह सुंदर अवस्था है जिसमें आशा, ऊर्जा और प्रेम का सबसे शुद्ध रूप बसता है। हमें इस बचपन की रक्षा करनी है, इसे खिलने देना है, क्योंकि जहाँ बच्चे मुस्कुराते हैं, वहीं राष्ट्र खिलता है।

-प्रियंका सौरभ 

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,

कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,

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