जिन्ना विभाजन का खलनायक−कांग्रेस की नजर में आज भी है‘जी’

0
23
No photo description available.

डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारत के स्वतंत्रता संग्राम और विभाजन का इतिहास आज की हर देश भक्‍त को दर्द से भर देता है। मध्‍य प्रदेश के इंदौर में युवा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय भानु चिब द्वारा दिए गए बयान ने इसी इतिहास को एक बार फिर बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान स्वतंत्रता संग्राम के नेताओं का उल्लेख करते हुए ‘जिन्ना’ को सम्मानसूचक भाषा में याद करना वास्‍तव में शब्दों की चूक नहीं माना जा सकता। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इसे देश की स्‍वाधीनता के बलिदानियों के बलिदान का अपमान बताते हुए कांग्रेस की मानसिकता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। वस्‍तुत: यह विवाद इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कांग्रेस के ऐतिहासिक फैसलों, उसकी वैचारिक दिशा और विभाजन की त्रासदी में उसकी भूमिका को फिर से कठघरे में लाता है।

क्‍या यह भुलाया जा सकता है कि जिन्ना 1947 के विभाजन के मुख्य प्रतीक और सूत्रधार थे? ऐसे व्यक्ति को “महापुरुष” जैसी भाषा में याद करना उन लाखों लोगों के घावों को कुरेदने जैसा है, जिन्होंने विभाजन के दौरान अपना घर, परिवार और जीवन खो दिया। निश्‍चित ही भाजपा नेता आशीष ऊषा अग्रवाल ने सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को जोरदार ढंग से उठाया है। उनका ये कहना, “पहले ओसामा जी, अब जिन्ना जी- यह कांग्रेस की सोच का आईना है।” वास्‍तव में इस सोच को देखकर आज यही कहना उचित होगा कि कांग्रेस की राजनीति में राष्ट्र पहले नहीं, बल्कि तुष्टिकरण और वैचारिक भ्रम सबसे पहले आता है।

आज हम यदि भारत विभाजन और इतिहास के आइने में देखें तो फिर से ये साफ हो जाता है कि जिन्ना का राजनीतिक जीवन विभाजनवादी था। आर.सी. मजूमदार अपनी ऐतिहासिक कृति The History and Culture of the Indian People में लिखते हैं कि 1937 के बाद जिन्ना ने मुस्लिम समुदाय के भीतर असुरक्षा और भय की भावना को राजनीतिक हथियार बनाया। यहीं से दो-राष्ट्र सिद्धांत को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया गया। यह सिद्धांत इस विचार पर आधारित था कि हिंदू और मुस्लिम अलग-अलग राष्ट्र हैं और साथ नहीं रह सकते। यह अवधारणा भारत की साझा संस्कृति और इतिहास को नकारती थी, सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को भी गहरा करती थी।

1940 का लाहौर प्रस्ताव इस दिशा में निर्णायक कदम साबित हुआ। बिपिन चंद्र अपनी पुस्तक India’s Struggle for Independence में लिखते हैं कि यह प्रस्ताव भारत के एकीकृत राष्ट्रवाद पर सीधा हमला था। जिन्ना ने इसे मुस्लिमों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा का माध्यम बताया, लेकिन वास्तव में यह विभाजन की औपचारिक घोषणा थी। इसके बाद की राजनीति में समझौते की संभावनाएं लगातार कमजोर होती गईं।

विभाजन की ओर बढ़ते कदमों में सबसे भयावह अध्याय 16 अगस्त 1946 का ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ था। जिन्ना द्वारा घोषित इस आंदोलन का उद्देश्य ब्रिटिश सरकार और कांग्रेस पर पाकिस्तान की मांग स्वीकार करने का दबाव बनाना था। रामचंद्र गुहा ने अपनी पुस्तक India After Gandhi में जानकारी दी है कि ‘इस दिन की हिंसा ने यह स्पष्ट कर दिया कि जिन्ना की राजनीति अब संवाद नहीं, टकराव और हिंसा के रास्ते पर चल पड़ी थी। कलकत्ता से शुरू हुई हिंसा ने पूरे देश में आग की तरह फैलकर हजारों लोगों की जान ले ली।’

यहां कांग्रेस की भूमिका भी सवालों के घेरे में आती है। स्वतंत्रता आंदोलन की अगुआ कांग्रेस विभाजन को रोकने में क्यों असफल रही? ए.जी. नूरानी (The Muslim League and the Partition of India) के अनुसार, कांग्रेस नेतृत्व जिन्ना की हठधर्मिता और ब्रिटिश सरकार की “फूट डालो और राज करो” नीति का सही आकलन नहीं कर पाया। कैबिनेट मिशन योजना, जोकि भारत को एक रखने का अंतिम अवसर थी, आपसी अविश्वास और राजनीतिक अहंकार की भेंट चढ़ गई।

1947 में माउंटबेटन योजना के तहत विभाजन को स्वीकार करना कांग्रेस का सबसे विवादास्पद निर्णय माना जाता है। जसवंत सिंह अपनी पुस्तक Jinnah: India, Partition, Independence में इसलिए ही इन्‍हीं सब तथ्‍यों की गहराई से पड़ताल करते हैं और बताते हैं कि सत्ता हस्तांतरण की जल्दबाजी ने कांग्रेस नेतृत्व को दीर्घकालिक परिणामों पर गंभीर विचार करने से रोक दिया। सीमाओं का निर्धारण जल्दबाजी में हुआ, जिससे अभूतपूर्व नरसंहार और विस्थापन हुआ। इस संदर्भ में उर्वशी बुटालिया की पुस्‍तक (The Other Side of Silence) भी देखी जा सकती है जो विभाजन को इतिहास का सबसे बड़ा मानवीय विस्थापन बताती हैं। करीब डेढ़ करोड़ लोग अपने घरों से उजड़ गए और लाखों मारे गए। यह त्रासदी सिर्फ जिन्ना की जिद का परिणाम नहीं कही जा सकती है, वास्‍तव में यह तो कांग्रेस की राजनीतिक कमजोरियों और गलत आकलनों का भी नतीजा थी।

आज, जब यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा जिन्ना का उल्लेख सम्मानजनक शब्दों में किया जाता है, तब यह इतिहास के उन तमाम घावों को फिर से हरा कर देता है जोकि संघर्ष, बलिदान और समर्पण से भरा हुआ है, इसमें असंख्‍य मासूमों की चीखें है, जिसके लिए निश्‍चित ही कांग्रेस कभी अपने को अपराध से मुक्‍त नहीं कर सकती है, क्‍योंकि वही इसके लिए पूरी तरह से जिम्‍मेदार है, क्‍योंकि नेतृत्‍वकर्ता भी उस वक्‍त वही थी।

ऐसे में भाजपा नेताओं का कहना है कि यह कांग्रेस की वही पुरानी मानसिकता है, जो तुष्टिकरण के लिए ऐतिहासिक सच्चाइयों को धुंधला करती है, एक तरह से देखें तो आज पूरी तरह से सही नजर आता है। उसके आचरण से तो यही भाव झलकता है कि कांग्रेस अब भी विभाजन के सबक से नहीं सीख पाई है। फिर प्रश्न शब्दों का नहीं, सोच का भी है, जोकि भारतीय स्‍वाधीनता आन्‍दोलन के बलिदानियों के साथ जिन्ना को “इतिहास का मुख्‍य पात्र” बनाकर ‘जी’ के सम्‍बोधन के साथ पेश करती है।

ऐसे में स्‍वभाविक तौर पर एक बार फिर कांग्रेस की वैचारिक दिशा पर गंभीर प्रश्न खड़े होते दिखते हैं। ये तो सभी को समझना होगा कि जिन्ना का नाम भारतीय इतिहास में विभाजन, हिंसा और अलगाव से जुड़ा रहेगा, इसे कोई कभी नकार नहीं सकता है, क्‍योंकि जब तक इतिहास का अस्‍तित्‍व है। जिन्‍ना भारत के लिए एक खलनायक ही है । कांग्रेस यदि आज भी इस सच्चाई को स्वीकार करने और अपनी ऐतिहासिक भूलों पर ईमानदार आत्ममंथन करने से बचती है, तब फिर यही समझा जाए कि वह भारत से वास्‍तविक प्रेम नहीं करती। उसका आचरण देशभक्‍ति के संदर्भ में सिर्फ दिखावा है !

(लेखक, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here