गहरे संदेश देती ‘कंजक: द गर्ल विदाउट अ नेम’

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विवेक शुक्ला

हिंदुओं के लिए नवरात्रि सिर्फ़ त्योहार नहीं, एक गहरी भावना है जो हमारी संस्कृति में बसी हुई है। साल में दो बार मनाया जाने वाला यह त्योहार अष्टमी या नवमी पर कंजक या कन्या पूजन के साथ खत्म होता है। इस दिन घर में नौ छोटी लड़कियों और एक लड़के (जिसे अक्सर लोंकड़ा कहते हैं) को बुलाया जाता है और उन्हें मां दुर्गा का जीवंत रूप मानकर पूजा जाता है। उन्हें पूढ़ी, हलवा, चना खिलाया जाता है, उपहार दिए जाते हैं और उनके पैर छुए जाते हैं। यह रस्म शुद्धता, भक्ति और स्त्री शक्ति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है।

यह रस्म बहुत पवित्र और प्यारी है, लेकिन इसमें कुछ सामाजिक बारीकियां और रोज़मर्रा की मुश्किलें भी छिपी हैं। इन्हीं बातों को बहुत खूबसूरती से दिखाया गया है फिल्म ‘कंजक: द गर्ल विदाउट अ नेम’ में। यह फिल्म सच्चिदानंद जोशी की कहानी पर आधारित है। राहुल यादव ने इसे बहुत संवेदनशीलता से निर्देशित किया है। यह हाल ही में रिलीज़ हुई एक छोटी लेकिन गहरी छाप छोड़ने वाली कहानी है, जो दिल्ली के एक मध्यमवर्गीय घर में दुर्गा पूजा के दौरान घटित होती है।

पूजा से पहले का हंगामा

कहानी की मुख्य किरदार हैं एक सम्मानित और धार्मिक महिला, जिन्हें सब प्यार से ‘आंटी’ कहते हैं। मालविका जोशी ने इस रोल को बहुत शिद्दत से निभाया है। आंटी कन्या पूजन की हर छोटी-बड़ी तैयारी पूरी लगन से कर रही हैं लेकिन सुबह होते ही सब उल्टा-पुल्टा हो जाता है। घर की मदद करने वाली मीना नहीं आती। प्लेटें, चढ़ावा, यहां तक कि पूजा की दरी भी गायब हो जाती है। घर वाले बेचैन और चिढ़े हुए हैं।

आंटी की घबराहट बढ़ती जाती है। उनकी यह परेशानी एक गहरी सच्चाई दिखाती है।औरतों पर ही अक्सर संस्कृति और धर्म की रस्मों को पूरी तरह निभाने का बोझ पड़ता है। रस्म की पवित्रता खतरे में लगती है और घर का माहौल तनाव से भर जाता है। फिल्म इन घरेलू बातों को बहुत सच्चाई से दिखाती है—छोटी-छोटी चिढ़, पीढ़ियों का फर्क, और नीचे-नीचे छिपी भक्ति—बिना ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर। जो शुरू में घरेलू हंगामे जैसी हल्की-फुल्की कॉमेडी लगती है, वो धीरे-धीरे बहुत गहरी सोच वाली बात बन जाती है।

अचानक आई वो रहस्यमयी दीदी

जब तनाव चरम पर पहुंचता है, तभी एक युवती जिसे सिर्फ़ ‘दीदी’ कहा जाता है, अचानक आ पहुंचती है—और ठीक नौ लड़कियों के साथ। उसका आना ऐसा लगता है जैसे भगवान ने खुद भेजा हो। वो शांत और आत्मविश्वास से भरी हुई है। वो गायब चीज़ें ढूँढ निकालती है, सबको बैठाती है, बच्चों से प्यार से बात करती है और आंटी को ढाढ़स बंधाती है। एक पल में सब बदल जाता है। घर जो तनाव से भरा था, अब गर्मजोशी और सुखद माहौल से भर जाता है। लड़कियां हंसती-खेलती हैं, गाती हैं और पूजा में खुशी-खुशी हिस्सा लेती हैं। दीदी की शांत कार्यक्षमता और संयम से रस्म सिर्फ़ रस्म नहीं रह जाती, बल्कि सच्ची भक्ति और एकता का रूप ले लेती है।

ये लड़की (सवलीन कौर) घर की मालकिन आंटी से बात करते हुए एक कड़वी सच्चाई कह देती है—हमने अपनी नदियों को बहुत गंदा कर दिया है। उसकी बात उत्सव की खुशी में चुभ जाती है। खासकर दिल्ली में, जहां कंजक के बाद लोग यमुना किनारे जाकर बचे-खुचे प्रसाद को बहा देते हैं—और यही नदी को और गंदा करते हैं।

यह पल हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या बिना ज़िम्मेदारी वाली रस्म सच में भगवान की इज़्ज़त करती है?

एक आध्यात्मिक मोड़

पूजा खत्म होने पर माहौल गंभीर हो जाता

है। कबीर का भजन धीरे-धीरे बजता है:

“मोको

कहाँ ढूंढे रे बंदे, मैं तो तेरे पास में।”

यह भजन फिल्म के मुख्य संदेश को

रेखांकित करता है। बिना ज्यादा खुलासा किए, कहानी

में दीदी की असलियत का एक दमदार ट्विस्ट आता है। यह ट्विस्ट कहानी को घरेलू सच्चाई

से आध्यात्मिक प्रतीक तक ले जाता है। यह बताता है कि भगवान सिर्फ़ बड़ी-बड़ी

रस्मों या दूर की मूर्तियों में नहीं,

बल्कि

इंसानी रिश्तों, दया और सच्ची श्रद्धा

में बसता है। ‘बिना नाम वाली लड़की’ एक प्रतीक बन जाती है—उस पवित्रता की, जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं।

क्लाइमेक्स ड्रामेटिक नहीं, बल्कि सोचने वाला है। फिल्म खत्म होने के बाद भी दिमाग में घूमती रहती है।

रस्म से परे भक्ति

सच्चिदानंद जोशी की कहानी सामाजिक टिप्पणी के लिए जानी जाती है और फिल्म ने उसे अच्छे से अपनाया है। यह समावेशिता, औरतों की संस्कृति बचाने की भूमिका, और जाति-वर्ग-धर्म की दीवारों को तोड़ने की बात करती है। यह सवाल उठाती है कि क्या सिर्फ़ यांत्रिक रस्में करने से भक्ति बची रहती है, या असली भक्ति तो सहानुभूति और खुले दिल में है।

राहुल यादव का निर्देशन हास्य, कोमलता और दर्शन के बीच संतुलन बनाए रखता है। गति तेज़ है, एक्टिंग स्वाभाविक है और कहानी बिना बनावटी के है। मालविका जोशी ने आंटी के घबराहट से आश्चर्य तक के सफर को खूबसूरती से निभाया है। बच्चे भी बहुत सहज और मासूम लगते हैं।

‘कंजक: द गर्ल विदाउट अ नेम’ सिर्फ़ त्योहार वाली शॉर्ट फिल्म नहीं है। यह एक कोमल याद दिलाती है कि सच्ची भक्ति कठोर रस्मों में नहीं, बल्कि इंसानियत में है। आजकल जब त्योहार दिखावा बन जाते हैं, यह फिल्म हमें भक्ति का असली मतलब फिर से याद दिलाती है। यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि हम भगवान को कहाँ ढूँढते हैं। शायद वो दूर नहीं, हमारे बगल में ही है—बिना नाम का, अनदेखा, लेकिन बहुत असली। अपने शांत और सादे अंदाज़ में यह फिल्म भारतीय परंपरा, सामाजिक सोच और सार्थक कहानी का बेहतरीन मिश्रण है। जो भारतीय संस्कृति, सामाजिक मुद्दों और अच्छी कहानी पसंद करते हैं, उनके लिए यह फिल्म ज़रूर देखने लायक है—दिल को छूने वाली और लंबे समय तक याद रहने वाली।

(लेखक, जाने-माने पत्रकार और स्तंभकार हैं।)

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