ताश के बावन पत्ते:पंजे छक्के सत्ते?

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−दिनेश गंगराड़े

किसने की पता नहीं पर ताश के बावन पत्ते और दो जोकर पर जो खोज हुई है वह देखिए,ताश के पत्तों में कुछ महानुभाव ज्योतिष्य ज्ञान का प्रतिफल युक्त गणित आजमाते है, आप भी देखें: अपने पूर्वजों का ज्ञानार्जन।ये है ताश का मर्म।इसे देहात में पत्ती का खेल भी कहते है।हम ताश खेलते है, अपना मनोरंजन करते है। पर शायद कुछ ही लोग जानते होंगे कि ताश का आधार वैज्ञानिक है व साथ साथ ही प्रकृति से भी जुड़ा हुआ है।आयताकार मोंटे कागज़ से बने पत्ते चार प्रकार के ईंट, पान, चिड़ी, और हुक्म, प्रत्येक तेरह पत्तों को मिलाकर कुल बावन पत्ते होते हैं।पत्ते एक्का से दस्सा, गुलाम, रानी एवं राजा।बावन पत्ते याने साल के बावन सप्ताह।चार प्रकार के पत्ते मतलब चारऋतु का संकेत।प्रत्येक रंग के
तेरह पत्ते,बताते हैं कि प्रत्येक ऋतु में तेरह सप्ताह होते है।सभी पत्तों का जोड़ एक से तेरह, बराबर,गुणा चार,तो हुए साल के तीन सौ चौसठ दिन।एक जोकर,और जोड़ा तो हो गए वर्ष के पूरे तीन सौ पैसठ दिन।दूसरा जोकर गिने तो तीन सौ पैसठ धन एक बराबर तीन सौ छाछठ दिन,मतलब लीप वर्ष!इन बावन पत्तों में बारह चित्र वाले पत्ते है बारह ये हुए बारह महिने।लाल और काला रंग, दिन और रात का संकेतक।
ताश के पत्तों का अर्थ भी गूढार्थ में देखें,जरा
ईक्का- एक ही आत्मा
दुक्की,जीव और ईश्वर पुद्गल,तिक्की सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चारित्र।चौकी चारअनुयोग(प्रथमानुयोग,चरणानुयोग,करनानुयोग,द्रव्यानुयोग।पंजी – पंच पाप से बचना
हिंसा,झूठ,चोरी,कुशील,परिग्रह।छक्की षड आवश्यक कार्य करना (देव पूजा, गुरु उपासना,स्वाध्याय,संयम,तप,दान)सत्ती सात तत्व को जानो (जीव, अजीव, आश्रव,संवर, निर्जरा,मोक्ष)अटठी सिद्ध के आठ गुण प्रकट करो (अनंत दर्शन,अनंत ज्ञान,अनंत सुख, अनंत वीर्य, अव्यबाधत्व, अगुरुलघुत्व, अवगाहनत्व)।नव्वा नौ कषाय को भी त्यागो (हास्य,रति, अरति,शोक,भय, जुगुप्सा,स्त्रीवेद पुरुष वेद, नपुंसक वेद,)
दस्सी दस धर्म प्रकट करो (उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव,सत्य, शौच,संयम,तप,त्याग, आकिंचन,ब्रह्मचर्य)दस दिशाओं का भी संकेत।
गुलाम,मन की वासना के गुलाम मत बनो।रानी,मोह रूपी माया को त्यागो।राजा आत्म गुणों पर शासन करो।
यह आनंद के साथ साथ ज्ञान भी है।भारतीय संस्कार और परंपरा को नमन जो हर कार्य में अच्छाई ढूंढ लेती हुई।
दृष्टिकोण दृष्टि बदल देता है।ताश का दूजा दृष्टिकोण ,नकारात्मक भी है तभी बुजुर्ग इसे अच्छा नहीं मानते?ताश के इन्ही पत्तो से लोग जुआ,किटी, रम्मी,रंग मिलावनी का खेल पैसों से खेलते हैं।जुआ सदैव ही बुरी चीज रहा है।धर्मराज युधिष्ठिर इतने ज्ञानवान होकर भी जुआ खेलने बैठे और अपनी पत्नी तक को हार गए।यह शर्मनाक करतूत हुई,जिससे उनकी छवि खराब हुई।जुएं में लाखों घर उजड़ जाते है।समय भी खूब बर्बाद होता हैं।

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