दादी के बाद अब पोते पर लटका विशेषाधिकार हनन का मामला

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बाल मुकुन्द ओझा

आजकल विशेषाधिकार की चर्चा कुछ ज्यादा ही हो रही है। विपक्ष के नेता राहुल गाँधी पर इन दिनों विशेषाधिकार हनन की तलवार लटकी हुई है। 1978 में लोकसभा में पूर्व प्रधान मंत्री  इंदिरा गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार प्रस्ताव पारित किया गया। इसके बाद इंदिरा गांधी की सदस्यता भी चली गई और कुछ दिन के लिए जेल भी जाना पड़ा था। हालांकि फिलहाल भाजपा ने इसे टाल दिया बताया। सरकार ने अब अपनी रणनीति बदल ली है। कहा जाता है राहुल गाँधी का यही रवैया रहा तो आज नहीं तो कल उन्हें विशेषाधिकार हनन का सामना करना पड़ सकता है।  आइये आज हम विशेषाधिकार और उसके हनन के बारे में चर्चा करते है। भारत में संसद, विधानसभा और विधान परिषद के सदस्यों को कर्तव्यों का प्रभावी ढंग से पालन सुनिश्चित करने के लिए कुछ विशेष अधिकार और छूट प्रदान की गई हैं। जब इन विशेषाधिकारों का उल्लंघन होता है या किसी भी तरह से सदन या उसके सदस्यों की गरिमा को ठेस पहुंचाई जाती है, तो उसे विशेषाधिकार हनन कहा जाता है। विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव की शुरुआत स्पीकर को लिखित नोटिस दिए जाने से होती है। नोटिस मिलने पर स्पीकर तय करेंगे कि मामला विशेषाधिकार हनन का बनता है या नहीं। अगर लोकसभा अध्यक्ष नोटिस स्वीकार करते हैं तो उसे विशेषाधिकार समिति के पास भेजा जा सकता है। लोकसभा में यह समिति आम तौर पर 15 सांसदों की होती है, जबकि राज्यसभा में 10 सांसदों की। जांच पूरी होने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंपेगी। इसके बाद रिपोर्ट को सदन में रखा जाएगा और फिर सदन तय करेगा कि क्या कार्रवाई होनी चाहिए। अगर स्पीकर मामले को विशेषाधिकार समिति को सौंपते हैं। अपनी जांच पूरी करने के बाद समिति एक रिपोर्ट तैयार करती है और उसे सदन के पटल पर रखती है। दोषी पाए जाने पर भी समिति खुद सजा नहीं देती बल्कि सजा की सिफारिश करती है।

 विशेषाधिकार समिति दोषी पाए जाने पर दोषी सदस्य को चेतावनी देने या फटकार लगाने की सिफारिश कर सकती है। अगर ज्यादा गंभीर नहीं लगे तो समिति उन्हें सदन में बिना शर्त माफी मांगने या खेद जताने का निर्देश दे सकती है। मामला गंभीर लगने पर समिति उन्हें कुछ दिनों या पूरे सत्र के लिए सदन की कार्यवाही से अलग रखने की सिफारिश कर सकती है। बेहद गंभीर मामलों में समिति सदस्यता रद्द करने की भी सिफारिश कर सकती है। इसे सदन में वोटिंग के जरिए लागू किया जाता है। जेल की  बेहद ही गंभीर मामलों में सदन संबंधित सांसद को कारावास की सजा भी सुना सकता है।  हालांकि ऐसा दुर्लभ मामलों में ही होता है।

 पहले भी विशेषाधिकार हमले की गाज कई लोगों पर गिर चुकी है। इनमें देश के प्रधानमंत्री जैसे बड़े नेता भी शामिल है।

लोकसभा की विशेषाधिकार समिति ने इंदिरा गांधी को 1975 के एक मामले में सदन की अवमानना और विशेषाधिकार हनन का दोषी पाया था। इस मामले में न सिर्फ उनकी सदस्यता रद्द की गई बल्कि सत्र खत्म होने तक उन्हें जेल भी भेजा गया था। इमरजेंसी के दौरान सांसद सुब्रमण्यम स्वामी पर आरोप लगा कि उन्होंने विदेश में रहकर भारत विरोधी प्रचार किया और सदन की गरिमा को ठेस पहुंचाई। विशेषाधिकार समिति की रिपोर्ट के आधार पर उन्हें राज्यसभा से निष्कासित कर दिया गया था।  संसद में सवाल पूछने के बदले पैसे लेने के स्टिंग में फंसे 11 सांसदों की सदस्यता एक झटके में खत्म कर दी गई थी।  विशेषाधिकार समिति और पवन बंसल समिति की सिफारिशों के आधार पर सदन ने इसे सदन की अवमानना माना था। सदन के अंदर दिए गए बयानों पर अदालती कार्यवाही नहीं होती, लेकिन विशेषाधिकार हनन की कार्यवाही की जा सकती है। इस मामले में अध्यक्ष का निर्णय सर्वोपरि होता है। 

बाल मुकुन्द ओझा

वरिष्ठ लेखक एवं पत्रकार

डी-32, मॉडल टाउन, मालवीय नगर, जयपुर

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