जब अस्वस्थता में भी अटल जी ने किया ‘राष्ट्रधर्म’ का लोकार्पण

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– कर्मचारी थक जाते तो अटल जी चलाते थे मशीन

लखनऊ,24 दिसंबर (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन प्रान्त प्रचारक भाऊराव देवरस ने अटल जी को हरदोई जिले की सण्डीला तहसील में प्रचारक के रूप में भेजा था। अगस्त 1947 में भाऊराव देवरस और सह प्रान्त प्रचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय के मन में आया कि भविष्य के दिशा-दर्शन के लिए ​एक सांस्कृतिक पत्रिका का प्रकाशन होना चाहिए। अन्तत: राष्ट्रधर्म के प्रकाशन की योजना बनी।

अखिल भारतीय साहित्य परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. पवन पुत्र बादल ने बताया कि 31 अगस्त, 1947 की श्रावणी पूर्णिमा (रक्षाबंधन) के पुनीत अवसर पर राष्ट्रधर्म का प्र​थम अंक प्रकाशित हुआ। पत्रिका के प्रथम पृष्ठ पर ही अटल जी की प्रसि​द्ध कविता ‘हिन्दू तन मन हिन्दू जीवन, रग—रग हिन्दू मेरा परिचय’ छपी। साथ ही इसी अंक में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का चिन्तनपरक लेख ​’चिति’ भी छपा। इस पत्रिका की तीन हजार प्रतियां हाथों हाथ बिक गईं। इसका दूसरा संस्करण निकालने के लिए पुन: 500 प्रतियों का आदेश दिया गया। देखते ही देखते पत्रिका का प्रसार दूसरे अंक का 4000 और तीसरे अंक का 12000 तक पहुंच गया। पूरे देश में युवा संपादक अटल जी की धूम मच गई।

डॉ. बादल ने बताया कि उस समय अंक निकालना इतना सरल नहीं था। हाथ से मशीन चलानी पड़ती थी। जब कर्मचारी थक जाते थे तो अटल जी और दीनदयाल उपाध्याय जी स्वयं ही मशीन हाथ से चलाते थे। इतना ही नहीं स्वयं अटल जी साइकिल पर राष्ट्रधर्म के बण्डल लेकर चारबाग रेलवे स्टेशन और लखनऊ के स्थानीय अभिकर्ताओं के यहां पहुंचाते थे।

बाद में तो अटल जी इस देश के जन-मन में बस गए। तीन बार देश के प्रधानमंत्री रहे। राष्ट्रधर्म के प्रबंध संपादक रहे डॉ.बादल ने बताया कि कालान्तर में जब 2007 का अंक जनसंघ और भाजपा विशेषांक के रूप में निकाला गया तो लोकार्पण के लिए आग्रह करने हम अटल जी से मिलने दिल्ली गए। उन्होंने कहा कि अब हम तो लखनऊ चल नहीं सकते। हमने तुरन्त कहा कि अटल जी। हम तो दिल्ली आ सकते हैं। अटल जी मुस्कुराये और कहा आ जाइए, हम भी आ जायेंगे। और फिर दिनांक 07 अगस्त, 2007 अटल जी और आडवाणी जी के द्वारा दोनों अंको का विमोचन नई दिल्ली में संपन्न हुआ। अटल जी जैसे श्रेष्ठ वक्ता के सामने हमें कार्यक्रम संचालन का आशीर्वाद भी प्राप्त हुआ। विधि का विधान अगस्त 1947 में राष्ट्रधर्म से प्रारम्भ हुई उनकी यह सामाजिक यात्रा 07 अगस्त 2007 को राष्ट्रधर्म के जनसंघ और भाजपा विशेषांक के लोकार्पण के साथ समाप्त हुई। अटल जी का यह अन्तिम सार्वजनिक कार्यक्रम था।

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