कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने के बाद भुगतान रोके रखना उल्लंघन नहीं: हाईकोर्ट

न्याय

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जोधपुर, 01 जनवरी (हि.स.)। राजस्थान हाईकोर्ट ने लिमिटेशन एक्ट (परिसीमा अधिनियम) के तहत एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने के बाद भुगतान रोके रखना उल्लंघन नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने उदयपुर कॉमर्शियल कोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें राजस्थान स्टेट रोड डेवलपमेंट एंड कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन (आरएसआरडीसी) को ठेकेदार कंपनी को करीब 41 लाख रुपए ब्याज सहित चुकाने का आदेश दिया गया था। जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस अनुरूप सिंघी की खंडपीठ ने आरएसआरडीसी की अपील को स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया। मामला उदयपुर में सज्जनगढ़ बायोलॉजिकल पार्क के निर्माण कार्य से जुड़ा है।

आरएसआरडीसी ने मैसर्स प्रमाण कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड को 1 सितंबर 2009 को 2.74 करोड़ रुपए का वर्क ऑर्डर दिया था। यह काम 16 सितंबर 2009 से शुरू होकर 11 माह में 15 अगस्त 2010 तक पूरा होना था, लेकिन काम के दौरान ड्रॉइंग, प्रगति और शर्तों को लेकर विवाद खड़े हुए और कॉरपोरेशन ने 23 सितंबर 2010 को कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर 13 लाख रुपए की पेनल्टी लगाते हुए 6 अक्टूबर 2010 को फाइनल माप का कार्य पूरा कराया। ठेकेदार कंपनी ने अंतिम बिल के भुगतान, सिक्योरिटी रिफंड और पेनल्टी निरस्त करने की मांग करते हुए 10 दिसंबर 2015 को, यानी एग्रीमेंट खत्म होने के 5 साल बाद सिविल सूट दायर किया। जिसे बाद में कॉमर्शियल कोर्ट, उदयपुर को ट्रांसफर कर दिया गया। उदयपुर की कॉमर्शियल कोर्ट ने 5 जून 2024 को ठेकेदार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए आरएसआरडीसी को फाइनल बिल के 27.66 लाख और सिक्योरिटी डिपॉजिट के 13.56 लाख रुपए 9 प्रतिशत ब्याज के साथ चुकाने का आदेश दिया था, जिसे अब हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है।

आरएसआरडीसी के वकील ने तर्क दिया कि लिमिटेशन एक्ट के तहत पैसा वसूलने का केस तीन साल के भीतर किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि जब वर्ष 2010 में कॉन्ट्रैक्ट खत्म हो गया और फाइनल नाप-जोख हो गई, तो वाद का कारण उसी समय पैदा हो गया था। ऐसे में वर्ष 2013 तक ही केस किया जा सकता था, जबकि ठेकेदार ने वर्ष 2015 में केस फाइल किया जो कि कानूनन गलत है। प्रतिवादी (ठेकेदार) के वकील ने तर्क दिया कि अधिकारियों द्वारा भुगतान रोके रखना लगातार जारी उल्लंघन की श्रेणी में आता है, इसलिए लिमिटेशन का नियम लागू नहीं होता। वकील ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2013 में विवाद निपटारा समिति के सामने भी आवेदन किया था और लगातार पत्र लिखते रहे, इसलिए उनका दावा सही है।

कोर्ट ने कहा कि 23 सितंबर 2010 को कॉन्ट्रैक्ट रद्द होने और 6 अक्टूबर 2010 को अंतिम माप हो जाने के बाद दोनों पक्षों के बीच संविदात्मक संबंध समाप्त हो गए और ठेकेदार का कारण-ए-कार्रवाई अधिकतम 6 अक्टूबर 2010 तक ही पैदा हुआ माना जाएगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लिमिटेशन एक्ट की तीन साल की अवधि अक्टूबर 2013 में समाप्त हो गई थी, ऐसे में 7 अक्टूबर 2013 को क्लॉज 23 के तहत एम्पावर्ड स्टैंडिंग कमेटी को रेफरेंस की मांग करना भी समय-सीमा से बाहर था और इस तरह की प्रक्रिया न तो दावा करने की नई वजह बना सकती है और न ही समय पार दावे को पुनर्जीवित कर सकती है। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि महज अधिकारियों को ज्ञापन देने या पत्राचार करने से लिमिटेशन की अवधि नहीं बढ़ती। कोर्ट ने कहा कि भुगतान रोके रखना आर्टिकल 55 के तहत निरंतर उल्लंघन नहीं है, बल्कि यह एक बार घटित होने वाली घटना है जो वर्ष 2010 में हो चुकी थी। कोर्ट ने कॉमर्शियल कोर्ट के उस आदेश को भी गलत माना, जिसमें कॉरपोरेशन पर 27 लाख 66 हजार 879 रुपए फाइनल बिल के, 13 लाख 56 हजार 864 रुपए सिक्योरिटी रिफंड के और 9 फीसदी वार्षिक ब्याज सहित देनदारी तय की गई थी और 13 लाख रुपए की पेनल्टी को रद्द कर दिया गया था। बेंच ने कहा कि लिमिटेशन जैसे बुनियादी मुद्दे पर गलत निष्कर्ष के कारण कॉमर्शियल कोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर समय पार सूट को डिक्री में बदल दिया, जिसे अपीलीय अदालत में टिकने की अनुमति नहीं दी जा सकती। डिवीजन बेंच ने कॉर्पोरेशन की अपील को मंजूर करते हुए कॉमर्शियल कोर्ट का 5 जून 2024 का पूरा जजमेंट और डिक्री आदेश रद्द कर दिया।

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